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Monday, 14 March 2016

संविधानसभा द्वारा हिन्दी सर्वसम्मति से राजभाषा चुनी गई थी (आलेख)

 ~ संविधानसभा द्वारा हिन्दी सर्वसम्मति से राजभाषा चुनी गई थी (आलेख) ~
         हिन्दी को लेकर एक प्रकार की भ्रांति  फैली हुई है कि संविधानसभा में हिन्दी मात्र 1 वोट के बहुमत से राजभाषा चुनी गई जबकि तथ्य यह है कि हिन्दी सर्वसम्मति से राजभाषा चुनी गई थी। हिन्दी के राजभाषा बनने की संवैधानिक पृष्ठभूमि और संविधानसभा द्वारा राजभाषा के प्रश्न को कैसे हल किया गया नीचे इसकी चर्चा की गई है।
        सन 1946 में संविधान सभा की प्रथम बैठक के समय अधिकांश प्रमुख नेता हिन्दुस्तानी को राजभाषा बनाए जाने के पक्ष में थे। उस समय तक यह स्पष्ट नहीं था कि पाकिस्तान बनेगा या नहीं। विभाजन को रोकने के प्रयास चल रहे थे।
          14 जुलाई, 1947 को संविधानसभा की चौथी बैठक हुई। इस समय तक यह स्पष्ट हो चुका था कि पाकिस्तान बनने जा रहा है। इसलिए सेठ गोविंददास और पी डी टंडन जैसे संविधान सभा सदस्य और उनके समर्थक जो अब तक देश की एकता को ध्यान में रखते हुए हिन्दुस्तानी का समर्थन कर रहे थे खुलकर हिन्दी के पक्ष में आ गए। इस बारे में जब समझौते के प्रयास असफल हो गए तो मतदान कराया गया। हिन्दुस्तानी के समर्थकों को गहरा धक्का लगा क्योंकि 63 वोट हिन्दी के पक्ष में पड़े जबकि 32 वोट हिन्दुस्तानी के पक्ष में पड़े। लिपि के लिए भी मतदान कराया गया जिसमें 63 वोट देवनागरी के पक्ष में पड़े और 18 वोट इसके खिलाफ पडे( संदर्भ : हिन्दुस्तान टाइम्स 17 जुलाई 1947) । सरदार पटेल को मत विभाजन की स्थिति को देखते हुए लगा कि यदि इस समय भाषा के मुद्दे को महत्व दिया जाता है तो इससे अन्य मुद्दों पर भी असर पड़ेगा। इसलिए उनके सुझाव पर इस मुद्दे पर विचार टाल दिया गया। सेठ गोविन्द दास ने इसकी आलोचना भी की ( संदर्भ- सेठ गोविन्द दास: आत्म निरीक्षण,भाग 3 पृ.121)।
          5 अगस्त 1949 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने इस आशय का एक प्रस्ताव पास किया कि अखिल भारतीय उद्देश्य के लिए एक राजभाषा होगी जिसमें संघ के कार्य संपादित किए जाएंगे।हिन्दी के समर्थकों को इससे बड़ी निराशा हुई। सेठ गोविन्ददास ने दिल्ली में 6-7 अगस्त 1949 को एक राष्ट्रभाषा सम्मेलन आयोजित किया जिसमें विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्यकार शामिल हुए। इस सम्मेलन में माँग की गई कि देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया जाए।
          पूरे अगस्त माह के दौरान इस बात के प्रयास किए गए कि राजभाषा के प्रश्न पर मतैक्य बन जाए। प्रमुख मतभेद लिपि के प्रश्न पर था क्योंकि कुछ लोग अरबी लिपि को और कुछ लोग रोमन लिपि को अपनाने का भी सुझाव दे रहे थे।बहुमत हिन्दी के पक्ष में था फिर भी कुछ लोग अभी भी राष्ट्रीय एकता के परिप्रेक्ष्य में हिन्दुस्तानी के पक्षधर थे ( संदर्भ- कानस्टीट्यूशनल असेम्बली रिपोर्ट वोल्यूम 7,पृ 321)। 16 अगस्त 1949 को डा राजेन्द्र प्रसाद ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी का समर्थन किया ।परन्तु उनका कहना था कि हिन्दी को अन्य भारतीय एवं विदेशी भाषाओं के शब्दों को भी ग्रहण करना चाहिए । उन्होंने यह भी कहा कि कुछ समय तक जो लोग चाहें उन्हें उर्दू लिपि का प्रयोग करने की भी अनुमति दी जाए ( संदर्भ- हिन्दुस्तान टाइम्स, 21 अगस्त 1949)। हिन्दी समर्थक समूह अंकों के लिए देवनागरी लिपि के मामले पर अडिग था। 16 अगस्त को कांग्रेस के संविधान सभा के सदस्यों की बैठक हुई जिसमें अंकों की लिपि के प्रश्न पर मतदान हुआ। 75 मत अंकों की देवनागरी लिपि के पक्ष में पड़े तथा 74 मत अंकों के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप के पक्ष में पडे। 
         डा के एम मुंशी, गोपालास्वामी आयंगार तथा डा श्यामाप्रसाद मुखर्जी को भाषा के प्रश्न पर सर्वसहमति बनाने की जिम्मेदारी दी गई। 2 सितम्बर 1949 को संविधानसभा के कांग्रेस सदस्यों की बैठक हुई जिसमें मुंशी- आयंगार फार्मूला प्रस्तुत किया गया। पर सभा में सहमति नहीं बन पाई,वोटिंग हुई और 77-77 से मामला टाई पर अटक गया। अतः कांग्रेस के सदस्यों को संविधान सभा में अपने विवेकानुसार मतदान की छूट दी गई।
          12 सितंबर 1949 को भाषा के प्रश्न पर विचार करने के लिए संविधानसभा की बैठक हुई। सभा के अध्यक्षता के तौर पर डा राजेन्द्र प्रसाद ने सभी से संयम बरतने और किसी को आहत न करने की अपील की। सभा में हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाए जाने के पक्ष में आम सहमति बन गई। मुंशी- आयंगार फार्मूले के अनुसार निम्नलिखित प्रस्ताव रखा गया- हम इस बात के पक्ष में हैं कि भारत के संविधान में व्यवस्था की जाए कि राजभाषा और राजभाषा की लिपि क्रमशः हिन्दी और देवनागरी होंगी। हिन्दी को एकदम अपनाने में व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए अंग्रेजी का प्रयोग अगले 15 वर्षों तक जारी रखने की बात कही गई। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि अंकों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप का प्रयोग किया जाए। पर अंकों की लिपि और अंग्रेजी को जारी रहने के लिए कितना समय दिया जाए इस पर सहमति नहीं बन पाई क्योंकि सेठ गोविन्ददास ने इन प्रावधानों का कड़ा विरोध किया। तीन दिनों तक बहस चलती रही पर समझौते का रास्ता नहीं निकल पा रहा था। 14 सितम्बर 1949 को 1 बजे अप. सभा 5 बजे अप. तक के लिए एडजार्न कर दी गई। 3 बजे अप. संविधानसभा के कांग्रेस सदस्यों की बैठक रखी गईं। इस बैठक में सायं 5 बजे के ठीक पहले आम सहमति बन गई। सायं 5 बजे जब संविधानसभा की पुनः बैठक आरंभ हुई तो अध्यक्ष डा राजेन्द्र प्रसाद को इसकी सूचना दे दी गईं।
          सायं 6 बजे डा के एम मुंशी ने एक प्रस्ताव रखा जिसमें सेठ गोविन्ददास और उनके समर्थकों की आपत्तियों को समायोजित करने का प्रयास किया गया। तद्नुसार यह भी जोड़ा गया कि लोकसभा 15 वर्षों के बाद देवनागरी अंकों के प्रयोग को विधि द्वारा अधिकृत कर सकती है। राष्ट्रपति की अनुमति से क्षेत्रीय और उच्च न्यायालयों में हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग किया जा सकेगा । बिल आदि के लिए राज्य अपनी भाषा का प्रयोग कर सकेंगे और साथ ही संविधान के आठवें अनुच्छेद में संस्कृत को जोड़ा गया। संविधान सभा ने इस प्रस्ताव को पारित कर दिया। सभा के अध्यक्ष डा राजेन्द्र प्रसाद ने सभी को बधाई देते हुए कहा- आज यह पहली बार हो रहा है कि हमारा अपना एक संविधान है, अपने संविधान में हम एक भाषा का उपबंध कर रहे हैं जो संघ के प्रशासन की भाषा होगी।
           एक वोट से हिन्दी के राजभाषा बनने की जो बात कही जाती है उसके मूल में अंकों के स्वरूप पर हुआ मतदान है जिसमें हिन्दी स्वरूप 1 मत से विजयी रहा था। डा सुनीति कुमार चाटुर्ज्या, डा अम्बेडकर तथा सेठ गोविन्ददास ने भी 1 वोट से हिन्दी के राजभाषा बनने की बात कही है ।इस बारे में सुधाकर द्विवेदी जो राजभाषा विभाग के संस्थापकों में हैं ,का कथन द्रष्टव्य है-The above gentlemen obviously refer to the voting that had taken place on 26 August 1949 on the question of numerals. The question of official language had been settled in July 1947 itself when there was overwhelming support for adopting Hindi as the Official Ianguage of the Union.(संदर्भ- सुधाकर द्विवेदी: हिन्दी आन ट्रायल, पृ 23) ग्रैनविल आस्टिन ने लिखा है- "Ambedkar and Govind Das have confused the facts or have interpreted the one vote majority for Nagari Numerals, if such there was,as victory for Hindi"(संदर्भ- ग्रैनविल आस्टिन: दि इंडियन कानस्टीट्यूशन, कार्नर स्टोन आफ ए नेशन,पृ 300)

Tuesday, 8 March 2016

~ वामपंथी मित्रों के साथ राष्ट्रवाद पर बहस ~

~ वामपंथी मित्रों के साथ राष्ट्रवाद पर बहस ~

रघुवंशमणि : "जिभकट्टू राष्ट्रवाद" - इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम मैंने किया है।देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए लगता है इस शब्द का प्रयोग भविष्य में बहुत अधिक होना है । इसलिए मैं इस शब्द को पेटेंट करा लेना चाहता हूँ।भाषाशास्त्री यदि भविष्य में इस शब्द पर चर्चा करें तो इस बात का जिक्र अवश्य करें कि इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम रघुवंशमणि ने 7-3-2016 को किया था।इस शब्द का प्रयोग कोई भी कर सकता है। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं। यदि राजनीति विज्ञान के विद्वान इस पर कार्य करेंगे तो मुझे विशेष प्रसन्नता होगी।

स्वप्निल श्रीवास्तव : यह कट्टर के आगे का शब्द है । कुछ हिंसक जैसा भाव है।

दिनेश चौधरी ः गलकटराष्ट्रवाद का पेटेंट मेरे नाम करें।

डा राधेश्याम सिंह : हलकट राष्ट्रवाद बनाम गलकट राष्ट्रवाद

मेरी टिप्पणी- डा राधेश्याम सिंह ने हलकट शब्द का प्रयोग किया है तो संभवतः उन्हें यह जानकारी भी हो कि मराठी में इसे abusive term समझा जाता है और मुंबई में इस शब्द का प्रयोग गाली देने के लिए किया जाता है!

रघुवंशजी : हलकट का शाब्दिक अर्थ क्या है? "हलकट जवानी" जैसा कोई गीत है जो खुले आम बजता है।

मेरी टिप्पणी- फिल्मों में तो बहुत कुछ हो रहा है । भाग डी के बोस डी के...... जैसे गाने भी बन चुके हैं । एक जमाना ऐसा भी आएगा, मैंने सोचा नहीं था। बहरहाल मुझे लगता है कि राष्ट्रवाद मजाक का विषय नहीं होना चाहिए, न ही इसका ठेका किसी पार्टी या संगठन विशेष के पास होना चाहिए। वे वामपंथी भी राष्ट्रवादी ही थे जिन्होंने राष्ट्रवाद के लिए फांसी के फंदे को चूमा- भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव। वो जिसने जनेऊ नहीं छोड़ा था पर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का सेनापति था। सुभाषचंद्र बोस भी वामपंथी थे भले ही अपने राष्ट्रवाद के कारण उन्होंने धुरी राष्ट्रों से मदद लेने में संकोच नहीं दिया। वामपंथ और राष्ट्रवाद का आपस में कोई विरोध नहीं है। दिग्भ्रमित नक्सली वामपंथियों का भले राष्ट्रवाद से विरोध हो।मैं नहीं समझ पाता हूँ कि क्यों दोनों को एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा रहा है। भले ही मार्क्स ने सार्वभौमिक साम्यवाद को सिद्धांतत: प्रतिपादित किया हो; लेनिन, स्टालिन, माओ और चाऊ एन लाई से लेकर डेंग शियाओ पेंग और फिडेल कास्ट्रो तक सभी राष्ट्रवादी थे।

जनविजय- जिस देश में डेढ़ सौ से ज़्यादा राष्ट्रीयताओं के लोग रहते हों, वहाँ राष्ट्रवाद की बात करना बेवकूफ़ी है। भूमण्डलीकरण के इस ज़माने में तो जापानी और जर्मन राष्ट्रवाद भी ख़त्म हो रहे हैं।

मेरी टिप्पणी- संभव है जन विजय जी कि मैं मूर्ख होऊँ। पर मेरा विचार है कि निश्चय ही जिस देश में विभिन्न राष्ट्रीयताओं के लोग रहते हों वहाँ उन्हें आपस में जोड़ने के लिए कुछ चाहिए और यह भारतीयता है जो हम सबको जोड़ती है।यदि आप 130 करोड़ भारतीयों के हित की बात सोचते हैं तो मेरी नजर में यही राष्ट्रवाद है और आप राष्ट्रवादी हैं। मैं किसी पार्टी या संगठन के आइने के अनुसार राष्ट्रवाद को नहीं देखता हूँ।यदि आप विभिन्न राष्ट्रीयताएं जिन्हें आपने इंगित किया है,के बीच जुड़ाव नहीं चाहते हैं तो बात दूसरी है । मुंबई में मेरे एक मित्र एस पी चक्रवर्ती हैं जो ट्रेड यूनियन लीटर और die-hard communist हैं । सोवियत रूस के विघटन के बाद मेरी उनसे उसी तर्ज पर विभिन्न राष्ट्रीयताओं वाला देश होने के कारण भारत के विघटन की संभावना के बारे में चर्चा हुई। चक्रवर्ती जी ने मेरी बात का पुरजोर विरोध किया और परिचर्चा के दौरान बहुत उत्तेजित हो गए। एस पी चक्रवर्ती जी ने सोवियत रूस के विघटन की परिस्थितियों से भारत की परिस्थितियों को भिन्न बताते हुए और उन तत्वों को इंगित करते हुए जिन्होंने भारत को जोड़ रखा है, ऐसी किसी भी संभावना को खारिज किया । 

जहाँ तक भूमण्डलीकरण की बात है यदि वह उस सीमा तक वास्तविकता बन गई है कि राष्ट्रीयता गौण हो गई है तो विभिन्न देशों को borderless हो जाना चाहिए, विभिन्न देशों की सीमाओं पर सेना नहीं होनी चाहिए, दुनिया में कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, वीजा-पासपोर्ट की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो ग्लोबलाइजेशन की सारी बातों के बावजूद राष्ट्र और राष्ट्रीयता एक वास्तविकता है तथा अपने राष्ट्र के हित की बात सोचना राष्ट्रवाद है। ग्लोबलाइजेशन के नाम पर संपन्न राष्ट्र अपने लिए बड़ा बाजार चाहते हैं पर कुछ देने को तैयार नहीं हैं। मात्र संचार संबन्धी उपलब्धता को या कुछ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कार्यक्रमों को ग्लोबलाइजेशन कहना कहाँ तक समुचित है यह विचारणीय है। जापान में यदि राष्ट्रवाद समाप्त हो रहा है तो जापान अमेरिका और आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर प्रशान्त महासागर और चाइना-सी की निगरानी की योजना क्यों बना रहा है और उसमें भारत को भी शामिल करने का प्रयास क्यों कर रहा है(भारत ने इससे इनकार कर दिया है), पुनश्च जापान अपना रक्षा बजट क्यों बढ़ा रहा है?जर्मनी में यदि राष्ट्रवाद समाप्त हो गया है तो जर्मनी में सीरिया से आने वाले शरणार्थियों की संख्या नियंत्रित करने और उन्हें जर्मन संस्कृति से परिचित कराने की बात क्यों हो रही है? आदर्श और वास्तविकताएं अलग-अलग हैं। राष्ट्रवाद एक उत्कृष्ट भावना है जिसे राजनैतिक मुद्दा बनाने का कुछ लोग अवसर ढूँढ रहे थे और इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं उन्हें यह अवसर प्रदान कर रही हैं।

डा राधेश्याम सिंह : ए हलकट भी हलक काट का मुखसुख संक्षेपीकरण लगता है।मेरा अभिप्राय दोनों ही पक्ष के संशुद्धतावादी राष्ट्रवादियों का निषेध करना था।आशा है संजय जी और रघुवंश जी ने मेरे दुख को समझा होगा।

रघुवंशजी : संजयजी कुछ ज्यादा ही अकादमिक हैं। लेकिन हलकट का मराठी अर्थ साफ़ नहीं हुआ।

मेरी टिप्पणी : रघुवंशजी हर चीज का शाब्दिक अर्थ खुले मंच पर लिखने लायक नहीं होता। बहरहाल अगर कोई तमाशा देखना चाहे तो मुंबई में किसी मराठीभाषी के आगे यह शब्द उच्चारित कर दे और फिर तमाशा देखे। डा राधेश्याम सिंह की व्याख्या से स्पष्ट हुआ कि उन्हें भी इसका अर्थ ज्ञात नहीं है। मुझे लगा था कि हो सकता है कि वे मराठी से परिचित हों या मुंबई में रहे हों और अर्थ जानते हों।

रघुवंशजी : राष्ट्रवाद कोई पवित्र चीज नहीं जिस पर बहस न की जाए। हिटलर के दौर में भी एक राष्ट्रवाद था और मुसोलिनी के समय में  भी। भारत में आज राष्ट्रवाद का उपयेग अपने विरोधियों से निपटने के लिए किया जा रहा है। ऐसे में इस प्रकार के राष्ट्रवाद की आलोचना करना जरूरी हो गया है।

मेरी टिप्पणी : पवित्र वस्तु भी आलोचना के दायरे से बाहर नहीं कही जा सकती।पर कोई भी आलोचना सोद्देश्य होनी चाहिए महज राजनैतिक विरोध के लिए नहीं। राष्ट्रवाद एक अवधारणा है। यह अवधारणा क्या हो कैसी हो यह विवेचन का विषय हो सकता है। यह अवधारणा ही न हो यह भी विवेचन का विषय हो सकता है। पर मुझे लगता है कि आपका उद्देश्य इस अवधारणा का दुरुपयोग करने वालों को कटघरे में खड़ा करना है। ऐसे में जब आप राष्ट्रवाद की आलोचना करने में लग जाते हैं तो अपने मूल उद्देश्य से भटक जाने की संभावना है। फिर आप राष्ट्रवाद के नाम पर आज तक जो भी हुआ है यहाँ तक कि हमारी स्वतंत्रता की पूरी लड़ाई पर भी प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। आप उन पर भी सवाल खड़ा कर रहे हैं जिन्होंने राजनैतिक दलों और श्रमिक संगठनों के साथ राष्ट्रीय शब्द लगा रखा है क्योंकि वह भी राष्ट्रवाद को ही द्योतित करता है। उन समस्त पूर्ववर्ती महापुरुषों पर भी सवाल खड़ा कर रहे हैं जिन्होंने राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की बात की। पर नि:संदेह प्रश्न आप किसी पर भी खड़ा कर सकते हैं और उसका आपको अधिकार है । पर आपको यह भी बताना चाहिए कि कुछ लोगों या संगठनों के कारण आप पहले की राष्ट्रवाद संबन्धी पूरी धरोहर को क्यों खारिज कर देना चाहते हैं।


Sunday, 6 March 2016

Speech of Kanhaiya Kumar after his bail - Revisited.

~ Speech of Kanhaiya Kumar after his bail - Revisited ~

                             A
"Is it wrong to ask for azadi from the problems that are existing in the country? Brothers, it's not from India, but it's in India that we are seeking Azadi . And there is difference between 'from ' and 'in'. The Azadi we are asking for is from starvation and poverty, from exploitation and torment; for the rights of Dalits, tribals,minorities and women. And the azadi we will ensure through this very constitution, Parliament and judiciary.This was Baba Saheb's dream,and this is Comrade Rohith's (Vemula) dream."- Kanhaiya Kumar as quoted by TOI

My comment: Brother, certainly it is not wrong to ask for azadi from the problems that are existing in the country ! But it is wrong if you camouflage aspirations of those who want azadi from India as azadi from problems existing in the country. It is wrong when you provide a platform to the separatists or let them hijack your platform for their purposes and provide a respectability to their cause from the Sanctum Santorum of a respected institution like J N U. For that you should accept responsibility. Gandhiji stopped non-cooperation movement after Chaurichaura happened.

        You are quoting Baba Saheb but forget that he was firmly opposed to separatist politics. When you quote Baba Saheb and Rohith Vemula along with, YOU forget that Baba Saheb was a great fighter who never surrendered before adversities.He fought all the odds and made a place for himself or rather you can say, snatched the place for himself. Despite of all the problems he faced in life due to caste barrier, he did not have any grudge towards anyone. When he was entrusted with the responsibility of Drafting Constitution, he gave his best to the country. Rohith can not be placed on the same pedestal. Fighter in him surrendered before adversities. When I'm writing this piece, I know the risks involved and ready to face consequences. If any adversity is presented before me I would fight and not surrender. So when Rohith championed a cause, he should have fought and not surrendered. 

          When you say you have full faith in constitution and stand by the preamble please don't quote those as your ideals who espoused or espouse cause of separatists. I believe you on your words and also that you don't support the separatist cause and also that your programme was hijacked by separatists. If any democratic element is ready to give any leverage to separatists, separatists  are ready to use him as a pawn in their game under the garb of democracy.

          There are crores of Dalits in this country who love this country despite of all their problems.They don't support dismemberment of this country and would never ally with separatists.Baba Saheb is their ideal but certainly no person having sympathy for separatists can be their ideal.

                              B
"When I was in jail, I got two bowls - one was blue coloured, and the other red.I was looking at those bowls and thinking- I don't believe in fate,neither I do have faith in God.But a red bowl and a blue bowl on the same plate means something good is going to happen in the country. That plate looked like India to me; the blue bowl the Ambedkar movement and the red bowl the left movement. I felt that if the two movements unite.....we will form a government that ensures justice for all. We will establish. 'sabka sath sabka vikas' in the real sense" (Kanhaiya Kumar as quoted in TOI)

My comment: So ultimately left has got its own social engineer. So far every party has been trying social engineering as an easy way of getting votes in hordes. But communists had not tried this so for.They talked of poors and classes. Now Kanhaiya Kumar sees left as such a big movement that by making Dalits only ride the band wagon of left he would be able to see the left through the elections and even be able to form a Govt. Here he seems too much optimistic to me and it also seems that the optimism has made him myopic. First of all left needs to be taken to the level that by having only Dalits on its side it is able to get majority. Seeing left's downward slide in the last decade it seems improbable. Secondly getting Dalits on the communist bandwagon is not that much easy. They already have their political affiliations and not going to leave it in favour of someone only because he says Rohith Vemula is his ideal. The way Kanhaiya Kumar talks of social engineering, to me he seems like other politicians and not different from them. Moresover, for this he is ready to dump class theory of communism and folllow in Lohiya's shoe steps ,so he doesn't seems committed to communist ideology either. So I don't see as much promise in him , as much is being seen by the media.

                                 C
"Afzal Guru. ......was punished as per the law of land and the same law permits citizens to discuss that punishment. (Kanhaiya Kumar as quoted in TOI)"

मेरी टिप्पणी: भइया बाएं हाथ से दायां कान पकडने की कोशिश क्यों कर रहे हो? सीधे-सीधे दाएं हाथ से दायां कान पकड़ो न!

Saturday, 5 March 2016

~ लोकतांत्रिक पूँजीवाद बनाम साम्यवादी अधिनायकवाद ~

~लोकतांत्रिक पूँजीवाद बनाम साम्यवादी अधिनायकवाद~

         लोकतांत्रिक पूँजीवाद में कम से कम वस्तुओं की शेल्फ लाइफ कम होने के कारण नए-नए नायक लांच होते रहते हैं । इस प्रकार इसमें नए प्रयोगों के लिए स्थान है।

         पर साम्यवादी व्यवस्था में तो एक बार नायक जम जाए तो उसके मरने या बीमार पड़ कर अशक्त हो जाने तक या किसी षडयंत्र के सफल हो जाने तक दूसरे नायक के लिए कोई स्थान नहीं रहता था । चीन ने इस साम्यवादी परंपरा को तोड़ा है परंतु यहीं यह भी ध्यान देने योग्य है कि उसने पूँजीवाद के बहुत से तत्व अपना लिए हैं। 

        लोकतांत्रिक पूँजीवाद कम से कम हर नायक को कुछ दिनों के बाद उसकी औकात बता देता है और उसे वास्तविकता के धरातल पर उतार देता है। 

        विशुद्ध पूँजीवाद और विशुद्ध साम्यवाद दोनों ही व्यवस्थाएँ मानव के हित में नहीं हैं । यदि पूँजीवाद के साथ साम्यवाद के मूल में जो जन चिन्तन है वह समाहित हो जाए(और यह जनचिन्तन साम्यवाद के अंतर्गत स्थापित होने वाले अधिनायक तंत्र में तिरोहित हो जाता है क्योंकि अधिनायकवाद भले ही वह पूँजीवादी हो या साम्यवादी, अंततोगत्वा स्वहितवाद में तब्दील हो जाता है) तो वह मानव के लिए हितकारी होगा। 

       बिल गेट्स जिन्होंने पूँजीवादी व्यवस्था में पैसा कमाया और फिर अपनी कुल सम्पत्ति का लोकहित के लिए दान कर दिया है स्टालिन, माओ, चाऊ-एन-लाई, ख्रुश्चेव, ब्रेझनेव और फिडेल कास्ट्रो जैसे साम्यवादियों से लाख बेहतर हैं। डेग-शियाओ-पेंग को मैं इन साम्यवादी नेताओं की सूची में नहीं रख रहा हूँ क्योंकि वह साम्यवादी की खाल ओढे हुए पूँजीवादी थे।