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Monday, 27 July 2015

राधा मोहन शरणं ,ग्रामस्य इति वृत्तांतं (व्यंग्य/Satire)

कल मुझे ख्याली पुलाव राम जी मिले । कहने लगे -" तुम्हें भारत की प्रगति के बारे में कुछ पता है।"

 "अरे ख्याली सर जी! मंगल गृह तक तो अपना यान पहुँच ही गया था। क्या इसके आगे किसी और भी ग्रह पर हमारा झंडा गड गया है ? मैंने कहा। 

" तुम रहोगे भोंदू के भोंदू ही" ख्यालीजी मुझ पर टिप्पणी करते हुए आगे बोले- " अरे मैं गाँवों की प्रगति की बात कर रहा हूँ।"

 " गाँवों में कौन सी प्रगति हो रही है ख्यालीजी ? आपने सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट नहीं पढी ?  गावों में 75% परिवारों की आय प्रति महीने पाँच हजार रूपए से भी कम है। एक तिहाई आबादी भूमिहीन है।आधी आबादी गरीब है और मेहनत- मजदूरी पर गुजर - बसर करती है। "

" इसीलिए तो कह रहा हूँ कि तुम्हारे जैसे आकडों में उलझने वाले लोग भोंदू हैं जिनको सिक्के का एक ही पहलू दिखाई देता है। अरे बुद्धू , मैं बात कर रहा हूँ आधुनिकता की,मॉडर्निटी की ,इसमें हमारे गाँव और वहाँ रहने वाले लोग आगे निकल रहे हैं ।"

" ख्याली पुलाव राम जी ! गाँव आज भी जातिप्रथा और ढकोसलों के शिकार हैं। आप कैसी आधुनिकता और मॉडर्निटी की बात कर रहे हैं? क्या दो-चार घरों में टी वी लग जाने से या फिर कुछ लोगों के पास मोबाइल आ जाने से गाँव आधुनिक हो गए?"

" अरे भैया तुम नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट पढो जिसके आधार पर हमारे कृषिमंत्रीजी ने  राज्यसभा में किसानों की आत्महत्या के लिए पारिवारिक समस्याओं, बीमारी,बेरोजगारी, संपत्ति के झगडों और दहेज प्रथा के साथ-साथ ड्रग के सेवन,नशाखोरी ,कैरियर बनाने या प्रोफेशनल जीवन  की समस्याओं, प्यार के किस्सों, शादी के तय न हो पाने या रद्द हो जाने, बाँझपन या नपुंसकता और सामजिक ख्याति में गिरावट जैसे कारण गिनाए हैं।"

" तो ख्याली पुलाव रामजी आपने समाचारपत्रों में यह नहीं पढा कि कांग्रेस सहित सभी सभी विरोधी दलों ने कृषिमंत्रीजी के बयान को संवेदनहीन बताया है!"

" अमां क्या बात करते हो?  किसान की आत्महत्या के कारणों में दहेज प्रथा, प्यार के किस्सों, बाँझपन और नपुंसकता , शादी का न हो पाना या रद्द हो जाना जैसे कारणों को यू. पी. ए. सरकार भी पहले 2013 में बता चुकी है।"

" लेकिन किसान बेचारा तो कभी असमय बारिश हो जाने से फसल बरबाद हो जाने और कभी बारिश न होने से परेशान है। कई बेचारे तो रोजगार की तलाश में गाँव छोडकर  बाहर चले गए हैं और जहाँ भी हैं किसी तरह रहते और गुजारा करते हैं। उनके पास प्यार-व्यार करने के लिए टाइम कहाँ है? यह बात अलबत्ता सुनी है कि जो किसान रोजी की तलाश में परदेश चले जाते हैं वो अपने गाँव,बच्चों और बहुरिया की याद में 'मोरे देसवा कै चमकै लिलार बिरना ' जैसे लोकगीत गुनगुनाते हैं और ऐसे ही उनकी बहुरिया भी गाँव में ही 'पनिया के जहाज से पल्टनिहा बन के अइहा हो ' जैसा कोई लोकगीत गा के दिन गुजार लेती है। इससे आगे गाँव में प्यार का मामला बढने की खबर तो कभी सुनी नहीं ख्याली पुलाव रामजी!"

" लगता है तुम न फिल्में देखते हो और न ही कुछ साहित्य वगैरह पढते हो। फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'पंचलैट'  और उपन्यास 'मैला आँचल'  पढो तब तुम्हें पता लगेगा कि गाँव में  अभाव में भी कैसे प्यार पनपता है। "

" वह तो सब उपन्यास - कहनियों की बात है ख्याली राम जी। 'बाबरनामा' में भारत के किसानों की दीन- हीन दशा और वेशभूषा का जो वर्णन बाबर ने किया है ,मुझे तो गाँव जाने पर आज भी वही गरीबी कई कोनों में पसरी दिखाई देती है। जिसके पेट में अन्न नहीं , जो दो वक्त की रोटी के जुगाड में लगा है ,तन पर ढंग के कपडे नहीं , अपनी खेती-बारी की चिंता में आसमान की तरफ देखा करता है , वो बेचारा प्यार कैसे करेगा?"

"  'नदिया के पार' फिल्म देखो फिर तुम्हें पता चल जाएगा गाँव में लोग प्यार कैसे करते हैं, चंदन-गुंजा और ओमकार के प्यार का त्रिकोण कैसे बनता है !"

" ख्याली सरजी , मैंने तो केशव प्रसाद मिश्र का ओरिजिनल उपन्यास 'कोहबर की शर्त' ही पढ रखा है जिस पर यह फिल्म बनी है। उस उपन्यास की मूल कहानी ही फिल्म में पूरी तरह बदल दी गई है। मूल उपन्यास में गुंजा की बडी बहन और ओमकार की पत्नी के देहांत के बाद गुंजा  की शादी चंदन से नहीं, बडे भाई ओमकार से हो जाती है। न गुंजा कुछ कह पाती है न चंदन कुछ बोल पाता है। गुंजा और चंदन अवसाद में जीने लगते हैं। फिर गाँव में महामारी फैलती है। जिसमें चंदन का पूरा परिवार खत्म हो जाता है।"

" अब आया ऊँट पहाड के नीचे! क्या कहा बेटा तुमने, गुंजा और चंदन अवसाद में जीने लगते हैं! और अवसाद में जीने का नतीजा क्या होता है बेटा? साइकोलॉजी पढी है तुमने? बिना समझे-बूझे बोला नहीं करो!"

" ख्याली सरजी मैं आपका इशारा समझ गया । पर अवसाद का एक वही परिणाम नहीं होता जो आप सोच रहे हैं। आदमी अवसाद से बाहर भी निकल सकता है। बस पॉजिटिव थिंकिंग की दरकार होती है।"

" बेटा गाँव में न साइकोलॉजिस्ट बैठा है और न ही साइकियाट्रिस्ट! वहाँ अवसाद का एक ही नतीजा होता है-आत्महत्या! गाँव में लोगों की पॉजिटिव थिंकिंग एक बार बनती है जब नेता लोग चुनाव के समय आते हैं और तरह-तरह के सब्जबाग दिखाते हैं। इलेक्शन खतम और किसान के अवसाद भरे दिन लौट आते हैं। अब मैं तो ये कहूँगा कि 'नदिया के पार' फिल्म बनाने वाले ने ही कहानी नहीं बदली, मूल उपन्यासकार ने भी ' कोहबर की शर्त' में गाँव की ओरिजनल कहानी बदल दी है। गाँव में लोग अवसाद के बाद आत्महत्या करते हैं महामारी से नहीं मरा करते। बेटा ,ये सोलह आने सच है कि किसान प्यार की वजह से मरता है। और जानते हो किसके साथ प्यार की वजह से?"

मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था। मैंने मत्थे पर बल डालकर ख्याली पुलाव रामजी की तरफ देखा।

ख्याली पुलाव रामजी समझ गए कि मैं उनके साथ बहस में हार गया हूँ, वे आगे जारी हो गए - " अवसाद के साथ प्यार की वजह से ! तो हमारे मंत्रीजी ने गलत नहीं कहा है। लोगों की समझ का फेर है। अच्छा चलता हूँ।"

ख्याली पुलाव रामजी गुनगुनाते हुए जाने  लगे- " राधा मोहन शरणं। सत्यं शिवं सुंदरम् । ग्रामस्य इति वृत्तांतं"
मैं ख्याली पुलाव राम जी को जाते देखता रहा।

Monday, 20 July 2015

Education as an empowerment tool


          Education & Economic Independence for all hold key for the progress of a nation. Education is the most important tool for making of a nation with equal playing field and empowerment of all the sections of society, including the underprivileged,deprived and minority sections ,women as well as  youth of the society. Education in our country is suffering from following diseases-
·         For many marginalized sections of the society ,specially in the remote corners of nation, there are no educational opportunities at all.
·         For many, educational opportunities have been made available but it is not quality education. As a result many a times  we find such students at the H S Level who don’t have basic language skills and mathematical ability.
·         Education has to fulfill the objective of producing responsible citizens . If we  find that the secular fabric of the country is under strain, it  means  education is not helping our national objectives.
·         There are such educational institutions in the country which have fundamentalism as one of their  objectives.
·         Education is not employment oriented  therefore it is producing unemployable graduates. It is  also failing in the objective of making people economically independent.

Solutions-
 (1) Education has to be universal in the country available to everyone within 5 Km radius of his house and within 2-3 Km radius of a house at the primary level.
(2)Education means quality education with the help of committed and qualified teachers.In the educational field Govt. offers better salary structure and therefore boasts of better qualified teachers yet their performance is lackadaisical and those who can afford, prefer private educational institutions. To make teachers of Govt. Schools performance oriented, carrot and stick policy should be adopted whereby good  performance has to be rewarded  with incentives whereas penalties have to be imposed  for non-performance. Govt. Schools should become model institutions with high standards . These should be utilized as Nodal Agencies for achieving educational objectives.
(3) Curriculum should be such that it inculcate moral and national values including democratic values, secularism, tolerance,equality of gender ,religion and caste as well as  mutual respect for different  sections and communities,shunning  stereotypes  & prejudices.
(4)All the educational institutions whether Govt., private & dependent  on Govt. aid  or totally private have to abide by core values of the nation and make efforts to  inculcate these in the students. Schools which don’t follow it and encourage fundamentalism of any kind have to be penalized and ultimately to be shut down if  don’t fall in line.
(5) After  imparting basic and middle level education only those should be encouraged to go for higher education who are really interested. Others have to be diverted towards Skill development so that they can have some gainful employment or become able for self employment.  I.T.I.s  (Industrial Training Institutes) have to be made nodal agency for skill development.  A lot of changes have taken place in the society in last twenty years and many new professions have come into being so new trades like mobile repairing and computer maintenance have to be included in the curriculum of I.T.I.s.Regular refresher courses should be conducted for the instructors of I.T. I.s to keep them abreast of new technological developments and up-to-date so that students trained by them are fit for the modern day industry.
(6) I.T.I.s impart skill training to only those who have a minimum level of education. But there are many who don’t have even minimum level of education ,yet they acquire some skill in the unorganized sector by their private efforts like as automobile repairing,tailoring,embroidery etc. This has contributed a lot in gainful as well as self- employment. Such efforts have to be encouraged and some sort of institutional support should be given for the purpose  . NGOs can be included in a scheme to encourage  and  streamline such efforts.
(7) Higher education also has to be streamlined. It can be devided in two categories- (i) Professional : Profession oriented degrees related to Management ,Law,Medical ,Engineering, Accountancy should fall in this category. Professional education has to be quality oriented and of international standards so that our professionals are of world level. We certainly have some world level institutions yet with the recent proliferation of professional degree distributing private institutes it has become difficult to ensure quality standards in the sphere of professional education. This has to be curbed and only genuine institutions which ensure quality and excellence should be allowed. (ii) Academic:Purely acedemic institutions should be a hub of equiping the knowledge seekers with the best of their chosen field,with best Research facilities and standards. It is sad that while China has its several professional and educational institutions as well as universities enumerated among best of the world we can count our such institutions and universities on fingers only.

Emphasis on growth of manufacturing sector-
          As a corollary of skill development we have to put  emphasize upon  growth of manufacturing sector. For a robust growth of manufacturing sector we have to create suitable business atmosphere with the help  regarding planning,  know how,  capital arrangement,tax rebate , labour laws and other appropriate policies . Further  we  have to look for export opportunities in addition to our own internal market . We should look for exploiting even small opportunities for export. China has successfully been doing this.

                The above mentioned  educational  reforms along with the growth of manufacturing sector  will help in harnessing potential of the youth for innovation and economic self dependence  which is the key for  progress of a nation.

     

















Saturday, 18 July 2015

सरकार की प्राथमिकता आम जनता हो विश्वगुरू बनना नहीं

          भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री अमित शाह साहब का कहना है भारत वर्ष को विश्व गुरू की स्थिति में पहुँचाने के लिए 25 वर्ष लगेंगे और इसके लिए भारतीय जनता पार्टी को लगातार पाँच चुनाव जीतने होंगे।

          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतवर्ष को एक गौरवशाली देश के रूप में व्याख्यापित करता रहा है और इसके साथ जुड़ी गर्व की भावना को अपने अनुयाइयों में भरने का प्रयास करता रहा है। यह गौरव बोध कराने के लिए संघ उन्हें बहुत सी बातें बताता है। इसी का हिस्सा यह भी है कि भारतवर्ष देवभूमि है जहाँ भगवान जन्म लेते रहे हैं और भारतवर्ष विश्वगुरू रहा है और है। चूँकि अमित शाह की पृष्ठभूमि संघ की है , इसलिए संघ की अवधारणाओं को दुहराना उनके लिए लाजमी है। अंतर यह है कि उन्होंने जैसे यह मान लिया है कि भारतवर्ष अब विश्वगुरू नहीं है और उस स्थिति में उसे लाने के लिए 25 वर्ष लगेंगे। शायद अमित शाह अपने कार्यकर्ताओं की देशभक्ति जाग्रत कर उन्हें परिश्रमपूर्वक काम करने के लिए प्रेरित करना चाहते थे। कुछ मीडियाकर्मियों ने इसका अर्थ यह बताया कि मोदी जी द्वारा जिन अच्छे दिनों को लाने का वादा चुनाव के पहले किया गया था उन अच्छे दिनों को लाने में 25 वर्ष लगेंगे।

          इस बारे में ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल द्वारा स्पष्टीकरण दिया गया कि अमित शाह का आशय विश्वगुरू बनने में 25 वर्ष लगने से है न कि अच्छे दिन आने में इतना समय लगने के बारे में है ।

          यहाँ मुझे यह लगता है कि भारतीय जनता पार्टी यदि 25 वर्षों की योजना बना कर चल रही है तो यह स्वयं में अच्छा होते हुए भी कुछ अधिक महत्वाकांक्षा से परिपूरित है । भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार को प्रथम तो वर्तमान पाँच वर्षों की अवधि ( जिसमें से एक वर्ष की अवधि बीत चुकी है) के लिए आम जनता हेतु एक ठोस योजना रखनी और कार्यान्वित करनी चाहिए और फिर उसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आदर्शों और उनके परिप्रेक्ष्य में और समय की बात सोचनी चाहिए। जनता जब इन पाँच वर्षों के आपके काम से राहत और संतोष अनुभव करेगी तभी आपको 2019 के बाद अगले पाँच वर्ष देगी , अन्यथा नहीं। सन 1977 से आयोजित सभी आम चुनाव इस बात को प्रमाणित करते हैं। केवल 1984, 1999 और 2009 में तत्कालीन सत्ताधारी दल दोबारा सत्ता में आने में सफल रहे। 1989, 1991 ,1996 ,1998,2004 और 2014 सत्ता परिवर्तन के वर्ष रहे। इस प्रकार सत्ता परिवर्तन का पलड़ा भारी रहा है।

          पर अगर हम सत्ता की निरंतरता के वर्षों 1984, 1999 और 2009 को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि जनता बहुत अधिक महत्वाकांक्षी नहीं है । यदि कोई भावनात्मक मुद्दा आ जाता है जहाँ उसे देश के लिए खतरा लगता है अथवा उसे लगता है कि कुल मिलाकर शासन ठीक- ठाक चला है या विपक्षी दल उसे सत्ताधारी दल की अपेक्षा खराब स्थिति में दिखाई देते हैं तो वह सत्ताधारी दल को दोबारा मौका दे देती है। सन 2004 में अनुकूल छवि और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रखर वक्ता प्रधानमंत्री के होते हुए भी भारतीय जनता पार्टी को हार का मुँह देखना पड़ा था। शायद इसलिए कि आम आदमी राहत नहीं महसूस कर रहा था और भारतीय जनता पार्टी को इस बात का अहसास तक नहीं था।

          हाल ही में जारी जनगणना के सामाजिक- आर्थिक आँकडों के अनुसार देश के गाँवों में एक तिहाई लोग भूमिहीन हैं। इनमें से अधिकांश हुनरमंद नहीं है इस कारण मजदूरी करने को छोड़ उनके सामने कोई विकल्प नहीं है। इन्हीं आँकडों के अनुसार गाँवों में रहने वाले लगभग आधे लोग गरीब की श्रेणी में आते हैं। तीन चौथाई ग्रामीण परिवारों की मासिक आय रू. पाँच हजार प्रतिमाह तक ही है। लगभग 14 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास ही कृषि या मजदूरी को छोड़कर आय का और साधन है।  

          इसलिए मोदी सरकार को अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं से भी ऊपर आम आदमी को राहत पहुँजाने को प्राथमिकता देनी चाहिए। गरीब के हाथों में काम हो, उसे दो वक्त रोटी मिल जाए, सर पर एक छत का आसरा हो, वक्त जरूरत पड़ने वाले खर्च के लिए चार पैसे उसके हाथ में हों, जरूरी चीजें उसकी क्रयशक्ति के भीतर उपलब्ध हों, कानून- व्यवस्था की स्थिति ठीक हो ताकि वह भयमुक्त रहे एवं भ्रष्टाचार नियंत्रित हो ताकि वह उसकी चक्की में पिसने से बच जाए और इस पर अगर बिजली-पानी मिलते रहें तो फिर सोने में सोहागा है, बच्चों को शिक्षा मिल सके तो फिर कहना ही क्या। फिर तो गरीब के लिए अच्छे दिन आ गए।

          मोदी सरकार ने सबका साथ- सबका विकास, स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया, स्किल एवं स्केल, डिजिटल इंडिया, 100 स्मार्ट सिटी, नवामि गंगे, सबको 2022 तक आवास जैसी योजनाएँ एवं नारे दिए हैं पर इन्हें कार्य रूप में परिणत होते दिखना चाहिए। यदि अगले तीन वर्षों में इनका कार्य रूप नहीं दिखता तो वर्ष 2019 तक यह महज जुमले के रूप में रह जाएंगे और तिस पर अगर गरीब को राहत नहीं मिलती दिखाई दे तो सरकार को 2019 के बाद अगले पाँच वर्ष मिलने उस स्थिति को छोड़कर जब कोई भावनात्मक ( इमोटिव) मुद्दा सृजित हो जाए ,मुश्किल हो जाएंगे।

          राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश को एक प्रकार के सांस्कृतिक-धार्मिक राष्ट्रवाद के साँचे में ढालने का लक्ष्य रखता है पर देश की केन्द्रीय सरकार की नौका इस प्रकार के लक्ष्य के सहारे पार नहीं हो सकती। आम जनता उसके लिए पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।





Friday, 17 July 2015

फाँसी की सजायाफ्ता रेहाना की माँ को चिट्ठी

          ईरान की रेहाना जब्बारी को 25 अक्टूबर,2014 के दिन 26 वर्ष की आयु में इस आरोप में फांसी पर लटका दिया गया कि उसने बलात्कार की कोशिश करने वाले मुर्तजा अब्दुलअली सरबन्दी को जो कि ईरान की सेक्रेट सर्विस का अधिकारी था, चाकू से प्रहार कर मार दिया था। उसे 19 वर्ष की आयु में 2007 में गिरफ्तार किया गया था। संपूर्ण विश्व से रेहाना को मुक्त करने की माँग उठी पर उसे नजरअंदाज करते हुए ईरान के कानून के अंतर्गत रेहाना को सजा-ए-मौत दे दी गई।रेहाना की मां ने कहा कि उसे छोड़ मुझे सूली पर चढ़ा दो पर उसकी बात सुनी नहीं गई। रेहाना ने अपनी मां को एक मार्मिक चिट्ठी लिखी जो हम सबको कुछ सोचने के लिए और खास तौर पर समाज में स्त्रियों की स्थिति पर विचार करने के लिए विवश करती है। निश्चय ही जिन समाजों में आज भी कानून स्त्रियों के प्रति पक्षपातपूर्ण है वहाँ उसे बदलने के लिए जोरदार आवाज उठाने की जरूरत है। रेहाना की चिट्ठी का हिन्दी में अनूदित मजमून निम्नवत है- 

प्रिय शोलेह ( माँ),
                    आज मुझे ज्ञात हुआ कि अब मेरी बारी किसास (ईरान में बदले का कानून) का सामना करने की है। मुझे इस बात का दुःख है कि तुमने स्वयं मुझे यह नहीं बताया कि मैं अपने जीवन की पुस्तक के अंतिम पृष्ठ पर पहुँच चुकी हूँ। क्या तुम ऐसा नहीं सोचती हो कि यह मुझे मालूम होना चाहिए था। मैं इस बात पर लज्जित हूँ कि तुम दुःखी हो। तुमने मुझे वह अवसर क्यों नहीं दिया कि मैं तुम्हारे और अब्बा के हाथों का चुंबन ले सकती?

          इस विश्व ने मुझे 19 वर्ष ही जीवित रहने दिया। उस मनहूस रात्रि में मेरी हत्या हो जानी चाहिए थी। मेरा शव नगर के एक कोने में फेंक दिया गया होता और कुछ दिनों के बाद पुलिस मेरे शव की पहचान करने के लिए तुम्हें ले जाती और वहाँ तुम्हें यह भी ज्ञात होता कि मेरे साथ बलात्कार भी हुआ था। हत्यारे के बारे में कुछ पता नहीं चल पाता क्योंकि हमारे पास न तो उसकी तरह धन है और न ही ताकत । तो भी तुम इसी तरह कष्ट और लज्जा की स्थिति में होतीं और इनके बोझ के तले कुछ वर्ष के बाद तुम मृत्यु के समीप पहुँच जातीं।

          पर उस शापित प्रहार के साथ कहानी परिवर्तित हो गईं। मेरा शव फेंका नहीं गया बल्कि मुझे एविन जेल के एकांत वार्ड रूपी कब्र और उसके बाद अब शहर-ए-रे की कब्र जैसी जेल में अकेला डाल दिया गया। शहर की यह जेल कब्र जैसी ही होती हैं। पर सब कुछ भाग्य पर छोड़ देना है और किसी प्रकार की शिकायत नहीं करनी है। तुम बेहतर जानती हो कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है। तुमने मुझे सिखाया था कि मनुष्य इस विश्व में अनुभव प्राप्त करने और सीखने के लिए आता है और हर जन्म के साथ आदमी के कंधों पर जिम्मेदारी आ जाती है। मैंने सीखा कि कभी-कभी मनुष्य को संघर्ष करना पड़ता है। मुझे याद है कि तुमने मुझे बताया था कि एक गाड़ीवान ने मुझे कोड़े मारे जाने का विरोध किया था परंतु कोड़े मारने वाले ने उसके चेहरे और सिर पर वार किया ,जिससे अंततोगत्वा उसकी मौत हो गई। तुमने मुझे बताया है कि मूल्यों के सृजन या उन्हें बनाए रखने के लिए यदि जीवन का भी त्याग करना पड़े तो वह श्रेयस्कर है। 

          तुमने मुझे सिखाया था कि विद्यालय जाने पर झगड़े या शिकायत का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। क्या तुम्हें याद है कि तुमने आचरण के तौर-तरीकों पर कितना जोर दिया था । तुम्हारा अनुभव नाकाम साबित हुआ। जब मेरे साथ यह घटना घटी तो मिली हुई सीखें मेरे काम नहीं आईं। अदालत में प्रस्तुत किए जाने के समय मैं नृशंस हत्यारिन और निर्दयी अपराधी के रूप में देखी जा रही थी। मैंने आँसू नहीं गिराए । मैंने फरियाद नहीं की। मैं ताकत भर रोई नहीं क्योंकि मुझे कानून पर विश्वास था।

          पर मुझ पर अपराध के प्रति कोई अफसोस न होने का आरोप लगाया गया।तुम्हें मालूम है कि मैंने कभी एक मच्छर तक नहीं मारा और काक्रोचों को उनके ऐंटीना से पकड़ कर बाहर फेंक आया करती थी। लेकिन अब मुझे एक सोची-समझी हत्या का अपराधी बताया गया । जीवों के प्रति मेरे व्यवहार को मुझमें लड़कों के गुण होने के रूप में लिया गया। जज ने इस तथ्य का संज्ञान लेने का कोई कष्ट नहीं किया कि घटना के समय मैंने लंबे नाखून रखे थे और उन पर नेलपालिश लगाई थी।   

          जिसने जजों से न्याय की उम्मीद की थी वह बहुत आशावादी है। जजों ने इस बात को कोई तरजीह नहीं दी कि मेरे हाथ महिला खिलाड़ियों विशेषकर बाक्सरों की तरह रूखे नहीं हैं। जब मैं इन्ट्रोगेटर के सवालों की बौछार से रो रही थी और अत्यधिक अश्लील शब्दावली सुन रही थी तो इस देश ने जिसके प्रति तुमने मेरे भीतर प्यार पैदा किया था, न तो मुझे चाहा और न ही किसी ने मेरा समर्थन किया। जब मैंने स्वयं से सौंदर्य के अंतिम प्रतीक बालों को अपना सिर मुंडवा कर हटा दिया तो मुझे बतौर पुरस्कार तनहाई के ग्यारह दिन दिए गए। 

          प्रिय माँ शोलेह तुमने जो कुछ सुना है उसके लिए रोना मत । थाने में प्रथम दिन मुझे एक अविवाहित एजेन्ट ने सुन्दर नाखून के लिए चोट पहुँचाई तो मेरी समझ में आ गया कि आज की दुनिया में सुन्दरता की जरूरत नहीं है चाहे वह देखने में हो, विचारों या इच्छाओं की हो, हस्तलेखन की हो, आँखों की हो या फिर मोहक आवाज की हो ।

          मेरी प्यारी माँ मेरी विचारधारा बदल गई है पर इसके लिए तुम जिम्मेदार नहीं हो । मेरी बातों का अंत नहीं है और मैंने सब कुछ लिखकर किसी को दे दिया है ताकि अगर तुम्हारी जानकारी के बिना या तुम्हारी अनुपस्थिति में मुझे फाँसी दे दी जाए तो यह तुम्हें दे दिया जाए। मैंने विरासत के तौर पर कई हस्तलिखित दस्तावेज छोड़ दिए हैं।

          मैं अपनी मौत से पहले तुमसे कुछ निवेदन करना चाहती हूँ जिसे तुम अपनी पूरी ताकत लगानी पड़े तो भी और कैसे भी करके पूरा करना। वास्तव में यही एक बात है जो मैं दुनिया से, देश से और तुमसे चाहती हूँ। मुझे मालूम है कि तुम्हें इसके लिए समय चाहिए ।इसलिए मैं तुम्हें अपनी इच्छा का यह हिस्सा जल्दी से बता रही हूँ। कृपया बिना रोए हुए सुनो! मैं चाहती हूँ कि तुम न्यायालय जाकर उन्हें मेरी इस प्रार्थना के बारे में बता दो। मैं जेल के भीतर से ऐसी चिट्ठी नहीं लिख सकती जो जेल के अध्यक्ष द्वारा अनुमोदित हो, इसलिए एक बार फिर तुम्हें मेरे कारण कष्ट उठाना पड़ेगा । यह एक ऐसी बात है जिसके लिए अगर तुम्हें रिरियाना भी पड़े तो मुझे कष्ट नहीं होगा। हालाँकि मैंने कई बार तुमसे अनुरोध किया है कि मेरी जान बचाने के लिए किसी से भीख नहीं माँगना ।

          मुझे प्राणों से भी प्यारी मेरी प्रिय माँ शोलेह , मैं मिट्टी के अंदर सड़ना नहीं चाहती। मैं अपनी आँखों और जवान दिल को मिट्टी नहीं बनने देना चाहती । इसलिए अनुरोध करती हूँ कि फाँसी के बाद शीघ्रातिशीघ्र मेरा दिल,किडनी,आँखें,हड्डियाँ और जो कुछ भी ट्राँसप्लाँट किया जा सकता है वह सब मेरे शरीर से निकाल लिया जाए और उसे भेंट के तौर पर दे दिया जाए जिसे इनकी जरूरत है। मैं नहीं चाहती हूँ कि जिसे मेरा अंग दिया जाए वह मेरा नाम जाने ,मेरे लिए गुलदस्ता खरीदे या मेरे लिए प्रार्थना करे।

          मैं अपने दिल की गहराइयों से बता रही हूँ कि मैं नहीं चाहती कि मेरी कब्र हो जहाँ पर आकर तुम मेरी मृत्यु का शोक मनाओ और कष्ट अनुभव करो। मैं नहीं चाहती हूँ कि तुम मेरे सोग में काले कपड़े पहने। तुम भरसक मेरे इन कठिन दिनों को भूल जाना। हवाओं को मुझे ले जाने देना।

          दुनिया को हमसे प्यार नहीं था। मुझे ऐसे भाग्य की चाह नहीं थी। अब मैंने इसके आगे समर्पण कर दिया है और मृत्यु का वरण कर रही हूँ। क्योंकि खुदा की अदालत में मैं इंसपेक्टरों पर, इंसपेक्टर शामलोऊ पर, जज पर और देश के सर्वोच्च न्यायालय के जजों पर जिन्होंने मुझे जागृत अवस्था में प्रताड़ित किया और मेरा उत्पीड़न करने से बाज नहीं आए ;आरोप लगाऊँगी। उस दुनिया बनाने वाले की अदालत में मैं डॉ फरवंडी, कसीम शबानी और जिन्होंने अज्ञानतावश या अपने झूठ से मेरे साथ गलत किया तथा मेरे अधिकारों का हनन किया और इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कई बार जैसा दिखता है, वास्तविकता उससे भिन्न होती है; उन सब पर आरोप लगाऊँगी ।

          कोमल हृदय माँ शोलेह, उस दूसरी दुनिया में तुम और मैं आरोपकर्ता होंगे और यहाँ के आरोपकर्ता आरोपी होंगे। देखते हैं कि अल्लाह की क्या मर्जी है! मैं मौत के आगमन तक तुम्हारे साथ आलिंगनबद्ध रहना चाहती थी। तुम्हारे प्रति प्यार!
                         रेहाना, 1अप्रैल 2014




Monday, 13 July 2015

" इफ्तार" और राजनीतिक दल


“इफ्तार” के बारे में इंटरनेट खंगालने पर मुझे निम्नलिखित जानकारी मिली-

          इफ्तार अरबी शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ नाश्ता है। इस शब्द को रमजान के महीने में सायं सूर्यास्त के बाद मगरिब की नमाज के समय  रोजा खोलने के लिए खाद्य  ग्रहण किए जाने हेतु प्रयोग में लाया जाता है। सुन्नी समुदाय के लिए इसका समय सायं की प्रार्थना की पुकार के समय होता है जबकि शिया समुदाय के लिए इसका समय सायंकालीन प्रार्थना के बाद होता है। इस्लाम में सामूहिक रूप से मजहबी क्रियाकलापों को संपन्न करने को महत्व दिया गया है। पैगम्बर मुहम्मद का अनुसरण करते हुए तीन खजूर खाकर रोजा खोलना अच्छा समझा जाता है पर इसी प्रकार रोजा खोला जाए यह आवश्यक नहीं है। मुस्लिम समाज में गरीबों के प्रति दयाभाव रखने का विशेष महत्व है इस कारण उन्हें इफ्तार खिलाना पुण्य का काम समझा जाता है क्योंकि पैगम्बर मुहम्मद भी ऐसा किया करते थे। श्री ए एच कासमी के अनुसार इफ्तार के समय निम्न आशय की  प्रार्थना पढनी चाहिए‌ - “ ऐ अल्लाह , आपके लिए मैंने रोजा रखा और आपके आशीर्वाद से मैं इसे खोल रहा हूँ”|  भारत के अधिकांश भाग में मुस्लिम अपना रोजा परिवार और मित्रों के साथ खोलते हैं। कई मस्जिदों में इफ्तार की व्यवस्था की जाती है।

         www.bhaskar.com के अनुसार ‌ “ रमजान में रोजा अहम इबादत है। रमजान अल्लाह ताला का महीना है। अल्लाह फरमाता है कि रोजेदार को उसके रोजे का बदला मैं खुद दूँगा। इसे कुरान का महीना भी कहा जाता है। रमजान में पाँचों वक्त की  नमाज के अलावा इशा की नमाज के बाद बीस रकात तरावीह में कुरान का पूरे माह सुनना जरूरी है। रमजान में कुरान की तिलावत भी अहम इबादत है। वहीं रोजा इफ्तार करवाने में भी बडा सबाब है।"

          अब बात करें राजनीतिक पार्टियों द्वारा दी जाने वाली इफ्तार दावतों की। मैं नहीं समझ पाता हूँ कि रमजान के पूरे महीने के दौरान मुस्लिमों में पवित्रता और पुण्यता का भाव बनाए रखने की जो बात कही गई है वह इन राजनीतिक इफ्तार पार्टियों में कहाँ तक होती है। वस्तुत: इनके पीछे छिपे राजनीतिक उद्देश्य इनके विपरीत हैं। इनमें आमंत्रित लोगों में बडी संख्या  ऐसे लोगों की होती है जिनका रोजा रखने से कोई लेना-देना नहीं होता। इस्लाम दयाभाव पर विशेष जोर देता है। पर राजनीतिक पार्टियों द्वारा आयोजित इफ्तार विशिष्ट लोगों के लिए होते हैं और शायद कोई गरीब या यतीम अगर इनकी इफ्तार पार्टी में शामिल होने पहुँच जाए तो उसे दरवाजे से ही बाहर कर दिया जाएगा। अगर राजनीतिक पार्टियाँ इन गरीबों और यतीमों के लिए इफ्तार का आयोजन करतीं तो समझ में बात आती कि हाँ कहीं इस्लाम की शिक्षा का अनुकरण किया जा रहा है।  अगर राजनीतिक पार्टियाँ मस्जिदों में इफ्तार आयोजित करने में सहयोग प्रदान करतीं तो भी समझ में आता कि वे मुस्लिम समाज को सहयोग प्रदान कर रही हैं। पर राजनीतिक पार्टियों द्वारा आयोजित इफ्तार पार्टियों में मात्र सर पर टोपी लगाकर स्वयं को मुस्लिम समाज का खैरख्वाह साबित करने की भावना ही बलवती नजर आती है।

          भारत स्थित पाकिस्तानी दूतावास तो हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों से बहुत आगे निकल गया है। उसकी नजर में ईद मिलनोत्सव मात्र हुर्रियत के नेताओं और जम्मू‌‌‌ काश्मीर के अलगाववादियों के साथ करने की जरूरत है।


          इफ्तार जैसे पवित्र आयोजन को राजनीति से दूर रखने के विषय में पश्चिम बंगाल के माल्दा कॉलेज के प्राचार्य मोहम्मद अनवारुज्जमाँ ने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। जब उनके ऊपर कॉलेज में इफ्तार पार्टी आयोजित करने की अनुमति देने के लिए सत्ताधारी दल के स्थानीय नेताओं द्वारा दबाव डाला गया तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि इफ्तार एक धार्मिक आयोजन है और वे कॉलेज में इसकी अनुमति नहीं देंगे । अधिक  दबाव पडने पर उन्होंने अनुमति देने के बजाय त्यागपत्र दे देना बेहतर समझा। अंततोगत्वा सत्ताधारी दल के केंद्रीय नेतृत्व ने स्थिति की गंभीरता को समझा और शिक्षा मंत्री के आग्रह पर उन्होंने अपना त्यागपत्र वापस लिया।

Thursday, 9 July 2015

An expired friend communicates !

          A few days ago on 5th of July this year itself, I saw a dream. In the dream I saw my late childhood friend Romi who had died in an accident long ago. Prior to it I never saw him in my dreams.
          In 1991 I started my job at Mumbai, nearly 1500 Kms away from my native place. Sometimes in 1992-93, my mother intimated me about Romi's accidental death through a letter. At that time I was a bachelor and so I assumed that Romi also died while still a bachelor. I had not met him for a few years so I had no information about him.A Sikh lad, he resided at my maternal grandparents place and during my visits there since age of 6-7 we were friends.It was just a coincidence that his mother was my mother's friend and she had also died accidentally when Romi was a toddler. Thereafter Romi was brought up by his maternal grandparents.
          In the dream that I am describing, I saw that Romi has a lovely daughter nearly three years old and she is playing some instrument. His daughter gives a similar instrument to me. I laugh and say- 'what should I do with it,should I play with it.' Romi says that his daughter has gifted the instrument to me.Thereafter I try to play with the instrument but no proper sound is produced. Romi says- 'It has not to be played this way. Let me tell you.' Thereafter he takes the instrument and playing on the instrument produces a Hindi song.Then he takes me to his home. On the staircases to his home itself, I meet his wife who is a young lady and as per traditions for the newly married Sikh girls,she has covered her head. Thereafter I awoke. I was surprised at the dream. I saw Romi in my dream more than twenty years after his death that too with his daughter and wife.What does the dream means? Has Romi taken rebirth and now he is married and has a daughter also.I discussed about the dream with my wife and a colleague. I was perplexed at why I saw Romi with a wife and daughter when he died a bachelor.
          Ultimately the mystery was solved in the evening when I had a talk with my mother. I asked my mother whether Romi was a bachelor when he died. 
' No, he had been married ' mom told me. 
'Has he had any child at the time of his death? '
'Yes. he had a daughter'
'How much old she was when Romi expired?'
'Three years old.'
'Oh!' I was amazed. 
          My mother continued with the details that Romi's widowed wife has been remarried. His daughter is along with her mother. Romi's maternal uncle has made a provision of Rs.Ten Lacs for Romi's daughter as Fixed Deposit etc.
          Now it occurs to me that all these years I have been under impression that Romi died a bachelor. I used to think how unfortunate my friend was and in some respects his mother had a better fortune because she atleast had a family when she accidentally died. To correct me my friend communicated to me via a dream that he had a family.Not only that he made me meet his family.