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Monday, 29 August 2016

भिक्षावृत्ति- अतिरिक्त आय के साधनरूप में !

           कोलकाता के उपनगर बैरकपुर के समीपस्थ इच्छापुर - नवाबगंज में सप्ताह में दो दिन साप्ताहिक सब्जी बाजार लगता है। मैं वहाँ अपनी  तैनाती के दौरान प्रत्येक रविवार सब्जी लेने जाया करता था। सब्जी लेने मैं साइकिल से जाया करता था और सब्जी बाजार में जहाँ मैं साइकिल खड़ी करता था, वहीं एक लंगडा भिखारी पहले से  बैसाखी लिए खड़ा रहता था । मेरे वहाँ पहुँचते ही वह हाथ फैला दिया करता था । मलिन चेहरा,बढी हुई दाढी, चेहरे पर दैन्यता का भाव! मुझे कभी-कभी कोफ्त भी होती । आते ही आते पहले इस बंदे का सामना करना पडता है ।
 
          एक दिन श्रीमतीजी मेरे साथ गईं । सब्जी खरीदने केपश्चात  बोलीं- 'झोले भारी हो गए हैं ,कोई रिक्शा मिल जाता तो अच्छा रहता।' वह इधर- उधर देखने लगीं और जैसे ही उनकी निगाह भिखारी पर पड़ी प्रसन्न हो गईं । यह बोलते हुए कि 'वो रिक्शे वाला है ',  उधर लपकीं । 'अरे वो भिखारी है' मैंने कहा । 'नहीं वो रिक्शे वाला है', श्रीमतीजी बोलीं । मैंने कहा- 'लंगडा है रिक्शा कैसे चलाएगा?' 'चलाएगा'- श्रीमतीजी बोलीं। तब तक वो भिखारी के पास पहुँच गईं ।  दोनों में दुआ-सलाम और मित्रवत बातचीत ने उनके पहले से परिचित होने का संकेत दिया । श्रीमतीजी  बोलीं- 'घर चलना है,रिक्शा लेकर आए हो ? कहाँ है?'  'अभी लेकर आता हूँ, मेम साहब' भिखारी हँसकर बोला, उसके चेहरे से सारा दैन्य भाव गायब हो चुका था । हम लोग बाजार से बाहर आए और वो बंदा रिक्शा लेकर आ गया । रिक्शे में ही उसने बैसाखी एक जगह फिट कर दी । जब श्रीमती जी ने पैसे की बात की तो बोला- 'मेम साहब आप जितना हमेशा देती हैं वही दीजिएगा, ज्यादा थोड़े लूँगा।' फिर अपने एक सीधे और एक लंगडे पैर से रिक्शा चलाते हुए हम दोनों को घर पहुँचा दिया । श्रीमतीजी ने उसे कुछ पैसे ज्यादा दिये और मुझे बताया कि उसके पैरों को देखते हुए हमेशा उसे पैसे ज्यादा देती हैं ।
 
           उस दिन मुझे पता लगा कि भीख माँगने का उपयोग साइड बिजनेस के तौर पर भी होता है और जिसे मैं भिखारी समझता था वह वस्तुत: भिक्षावृत्ति का उपयोग  अतिरिक्त आय के साधनरूप  करता था । वैसे उस दिव्यांग रिक्शा वाले उर्फ भिखारी के जज्बे को मेरा सलाम है!

दशरथ माझी से दाना माझी तक! (कविता)


माझी वह भी था माझी तुम भी हो
वह दशरथ था तुम दाना हो
उसने पहाड पार किया था
पत्नी को बचा लेने की आस में
तुम  कंधों पर जीवंसंगिनी
और साथ में बेटी को ले
पैदल निकल पडे
चौंसठ किलोमीटर रास्ता तय करने

अमंगदेई को  सती के समान
कंधों पर
शिववत लिए हुए
तुममें नहीं था
कोई रोष
कोई प्रतिकार की भावना नहीं
पत्नी वियोगी शिव ने तो दक्ष के यज्ञ
का कर दिया था विध्वंस

पत्नी को
अंतिम यात्रा कराते हुए
शीघ्र घर पहुँचने के लिए
थी उत्कंठा
ताकि अमंगदेई की ठंडी देह
प्रकृति को समर्पित कर सको
प्यार और सम्मान के साथ
अपने सामाजिक संस्कारों के साथ

पर तुम्हारे
ये ऐकांतिक क्षण
तुम्हारे न रह सके
उन्होंने झकझोर दिया है
उस समाज को
जो गरीबी
और भुखमरी देखकर
विचलित नहीं होता

अब नेता और पत्रकार
आते रहेंगे
तुम्हारे द्वार
आर्थिक सहायता की
होती रहेगी घोषणा
अमानवीय
कौन-कौन है
इसकी होगी गवेषणा

पर दाना
इस भुलभुलैया में तुम
अपना दानापन नहीं खोना
तुम दशरथ बनना
नया रास्ता बनाने का
हौसला रखना
अपनी दृढता, खुद्दारी
और हिम्मत नहीं खोना

सरलता तुम्हारे जैसे सीधे-सादे
आदिवासी की पूँजी हैं
इस सरलता में
वह शक्ति है
जो गहलौर से वजीरगंज पहुँचना
सहज बना देती है
पहाड को काट कर
रास्ता बना देती है


तुम्हारे सदृश दशरथ और दाना
इस देश के तमाम कोनों में
बिखरे हुए हैं
पर आँखें रहते न देखने का अभ्यस्त
यह समाज उन्हें कभी नहीं देखता
यह तभी देखता है
जब किरकिरी सा आँखों में गड
कोई मन को झंझोडता है

तुम्हें शवसंगी पथिक रूप में देखकर
दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र
लोककल्याणकारी राज्य
समाजवादी गणतंत्र
उन्नतशील राष्ट्र
सातवाँ बडा धनिक देश
सब झूठा लगता है
दंभ भरा ढकोसला लगता है
      - संजय त्रिपाठी












Tuesday, 16 August 2016

स्वतंत्रता का सत्तरवाँ पर्व मनाएँ !

70वें स्वतंत्रता दिवस पर सभी को हार्दिक बधाई!

आओ तज धर्म-जाति का बंधन
एक पंक्ति में खड़े हो जाएं
आज फिर वीरों को याद करें
और तिरंगा प्यारा लहराएं।।

राजनीति छोड़ देश का विकास
हो ध्येय राजनीतिज्ञों को समझाएं
जोड़- तोड़ से नहीं, काम करोगे
तभी मिलेंगे वोट आओ इन्हें बताएँ।।

सांप्रदायिकता और जातिवाद से नहीं
सियासतदाँ जनता को भरमाएं
चैन से न बैठे कोई , जब तक
गरीबी और अशिक्षा से सब न मुक्ति पाएं।।

सभ्यता और संस्कृति का यह देश,
असभ्यता की बातें न इसको भाएं
संसद है देश के लोकतंत्र का आइना
आओ सड़कतंत्र से इसे बचाएं ।।

प्रहार करो,शब्दाघात करो पर
कमर के नीचे न वार करो इन्हें बताएँ
संसद है देश के सेवाव्रतियों के लिए
सत्ता और विपक्ष मिल कर इसे चलाएं।।

छल-प्रपंच में उलझी राजनीति
नीचे गिरने की अब तोड़ती सीमाएं
संसद में करो सार्थक बहस,
सब मिल- बैठ देश को आगे बढाएं ।।

मजहब के नाम पर देश बँटा एक बार
फिर न बँटेगा संकल्प यही दुहराएं
गंगा और सिन्धु में बह चुका बहुत है पानी
नापाक पड़ोसी को सख्त भाषा में बतलाएं।।

देशहित में काम करने का सब लें संकल्प,
यही राजनीतिज्ञ भी दुहराएं
निराशा से रख ऊपर आशा, चलो
स्वतंत्रता का सत्तरवाँ पर्व मनाएँ।।
           -संजय त्रिपाठी