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Sunday, 24 July 2016

जम्मू एवं काश्मीर समस्या की पृष्ठभूमि (विमर्श)

कमलाकान्त त्रिपाठी जी :
Krishna Chandra Pandey ji, तथ्यों के अपने निष्कर्ष होते हैं। सबूत नहीं है पर समकालीन सुधी लोगों का अनुमान था कि नेहरू के लिए जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान में जाना एक दुःस्वप्न सरीखा था। दो कारण - शेख अब्दुल्ला से मित्रता और अपनी कश्मीरियत और कश्मीर के प्रति सहज, मानवीय भावात्मक लगाव। यह तथ्य है कि पटेल जम्मू और कश्मीर को पाकिस्तान में जाने की स्थिति से reconciled थे, क्योंकि जूनागढ़ और हैदराबाद के प्रति उनके रुख़ की यह स्वाभाविक परिणति थी और वे इतने अंतर्विरोधी व दोहरे मानदंड वाले नहीं थे। कहा तो यहां तक जाता है कि नेहरू का कश्मीर लगाव ही वह कारक था जिसके चलते रेडिक्लिफ़ द्वारा जल्दबाजी में सीमा-रेखा खीचते समय मुस्लिम-बहुल गुरुदासपुर को हिन्दुस्तान में और उसकी नैतिक काट के तौर पर लाहौर की हिन्दू-बहुल कैनाल कालोनी को पाकिस्तान में डालने का निर्णय लिया गया। इसके बिना जम्मू कश्मीर में भारत का स्थल मार्ग से प्रवेश संभव नहीं था। कश्मीर को मैदान से जोड़नेवाले दोनों प्राकृतिक और पारंपरिक मार्ग भावी पाकिस्तान से होकर ही जाते थे और उन्हीं से उसकी सारी आपूर्ति होती थी। रेडिक्लिफ पर प्रभाव का रूट कहा जाता है--नेहरू-एडविना-माउंटबैटन-रेडिक्लिफ़। जैसे भी हुआ, एक बार विलय हो जाने के बाद पटेल को विलय में पूरा involvement हो गया और उन्हें उसका U N O में ले जाना गवारा नहीं था। महाराजा के साथ हो रहे अन्याय के प्रति भी उन्हें अंत तक तीव्र आक्रोश रहा क्योंकि वे शेख को विश्वसनीय नहीं पाते थे जो अंतत: सही साबित हुआ। पर पटेल कुछ कर नहीं सकते थे क्योंकि नेहरू ने कश्मीर को गृह मंत्रालय से निकालकर परराष्ट्र मंत्रालय में रख लिया था जो उनका खुद का पोर्टफोलियो था।


मेरी प्रतिक्रिया:
मैंने जो कुछ पढ़ा है उसके अनुसार जम्मू-काश्मीर को भारत में शामिल करने की नेहरूजी की उत्कट अभिलाषा थी। इसके लिए नेहरू ने एक ओर शेख अबदुल्ला का सहारा लिया और दूसरी ओर ब्रिटिश कर्ता-धर्ता जन के साथ अपने संबन्धों का उपयोग किया। पुस्तकें अभी मेरे पास नहीं हैं और याददाश्त भी धोखा दे रही है इसलिए विस्तार में नहीं जा पाऊँगा। माउंटबेटन पूरी तरह मानते थे कि काश्मीर को पाकिस्तान में जाना चाहिए । जिन्ना इसके प्रति आश्वस्त थे। आजादी के कुछ महीनों बाद जब महाराजा से जिन्ना ने काश्मीर प्रवास और इसके लिए व्यवस्था करने को कहा तो महाराजा ने इन्कार कर किया। इससे जिन्ना हतप्रभ रह गए। पर महाराजा अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए रखना चाहते थे, वे भारत में आने के लिए भी तैयार नहीं थे। जब कबायलियों की आड़ में पाकिस्तानी हमले ने महाराजा को मजबूर कर दिया तो वे भारत में आने के लिए सहमत हुए। नेहरूजी ने अपने प्रभाव का उपयोग कर माउंटबेटन को काश्मीर के भारत में आने देने के लिए सहमत किया। पर वे अंतरतम से इसके पक्ष में नहीं थे।शेष नेहरु-एडविना-रेडक्लिफ तिकडी का आपने उल्लेख किया ही है। महाराजा की शुरू की हीलाहवाली ने पाकिस्तान को कबायलियों की आड़ में हमले का अवसर मुहैया कराया और इसके बाद महाराजा की महत्वाकांक्षाएं धाराशायी हो गईं तथा वे भारत में आने के लिए तैयार हुए। तदुपरांत वे स्ट्रेटिजिक गल्तियाँ हुईं जिनके परिणामस्वरूप एक तिहाई काश्मीर पाकिस्तान के पास चला गया। इनका उल्लेख आपने किया है। पर इस सबके बावजूद यदि नेहरूजी को दो-तिहाई काश्मीर के भारत मे आने के श्रेय से भी वंचित किया जाता है तो संभवतः यह उनके साथ नाइंसाफी होगी।

परमेश्वर रूँगटा :
I am clear in my mind that Nehru was primarily responsible for the Kashmir problem. Sanjay Tripathiji, you want to give credit to Nehru for retaining 2-3rd of Kashmir with India, but it is this 2-3rd which has created problems for us since independence. Over the years the problem has become more acute. Can we honestly say that this 2-3rd of Kashmir has become ours? The ground situation is quite different. As far as the Kashmir valley is concerned, it is India's only for namesake. The sooner we accept this ground reality, the better for us. Perhaps the best solution of the Kashmir issue could have been partition of the state on the lines of Punjab and Bengal, India retaining the Hindu majority Jammu and the valley and rest of Kashmir going to Pakistan. I think Pakistan would have accepted this. Even now Pakistan is eyeing the Kashmir valley only. It is not keen for Jammu. Even now this solution can be tried if there is statesmanship on both sides.

मेरी प्रतिक्रिया :
Roongta Sahab I am in agreement with you upto some extent. Many a times similar thought occurs to me. Just as in a venture it is better to shed away loss making part, would it be better to shed Kashmir valley away? As far as I rememher, during Vajpayee regime similar solution on the line of trifurcation of J& K in Muslim, Hindu and Buddhist area and then reaching on some sort of solution with Pakistan by making Muslim area accessible to them was suggested by some RSS quarters and it was actively considered at that time. But there are two things. First there would be an uproar in the country and whosoever suggests the same would be termed as a traitor. Secondly within a few years of independence it could have been an ideal solution but now any such solution would create a backlash against the Muslim community all over the country and that may complicate the problem on communal lines. Now it is an emotive issue directly linked to integrity of the nation. It is also akin to accepting Jinna's two nation theory. Third it may encourage  separatists in other parts of the country.

So far as Nehru is concerned I'm neither his supporter nor detractor. But my view is- any historical evaluation has to be neutral and based on facts. It is a fact that but for Nehru's emotional attachment and his firmness on that count with Mountbaten, Kashmir would have never been an Indian territory. On moral ground when we claimed Hyderabad and Junagarh as ours we should have allowed Pakistan to have Kashmir on the same grounds. To overcome this moral dilemma Nehru took Shekh Abdullah on his side. Many a times it also occurs to me, when Nehru made a case for Kashmir to be with India, why didn't he make a similar case for NWFP to be with India where a Congress Govt. was ruling. That is because the kind of emotitonal attachment he felt for J & K he did not have for NWFP.


 So far as delay in sending forces to Kashmir after Pakistani attack in garb of tribals is concerned, I don't think Nehru and Patel differed. Looking at the Maharaja Hari Singh's wayward ways neither Nehru nor Patel could feel assured by his verbal assurances and therefore insisted upon signing accession treaty before dispatching forces to J & K. No doubt Nehruji committed strategic mistakes but I'm not in agreement if due to those he is painted as a villain and an effort is made to discredit him totally.A rightist propaganda on these lines is being made and efforts are being made to blame Nehru for every ill of the country. Again I would like to make it clear that I'm neither a leftist nor a rightist, neither a committed Congress Supporter nor a committed BJP or RSS supporter. My effort is just to evaluate the history without wearing any sort of tinted glasses.

कृष्णचंद्र पांडेय :
आदरणीय रूंगटा जी एवं त्रिपाठी जी,आप लोगों जैसे बुद्धिमान एवं अनुभवी लोगों से ऐसी बातें सुनकर आश्चर्य व दुःख होता है। आप कहाँ- कहाँ से हटेंगे। समस्या का हल खोजने की बजाय उससे भागना समस्या का हल नहीं , उसकी जटिलता को बढ़ावा देना और उसका विस्तार करना है। आप के अनुसार किये जाने वाले कश्मीर के हल से खालिस्तान, तमिलनानाडु, उत्तर पूर्व और अंततः बंगाल और तेलंगाना जैसी दो दर्जन समस्यायें खड़ी हो जाएँगी। कश्मीर की समस्या का केवल एक हल है, वह है धारा 370 का खात्मा। इस तथ्य को जितनी जल्दी लागू करेगें उतनी जल्दी समस्या का समाधान होगा । मैं किसी राजनितिक दल का सदस्य नहीं हूँ । मैंने काश्मीर में कुछ वर्ष बिताए हैं। जब कोई लगातार गलती करते हुए उसको सुधारने की कोशिश नहीं करेगा तो वही होगा जो हो रहा है। मैं अपने पूरे विश्वास से कहता हूँ कि जिस दिन राज्य सभा में बीजेपी और शिवसेना तथा पैंथर पार्टी की इतनी संख्या हो जायेगी की वह सविधान संशोधन पास करा सके, उस दिन धारा 370 ख़त्म होगी और वहीं से काश्मीर समस्या का समाधान की शुरूआत होगी। आप से निवेदन है कि कृपया उन सुझाओं को मत व्यक्त करें क्यों कि सोशल साइट को देखने वाले वे लोग भी हैं जो इस तरह के विचारों की ताक में रहते हैं और बाद में।इसे समूह की आवाज बता कर प्रचारित करते हैं ,इसका कहीं न कहीं गलत संदेश जाता है।

मेरी प्रतिक्रिया :
पांडेयजी आपकी बात सही है कि जम्मू एवं काश्मीर का विभाजन समस्या का सटीक हल नहीं है। यह समस्या का अति सरलीकरण है। इसमें क्या समस्याएँ हैं इसका उल्लेख मैंने ऊपर अपनी टिप्पणी में किया है। देश के विभाजन के समय जो माहौल बना था, उसी समय इस तरह का कोई समाधान किसी प्रकार की अन्य समस्या उत्पन्न नहीं करता। अब इस तरह का कोई भी समाधान नई समस्याएँ पैदा करेगा । पर यह एक तथ्य है कि अटल जी की सरकार के समय इस लाइन पर काश्मीर समस्या के हल के बारे में पर्दे के पीछे विचार किया गया था। आज की स्थिति में पाकिस्तान कुछ भी पाकर संतुष्ट होने वाला नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान के साथ संबन्ध सुधार के लिए उस हद तक गए हैं जहाँ तक के लिए उनसे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती थी। पर नतीजा सिफर रहा है। पाकिस्तान में सत्ता के कई केन्द्र होने के कारण पाकिस्तान के साथ बातचीत कर संभवतः कोई कारगर समाधान नहीं निकलेगा। तो चारा यही है कि पाकिस्तान को मुँहतोड जवाब देने में सक्षम बनिए, काश्मीरियों के हृदय परिवर्तन का प्रयास करते रहिए, अलगाववादी तत्वों से कड़ाई से निपटिए। यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहेगी, अत: लंबे समय तक इसे झेलते रहने और इसके प्रतिकार के लिए तैयार रहिए।किसी भी प्रकार के कैंसर का इलाज खर्चीला और लंबा होता है तथा कैंसर ठीक होगा या नहीं या ठीक होने में कितना समय लेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है। रूँगटा साहब ने कैंसर की सर्जरी वाला इलाज बताया है। पर कैंसर के मामले में कई बार सर्जरी कारगर नहीं होती या फिर रोग दोबारा उभर आता है।यह भी विचार करने वाली बात है कि 1989 के बाद हम क्या-क्या गल्तियाँ करते रहे कि हालात बिगड़ते गए और अब पुराना समय फिर कैसे लाया जा सकता है। पाकिस्तान के अलगाववादी तत्वों को सक्रिय समर्थन दीजिए। पाकिस्तान की दुम दबाने के लिए यह जरूरी है।

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