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Thursday, 26 November 2015

दिल में ये पिघलता सा क्या है (गजल)

                 ~-गजल-~
     तेरे अफसाने से दिल में ये पिघलता सा क्या है
     कौन सा गुबार ये हलक में अटकता सा क्या है

     घूँघट में छिपे चेहरे पर दफन कितनी शिकनें हैं
     परदे से बाहर आने को ये मचलता सा क्या है 

     जुगनू है, गुहर है या फिर दर्द ए आब कह लो
     नम आँखों से ये रह-रह ढलकता सा क्या है

     दिलोदिमाग के मोम को ये किसने दे दी आँच
     सीने के अंदर ये कुछ-कुछ टहकता सा क्या है

     बजाए नींद के आँखों में अश्क आ जाएं हुजूर
     कहानियाँ ये कैसी विधाता रचता सा क्या है

     ढला हुआ मंजर एक बार फिर से जिंदा हो गया
     उसकी कलम से'संजय'जादू छलकता सा क्या है

      -संजय त्रिपाठी 
  (आदरणीय कमलाकान्त त्रिपाठी जी द्वारा इन दिनों लिखे जा रहे उपन्यास से प्रेरित होकर)

Wednesday, 25 November 2015

सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता

         
        सहिष्णुता पर छेड़ी गई ( मैं जान-बूझ कर छिड़ी नहीं छेड़ी शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ) बहस एक बडा सवाल यह खड़ा करती है कि क्या भारत पिछले एक साल में बदल गया है। क्या एक-डेढ़ साल पहले या जैसाकि आमिर खान कहते हैं छ: - सात माह पहले हमारे देश में सहिष्णुता थी और अचानक सब कुछ बदल गया है और लोग असहिष्णु हो गए हैं, उदार से अनुदार हो गए हैं।
          जो लोग इससे सहमत हैं उन्हें फिर यह भी मानना पड़ेगा कि जिनका भी एजेंडा लोगों को असहिष्णु बनाना है उन्होंने बहुत कम समय में बड़ी सफलता हासिल कर ली है और पूरे भारत की जनता बेवकूफ है जिसे आसानी से बरगलाया जा सकता है। 
          पर मेरा अपना मानना है कि ऐसा नहीं है। यह देश वही है, लोग वही हैं। सत्ता बदलने से लोग यानी देश की आम जनता नहीं बदल जाती। सत्ता का बदलाव लोकतंत्र का हिस्सा है। सत्ता के बदलाव का यह आशय भी नहीं कि किसी को देश का सर्वाधिकार सौंप दिया गया है। जनता ने जिन आशाओं के साथ सत्ता सौंपी है, यदि कोई उसका गलत आशय निकालता है अथवा जनता की आशाओं पर तुषारापात करता है तो जनता के सामने लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जब भी चुनाव होते हैं सत्ताधारियों को बाहर का रास्ता दिखाने का विकल्प खुला रहता है।
          सहिष्णुता पर छेड़ी गई बहस का वास्तविक मंतव्य देश की उदार परंपरा पर जोर देना और अनुदार तत्वों को हतोत्साहित करना होता तो ठीक था, पर इसने राजनीतिक स्वरूप अख्तियार कर लिया है और स्थिति यह है कि बी जे पी के पक्षधर इस बहस को खारिज कर रहे हैं और विरोधी दल केन्द्र के वर्तमान सत्ताधारी दल को कटघरे में खड़ा करने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि स्थिति यह है कि सांप्रदायिक मामलों में यदि साम्यवादियों और अपेक्षाकृत नए दलों को छोड़ दिया जाए तो किसी का भी दामन पाक- साफ नहीं है। अगर ऐसा होता तो 1969 का गुजरात दंगा नहीं होता, 1984 के दंगों की सिखों को विभीषिका नहीं झेलनी पड़ी होती,1989 का भागलपुर दंगा नहीं होता, मैलियाना और हाशिमपुरा के कांड नहीं होते, 1992 के मुंबई दंगे नहीं होते, 2002 में गुजरात के दंगे नहीं होते और न ही 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे होते। यदि ऐसा होता तो तमाम काश्मीरी पंडितों को अपने ही देश में बेघर होना और दर-बदर भटकना नहीं पड़ता। साम्यवादी भी उदार तो कतई नहीं कहे जा सकते। तसलीमा नसरीन के साथ उनका व्यवहार सबको मालूम है। कालबुर्जी और पनसारे की हत्या तथा दादरी मामले में जैसे ऐसा मान लिया जा रहा है कि राज्य सरकारों को कुछ करना ही नहीं था। 
          मैंने कई बार इस आशय के वक्तव्य पढ़े हैं कि भारत हिन्दू बहुसंख्यकों के कारण धर्म निरपेक्ष है। पर मुझे लगता है कि भारत हिन्दू बहुसंख्यकों के साथ-साथ अल्पसंख्यक मुस्लिमों, ईसाइयों और सिखों के कारण भी धर्मनिरपेक्ष है। इस देश की धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक सौहार्द्र के प्रति मुस्लिम प्रतिबद्धता का प्रमाण यह है कि 20 करोड़ भारतीय मुस्लिमों में से अब तक सिर्फ 21 के आई एस आई एस के साथ जाने की सूचना है जबकि सभी योरपीय देशों से हजारों की तादाद में मुस्लिम आई एस आई एस के साथ हैं। प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष कहा था कि भारत का मुसलमान अल कायदा को फेल करेगा और भारतीय मुसलमान इस बात पर खरा उतरा है। अल कायदा के साथ जाने वाले भारतीय मुसलमानों की संख्या भी नगण्य है। पाकिस्तान में आधारित आतंकवादी संगठन और आई एस आई लंबे समय से भारतीय मुसलमानों को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं। पर कुछ ही मुसलमान हैं जो उनके झाँसे में आए हैं । भले ही भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं पर तब भी भारत मुस्लिम आबादी के लिहाज से दुनिया के प्रथम कुछ देशों में है । जिस तरह मुस्लिम और योरपीय देशों में मुस्लिम आबादी का एक हिस्सा आतंकी संगठनों के बहकावे में आया है यदि उससे तुलना करें तो भारत के मुसलमानों ने उन्हें नकार कर भारत को आतंक के साये से एक बड़ी हद तक महफूज रखा है। भारत के ईसाई समुदाय की सांप्रदायिक मामलों मे संलग्नता न के बराबर रही है। सिख समुदाय की जहाँ तक बात है उनकी सक्रियता से ही पंजाब में पाकिस्तान के समर्थन से चल रहा खलिस्तान आंदोलन कुचला जा सका। इसलिए भारत की धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सौहार्द्र में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक सभी संप्रदायों का समान रूप से योगदान है। इनमें से अधिकांश को अपनी दो वक्त की रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। धार्मिक- सांप्रदायिक विवाद खड़े करने के लिए समय उन लोगों के पास हो सकता है जो इन चिन्ताओं से मुक्त हों। जब कोई यह कहता है कि देश में असहिष्णुता बढ़ गई है तो वह इन तमाम हिन्दुओं,मुसलमानों,सिखों और ईसाइयों की नीयत पर सवाल लगाता हैं। 
          जो साधन संपन्न है वह देश छोड़ कर जा सकता है पर जो दो रोटी के लिए संघर्ष करता है उसे तो इसी देश में रहना है । जब देश विभाजन की विभीषिका झेल रहा था तब इस देश में आज रहने वाले तमाम मुसलमानों या उनके पूर्वजों ने तरह-तरह का डर दिखाए जाने के बावजूद इस देश को नहीं छोड़ा । आज किसी महंत आदित्यनाथ, साक्षी महाराज या साध्वी के बयान भर या दादरी कांड के कारण वे देश छोड़ने की क्यों सोचें ( यही वह रास्ता है जो आमिर खान उन्हें दिखाने की कोशिश कर रहे हैं) । उन्हें यहीं जीना -मरना है और अपना तथा अपनी पीढ़ियों का भविष्य बनाने और स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश करना है। 
         यदि कोई यह कहता है कि सत्ताधारी दल के और उसके आनुषंगिक संगठनों कुछ सदस्य अनर्गल बयान देकर माहौल खराब कर रहे हैं तथा उन्हें नियंत्रित किया जाए, साथ ही कुछ राज्य भी धुर दक्षिणपंथी एवं सांप्रदायिक तत्वों पर लगाम लगाने में असफल हैं जिससे साहित्यिक सृजनशीलता और सांप्रदायिक स्थिति प्रभावित हो सकती है या हो रही है एवं इसे नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए जाएं तो बात मेरी समझ में आती है और मैं इसका समर्थन करता हूँ।
         पर यदि कोई यह कहता है कि देश में पिछले कुछ महीनों में अचानक असहिष्णुता बढ़ गई है, भारतवासी असहिष्णु हो गए हैं और इससे सामान्य रूप से जान-माल का खतरा पैदा हो गया है तथा एक डेढ़ वर्ष पूर्व देश में रामराज्य की स्थिति थी, शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पिया करते थे तो यह एक राजनीतिक बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं है जिससे देश को कोई लाभ नहीं अपितु नुकसान ही होगा।

सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता

         
        सहिष्णुता पर छेड़ी गई ( मैं जान-बूझ कर छिड़ी नहीं छेड़ी शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ) बहस एक बडा सवाल यह खड़ा करती है कि क्या भारत पिछले एक साल में बदल गया है। क्या एक-डेढ़ साल पहले या जैसाकि आमिर खान कहते हैं छ: - सात माह पहले हमारे देश में सहिष्णुता थी और अचानक सब कुछ बदल गया है और लोग असहिष्णु हो गए हैं, उदार से अनुदार हो गए हैं।
          जो लोग इससे सहमत हैं उन्हें फिर यह भी मानना पड़ेगा कि जिनका भी एजेंडा लोगों को असहिष्णु बनाना है उन्होंने बहुत कम समय में बड़ी सफलता हासिल कर ली है और पूरे भारत की जनता बेवकूफ है जिसे आसानी से बरगलाया जा सकता है। 
          पर मेरा अपना मानना है कि ऐसा नहीं है। यह देश वही है, लोग वही हैं। सत्ता बदलने से लोग यानी देश की आम जनता नहीं बदल जाती। सत्ता का बदलाव लोकतंत्र का हिस्सा है। सत्ता के बदलाव का यह आशय भी नहीं कि किसी को देश का सर्वाधिकार सौंप दिया गया है। जनता ने जिन आशाओं के साथ सत्ता सौंपी है, यदि कोई उसका गलत आशय निकालता है अथवा जनता की आशाओं पर तुषारापात करता है तो जनता के सामने लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जब भी चुनाव होते हैं सत्ताधारियों को बाहर का रास्ता दिखाने का विकल्प खुला रहता है।
          सहिष्णुता पर छेड़ी गई बहस का वास्तविक मंतव्य देश की उदार परंपरा पर जोर देना और अनुदार तत्वों को हतोत्साहित करना होता तो ठीक था, पर इसने राजनीतिक स्वरूप अख्तियार कर लिया है और स्थिति यह है कि बी जे पी के पक्षधर इस बहस को खारिज कर रहे हैं और विरोधी दल केन्द्र के वर्तमान सत्ताधारी दल को कटघरे में खड़ा करने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि स्थिति यह है कि सांप्रदायिक मामलों में यदि साम्यवादियों और अपेक्षाकृत नए दलों को छोड़ दिया जाए तो किसी का भी दामन पाक- साफ नहीं है। अगर ऐसा होता तो 1969 का गुजरात दंगा नहीं होता, 1984 के दंगों की सिखों को विभीषिका नहीं झेलनी पड़ी होती,1989 का भागलपुर दंगा नहीं होता, मैलियाना और हाशिमपुरा के कांड नहीं होते, 1992 के मुंबई दंगे नहीं होते, 2002 में गुजरात के दंगे नहीं होते और न ही 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे होते। यदि ऐसा होता तो तमाम काश्मीरी पंडितों को अपने ही देश में बेघर होना और दर-बदर भटकना नहीं पड़ता। साम्यवादी भी उदार तो कतई नहीं कहे जा सकते। तसलीमा नसरीन के साथ उनका व्यवहार सबको मालूम है। कालबुर्जी और पनसारे की हत्या तथा दादरी मामले में जैसे ऐसा मान लिया जा रहा है कि राज्य सरकारों को कुछ करना ही नहीं था। 
          मैंने कई बार इस आशय के वक्तव्य पढ़े हैं कि भारत हिन्दू बहुसंख्यकों के कारण धर्म निरपेक्ष है। पर मुझे लगता है कि भारत हिन्दू बहुसंख्यकों के साथ-साथ अल्पसंख्यक मुस्लिमों, ईसाइयों और सिखों के कारण भी धर्मनिरपेक्ष है। इस देश की धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक सौहार्द्र के प्रति मुस्लिम प्रतिबद्धता का प्रमाण यह है कि 20 करोड़ भारतीय मुस्लिमों में से अब तक सिर्फ 21 के आई एस आई एस के साथ जाने की सूचना है जबकि सभी योरपीय देशों से हजारों की तादाद में मुस्लिम आई एस आई एस के साथ हैं। प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष कहा था कि भारत का मुसलमान अल कायदा को फेल करेगा और भारतीय मुसलमान इस बात पर खरा उतरा है। अल कायदा के साथ जाने वाले भारतीय मुसलमानों की संख्या भी नगण्य है। पाकिस्तान में आधारित आतंकवादी संगठन और आई एस आई लंबे समय से भारतीय मुसलमानों को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं। पर कुछ ही मुसलमान हैं जो उनके झाँसे में आए हैं । भले ही भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं पर तब भी भारत मुस्लिम आबादी के लिहाज से दुनिया के प्रथम कुछ देशों में है । जिस तरह मुस्लिम और योरपीय देशों में मुस्लिम आबादी का एक हिस्सा आतंकी संगठनों के बहकावे में आया है यदि उससे तुलना करें तो भारत के मुसलमानों ने उन्हें नकार कर भारत को आतंक के साये से एक बड़ी हद तक महफूज रखा है। भारत के ईसाई समुदाय की सांप्रदायिक मामलों मे संलग्नता न के बराबर रही है। सिख समुदाय की जहाँ तक बात है उनकी सक्रियता से ही पंजाब में पाकिस्तान के समर्थन से चल रहा खलिस्तान आंदोलन कुचला जा सका। इसलिए भारत की धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सौहार्द्र में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक सभी संप्रदायों का समान रूप से योगदान है। इनमें से अधिकांश को अपनी दो वक्त की रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। धार्मिक- सांप्रदायिक विवाद खड़े करने के लिए समय उन लोगों के पास हो सकता है जो इन चिन्ताओं से मुक्त हों। जब कोई यह कहता है कि देश में असहिष्णुता बढ़ गई है तो वह इन तमाम हिन्दुओं,मुसलमानों,सिखों और ईसाइयों की नीयत पर सवाल लगाता हैं। 
          जो साधन संपन्न है वह देश छोड़ कर जा सकता है पर जो दो रोटी के लिए संघर्ष करता है उसे तो इसी देश में रहना है । जब देश विभाजन की विभीषिका झेल रहा था तब इस देश में आज रहने वाले तमाम मुसलमानों या उनके पूर्वजों ने तरह-तरह का डर दिखाए जाने के बावजूद इस देश को नहीं छोड़ा । आज किसी महंत आदित्यनाथ, साक्षी महाराज या साध्वी के बयान भर या दादरी कांड के कारण वे देश छोड़ने की क्यों सोचें ( यही वह रास्ता है जो आमिर खान उन्हें दिखाने की कोशिश कर रहे हैं) । उन्हें यहीं जीना -मरना है और अपना तथा अपनी पीढ़ियों का भविष्य बनाने और स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश करना है। 
         यदि कोई यह कहता है कि सत्ताधारी दल के और उसके आनुषंगिक संगठनों कुछ सदस्य अनर्गल बयान देकर माहौल खराब कर रहे हैं तथा उन्हें नियंत्रित किया जाए, साथ ही कुछ राज्य भी धुर दक्षिणपंथी एवं सांप्रदायिक तत्वों पर लगाम लगाने में असफल हैं जिससे साहित्यिक सृजनशीलता और सांप्रदायिक स्थिति प्रभावित हो सकती है या हो रही है एवं इसे नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए जाएं तो बात मेरी समझ में आती है और मैं इसका समर्थन करता हूँ।
         पर यदि कोई यह कहता है कि देश में पिछले कुछ महीनों में अचानक असहिष्णुता बढ़ गई है, भारतवासी असहिष्णु हो गए हैं और इससे सामान्य रूप से जान-माल का खतरा पैदा हो गया है तथा एक डेढ़ वर्ष पूर्व देश में रामराज्य की स्थिति थी, शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पिया करते थे तो यह एक राजनीतिक बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं है जिससे देश को कोई लाभ नहीं अपितु नुकसान ही होगा।

Tuesday, 24 November 2015

An open letter to Aamir Khan

Aamir you can afford to leave India not others!

        Aamir Khan your wife has been suggesting to leave India due to increasing intolerance along with the family for safety of your child ! You say that is a big and disastrous statement for Kiran to make. I agree with you that it is a big and disastrous statement but the problem is that you seem to be in agreement with her. You didn't try to reassure her.
          For you and your wife your child is important, but for million others their children are important and the problem is they have not made millions like you. So they can not look towards greener pastures like you. A majority of them can not even think of leaving this country.They were born here, they will die here irrespective of what happens to their children.Despite of all talks of despondency by you they have to earn their bread and butter here itself and have to train their children for the same here itself. When 1969 riots happened in Gujarat, when Bhagalpur happened in 1989, when Muslims were butchered by state forces in Maliana and Hashimpura, when Sikhs were butchered in 1984, when Kashmiri Pandits were driven out of their homes in their own country and when Gujrat 2002 and Mujaffarnagar 2013 happened, they all- Hindus,Muslims and Sikhs faced it with forbearance and rose in life to make their lives again. Even today they have got no justice, but still have some hope for the future. They never talk of leaving this country rather they struggle everyday.
         During my journeys to Delhi from Bareilly on Intercity Express a lot of Muslims used to board It at Gajraula,Amroha and many other small stations towards Delhi. I used to listen their discussions which had a certain element of worries of Muslim world. But they all used to agree ultimately that there is no country like India in the world which welcomes all the religions with both hands. India is made up of millions of these people- Hindus,Muslims, Christians as well as Sikhs- majority of them marginalised- who never lost hope on the idea of India and it survives due to them. It is God's Grace that its survival is not dependent on people like you whose wives sitting in one of the world's most costly locations in posh bungalows and flats with armed security guards around suggest that India has become a banana republic and people living luxurious life should leave the country. 
          As I read the news item about you, I see your photograph in the corner on the occasion of Id with your wife Kiran and child Azad in jovial mood enjoying festivities and I don't see even a shred of fear. It is very easy to sit in safe and luxurious environs and condemn your country and its people telling they have become intolerant but difficult to do something really worthwhile for the country. 
       I don't think you are not aware of your potential. People of this country have showered their so much love and affection upon you. Had you given call for a cause they would have stood behind you . Had you led, they would have marched in hordes. You can have direct access to Prime Minister. You could have put up problems before him and given suggestions. Instead of that you preferred to malign the country and its people .
        When you say intolerance has increased in the last six-eight months, you mean people have changed. They have become intolerant from tolerant. I don't think it is so. People are the same. Their thoughts are same. Country is same.Since rightists are in power, right and ultra-right forces have become more assertive. But it doesn't mean that people and country have changed. They are the same very people who loved you, who made you a star. Please don't blame them for the statements of some insane right wingers and stray communal incidences. Pl. don't give a chance to enemies of the country to laugh over us. India has survived and overcame far more serious communal disturbances and challenges. India has made you great, you help it in achieving greatness.


Monday, 23 November 2015

जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं (गजल)

   वर्ष 1992 में लिखी गई मेरी आरंभिक   गजलों में एक                
                        ~ - गजल-~

मार देते हैं चश्म ए सियाह से पर जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।
यूँ किए जाते हैं रोज हम पर सितम पर जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

उन आँखों की मौज ए कौसर में डूबे जाते हैं हम
बचाने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

शमशीर ए आबदार हैं वो रोज घायल हुए जाते हैं हम ।
मरहम भी नहीं लगाते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

पी उन निगाहों के पैमाने मदहोश हो गिर-गिर जाते हैं हम।
उठाने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

जब पलक झपकाते हैं कहीं गिरफ्तार हुए जाते हैं हम।
कफस खोलने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

नीम निगाहों से देख लेते हैं वो इक तूफान से घिर जाते हैं हम।
सहारा देने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

देख गजालचश्म की आँखें किसी वन में राह भटक जाते हैं हम।
राह दिखाने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

जहर भी है आब ए हयात भी है वहाँ मरकर जिए जाते हैं हम।
पर यूँ पेश आते हैं वो जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

दुनिया जान भी गई है 'संजय' किस मर्ज में मुबतला हो गए हैं हम ।
दवा देने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।        -संजय त्रिपाठी








Saturday, 21 November 2015

नितीश : चुनौतियाँ और संभावनाएं

          वोटिंग पैटर्न का विश्लेषण तर्कसंगत रूप में करना दुष्कर कार्य है। पर कई बार चुनाव की एक थीम बन जाती है जिसे चुनाव विश्लेषक प्रायः लहर का नाम दे देते हैं और जब इसका प्रभाव होता है तो जाति,धर्म जैसे मुद्दे गौण हो जाते हैं। अनेक चुनाव इसके साक्षी हैं। पर थीम या लहर जैसा कुछ बिहार के इस चुनाव में दिख नहीं रहा था। नि:संदेह बिहार चुनाव में लालू यादव का स्ट्राइक रेट नीतिश से बेहतर रहा है। पर फिर भी यह मानना होगा कि जनता के सामने यह स्पष्ट था कि मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ही होंगे। इसलिए लालू की छत्रछाया बाधा नहीं बनी और नीतिश के गुड गवर्नेंस के रिकार्ड के कारण उनके विरुद्ध एंटी इन्क्यूम्बेन्सी का फैक्टर नहीं था। अतः जीत का श्रेय तो उन्हें देना पड़ेगा । लालू का एक कमिटेड वोट बैंक है और शायद इस कारण लालू एवं नीतिश समझौते के बड़े गेनर लालू प्रसाद रहे हैं।
        मैंने अपने पूर्व ब्लाग में बात की है बिहार के चरित्र और उस परिप्रेक्ष्य में नीतिश की महत्वाकांक्षाओं की। नीतिश में क्षमता और योग्यता है । सुशील मोदी जब साथ थे तो नरेन्द्र मोदी का प्रोजेक्शन शुरू हो जाने के बावजूद नीतिश कुमार को प्राइम मिनिस्टीरियल मैटेरियल बताया करते थे। यह तो जब ऊपर से अलग होने के निर्देश आ गए तो उन्हें अलग होना पड़ा और फिर जबान भी बदल गई। 
          पर अब नीतिश ने जिस आदमी का साथ पकड़ा है वह पूरी कीमत वसूलना जानता है और तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री तथा तेजप्रताप को मंत्री बनाकर नीतिश ने उसकी अदायगी की शुरुआत भी कर दी है। इस कीमत अदायगी को मैनेज करना और लालू को बिहार में महाराष्ट्र के बाला साहब ठाकरे की जैसी भूमिका अख्तियार करने से रोक पाना नीतिश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। अगर वे इसमें सक्षम रहते हैं तो नि:संदेह विपक्ष के लिए वे एक समन्वय का बिन्दु बनकर उभर सकते हैं। नीतिश कुमार यह महत्वाकांक्षा रखते भी हैं। उन्होंने राहुल गाँधी,केजरीवाल और ममता बनर्जी से बार-बार संपर्क कर यह भूमिका पाने का प्रयास भी किया है। भारतीय राजनीति में राजनीतिज्ञ की सर्वाधिक उपयोगिता वोट कैचर राजनीतिज्ञ के रूप में समझी जाती है और अगर नीतिश इस रूप में औरों को उपयोगी लगेंगे तो वे उन्हें रास्ता देने के लिए तैयार रहेंगे। फार्रूख अब्दुल्ला ने तो उनकी इस भूमिका का समर्थन भी कर दिया हैं। जहाँ तक राहुल गाँधी की बात है, एक तो उन्होंने अब तक एक राजनीतिज्ञ के रूप में मैच्योरिटी नहीं दर्शाई है, दूसरे जब भी जिम्मेदारी सर पर आती दिखती है तो वे उससे भागते हुए दिखाई देते हैं । इसलिए मुझे नहीं लगता कि वे नीतिश के रास्ते में कंटक बनेंगे।   
            किसी भी प्रकार के झगड़े की स्थिति में लालू प्रदेश में और लालू तथा मुलायम की जोड़ी राष्ट्रीय स्तर पर उनका रास्ता अवरुद्ध करेगी। पर भविष्य के गर्त में क्या छिपा है यह तो कोई कह नहीं सकता। वैसे भारतीय राजनीति को नरेन्द्र मोदी के एक काउन्टर मैग्नेट की जरूरत तो है ही क्योंकि absolute power का परिणाम कभी भी अच्छा नहीं होता।

Friday, 20 November 2015

क्या नितीश कुमार का सपना साकार होगा?

                         दृश्य-1
          23 नवंबर, 2005 के दिन मैं दार्जिलिंग में एक कांफ्रेंस में भाग लेने के बाद न्यू जलपाई गुड़ी से बरेली के लिए एक सायंकालीन एक्सप्रेस ट्रेन से जो दिल्ली जाती थी, रवाना हुआ। साथ में मेरे मित्र एस पी तिवारी जी थे। समाचार आ चुका था कि बिहार में एक अरसे के बाद लालूजी की निर्णायक हार हुई है और एन डी ए गठबंधन विजयी हुआ है और 24 नवंबर,2005 को नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण करने वाले हैं। 
          ए सी 3 कंपार्टमेंट था।रात ग्यारह बजे मैं ऊपर की बर्थ पर सोने की कोशिश में था। नीचे की बर्थ पर तिवारी जी सो रहे थे । लगभग साढे ग्यारह बजे अचानक किसी के जोर-जोर से गाने की आवाज आने लगी-'चल-चल मेरे हाथी......'। ट्रेन में वैसे भी मेरे लिए सोना मुश्किल रहता है,ऊपर से यह विघ्न! फिर मन में सोचा बिहार-झारखंड का इलाका हैं। कानून को वैसे भी यहाँ लोग अपने अँगूठे तले रखते हैं। ज्यादा बोलना ठीक नहीं है। गाने वाला शायद कुछ गाने गाकर शांत हो जाएगा। पर बंदा था कि बुलंद आवाज में एक के बाद एक गाने गाता गया और मैं उसे कोसता रहा। खैर, 24 नवंबर की तिथि शुरू हो गई और पता नहीं कब देर रात गए मुझे नींद आ गई और मैं सो गया।
        लगभग चार बजे सुबह बगल से जोरों से आ रहे झगड़े के स्वर ने मुझे जगा दिया। कोई कह रहा था-"गाना गाता है, ,बहू-बेटी के आगे गाना गाता है ,मड़वारी है " । 
फिर धपाक-धपाक-धपाक आवाज आई। 
अब अन्य कोई बोल रहा था- " न टिकट है,न रिजर्वेशन "। 
फिर पहला स्वर बोला- "रात भर से टी टी को हवा दे रहा है।" 
 फिर दूसरा स्वर- " किसी से खुद को जार्ज फर्नांडीज का साथी बता रहा है, और किसी से नीतिश कुमार का।"
 पुन: पहला स्वर- " ऐसे ही रात भर से सबको हवा देकर बैठा हुआ है"।
 तब तक वहाँ नीचे से उठकर तिवारी जी भी पहुँच गए थे। कोई कह रहा था- "इसे पुलिस के पास ले चलो" । 
फिर आवाज आई - "इसे टी टी के पास ले चलो", यह तिवारी जी थे।
 फिर पहले वाला स्वर बोला-"अभी तो सरकार बनिबै नहीं किहा और आप सबका ई हाल है।"

                          दृश्य-2
15 नवंबर, 2015 के दिन मेरे एक सहकर्मी श्री गौतम सिन्हा छुट्टी लेकर छठ पूजा के उपलक्ष्य में परिवार के साथ हावड़ा से रेलगाड़ी द्वारा स्लीपर क्लास में अपने घर नालंदा जा रहे हैं। सभी अपनी-अपनी बर्थ पर सो रहे हैं। रात 2 बजे झाझा के पास एक कोई व्यक्ति जोर-जोर से डंडा पटकता है और कहता है- "उठो।" 
गौतम सिन्हा जाग जाते हैं। कहते हैं-" अरे भाई, मेरा बख्तियारपुर तक परिवार के साथ रिजर्वेशन है। कहीं और जगह देख लो"। गौतम सिन्हा के अनुसार संबन्धित व्यक्ति देखने में नेता लग रहा है।
नेता जैसा व्यक्ति-" मालूम है। पर जानते नहीं हो लालू का राज आ गया है। उठ जाओ और बैठने दो।"
गौतम सिन्हा- " लालू का राज है! नीतिश का राज नहीं है?"
ऊपर की बर्थ पर लेटा एक व्यक्ति जोर से चिल्लाता है- " क्या है नींद खराब कर रहे हो? रिजर्वेशन होने के बाद भी चैन से सोने नहीं दे रहे हो।"
नेता जैसा व्यक्ति- " अब. .......का राज है। दो-तीन मर्डर और कर दूँगा तो क्या फर्क पडेगा?"
गौतम सिन्हा- " इतनी सी बात पर मर्डर करने की जरूरत नहीं हैं। सात नं बर्थ टी टी की है। वो ए सी कंपार्टमेंट में चला गया है। उधर चले जाओ।"
नेता जैसा व्यक्ति यह बड़बड़ाते हुए कि दो-तीन मर्डर और कर दूँगा तो क्या फर्क पड़ेगा, सात नं बर्थ की तरफ चला जाता है।

                       दृश्य-3
(जो पूरे भारत ने आज विभिन्न टी वी चैनलों पर देखा ) - आज 20 नवंबर, 2015 के दिन नीतिश कुमार जी ने 28 मंत्रियों के साथ पाँचवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। इस मौके पर नौ राज्यों के मुख्य मंत्री और शीला दीक्षित- केजरीवाल, बाबूलाल मरांडी-हेमंत सोरेन, शरद पवार- रामदास कदम,ममता बनर्जी- सीताराम येचुरी जैसे परस्पर विरोधी तत्व, केन्द्र के सत्ता पक्ष की तरफ से वेंकैया नायडू एवं रूडी सहित विरोध पक्ष के अनेक नेता एवं विभिन्न राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि मौजूद हैं।
          शपथ ग्रहण के मौके पर इतने बड़े जमावड़े के अनेक निहितार्थ लगाए जा रहे हैं। पर इसमें सबसे बड़ा निहितार्थ यह है कि नीतिश कुमार अखिल भारतीय स्तर पर अपनी स्वीकार्यता दिखा कर नरेन्द्र मोदी के सामने खुद को एक काउन्टर मैग्नेट के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहते हैं। पर शाम को तेजस्वी यादव की उपमुख्यमंत्री के तौर पर घोषणा के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि नीतिश कुमार का वर्तमान शासनकाल लालूजी की छत्रछाया के कारण तलवार की धार पर चलने के समान है। यदि इसके बाद भी वे अपनी साफ-सुथरी और विकास पुरुष की छवि को बचाए रखने में समर्थ होंगे तो यह चमत्कार से कम नहीं होगा और उस स्थिति में ही वे नरेन्द्र मोदी के विकल्प के तौर पर खुद को प्रोजेक्ट करने में सक्षम हो सकेंगे। एक सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या बिहार बदलेगा और यदि हाँ तो किस दिशा में बदलाव होगा। यदि नीतिश कुमार यह बदलाव सकारात्मक दिशा की तरफ कर सकने में स्वयं को सक्षम साबित करते हैं तभी वे स्वयं को नरेन्द्र मोदी के विकल्प के तौर पर पेश कर सकेंगे। 



Sunday, 15 November 2015

राष्ट्रहित और धार्मिक हीनभावनाएं (टीपू सुल्तान के प्रसंग में विमर्श)

पुष्यमित्र उपाध्याय-
          वैसे मेरे विचार में जब देश की सबसे बड़ी समस्या वर्ग संघर्ष के इतिहास के कारण ही उपस्थित है, तो इन इतिहासों पर चर्चा जरुरी है, और निश्चित ही ये केंद्र होने भी चाहिए | टीपू जरूर रहे होंगे देश भक्त और समाज को जोड़ने वाले , लेकिन कब? जब अंग्रेज छाती पर चढ़ आये तब ? जब सत्ता छिनती दिखी तब जागा एकता का भाव? उससे पहले तो काटम काट ही मचाये हुए थे इनके पूर्वज और ये | वर्तमान केवल उन लोगों की जयंती मनाता है जो निर्विवाद रूप से नायक रहे थे, जिन्होंने किसी भी अन्य वर्ग का दमन कर अपना सिक्का नहीं चमकाया | वैसे अंग्रजो का आना भी इस देश की मूल सभ्यता के लिए जरुरी था वरना मैं आज परवेज होता और आप शाहबाज़ , हाँ जो अत्याचार और लूट पाट हुई बस वो नहीं होना था।

कमलाकान्त त्रिपाठी-
          मराठों का इतिहास क्यों भूलते हैं? राघोबा की फ़ितरत से अंग्रेज़ों के सामने मुंह की खा गए. वरना मुग़ल सल्तनत के उत्तराधिकारी होने से कोई अन्य शक्ति रोक नहीं सकती थी. 1761 के बावजूद.

पुष्यमित्र उपाध्याय-
          सर ऐसे किन्तु परन्तु तो काफी सारे हैं, अगर गद्दारी न होती , एकता होती तो हम गुलाम ही कहाँ बनते?

मेरी प्रतिक्रिया-
          पुष्यमित्र उपाध्याय जी, पहले तो हिन्दू धर्म को इतना कमजोर मत समझिए कि आप परवेज होते और मैं शहबाज होता। हिन्दू धर्म की पाचक क्षमता, मौके के अनुकूल खुद को ढाल लेने और पैसिव प्रतिरोध की शक्ति, लचीलापन और समुत्थान शक्ति जबर्दस्त हैं। इस्लाम के आगमन के पहले भारत में जो भी आए उन्हें हिन्दू धर्म पचा गया। शक, कुषाण और हूण कहाँ हैं पता नहीं चलता। केरल में जहाँ यहूदी और ईसाई धर्म इस्लाम से भी पुराने हैं वहाँ एक मलयाली हिन्दू, ईसाई और यहूदी में आप आसानी से भेद नहीं कर करते। महाराष्ट्र में मैं लंबे अरसे तक रहा हूँ। वहाँ भी ऐसा ही है। कुछ लोगों को मैं नाम से महाराष्ट्रियन हिन्दू समझता था । बाद में मुझे पता चला कि वे लोग यहूदी यानी कि Jew हैं। 
          इस्लाम पहला ऐसा संगठित धर्म था जिसने हिन्दू धर्म के सामने चुनौती प्रस्तुत की। भारत में आए इस्लाम के अनुयाई बेहतर तकनीक और युद्धनीति के जानकार थे और इसके बल पर अपना सत्ता विस्तार करते गए। तथापि इस्लाम की शरण लेने वाले भारतवासियों में एक बड़ी संख्या उन लोगों की थी जो सत्ता से जुड़े रहना या उसके निकट रहना चाहते थे अन्य बड़ी संख्या उन लोगों की थी जो गरीबी और जहालत में थे और जिन्हें लगा कि इस्लाम की शरण लेने से उन्हें राहत मिलेगी। जबरन धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बनाए जाने की घटनाएँ अपेक्षाकृत कम हुई हैं और यदि औरंगजेब के उत्तरवर्ती शासनकाल या काश्मीर में जबरन परिवर्तन को छोड़ दिया जाए तो ऐसा प्राय: युद्ध आदि के दौरान या फिर राजनीतिक विरोध होने पर ही होता था। भारतवर्ष के उन मुस्लिम शासकों में से भी जिन्होंने जजिया कर लगाया, अधिकांश ने ब्राह्मणों को इससे मुक्त रखा। यह इस बात का परिचायक है कि उनमें हिन्दू धर्म के लिए कहीं कुछ tolerance था। एक मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकार ने इस्लामी कानून और शासन व्यवस्था के संदर्भ में लिखा है कि भारतवर्ष में मुस्लिम दाल में नमक के बराबर हैं इसलिए उन व्यवस्थाओं को यहाँ लागू करना संभव नहीं है। भारतवर्ष में मुस्लिम जनसंख्या अधिकतम 15 % के आस-पास ही रही। 
         इस प्रकार भारतवर्ष ने अरब से उठी इस्लाम की आँधी को झेल लिया पर इस्लाम को स्थान देने के बाद भी अपने पुराने धर्मों, संप्रदायों को तो बचाए रखा ही, पूरे दक्षिण पूर्व एशिया को भी सुरक्षित रखा। कमलाकान्त त्रिपाठी जी की इस बात से सहमत हूँ कि अँगरेजों के आगमन के समय मराठा शक्ति मुगलों सहित अन्य सभी स्थानीय शक्तियों पर भारी थी। पर अपने आगमन के साथ ब्रिटिश ने उनका भी भाग्य निर्धारण कर दिया । इतिहास हमेशा if एवं but के लिए स्थान छोड़ देता है।
        जो कुछ भी हो इतिहास का वह युग बीत चुका है और भारतवर्ष की यदि उन्नति करनी है तो हम सबको मिल- जुल कर रहना पड़ेगा। जख्मों को बार-बार कुरेदना,याद करते रहना और यह भाव रखना कि कोई उन्हें सहलाए हीनभावना का परिचायक मात्र है और इस प्रकार की हीनभावना का हमें राष्ट्रहित में परित्याग करना चाहिए। इतिहास विषयक चर्चा- परिचर्चा और संवाद में कोई हर्ज नहीं है पर यह हमारी जानकारी,कुछ सीखने और बेहतरी के लिए होना चाहिए न कि वह हमारे ऊपर इतना हावी हो जाए कि हमारे वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करने लगे।

Saturday, 14 November 2015

क्या इतिहास हमारे लिए वर्तमान की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है ?

क्या इतिहास हमारे लिए वर्तमान की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है ?
          कर्नाटक में टीपू सुल्तान को लेकर संग्राम छिड़ा हुआ है। इसके कारण तीन लोग कालकवलित हो चुके हैं और साम्प्रदायिक संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई है।
          एक वर्ग का कहना है वह महान देशभक्त और योद्धा था। दूसरे वर्ग का कहना है कि वह निरंकुश साम्प्रदायिक अत्याचारी शासक था।
          दो सौ वर्ष पूर्वकाल के इस राजा ने उस समय क्या किया था , वह अचानक आज हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण हो गया है कि उसके पीछे हम आज आपसी सद्भाव को नष्ट करने पर आमादा हैं। हर व्यक्ति में गुण- अवगुण होते हैं। शायद टीपू के साथ भी ऐसा रहा होगा। किसी के भी अवगुण अनुकरणीय नहीं हो सकते। पर इससे उसके गुण उपेक्षणीय नहीं हो जाते। मेरी यह चेष्टा होती है कि मेरे अधीनस्थ या साथ जो भी लोग काम करते हैं ,मैं उनके गुण और अवगुण दोनों ही समझूँ। फिर मेरा यह प्रयास रहता है कि उनके अवगुण कार्य- कलाप को कम से कम प्रभावित करें तथा उनके गुणों का अधिक से अधिक लाभ उठाया जाए। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब एक के बाद एक भारतीय रियासतें अँगरेजों के आगे दम तोड़ रही थीं, टीपू सुल्तान को इस बात का श्रेय है कि उसने उनसे बीस वर्षों तक लोहा लिया । उसकी बहादुरी को उसके विरोधी भी स्वीकार करते थे।
          टीपू के समय न तो धर्मनिरपेक्षता के नारे लगते थे और न ही मानवाधिकारों की बात करने वाली संस्थाएँ थीं। भारतीय इतिहास के मध्य युग में मुगल शासकों का युग अपेक्षाकृत उदारता का समझा जाता है । पर औरंगजेब एवं कुछ अन्य छुटभैये मुगल शासकों के अलावा जहाँगीर और शाहजहाँ के समय में भी छिटपुट घटनाएँ हुईं जिन्हें हिन्दुओं के ऊपर अत्याचार की श्रेणी में रखा जा सकता है। पर पहले तो यह घटनाएँ छिटपुट थीं, दूसरे कई बार ऐसी घटनाओं के पीछे प्रजा का विद्रोही हो जाना या ऐसे राजा का अधीन होना जो मुगल सत्ता को चुनौती दे रहा हो, जैसे राजनीतिक कारण होते थे। पुनश्च इस्लाम राज्याश्रित धर्म था ही, हिन्दू धर्म का उस युग में यह दर्जा नहीं था।शायद यही कारण है कि इतिहास का आकलन करते समय जहाँगीर और शाहजहाँ को औरंगजेब की श्रेणी में नहीं रखा जाता। मेरे अपने विचार से टीपू सुल्तान ने जहाँ भी हिन्दुओं का दमन किया- नायरों का या फिर कूर्गों का तो उसके पीछे धार्मिक से अधिक राजनीतिक कारण थे। यह जरूर है कि इस दमन के लिए अपनाए गए तरीकों को सभ्य या न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। पर सवाल यह है कि क्या मात्र इन घटनाओं के आधार पर टीपू का मूल्यांकन किया जाना उचित है। इतिहास जब भी किसी का मूल्यांकन करता है तो निरपेक्ष रूप से करता है, हिन्दू या मुस्लिम का चश्मा चढ़ाकर नहीं।
          यदि हम दो सौ,चार सौ, हजार और दो हजार साल पुराने झगड़े लेकर बैठने लगेंगे तो शायद इस देश में कोई शांति से बैठ नहीं पाएगा। फिर तो सबसे पहले लोगों को प्रधानमंत्री मोदी जी के इंग्लैंड जाने का विरोध करना चाहिए था क्योंकि अँगरेजों से हमें इतिहास पर आधारित अनेक शिकायतें हैं, फिर अब उनसे दोस्ती क्यों। दलितों को ब्राह्मणों और क्षत्रियों पर पिल पडना चाहिए। वेदों में जिन्हें धृतवर्ण:,अनासः,मृगयु कहा गया है उन्हें ऐसा कहने वाले के वंशजों के खिलाफ मोर्चा खोल देना चाहिए। वस्तुत: शास्त्रों में अनेक जातियों और समूहों के लिए ऐसी बातें कही गई हैं जो उनके लिए शिकायत का कारण हो सकती हैं।इनमें आज की कुछ प्रतिष्ठित जातियाँ भी हैं। फिर महिलाएँ पुरुषों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दें। उनके पास इतिहासगत आधार पर ऐसा करने के लिए अनेक कारण हैं। कल मेरे किसी पूर्वज ने यदि कुछ किया था जो आज किसी को नागवार गुजरता है क्या आज उसका दंड मुझे मिलना चाहिए इसके बावजूद कि मैं उसका समर्थन नहीं करता?
         हमें अपना वर्तमान सुधार कर अपना भविष्य सँवारना चाहिए या भूतकाल में जीते रहकर अपना वर्तमान बिगाड़ना और भविष्य चौपट करना चाहिए, यह विचार करने का विषय है। कल मैंने किसी की टिप्पणी पढ़ी कि बच्चे विज्ञान पढ़ना चाहते हैं पर हम उन्हें इतिहास पढ़ाना चाहते हैं। वस्तुत: उपर्युक्त वाक्य का अंतिम हिस्सा होना चाहिए कि हम उन्हें इतिहास के आधार पर आपस में भिड़ाना चाहते हैं। आज वेंकैया नायडू जी का कथन पढ़ा- Tipu row uncalled for. यदि किसी को टीपू की जयंती मनाया जाना पसंद नहीं है तो वह विरोध वैचारिक और चर्चा गत आधार पर होना चाहिए न कि इसे एक नए सांप्रदायिक संघर्ष का रूप दिया जाना चाहिए। जैसाकि प्रधानमंत्री जी कहते हैं हमारी लड़ाई आपस में नहीं गरीबी के खिलाफ है, विकास के लिए है ; फिर क्यों हम बार-बार आपस में लड़ने के लिए तत्पर हो जाते हैं और क्यों नहीं सत्तारूढ़ दलों समेत समस्त राजनीतिक दल इसके खिलाफ एक स्वर में बोलते हैं। क्यों वे भी एक बाँटने वाली सीमारेखा के इधर या उधर खड़े दिखाई देते हैं - Just to score political points?

Sunday, 8 November 2015

Warning bell for P M Modi (A discussion)

        Here I'm placing an online discussion with my friend Raghuvansh Mani ji regarding PM Modi. 

 Vidyadhar Mishra (Friend of my friend Raghuvansh Mani)-
          Modi has been PM for only one year. Those before him never saw the problems. Imagine, Secondary schools in UP never had toilets for girls and this was taken as normal by the great seculars of India. Now that the fanatic Hindu has become PM, he has addressed the problem and he is addressing many more issues to make India a clean and safe place for the poor. Many forward castes cannot digest the fact that an OBC has become PM and is discharging his responsibilities so well that put all his predecessors in shame.

Raguvansh Mani (My friend, leftist by thoughts )-
          He is not that great, He is simply talking and talking. There is hardly any change in the prospects here. It is irrelevant to compare him with Nehru, Indira or even Rajiv. they brought sea change in the history of this country.

Myself-
          I accept Raguvanshji that Nehruji and Indira were Great despite of all their shortcomings. But I fail to understand how Rajiv Gandhi joins the category of Greats with his faltering on Shahbano case by submitting to fundamentalists, then repeating the same by allowing shilanyas at Ramjaanmbhoomi.The only thing that is often repeated by the Congress in his favour is that he introduced computers to India. Computers are prevalent in the whole world now and any way they would have been introduced to India.Rajiv Gandhi is primarily responsible for rise of fundamentalism in India as he gave long rope to such elements.He was a mediocre person thrust upon the nation by Indira Gandhi and Congress Party. Nehru had eighteen years behind him and Indira fifteen years as PM for all their Greatness. It is true that although Modi has only one and half years as PM behind him,he is losing time very fast and even the good efforts by him are at the risk of going to dustbin due to rogue elements of his party.He has to act fast if he wants to be remembered as PM of India by future generations.

Raguvansh Mani-
          Yes. Rajiv Gandhi failed on certain issues that you mentioned but his achievements are better than Modi, the talkative. Remember his Operation Blackboard and New Education Policy along with the Panchayati Raj and Empowerment of Women. There may be some disagreement on those issues but he implemented them sincerely. We should not forget that the computer matter could not be introduced in the time of Indira Gandhi, but only during the regime of Rajiv Gandhi. At least he exhibited the will power to do so. Modi has yet to start his machine.

Myself-
         Implementation of a scheme is different from standing for principles.It is standing for principles and even being ready to make sacrifices for, that in my view makes a difference between mortals and everlasting Greats. On that count Rajiv Gandhi who had come to power with immense goodwill of people failed miserably. He capitulated before fundamentalists and ultimately lost power.
         Ironically here I find an analogy with Narendra Modi.Modi also came to power with immense goodwill and hope of people who believed he was a doer of things.Now if he doesn't act decisively against fundamentalists of his party and tightens noose around them , he is also on the verge of losing his credibility with the people amid combined onslaught of opposition and leftists forces. On this score, his action in favour of pluralistic culture of the country or disregard and inaction for the same otherwise,will decide whether he has any shred of Greatness in him or merely a talker. I don't think he can wait as the moment has arrived. I had some expectations on this count as he had reined in the the VHP and some other Sangh affiliated Organisations in the later years of his reign in Gujrat but so far it has not happened during his present stint as PM. Now he has the virtual risk of losing the plot. So far as implementation of schemes is concerned Modi can also say that now India's GDP has surpassed that of China and India has emerged as biggest investment destination of the world. He can count many other schemes, but I don't think that can place him in the category of Greats if he fails on the front of unity,integrity and plurality of the country and allows his partymen or affiliates to have a field day for attacking these core values of the nation.

Raguvansh Mani-
          The point is that the previous PMs had fared better than the present PM. Implementation of programmes is more Important than keep on talking. So, this PM wil have to prove himself by his work and not by his talks. I think it was the right wing that produced the communal politics in India. It is good to stand by principles, but wrong to stand by the principles that create disturbances in the society. Manish ji (I've not quoted Manishji's comment here which Raghuvanshji is reacting to) it is strange to find you saying things like Indira played some role in the increase of population. She was the first PM to make an attempt to put a check on population. You should not forget that one of the reasons of her fall after the Emergency was the Nasbandi karyakram. After her no PM has tried to put a check on this issue. You are young enough to know the actual situation when operation Blue Star was ordered. The case of Sikh killings was not organised. it took place after the assasination of Mr Gandhi. Many RSS leaders were emotional enough to declare the bycott of Sikhs those days. Mr. Adwani told Indira to do something after the assasination of Lalit Makan. Now people are so political that they say anything to get their political aims. No doubt India was defeated in the Indo-China war. But the Indian army was not prepared for that attack. Nehru was certainly not a great leader to lead a war. But he was a great leader of peace. There cannot be any comparison between him and this PM of yours. Fundamentalism was fired on the mistakes of Rajiv by Adwani and his RathYatra. But no BJP propagandist will talk of the communal frenzy created in those days. Well,they are always selective. You should see the negative and positive aspects both at a time. Our past leaders had their drawbacks, but they had great qualities too, and they performed very well. Modi has yet to show his ability. But for many he is no less than God.
          Sanjay ji , I agree that the political principles are very important. Nerendra Modi is a flower bloomed on the stem of RSS. I don't think he will act aginst these institutions. Let us see and hope for better.

My finishing comment-
        As I've said above in my comment, the moment for Modi to act and prove that along with the unity and integrity of India he is committed towards preserving its plural culture and ethos also, has arrived. Mere telling that so and so have been reprimanded won't do. It feels like a farce when the so-called reprimanded persons again speak in the same voice after a few days only. P M should be seen acting decisively. Otherwise he is on the verge of losing the plot as shown now by the result of Bihar elections.