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Monday, 26 October 2015

~ गजल ~  (गीता की वतन वापसी पर)


~गजल  (गीता की वतन वापसी पर ) ~

बिछड़ी दुख्तर को फिर से घर मिले
जलावतन को उसका वतन मिले ।।

इस नीले अंबर की छत के तले 
गर चाँद ढले तो सूरज निकले ।।

नफरत की धूप से जो धरती जले
तन-मन पर कोई चंदन आन मले ।।

कुछ इधर बदले कुछ उधर बदले 
चलो फिर से मुहब्बत की बात चले ।।

इंसानियत का रुतबा सबसे पहले 
सारे मजहब इसी की छाँव पले ।।

लोगों के दिलों में गरमाहट फैले
मुल्की रिश्तों पे जमी बर्फ पिघले ।।

चलो कहीं  तो कोई शजर हिले
यहाँ कुछ फूल गिरें कुछ हवा चले ।।

हो अमावस  की काली रात भले
'संजय' चाँद-सितारों की भी बात चले ।।
           - संजय त्रिपाठी 



Wednesday, 21 October 2015

~ मुख पर कालिख पोतने के खेल की महत्ता (व्यंग्य)~          

~ मुख पर कालिख पोतने के खेल की महत्ता (व्यंग्य)~
          मुख पर कालिख पोतने का खेल छूत की बीमारी की तरह मुंबई से दिल्ली पहुँच गया वैसे ही जैसे डेंगू महामारी के रूप में पहले दिल्ली में फैला फिर मुंबई पहुँच गया । मुंबई किसी का अहसान अपने सर पर नहीं रखती तुरंत अहसान चुका कर हिसाब बराबर करती है। दिल्ली से गिफ्ट में डेंगू मिला था सो मुंबई ने उसे बदले में कालिख पोतो खेल का गिफ्ट दे दिया।
        लोकसभा चुनावों के कुछ पहले जूता फेंक और फिर पर थप्पड मार खेलों का दौर चला था। जूता फेंक खेल का प्रेरणास्रोत ईराक का पत्रकार था जिसने बुश पर जूता फेंका था। विदेशी प्रेरणास्रोत वाले इस खेल में हमारे खिलाड़ी निपुण नहीं थे । इसलिए इसका लक्ष्य जो भी होते थे, वे दाएं- बाएं या ऊपर- नीचे झटके से इधर-उधर हो, झुक कर बच लेते थे। यही कारण था कि यह खेल लोकप्रिय नहीं बन सका और जल्दी ही अवसान को प्राप्त हो गया।
         थप्पडमार खेल, जूता फेंक खेल की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय हुआ। गाहे-बगाहे इसका नमूना अभी भी देखने को मिल जाता है। लोकसभा चुनावों के पहले इसकी लोकप्रियता का आलम ये था कि जब एक केन्द्रीय मंत्री को किसी ने थप्पड मारा तो अन्ना हजारे सदृश पुण्यात्मा कह बैठा- बस एक ही थप्पड! पर इस खेल के साथ एक समस्या यह है कि कई बार लक्ष्य के साथी, खिलाड़ी के सफल या असफल प्रयास के बाद उस पर आफत बन कर बरस पड़ते हैं और इस बरसात से खिलाड़ी के अधमरा हो जाने के बाद पुलिस की गिरफ्तारी का छाता ही बचा पाता है। दूसरे कई बार जो लक्ष्य होता है वह खिलाड़ी के घर उसकी कुशल-क्षेम पूछने पहुँच जाता है और इस प्रकार मसीहा की ख्याति प्राप्त कर लेता है या फिर उस श्रेणी में आने का प्रयास करता है। इससे खिलाड़ी की सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है और उसका असर उल्टा हो जाता हैं। 
          खैर कुछ भी हो, यह तो मानना पड़ेगा कि जूता फेंक और थप्पड मार दोनों ही खेलों में हिंसा का समावेश है। इसलिए इन विधाओं में हाथ आजमाने वाले खिलाड़ी नए वैकल्पिक खेल की तलाश में थे और यह मिला है कालिख पोतने के खेल के रूप में।हमारे देश में राजनीति में परम्परा बन गई है कि जिन सिद्धांतों की दुहाई दी जाए, उनका उल्टा किया जाए। सो ऐसे राजनीतिक दल और संगठन जिन्हें तोड-फोड़ और हिंसा से कोई परहेज नहीं है, कह रहे हैं कि कालिख पोतने के नायाब खेल को उन्होंने इसलिए शुरू किया है कि यह अहिंसक है। बिना किसी प्रकार की हिंसा का प्रयोग किए इसके द्वारा विरोध प्रकट किया जाता है। उनका मानना है कि यदि गाँधीजी होते तो इस अहिंसक विरोध प्रदर्शन के लिए उनकी सराहना करते। उनका कहना है कि इस शांतिपूर्ण प्रयास के लिए उनके संगठन का नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी प्रस्तावित किया जाना चाहिए। दूसरे इस खेल के प्रतिपादकों का कहना है कि यह बड़ा ही फेयर यानी कि निष्पक्ष खेल है। इसमें कालिख पोतने वाले को तो ख्याति मिलती ही है, जिसके कालिख पोती जाती है वह भी कालिख लगाए-लगाए प्रेस-कांफ्रेंस करता है या स्टेटमेंट देता है और इस प्रकार उसे भी ख्याति मिलती है। इस खेल के समर्थक इसके पक्ष में यह दलील भी देते हैं कि इसकी प्रेरणा उन्हें देश के सर्वाधिक लोकप्रिय त्योहार होली से मिली है। इस तरह इस खेल को अपनाना देश की सांस्कृतिक परंपरा के अनुकूल है। इसलिए भारतीय संस्कृति का अनुसरण करने वाले सभी लोगों को इस खेल से कोई परहेज नहीं करना चाहिए और इसकी सराहना करनी चाहिए। उनका कहना है कि वे इस खेल को ओलिम्पिक खेलों में शामिल करने का प्रस्ताव करेंगे और विभिन्न देशों की सरकारें तथा स्पोर्ट्स एसोसिएशन उन्हें इसके लिए समर्थन प्रदान करें। वे इस खेल को देश में इतना लोकप्रिय बना देना चाहते हैं कि सभी लोग एक-दूसरे के कालिख पोतने के प्रयास में लग जाएं और सदैव लगे रहें। इससे यह लाभ होगा कि देश के सारे लोगों में एकरूपता आएगी और सभी एक ही रंग के दिखेंगे। इस प्रकार सामाजिक भेदभाव को मिटाने में सफलता मिलेगी। इस खेल के एक अन्य पक्षधर ने कहा कि चूँकि कालिख और आई एस आई एस के झंडे का रंग एक ही है इसलिए एक बडा लाभ यह है कि तमाम सारे कालिख पुते लोगों को आई एस आई एस अपना समर्थक समझेगा और भारत पर हमले की बात नहीं सोचेगा । कालिख पोतने के इतने सारे लाभ सुनकर इस खेल के प्रतिपादकों और अनुयाइयों दोनों के प्रति मैंने अपना सर श्रद्धावनत कर दिया हैं। मेरे विचार से कालिख पोतने के खेल में हमारी परंपरागत निपुणता देखते हुए इसे राष्ट्रीय खेल बना देना चाहिए। वर्तमान राष्ट्रीय खेल हाकी में वैसे भी इन दिनों हम हारते ही रहते हैं। जब यह खेल हमारे राष्ट्रीय खेल और साथ ही ओलम्पिक खेल का गौरव प्राप्त कर लेगा तो एक बड़ा लाभ यह होगा कि विदेशों में इस खेल के कोच की भारी माँग होगी और यह कार्य हमारे ही देश के लोग करेंगे। फिर विभिन्न देशों में कालिख पोतने के लीग टूर्नामेंट शुरू होंगे जिसमें हमारे देश के लोगों की निपुणता देखते हुए उन्हें खिलाड़ी के रूप में खेलने का मौका मिलेगी। इस प्रकार हमारे देश के तमाम लोगों के लिए रोजगार का सृजन होगा।
         एक खबर यह भी है कि पूर्वी भारत के एक राज्य में पुनः ब्रिटिश भारत की पुरानी राजधानी को देश की राजधानी बनाने की माँग उठाई जाने वाली है। इस माँग के समर्थकों का कहना है कि देश की राजधानी को छुआछूत के रोगों से विरत रहना चाहिए पर हाल में छुआछूत के रोग फैलने से पता चलता है कि दिल्ली और मुंबई इस पैमाने पर खरे नहीं उतरते। ब्रिटिशकालीन भारत की पुरानी राजधानी ने कालिख पोतने के खेल से विरक्ति दिखाई है और इस प्रकार उक्त पैमाने पर यह नगर खरा उतरता है। इसलिए माँग की जाएगी कि अंग्रेजों द्वारा स्थापित ब्रिटिशकालीन भारत की पहली राजधानी को पुन: देश की राजधानी के रूप में उसका गौरव वापस किया जाए। इस पूर्वी राज्य के पड़ोसी देश के साथ पोरस बॉर्डर के कारण पड़ोसी देश के रास्ते अवैध रूप से भारत आने -जाने वालों को काफी सुविधा रहती है । इसलिए भारत से अवैध प्रेम की चाह में भारत आने-जाने की इच्छा रखने वाले लोग भी इस माँग के पक्षधर हैं क्योंकि अपने कारनामों को अंजाम देने के लिए दिल्ली तक का सफर करने में इन्हें अनेक खतरे उठाने पड़ते हैं। मुहब्बत के सफर को आग का दरिया बनाकर और उसमें डूबकर जाने से फिर इन्हें छुट्टी मिलेगी और इनका सफर आसान हो जाएगा। जब चाहा बॉर्डर के इधर राजधानी में और जब चाहा उधर राजधानी में । फिर अवैध मुहब्बत का ये कारोबार निर्बाध गति से चल सकेगा।-संजय त्रिपाठी

Tuesday, 20 October 2015

For Communal amity P M Modi should speak

         When P M Narendra Modi spoke on 14th of October on the Dadri/ Bisahda incidence, more than after a fortnight and said such incidents including cancellation of Ghulam Ali's concert were undesirable, saddening and unfortunate, his critics condemned it as too late and soft. P M said B J P didn't support such happenings. However he said Central Govt. had nothing to do with the incidents and by levelling accusations at his door the opposition was trying to polarize the polity. 
          While PM's speaking on the issue at last is relieving, I find objections of his detractors valid when they say P M's reaction is weak, mild and late. PM is also not off the mark when he says that Dadri like incidences are being used to corner him. The vicious debate that is going around cow and beef makes me feel as if there are no seculars in the country ,there are only pro Hindu or pro Muslim people. Some people are very insistent upon stressing that eating beef is not a crime . It is implicit in such an argument that whosoever wants, can take beef. They don't care how much explosive this issue may become(actually it has already become) and endanger the social harmony. My better half has done research work on communal politics during British Period and her research work shows that cow and beef issue have been a major cause and source of many Hindu-Muslim riots during British rule. People should learn from Mughal rulers who were well aware of the issue and most of them had banned cow slaughter to keep social harmony intact and avoid communal rift in the society.It is sad that today's politicians and even so called intellectuals who have been advocating beef, can't understand this fact. There are people and always will be who insist that cow is mother like for them, it is a matter of religion and they won't hesitate to go any extent to save her.
          P M is under continuous scrutiny due to 2002 Gujarat riots which happened during his Chief Ministership of the Gujarat state. Since then he has been painted as a vllain and demonized by his opponents. They are hell bent upon keeping him on tenterhooks.They are not expected to allow a let up in their efforts. P M Modi's any faltering or slackness is an opportunity for them.
         In the above context I would like to make a reference regarding Rajiv Gandhi who came to power with immense goodwill of the people. But he faltered while finding a solution for the Shah banoo case. He overrode court judgement and passed a legislation to undo steps taken by the court to mitigate miseries of divorced are separated Muslim women. Since then the downward slide for him began.
          So it is P M Modi who has to take precaution and not give anyone an opportunity to cast aspersions on his performance as P M of this country. He should remember words of former P M A. B. Bajpayi who advised him to follow Rajdharma. As the P M himself has said so many times, maintaining sanctity of the Constitution of India is most important task for him. When any incidence takes place which attacks the very tenets or spirit of this constitution, he should be vocal in condemning it and announcing as well as initiating tough measures to control the damage immediately. He should not leave this job to his deputies or even President. People want to listen him as he is virtual head of the executive and President is only a figurehead. It will be reassuring for the people and deprive his adversaries of an opportunity to strike upon him.

Monday, 19 October 2015

पुरस्कार वापसी का लाइव परफारमेंस!

          मुनव्वर राणा साहब ने पुरस्कार वापसी का क्रम शुरू होने के बाद अपने घोषणा की थी कि वे पुरस्कार वापस नहीं करेंगे । फिर तीन-चार दिन में ऐसा क्या घट गया कि उन्हें इसका लाइव परफारमेंस देना पड़ गया। मुनव्वर साहब ने कहा कि उन्हें डर है कि कोई रात में घर में घुस कर उन्हें मार डालेगा और उन्हें कोई बचाने वाला नहीं हैं। वे यह किसके लिए कह रहे थे। कौन लोग हैं यह।
          फिर जो डर जाए वह साहित्यकार कैसा? सोलझेनित्सिन ने साइबेरियाई गुलाग में डाले जाने की कोई परवाह नहीं की और बेहतरीन साहित्य सृजित किया। फिर आपको किसने रोका है? साहित्यकारों के द्वारा सरकार की आलोचना किया जाना, पुरस्कार वापस किया जाना देश में लोकतंत्र की बहाली की गवाही देता है । 
          पर बात यह कही जा रही है कि देश में फासीवाद आ गया है। अगर ऐसा है तो जनता को जगाने से और फासीवाद के विरुद्ध आंदोलन खड़ा करने से आपको किसने रोका है? राजनीतिज्ञों के लिए अपना हित पहले है, वे वही बात करेंगे भले ही किसी भी पार्टी के हों। पर आप साहित्यकार हैं,उनकी बात से व्यथित हुए बिना, अपनी लेखनी को विराम दिए बिना,तूफानों में भी दिया जलाए रखकर विरोध कीजिए, बिना किसी राजनीति का हिस्सा बने । जब आप राजनीति का हिस्सा बनते हैं तो विरोध बेमानी हो जाता है। 
          आज मुनव्वर राना साहब को जब साहित्य अकादमी द्वारा दिये गये स्मृति चिह्न को टी वी के ए बी पी चैनल वालों के समक्ष वापस रखते देखा जिसमें रुपहले अक्षरों में साहित्य लिखा हुआ था तो लगा कि जैसे कोई साहित्य पर तमाचा मार रहा है। साहित्य अकादमी में मात्र पाँच सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत होते हैं । शेष 90 से भी अधिक सदस्य साहित्यकारों के अपने होते हैं। फिर भी यदि वे साहित्य अकादमी से मनोवांछित परिणाम हासिल नहीं कर सकते हैं तो इन साहित्यकारों का खुदा ही मालिक है।
           यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि कोई मुझे दक्षिणपंथी विचारधारा का न समझ ले । मैं समाजवादी विचारों का पक्षधर हूँ ( इन दिनों प्रचलन में आ गए परिवारवादी समाजवाद का नहीं) और यह बात पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि भारतवर्ष के सामने तरक्की के रास्ते पर चलने के लिए बहुधर्मी एकता और सद्भाव के सिवा कोई रास्ता नहीं है और इसे सुनिश्चित करने में देश के सबसे बड़े दो धार्मिक समूहों हिन्दू और मुस्लिम दोनों की जिम्मेदारी अन्य मतावलंबियों से कहीं अधिक है। पर दोनों ही समुदायों में ऐसे लोग हैं जो सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुँचाने पर आमादा हैं। जरूरत इस बात की है कि जहाँ भी आग लगाई जाती है उसे हवा देने के बजाय बुझाने का प्रयास किया जाए। पर आग लगाने और हवा देने वाले ही ज्यादा दिखाई दे रहे हैं, बुझाने वाले नहीं । आज फार्रूख अब्दुल्ला साहब ने तो लोगों को अब्दुल रशीद के मुँह पर कालिख पोते जाने के संदर्भ में देश के टुकड़े देखने की चेतावनी दे डाली है। पर उनके द्वारा गोमांस पार्टी दिए जाने वे कुछ नहीं बोले थे। रशीद साहब कालिख पुता चेहरा दिखाकर कह रहे हैं कि दुनिया देख ले कि भारत काश्मीरियों के साथ कैसा व्यवहार करता हैं। सवाल यह है कि कुछ गुंडे - मवाली लोगों के व्यवहार को क्या पूरे भारत के व्यवहार की संज्ञा दी जा सकती है? यह व्यक्ति गोमांस पार्टी आयोजित करने के बाद अब गाँधीजी का नाम उद्धृत कर रहा है।
          कई वर्ष पूर्व एक मुख्यमंत्री के शासनकाल में मुस्लिम गाँवों में कत्लेआम हुआ। कुछ वर्षों पहले उस मुख्यमंत्री के परिवार के एक सदस्य ने मेरी उपस्थिति में कहा - बाबूजी ने कहा कि सालों को काट कर फेंक दो । मैं यह सुन कर अवाक रह गया। वह मुख्यमंत्री एक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टी के थे । मेरे कई साम्यवादी मित्र हैं और इनमें से कई हैं जिन्हें थोड़ा सा उकसाइए तो एक धर्म विशेष के खिलाफ उनकी असली भावनाएं सामने आ जाती हैं। कहने के लिए लोग तरह- तरह के वामपंथी साहित्यकार संगठन बनाकर उसके पदाधिकारी और सदस्य बन कर घूमते हैं। पर एक बार ये आपको अपना करीबी समझने लगें फिर देखिए मंच पर दिए जाने वाले अपने भाषणों से अलग हट कर धर्म विशेष और कुछ जातियों के बारे में कैसे विचार व्यक्त करते हैं। 
          पहले जब धर्मनिरपेक्षता विरोधी और धर्मांधतापूर्ण घटनाएँ घट रही थीं तब इन साहित्यकारों का विवेक नहीं जागा। अब जब एक अलग विचारधारा की सरकार है तब साहित्यिक पुरस्कार वापस किए जा रहे हैं। यह इस आशंका को बल देता है कि साहित्यिक पुरस्कार वापस करने के पीछे राजनीतिक कारण हैं। अन्यथा क्या पुरस्कार वापस करने वालों को कलर ब्लाइंडनेस है जो उन्हें पहले घट रही धर्मनिरपेक्षता विरोधी घटनाएँ नहीं दिखाई देती थीं। स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले राजनीतिज्ञों एवं उसका झंडा उठाने वाले समाज के अन्य वर्गों के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार के कारण ही आज भाजपा सत्ता में है। यह दोगलापन है जिसके कारण साहित्यकार अप्रभावी हो रहे हैं। 
          ए बी पी टी वी चैनल वालों ने जब साहित्यकारों के साथ राकेश सिन्हा, संबित पात्रा और अतुल अनजान को बैठा दिया तभी साहित्यकारों को  समझ लेना चाहिए था कि बहस अंततोगत्वा साहित्यिक नहीं बल्कि राजनीतिक होने जा रही है। ए बी पी चैनल वालों को तो एक स्कूप मिल गया जिसे वे एक-दो दिनों तक भुनाते रहेंगे। 

Tuesday, 13 October 2015

चंद सिरफिरे समाज को बाँट नहीं सकते!

          मजहबी नफरत की बुनियाद पर पले लोग अच्छे और बुरे का, स्याह और सफेद का भेद नहीं कर करते। जो इनके प्रभाव में आ जाते हैं वे भी नहीं कर सकते। यह नफरत तनिक सी देर में हवा के एक बहाव से बवंडर और फिर प्रचंड तूफान में परिवर्तित हो जाता है और फिर बिना इस बात की परवाह किए कि कौन सा पेड़ बबूल का है और कौन सा आम का सबको धराशायी करता जाता है। बबूल का पेड़ जहाँ गिरा वहीं लोगों को शिकार बनाकर उन्हें लहूलुहान करता है ,वहीं आम के पेड़ों से गिरे सभी आम नफरत के व्यापारियों की टोकरी में गिरते हैं और यही उनका कैपिटल गेन है जिस पर उन्हें कोई टैक्स नहीं देना होता।
          दादरी के बिसहडा गाँव मे भी यही हुआ। 8 अक्टूबर को देश ने वायुसेना दिवस मनाया । पर इसके चंद दिनों पहले नफरत के तूफान में एक वायुसैनिक के पिता की जान चली गई और वायुसेना दिवस के दिन वह मजहबी तूफान की चपेट में आ गए अपने भाई की शुश्रूषा में लगा हुआ था। मजहबी नफरत के व्यापारी आम की फसल की बोहनी में लगे हुए हैं क्योंकि गाय मुख्य चर्चा में आ गई है। कोई सीना ठोंककर अपने को बीफ ईटर बता रहा है, कोई स्वयं को इस मामले में वशिष्ठ की परंपरा का अनुगामी बता रहा है। कोई कह रहा है कि कई हिन्दू बीफ खाते हैं तो कोई ऋषियों-मुनियों को बीफ खाने वाला बता रहा है तो कोई गौहत्या की बात कहकर ऐसा करने वालों को चेतावनी दे रहा है और सरकार से गौहत्या बंद कराने की माँग कर रहा है। इस स्थिति में सारे मजहबियों- क्या हिन्दू और क्या मुसलमान- की पौ-बारह है। राजनीतिक रोटियों को सेंकने का यही सबसे अच्छा मौका हैं सो सेंकी जा रही हैं।
          यह तो भला हो बिसहडा गाँव वालों का जो उन्हें अक्ल आ गई और उन्होंने दिनांक 11 अक्टूबर के दिन हकीम की दो बेटियों का गाँव में विवाह आयोजित कर सिद्ध कर दिया कि हिन्दू और मुसलमान अब भी साथ-साथ हैं और आगे भी रहेंगे। चंद सिरफिरे लोग समाज को कुछ समय के लिए उकसा सकते हैं पर बाँट नही सकते।

अकादमी पुरस्कार वापस करना कितना प्रासंगिक ?

                                      अकादमी पुरस्कार वापस करना कितना प्रासंगिक ?
          नयनतारा सहगल के पुरस्कार वापस करने के बाद से साहित्य अकादमी पुरस्कारों को वापस करने की होड़ लगी हुई है और अब तक 25 साहित्यकार पुरस्कार वापस कर चुके हैं। कल मैंने अकादमी पुरस्कार वापस करने के संबन्ध में मुनव्वर राणा और असगर वजाहत साहब के विचार पढ़े थे कि वे ऐसा करने वालों की इज्जत करते हुए भी इस उपाय के प्रभावी होने में विश्वास नहीं करते हैं । अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी साहित्यकार मृदुला गर्ग ने बड़ा मौजूँ सवाल उठाया है कि पुरस्कार वापस कर या अकादमी से इस्तीफा देकर साहित्यकारगण क्या अकादमी की स्वायत्ता के लिए खतरा नहीं पैदा कर रहे हैं। उनका कहना है कि सभी राज्यों में फैली हिंसक असहिष्णुता का और इस सबके प्रति केन्द्र और राज्य सरकारों की उपेक्षापूर्ण दृष्टि का वे पुरजोर विरोध करती हैं। जो भी लोग पुरस्कार लौटा रहे हैं या त्यागपत्र दे रहे हैं उनके साथ वे सहानुभूति रखती हैं। उनका कहना है कि स्वनियुक्त नैतिक पहरेदारों द्वारा एकांगी सांस्कृतिक मूल्य व्यवस्था थोपने का विरोध और असहिष्णुता से असहमति लेखन का अंतर्निहित तत्व है।

         परंतु त्यागपत्र देकर और पुरस्कार वापस कर विरोध का जो तरीका अपनाया जा रहा है वह ऐसा दर्शाता है जैसे कि साहित्य अकादमी कोई स्वायत्त संस्था न होकर सरकार की ही एक शाखा है। मृदुला गर्ग का कहना है कि साहित्यकारों द्वारा ऐसा किया जाना सरकार को साहित्य अकादमी में अपने प्रतिनिधियों को नियुक्त करने का अवसर प्रदान कर सकता है। संस्कृति मंत्री कह ही चुके हैं कि अकादमी में विरोध पर उनकी नजर है। नि:संदेह साहित्य अकादमी को कालबुर्जी की हत्या की निंदा करनी चाहिए थी और शोक सभा आयोजित करनी चाहिए थी। केवल साहित्य अकादमी के ही पुरस्कार क्यों लौटाए जा रहे हैं, अन्य सरकारों द्वारा दिए गए अन्य पुरस्कार भी लौटाए जाने चाहिए थे (एक समाचार के अनुसार नृत्यांगना माया राव ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार वापस लौटाने की घोषणा की है)।

          मृदुला गर्ग आशंका व्यक्त करती हैं कि सरकार के स्थान पर साहित्यकारों की अपनी विधिवत निर्वाचित स्वायत्त संस्था को प्रहार का केन्द्र बनाकर उसे कमजोर किया जा रहा है। साहित्यकार स्वयं आपस में झगड़ कर सरकार के लिए स्वायत्त संस्था को अधिकृत कर लेने का रास्ता साफ कर रहे हैं।

         मेरा अपना मत है कि जब विभिन्न लेखकों/रचनाकारों को पुरस्कार विभिन्न सरकारों के शासनकाल में प्रदान किए गए हैं तो उन्हें आज वापस करना जब एक अलग विचारधारा वाली सरकार है जिसने यह पुरस्कार नहीं प्रदान किए थे , उनकी वापसी के औचित्य को सिद्ध नहीं करता। इसी आधार पर आज पुरस्कार वापस करने वाले अपनी तुलना रवीन्द्रनाथ टैगोर से नहीं कर सकते हैं। कविगुरु ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई नाइटहुड की उपाधि ब्रिटिश सरकार को ही लौटाई थी। इंद्रजीत हाजरा का कहना है कि इस प्रकार का विरोध अवांछित तौर पर भारत के विधिक अस्तित्व पर सवाल उठाता है और मैं उनसे सहमत हूँ। देश में दक्षिणपंथी तत्वों के अत्युत्साह के कारण कहीं- कहीं अतिरंजित स्थिति देखने में आ रही है उसके बावजूद भारत " बनाना रिपब्लिक" नहीं बन गया है। जहाँ भी अति की स्थिति है उसको नियंत्रित करने हेतु सरकार पर दबाव बनाने के और भी तरीके हैं। परंतु पुरस्कृत साहित्यकार जो रास्ता अपना रहे हैं वह विश्व में भारत को सीरिया,इराक और अफगानिस्तान की श्रेणी में लाकर खड़ा करता है जहाँ फिलहाल आप अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की बात ही नहीं सोच सकते। कम से कम दुनिया को गलत संदेश देने से हमें परहेज करना चाहिए।

          जब इस प्रकार के विरोध प्रदर्शन के पीछे राजनीति होने की बात कही जाती है तो वह निराधार नहीं है। मैलियाना और हाशिमपुरा के नरसंहारों तथा बाबरी मस्जिद के विध्वंस के समय स्थिति कम सांप्रदायिक नहीं थी । तब हमारे पुरस्कृत साहित्यकारों ने यह रास्ता क्यों नहीं अपनाया। सवाल यह भी है कि क्या समस्त पुरस्कार कार्यकर्ताओं द्वारा पुरस्कार लौटा देने के साथ ही विरोध की भी इतिश्री हो जाएगी। त्यागपत्र दे देने और पुरस्कार लौटा देने का निर्णय मुझे "पैसिव" विरोध का लगता है जो सक्रिय या पुख्ता विरोध का तरीका नहीं है और ड्राइंगरूम में बैठकर लिया गया निर्णय प्रतीत होता है जिसका असर सीमित होगा और कुछ दिनों में समाप्त हो जाएगा। विरोध व्यक्त करने के लिए यदि हमारे साहित्यकार अन्य सक्रिय तरीके अपनाते जिनमें नैरंतर्य का समावेश रहता जो समाज को लंबे समय तक अनुप्राणित कर सकता तो वह अधिक कारगर सिद्ध होता।

Wednesday, 7 October 2015

बिसाडा के सरताज से हमें और भी सरताज चाहिए!

       
          दादरी के बिसाडा गाँव में गौकसी की अफवाह के कारण हुई मुहम्मद अखलाक की हत्या के बाद उक्त घटना को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही राजनीति जोरों पर है। पर इस सबके बीच उनके बड़े पुत्र वायुसेना में कारपोरल के रूप में कार्यरत सरताज ने बड़े ही संयम के साथ अपनी बात रखी है जो गौर करने लायक है-
         " हमारी पीड़ा समझने के बजाय राजनीतिज्ञों को अपनी राजनीति की फिक्र है। मेरे पिता की मृत्यु राजनीति का विषय बन गई है। बहुत से राजनीतिज्ञ मेरे घर पर सिर्फ इसलिए आए कि मीडिया में उनका नाम आए।"
          " मेरा परिवार देशभक्त है। इसी कारण मैंने वायुसेना में नौकरी की है। सांप्रदायिक सद्भाव लोकतंत्र का मूल तत्व हैं। हमारा देश सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जाना जाता है। मेरी अपील है कि लोग शांति भंग न करें।"
          " न्याय इस प्रकार का होना चाहिए कि एक उदाहरण बने। लोगों के दिमाग से डर दूर करें। यह घटना इस तरह की अंतिम घटना होनी चाहिए। यद्यपि मैं सीमा पर तैनात नहीं हूँ, मैंने समर्पण के साथ देश के लिए काम किया है। मेरा छोटा भाई दानिश भी सेना में जाने के लिए तैयारी कर रहा था। घटना से एक घंटा पहले मैंने परिवार के साथ बात की थी और सब कुछ सामान्य था। बिना किसी कारण के मेरे पिता को मार दिया गया।........कोई उनकी मदद के लिए नहीं आया"।
          इस देश के एक नागरिक के तौर पर हम तुमसे माफी माँगते हैं सरताज! जिन परिस्थितियों में तुम्हारे पिता का इंतकाल हुआ उसमें तुम्हें किस तरह का सदमा पहुँचा होगा ,हम समझ सकते हैं। तुम्हारे ऐसे और भी सरताजों की इस देश को बहुत जरूरत है।
          दादरी की घटना पर एक तरफ गृह मंत्रालय ने राज्यों को एडवाइजरी जारी करते हुए कहा है कि साम्प्रदायिक घटनाओं को जिनसे देश की धर्मनिरपेक्षता कमजोर पड़ सकती है और जिनके द्वारा धार्मिक भावनाओं को भुनाने का प्रयास किया जाए, तनिक भी बर्दाश्त न किया जाए (मंत्रालय ने दादरी की घटना पर उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी थी जो उसे प्राप्त हो चुकी है)। दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री संजीव बाल्यान का कहना है कि गोमांस की अफवाह के बाद भीड़ के द्वारा अखलाक की हत्या पूर्वनियोजित न होकर तात्कालिक रूप से घटित हुई और एक हादसा है। उनका यह भी कहना है कि यह साम्प्रदायिक घटना नहीं है और इसे साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास न किया जाए। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से गौकसी की घटनाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए कहा हैं। बी जे पी विधायक संगीत सोम का कहना है कि अखलाक की हत्या के मामले में पकड़े गए लोग बेगुनाह हैं और सही हत्यारों को पकड़ा जाए। उन्होंने भी कहा है कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री और राज्यपाल से मिलकर गोकसी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग करेंगे । साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ अपने बयान अलग दे रहे हैं। दिनांक 6/10/2015 की रात्रि की एक खबर यह भी है कि भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने उत्तेजक बयानबाजी करने वाले अपने नेताओं को दादरी मामले से दूर रहने की सलाह दी है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घटना की निन्दा करते हुए कहा है कि समाज के सभी जिम्मेदार तत्वों की जिनमें केन्द्रीय और राज्य सरकार शामिल हैं, यह सुनिश्चित करना जिम्मेदारी है कि इस प्रकार की घटनाएँ न घटित हों।
          इन सबसे अलग उत्तरप्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खान साहब ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को चिट्ठी लिखी है जिसमें गुहार लगाई गई है कि मोदी जी की सरकार आर एस एस और उसके आनुषंगिक संगठनों को परोक्ष सहायता दे रही है ताकि वे अल्पसंख्यक समुदायों को भयग्रस्त कर उनका धर्म परिवर्तन कर दें और भारत 2022-23 तक हिन्दू राष्ट्रीय बन जाए।
          इस विषय पर मेरा अपना मत है कि- 1.यद्यपि केन्द्र सरकार के नं 2 एवं नं 3 यानी कि श्री राजनाथसिंह और श्री अरुण जेटली ने अपना अभिमत दे दिया है तथापि उन्होंने जो बात कही है वह प्रधानमंत्री की तरफ से आनी चाहिए क्योंकि नदी की धारा सदैव पर्वत शिखर से सागर की तरफ बहती हैं। प्रधानमंत्री यदि स्पष्टतः गृह मंत्रालय द्वारा कही गई बात को अपने मुखारबिन्दुओं से व्यक्त करते हैं तो इससे पूरे देश में एक संदेश जाएगा और उनकी अपनी पार्टी के भडकाऊ बयान देने वाले तत्वों पर लगाम लगेगी। यह एक संवेदनशील मसला है और उन्हें इसे अपने मातहतों के सुपुर्द कर निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। एक तरफ गृह मंत्रालय तथा अरुण जेटली के बयान और दूसरी तरफ संजीव बाल्यान और संगीत सोम त़था कुछ अन्य भाजपा नेताओं के बयान इस धारणा को बल देते हैं कि सरकार दो स्वर में बोलती है। फिर भी यह एक शुभ संकेत है कि पी एम ओ ने मामले की रिपोर्ट गृह मंत्रालय से माँगी है।
2. स्थानीय भाजपा नेता संजय राणा (जिनके पुत्र की गिरफ्तारी मामले में हुई है) का कहना है कि उन्होंने रात्रि10.26 पर पुलिस को फोन किया। इसी से कुछ मिनट पहले मुहम्मद अखलाक(जिनकी हत्या की गई) ने गाँव के अपने एक मित्र को फोन कर मदद का आग्रह किया था। उसने भी संजय राणा के फोन के कुछेक मिनट पहले पुलिस को फोन किया था । रात्रि में 10.50 पर पुलिस पहुँच गई। इस बीच मुहम्मद अखलाक को मरणान्तक चोट लग चुकी थी तथा उनका छोटा पुत्र दानिश गंभीर रूप से घायल हो चुका था। संजय राणा का यह भी कहना है कि घटना में कोई बाहर का व्यक्ति नहीं था। सभी गाँव के ही लोग थे ।
          यहाँ यह ज्वलंत प्रश्न यह है कि गाँवों की जो संस्कृति है उसमें सभी एक दूसरे को बिना जाति-धर्म के भेदभाव के चाचा,ताऊ, बेटा,भतीजा के रूप में संबोधित करते और जानते हैं। गाँवों का वातावरण इतना सांप्रदायिक या हिंसक कैसे हो गया है कि लोग नाते-रिश्ते भूल कानून को अपने हाथ में लेने लगे हैं और अपनों में से ही किसी की हत्या करने पर उतारू हो गए। गाँवों के वातावरण को विषाक्त होने और वहाँ के सामाजिक संतुलन के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न होने से कैसे बचाया जाए, इस पर विचार करने की जरूरत है।
          रात गए गाँव के मंदिर से लोगों को एकत्रित करने के लिए उद्घोषणा और रात साढ़े दस बजे भीड़ का मुहम्मद अखलाक के घर की तरफ जाना नियोजित हमले की तरफ इशारा करते हैं । इसके क्या कारण थे और इसके पीछे किसका दिमाग था, इस बात की तहकीकात की जरूरत है।
3. श्री आजम खान दादरी के मसले पर जब संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी लिखते हैं तो एक प्रकार से अपनी ही सरकार जिसमें वे मंत्री हैं, की विफलता को स्वीकार करते हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है। इसलिए कम से कम यह पत्र लिखने के पहले उन्हें समाजवादी सरकार से इस्तीफा दे देना चाहिए था क्योंकि उनका यह कदम बताता है कि उन्हें अपने दल और उसके नेतृत्व तथा स्वयं अपने मुख्यमंत्री पर भी भरोसा नहीं है अन्यथा उनसे बात करने के बजाय वे सीधे संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी क्यों लिखने लगते। दूसरे देश के सबसे बड़े प्रदेश के सत्ताधारी दल के प्रमुख राजनीतिज्ञ के तौर पर उन्हें सीधा यू.एन. जाने के बजाय पहले देश के भीतर अपनी समस्या को उठाना चाहिए था। यू एन जाने का विकल्प यह दर्शाता है कि जैसे इस देश में आजम खाँ के लिए कोई ठौर नहीं रह गया है। यह देश में और बाहर भी एक गलत संदेश देता है। यह दायित्व केन्द्र के साथ- साथ प्रदेश सरकार का भी है कि दादरी जैसी घटनाएँ न हों।
4. सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को इस मसले पर मिल-बैठकर विचार करना चाहिए और इस बारे में एकमत पर पहुँचना चाहिए कि वे गाय नामक निरीह प्राणी के नाम पर राजनीति नहीं करेंगे और न ही किसी के द्वारा इस पर की जाने वाली राजनीति को प्रोत्साहित करेंगे। साथ ही इस प्रकार की सारी स्थितियों को समाप्त करेंगे जो गाय के नाम पर राजनीति को अवसर देती हैं।

बिसाडा के सरताज से हमें और भी सरताज चाहिए!

       
          दादरी के बिसाडा गाँव में गौकसी की अफवाह के कारण हुई मुहम्मद अखलाक की हत्या के बाद उक्त घटना को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही राजनीति जोरों पर है। पर इस सबके बीच उनके बड़े पुत्र वायुसेना में कारपोरल के रूप में कार्यरत सरताज ने बड़े ही संयम के साथ अपनी बात रखी है जो गौर करने लायक है-
         " हमारी पीड़ा समझने के बजाय राजनीतिज्ञों को अपनी राजनीति की फिक्र है। मेरे पिता की मृत्यु राजनीति का विषय बन गई है। बहुत से राजनीतिज्ञ मेरे घर पर सिर्फ इसलिए आए कि मीडिया में उनका नाम आए।"
          " मेरा परिवार देशभक्त है। इसी कारण मैंने वायुसेना में नौकरी की है। सांप्रदायिक सद्भाव लोकतंत्र का मूल तत्व हैं। हमारा देश सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जाना जाता है। मेरी अपील है कि लोग शांति भंग न करें।"
          " न्याय इस प्रकार का होना चाहिए कि एक उदाहरण बने। लोगों के दिमाग से डर दूर करें। यह घटना इस तरह की अंतिम घटना होनी चाहिए। यद्यपि मैं सीमा पर तैनात नहीं हूँ, मैंने समर्पण के साथ देश के लिए काम किया है। मेरा छोटा भाई दानिश भी सेना में जाने के लिए तैयारी कर रहा था। घटना से एक घंटा पहले मैंने परिवार के साथ बात की थी और सब कुछ सामान्य था। बिना किसी कारण के मेरे पिता को मार दिया गया।........कोई उनकी मदद के लिए नहीं आया"।
          इस देश के एक नागरिक के तौर पर हम तुमसे माफी माँगते हैं सरताज! जिन परिस्थितियों में तुम्हारे पिता का इंतकाल हुआ उसमें तुम्हें किस तरह का सदमा पहुँचा होगा ,हम समझ सकते हैं। तुम्हारे ऐसे और भी सरताजों की इस देश को बहुत जरूरत है।
          दादरी की घटना पर एक तरफ गृह मंत्रालय ने राज्यों को एडवाइजरी जारी करते हुए कहा है कि साम्प्रदायिक घटनाओं को जिनसे देश की धर्मनिरपेक्षता कमजोर पड़ सकती है और जिनके द्वारा धार्मिक भावनाओं को भुनाने का प्रयास किया जाए, तनिक भी बर्दाश्त न किया जाए (मंत्रालय ने दादरी की घटना पर उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी थी जो उसे प्राप्त हो चुकी है)। दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री संजीव बाल्यान का कहना है कि गोमांस की अफवाह के बाद भीड़ के द्वारा अखलाक की हत्या पूर्वनियोजित न होकर तात्कालिक रूप से घटित हुई और एक हादसा है। उनका यह भी कहना है कि यह साम्प्रदायिक घटना नहीं है और इसे साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास न किया जाए। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से गौकसी की घटनाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए कहा हैं। बी जे पी विधायक संगीत सोम का कहना है कि अखलाक की हत्या के मामले में पकड़े गए लोग बेगुनाह हैं और सही हत्यारों को पकड़ा जाए। उन्होंने भी कहा है कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री और राज्यपाल से मिलकर गोकसी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग करेंगे । साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ अपने बयान अलग दे रहे हैं। दिनांक 6/10/2015 की रात्रि की एक खबर यह भी है कि भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने उत्तेजक बयानबाजी करने वाले अपने नेताओं को दादरी मामले से दूर रहने की सलाह दी है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घटना की निन्दा करते हुए कहा है कि समाज के सभी जिम्मेदार तत्वों की जिनमें केन्द्रीय और राज्य सरकार शामिल हैं, यह सुनिश्चित करना जिम्मेदारी है कि इस प्रकार की घटनाएँ न घटित हों।
          इन सबसे अलग उत्तरप्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खान साहब ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को चिट्ठी लिखी है जिसमें गुहार लगाई गई है कि मोदी जी की सरकार आर एस एस और उसके आनुषंगिक संगठनों को परोक्ष सहायता दे रही है ताकि वे अल्पसंख्यक समुदायों को भयग्रस्त कर उनका धर्म परिवर्तन कर दें और भारत 2022-23 तक हिन्दू राष्ट्रीय बन जाए।
          इस विषय पर मेरा अपना मत है कि- 1.यद्यपि केन्द्र सरकार के नं 2 एवं नं 3 यानी कि श्री राजनाथसिंह और श्री अरुण जेटली ने अपना अभिमत दे दिया है तथापि उन्होंने जो बात कही है वह प्रधानमंत्री की तरफ से आनी चाहिए क्योंकि नदी की धारा सदैव पर्वत शिखर से सागर की तरफ बहती हैं। प्रधानमंत्री यदि स्पष्टतः गृह मंत्रालय द्वारा कही गई बात को अपने मुखारबिन्दुओं से व्यक्त करते हैं तो इससे पूरे देश में एक संदेश जाएगा और उनकी अपनी पार्टी के भडकाऊ बयान देने वाले तत्वों पर लगाम लगेगी। यह एक संवेदनशील मसला है और उन्हें इसे अपने मातहतों के सुपुर्द कर निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। एक तरफ गृह मंत्रालय तथा अरुण जेटली के बयान और दूसरी तरफ संजीव बाल्यान और संगीत सोम त़था कुछ अन्य भाजपा नेताओं के बयान इस धारणा को बल देते हैं कि सरकार दो स्वर में बोलती है। फिर भी यह एक शुभ संकेत है कि पी एम ओ ने मामले की रिपोर्ट गृह मंत्रालय से माँगी है।
2. स्थानीय भाजपा नेता संजय राणा (जिनके पुत्र की गिरफ्तारी मामले में हुई है) का कहना है कि उन्होंने रात्रि10.26 पर पुलिस को फोन किया। इसी से कुछ मिनट पहले मुहम्मद अखलाक(जिनकी हत्या की गई) ने गाँव के अपने एक मित्र को फोन कर मदद का आग्रह किया था। उसने भी संजय राणा के फोन के कुछेक मिनट पहले पुलिस को फोन किया था । रात्रि में 10.50 पर पुलिस पहुँच गई। इस बीच मुहम्मद अखलाक को मरणान्तक चोट लग चुकी थी तथा उनका छोटा पुत्र दानिश गंभीर रूप से घायल हो चुका था। संजय राणा का यह भी कहना है कि घटना में कोई बाहर का व्यक्ति नहीं था। सभी गाँव के ही लोग थे ।
          यहाँ यह ज्वलंत प्रश्न यह है कि गाँवों की जो संस्कृति है उसमें सभी एक दूसरे को बिना जाति-धर्म के भेदभाव के चाचा,ताऊ, बेटा,भतीजा के रूप में संबोधित करते और जानते हैं। गाँवों का वातावरण इतना सांप्रदायिक या हिंसक कैसे हो गया है कि लोग नाते-रिश्ते भूल कानून को अपने हाथ में लेने लगे हैं और अपनों में से ही किसी की हत्या करने पर उतारू हो गए। गाँवों के वातावरण को विषाक्त होने और वहाँ के सामाजिक संतुलन के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न होने से कैसे बचाया जाए, इस पर विचार करने की जरूरत है।
          रात गए गाँव के मंदिर से लोगों को एकत्रित करने के लिए उद्घोषणा और रात साढ़े दस बजे भीड़ का मुहम्मद अखलाक के घर की तरफ जाना नियोजित हमले की तरफ इशारा करते हैं । इसके क्या कारण थे और इसके पीछे किसका दिमाग था, इस बात की तहकीकात की जरूरत है।
3. श्री आजम खान दादरी के मसले पर जब संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी लिखते हैं तो एक प्रकार से अपनी ही सरकार जिसमें वे मंत्री हैं, की विफलता को स्वीकार करते हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है। इसलिए कम से कम यह पत्र लिखने के पहले उन्हें समाजवादी सरकार से इस्तीफा दे देना चाहिए था क्योंकि उनका यह कदम बताता है कि उन्हें अपने दल और उसके नेतृत्व तथा स्वयं अपने मुख्यमंत्री पर भी भरोसा नहीं है अन्यथा उनसे बात करने के बजाय वे सीधे संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी क्यों लिखने लगते। दूसरे देश के सबसे बड़े प्रदेश के सत्ताधारी दल के प्रमुख राजनीतिज्ञ के तौर पर उन्हें सीधा यू.एन. जाने के बजाय पहले देश के भीतर अपनी समस्या को उठाना चाहिए था। यू एन जाने का विकल्प यह दर्शाता है कि जैसे इस देश में आजम खाँ के लिए कोई ठौर नहीं रह गया है। यह देश में और बाहर भी एक गलत संदेश देता है। यह दायित्व केन्द्र के साथ- साथ प्रदेश सरकार का भी है कि दादरी जैसी घटनाएँ न हों।
4. सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को इस मसले पर मिल-बैठकर विचार करना चाहिए और इस बारे में एकमत पर पहुँचना चाहिए कि वे गाय नामक निरीह प्राणी के नाम पर राजनीति नहीं करेंगे और न ही किसी के द्वारा इस पर की जाने वाली राजनीति को प्रोत्साहित करेंगे। साथ ही इस प्रकार की सारी स्थितियों को समाप्त करेंगे जो गाय के नाम पर राजनीति को अवसर देती हैं।