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Monday, 30 March 2015

क्या जनता का एक और सपना टूटेगा? ( "आप " की राजनीतिक उठा-पटक पर टिप्पणी)

          वर्ष 2011 में अन्ना के 'जनलोकपाल आंदोलन' के दौरान मेरे एक मित्र विक्रम सिंह अरविंद केजरीवाल से मिलने उनके घर पर गए। उन्होंने उस समय अरविंद केजरीवाल से एक राजनीतिक पार्टी बनाने का अनुरोध यह कहते हुए किया कि देश में जिस व्यापक सुधार की जरूरत है वह मात्र आंदोलन से नहीं संभव हो सकेगा। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है जो किसी भी पार्टी में नहीं है। इसलिए आप अपने आदर्शों के साथ एक राजनीतिक दल बनाइए जो जनाकांक्षाओं के अनुरूप कार्य करते हुए देश में परिवर्तन लाने के लिए प्रयासरत रहे। मेरे मित्र ने यह भी कहा कि इस समय जनता में इस प्रकार के बदलाव की तीव्र आकांक्षा है । इसलिए इस प्रयास के सफल होने की पूरी आशा है। मेरे मित्र का कहना है कि अरविंद केजरीवाल ने उस समय जवाब दिया कि वे लोग 'जनलोकपाल आंदोलन' को पूरी तरह अराजनीतिक रखना चाहते हैं तथा स्वयं भी राजनीति से अलग रहते हुए ही कार्य करना चाहते हैं। उन्होंने किसी भी प्रकार की राजनीति  से जुडने से पूरी तरह इंकार किया। मेरे मित्र का कहना है कि अरविंद केजरीवाल का रवैया बहुत उत्साहवर्धक नहीं था तथा वह निराश होकर लौट आए।

          पर उसके सवा साल बाद अरविंद केजरीवाल की समझ में यह बात आ गई कि बिना राजनीतिक पहल के कुछ हासिल नहीं होगा और उन्होंने अन्ना के विरोध के बावजूद नवंबर 2012 में आम आदमी पार्टी का गठन कर डाला। जब प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव यह कहते हैं कि आम आदमी पार्टी की स्थापना सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं , बल्कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने के उद्देश्य को लेकर राजनीति में आदर्श और शुचिता को प्रतिष्ठापित करने के लिए हुई थी तो वे गलत नहीं कहते हैं। अपेक्षा यह थी कि इन मूल्यों के कारण पार्टी को जनता का स्वत: समर्थन प्राप्त होगा और ऐसा हुआ भी। नवंबर 2012 में पैदा हुई आम आदमी पार्टी एक वर्ष बाद दिसंबर 2013 में सत्ता में आ गई । केजरीवाल के नेतृत्व में "आप" की सफलता दिल्ली का प्रशासन चलाने में उनकी निपुणता,  लोगों  की उम्मीदों पर खरा उतरने और चुनावी वायदों को पूरा करने पर निर्भर थी।पर उन्चास दिनों तक सत्तासीन रहने के बाद जब केजरीवाल ने सत्ता त्याग दी तो तमाम सारे सवाल उठ खडे हुए। क्या आप और उसके  नेता मिथ्याचारी और ढोंगी थे ? अन्यथा जब वे जानते थे कि उनके पास बहुमत नहीं है तो उसी कांग्रेस की मदद से उन्होंने सत्तासीन होने का निर्णय क्यों किया था जिसके कुशासन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उन्होंने संघर्ष किया था। क्या सत्ताग्रहण और पदत्याग योजनाबद्ध तरीके से किया गया था ताकि लोकलुभावन घोषणाओं द्वारा और जनलोकपाल के मुद्दे पर पदत्याग कर उसे शहादत का जामा पहना कर जनता को भरमाया जा सके।

          जनता ने लोकसभा चुनावों में "आप" पार्टी को दंडित करते हुए ठुकरा दिया। पर फरवरी 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल जनता से माफी मांगते हुए, उसकी पसंद के वायदे कर और उम्मीदों पर खरा उतरने का वादा कर  एक बार फिर जनता का भरोसा पाने में सफल रहे। पर सत्ता पाने के बाद मार्च,2015 में "आप" पार्टी की आपसी राजनीतिक उठापटक और उक्त संदर्भ में अरविंद की प्रतिक्रिया एवं आचरण देखकर लगता है कि वे पूरे राजनीतिक तानाशाह हो गए हैं। एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के हिस्से के तौर पर पार्टी में अपने विरोधियों को देखने के स्थान पर उन्होंने एक अधिनायकवादी की तरह आचरण करते हुए अपनी पार्टी के लोगों से स्वयं एवं उनमें से किसी एक को चुनने के लिए कहा। निजी बातचीत में उनके लिए उन्होंने गाली-गलौज वाली भाषा का भी इस्तेमाल किया। यह इस बात का संकेत है कि वे अपने विरोधियों को बर्दाश्त करने या उनके साथ काम करने के लिए तैयार नहीं हैं। यह स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवहार को नहीं दर्शाता। प्रशांतभूषण और योगेंद्र यादव दो ऐसे नाम हैं जो अपनी वरिष्ठता और सम्मान्यता के आधार पर अरविंद केजरीवाल के सामने बराबरी से खडे हो सकते थे। अरविंद केजरीवाल ने इन्हें हटाकर कद  में खुद से बौने लोगों के बीच रहने की वृत्ति प्रदर्शित की है। वे कबीरदास के इस कथन को भी भूल गए- निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय ।

          इतिहास गवाह है कि वक्त किसी को बार-बार मौके नहीं देता। एक मौका गंवा देने के बाद दूसरा तो कतई नहीं। पर केजरीवाल पर वक्त कुछ हद तक मेहरबान दिखाई दिया है और उन्हें दूसरा मौका मिला है। अगर यह मौका उन्होंने  खो दिया तो न तो उन्हें इतिहास माफ करेगा और न ही वक्त माफ करेगा। संभावनाएं अपार हैं पर राजनीति के खेल में सफलता के लिए जनलोकप्रियता के साथ - साथ चतुराई, सजगता और एक सीमा तक मौकापरस्ती मददगार होती है। विपक्ष को एक फोर्स मल्टीप्लायर की जरूरत शिद्दत से महसूस हो रही है।  अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में होने वाले आम चुनावों में कुछ हद तक अपने को वह मैग्नेट सिद्ध किया जिसमें जनता को खींचने की क्षमता है । आने वाले समय में विपक्षी खेमा यह समझ कर उन्हें अपने साथ लेना चाहेगा कि वे उसके लिए फोर्स मल्टीप्लायर हो सकते हैं। पर अरविंद केजरीवाल की लोकतांत्रिक विरोध को बर्दाश्त न कर पाने तथा अधिनायक की तरह आचरण करने की वृत्ति इसमें बाधक सिद्ध होगी। वायदे करना, सपने देखना और दिखाना आसान है पर उनको पूरा करने के लिए विचारों की स्पष्टता तथा सुव्यवस्थित और समयबद्ध कार्ययोजना एवं कठोर परिश्रम एवं अनुशासन आवश्यक है। 

         यदि "आप" का प्रयोग एक बार फिर असफल सिद्ध होता है तो लोग क्या इसके बाद फिर दोबारा किसी ऐसे व्यक्ति पर यकीन करेंगे जो यह कहेगा कि वह सच्चाई की राह पर चलने वाला है और तमाम बुराइयों को मिटा देने के लिए राजनीति में अवतरित हुआ है। एक लंबे अरसे से जनता के सपने टूटते आ रहे हैं। क्या एक और सपना टूटेगा ? इस प्रश्न का जवाब निश्चय ही अरविंद  केजरीवाल के  पास है। दिसंबर 2014 में 'आप' ने देश की जनता को बड़ी उम्मीदें बँधाई थीं जो दो महीने के बाद धराशायी हो गई थीं। अब वर्ष 2015 की चुनावी जीत और फिर आपसी लडाई-झगडे के बाद यदि प्रशांतभूषण और योगेन्द्र यादव एक नई पार्टी का गठन करते हैं तो यह केजरीवाल के राष्ट्रीय नेता के तौर पर उभरने की संभावना को सीमित कर देगा तथा वे दिल्ली के एक छुटभैये नेता भर रह जाएंगे।

          जनता ने केजरीवाल को एक मौका और दिया है तो उन्हें आपसी विवादों में उलझने के बजाय इस तरह की समस्याओं का समाधान लोकतांत्रिक कार्य-व्यवहार से करना चाहिए। उन्हें आंतरिक राजनीतिक विरोध को स्वस्थ लोकतंत्र का प्रतीक समझते हुए उसके साथ समन्वय बनाकर चलने की आदत डालनी चाहिए और अपने काम से यह साबित करना चाहिए कि जनता के लिए एक बेहतर विकल्प मौजूद है।

       
 

Thursday, 26 March 2015

भारतीय क्रिकेट टीम के लिए सांत्वना-गीत ( व्यंग्य/Satire)

-भारतीय क्रिकेट टीम के लिए सांत्वना-गीत-
(फिल्म पी के के गीत' चार कदम' के गीतकार के प्रति आभार के साथ जिनसे मैंने मुखडा उधार लिया है )

जीतें क्यूँ रे जीतें क्यूँ रे हर बार हाँ न रे
चार कदम बस चार कदम चल दो न साथ मेरे
हार गए जो हार गए तो हुआ क्या यार मेरे
चार कदम बस चार कदम चल दो न साथ मेरे

अपने दामन में तुमको छिपाने आ जाएंगे हम
चिन्ता न करना आँसू तुम्हारे पोंछकर जाएंगे हम
जो न रहे कोई रहगुजर तुझे साथ ले जाएंगे हम
पहुँच भी न पाए कोई हमवतन वहाँ ले जाएंगे हम

जब मैं साथ फिर बाकी कि फिक्र क्यूँ करे
चार कदम बस चार कदम चल दो न साथ मेरे
रखकर सारी क्रिकेट को मगज से अपने परे
चार कदम बस चार कदम चल दो न साथ मेरे
- संजय त्रिपाठी

Saturday, 21 March 2015

Why all this humbug about religion?

          There is a lot of controversy in our country today due to anti minority rhetoric by a few and arguments against and, in favour of the same by some. The question arises why we have suddenly started listening such a noise which was absent earlier or even if we listened earlier that was in hushed tones. There are two reasons . First is that suddenly some sections have become emboldened enough to express their views in public as the win of Narendra Modi is considered by them win of Hindu point of view. They ignore the fact that he won it on the slogan of- "Sabka sath,Sabka vikas". People voted for him due to his development agenda.Second is that people representing such sections are now getting better media coverage. For the first reason the opposition has been blaming the new regime at the centre. The second reason is also for the purpose of puting the new regime at the centre, under spot by the media houses.

          It is natural that the elements which consider themselves pro-Hindu have been emboldened as the new regime draws its inspiration from Rashtriya Swayam Sewak Sangh which declares itself as an organization espousing cause of Hinduism.  Many a times R.S.S. has declared that it believes in the principle of  'Vasudhaiv Kutumbakam" and being 'pro-Hindu' doesn't mean being opposed to others. If we go to history we shall find Mahatma Gandhi is a true follower of above ideals. He was a devout Hindu but he didn't question other religions. He never said that truth prevails only with us. However, in practice we find that a better part of people who are followers of R.S.S.  can't complete their talk without talking of others and the crux of problem lies here.

          R.S.S. draws a lot of inspiration from History and it perceives history through two mirrors. One is mirror of glorified Hindu period of History and Glorified Hindu kings of medieval period when there was Muslim rule in the country.  The other mirror is of tyranny of others towards Hindus that too especially during the period of Muslim rule. The later mirror is extended to the British period and Christian Missionaries are also included as they made efforts to proselytize Hindus. The Hindu kings who fought with Muslim rulers during the medieval period as well as Revolutionaries who fought against the British are a source of inspiration for the R.S.S. and a sense of grievance or animosity against Muslim and Christian religions arises out of this historical baggage.

         While dealing with the matter of Historical baggage, I find the R.S.S. ignores strength and resilience of Hinduism due to which Hinduism stood as a solid rock ( I maintain solid rock, Hindu kings and kingdoms fell before the Muslim invaders but Hinduism held its forte)  against the tide of Islam which swept whole of the West and Central Asia. Despite of all the talk of conversion only twenty percent of the population of the Indian subcontinent is follower of Muslim religion inspite of eight hundred of years of Muslim rule in the subcontinent. Similarly Christian population is limited to 2.18% of the country's population. If thousand  years of slavery could not put Hinduism to peril ,how Hinduism is suddenly being considered weak and threatened today.

          I'm unable to understand that in this country of billions if a few thousand people at any given time  leave their parent religion and start following some other religion what difference does it make to the society and country. If a few poor people of the society are lured by anyone and they convert to some other religion it is not going to benefit anyone. A person who changes his or her religion due to offer of some material gain is not even worth that any religion or religonist should vouch for him or her. 

          I know that R.S.S. accepts contribution of Dara Shikoh, Rahim, Raskhan, Maulvi Ahmad Shah, Ashafaq ullah Khan and A.P.J. Kalam to the nation. It also accepts contribution of Bhagini Nivedita (originally Margaret Noble), Dinbandhu Andrews ( Charles Freer Andrews), Leander Paes and Tesse Thomas to our country. When P.M. Narendra Modi and Home Minister Rajnath Singh say that the Indian Muslim will fail Al-Quaida and ISIS,they are hundred percent right. Number of  Indian Muslims who have fallen prey to propaganda of these organizations is miniscule and can be counted on fingers while thousands of youth in the western world have gone under their umbrella. It shows that like Hinduism of India, Indian Muslims as a society are impregnable to outside influence barring a few aberrations. Similarly, Christians of this country have immensely contributed to the betterment of this country in various fields.

          All this humbug about religion has been creating a fear psychosis, sowing seeds of doubt in people's mind and it will put people against people ,countrymen against countrymen. Social cohesion is very necessary if we want to realize opportunities before the nation and march on the path of progress as well as be counted in this Twenty First century World. We must set aside past baggages in the interest of the nation. It will be to our own detriment if we fall a prey to the nonsense being espoused by some fools who can't be called religionists at all and , are fools anyway .

Wednesday, 18 March 2015

राबता जिंदगी से खुदा के चाहने से ही खत्म हो पाएगा (गजल)

रजिया दलवी जी के शेर- " थक गया हूँ तेरी नौकरी से ऐ जिन्दगी, मुनासिब होगा मेरा हिसाब कर दे....." पर मन की प्रतिक्रिया से उपजी  
                            -गजल-
राबता जिंदगी से खुदा के चाहने से ही खत्म हो पाएगा
जल्दी थक गया गर तू उसका कर्ज कैसे चुका पाएगा

जीवन वो मालिक है बंदे जो चाकर की न सुने कभी
अमानत अल्लाह की ये अपनी मर्जी का राग गाएगा

अभी से हिम्मत हार जो बैठ यूँ जाएगा मुसाफिर
जिंदगी से तेरा बच गया वो हिसाब कौन चुकाएगा

दौड़ता रह इस जिंदगी के साथ हौसला बाँधकर
यकीन रख तेरा हिसाब फिर न बाकी रह जाएगा

जब तक वो न चाहे हिसाब किसी का न बराबर हो
जो तूने ये करने की सोची कयामत के दिन पछताएगा

अब बस भी कर जिंदगी से और न शिकवा-शिकायत कर ,
कोशिश की तो चलते-चलते 'संजय'आखिर मंजिल पाएगा
-संजय त्रिपाठी


                     


















Saturday, 14 March 2015

नए भारत की बेटी (व्यंग्य कविता/Satirical poem)


                - नए भारत की बेटी -

दूल्हे राजा आए सज कर,  दिल में लिए सुनहरे ख्वाब
घोडी पर बैठे यूँ तन कर, जैसे  आए हों कहीं से नवाब
आए हों कहीं से नवाब, मन में फूट रहे थे लड्डू
तगडा झटका दिया उतरने पर, घोडी थी लद्दू
 कन्यापक्ष के लोगों ने पकड सम्भाला उनको
 बोले हूँ तजुर्बेकार , घोडी अडियल मिल गई मुझको

आखिर चढ गए मंच पर, लिए जयमाल हाथ में इठलाएं
इंतजार बस यही, कब दुल्हन वरमाला लेकर आए
कब वरमाला लेकर आए, बन जाए मेरी घरवाली
सेवा करे मेरी दिन-रात, सजाए भोजन की थाली
आँख बिछाकर बैठेगी, पहुँचूँगा जब भी मैं घर पर
जब चाहूँ प्यार से बोलूँ, जब जी चाहे तना रहूँ उस पर

गजगामिनी  आते देख ,दूल्हे का दिल लगा धडकने
पकड न पाएं दिल को अपने, बल्लियों लगा उछलने
बल्लियों लगा उछलने, हर पल लगे उन्हें भारी-भारी
अब तो रहा न जाए, सोचें कटेगी कैसे रात ये सारी
पड जाए गले में वरमाला, बन जाए ये मेरी घरवाली
भीड साथ दुल्हन के, वो थे दुल्हे के भावी साले-साली

दुल्हन खडी हो गई लेकर वरमाला, मंच पर एक किनारे
दूल्हे ने सोचा आ भी जाती, लग जाए मेरी भी नाव किनारे
लग जाए मेरी भी नाव किनारे, इसको ले फिर घर जाऊँ
बन जाए मेरी जीवनसंगिनी भाग्य पे अपने इतराऊँ
दुल्हन ने किया इशारा, आगे बढ आए भावी साले-साली
दूल्हा हुआ सतर्क, लगता है होगी कोई ठिठोली भारी

बतलाओ दूल्हे पहले,  पंन्द्रह और छ: का जोड  है कितना
फिर पहन लेना वरमाला, सुखी रहोगे जीवन जितना
सुखी रहोगे जीवन जितना, दूल्हे का सिर चकराया
गणित अपनी सदा से कमजोर, पूछ ले और कुछ ताया
करते हो कैसे सवाल, ये है कौन मसखरी भाया
इधर-उधर की कुछ  पूछ, समझ न आए गणित की माया

बस बतलाओ यही सवाल, अगर पहननी है तुमको वरमाला
वरना घोडी संग वापस जाओ, है डिब्बा गोल तुम्हारा लाला
है डिब्बा गोल तुम्हारा लाला, दीदी है नए भारत की बेटी
अपनी मर्जी की है मालिक, नहीं जाए किसी भी खूँटे से सेंटी
वो दिन चले गए बच्चू जब भारत की नारी थी बेचारी
होशियार और पढी - लिखी वो सहे क्यूँ कोई लाचारी

पंद्रह और छ: होते हैं सोलह,  सोच दूल्हे ने तुक्का मारा
कुहनी मार कोई बोला है गणित में बहुत कमजोर बेचारा
है गणित में कमजोर बहुत ,दूल्हन वालों  कुछ तो किरपा कीजे
छोड गणित हमारे भैया से, कुछ इतिहास-भूगोल ही पूछ लीजे
बोली दुल्हन अक्ल के मारे संग जाने से मैं अच्छी बाबुल के घर
है मेरा संदेश यही बेटी जब भी ब्याहो, ब्याहो सोच-समझकर
-संजय त्रिपाठी















Saturday, 7 March 2015

होली पर दो गजलें

भाई पुष्यमित्र उपाध्याय की कविता " संग-ऐ -मरमर पर तराशी हुई तुम.........बडे बेकद्र होंगे वो बुत-ऐ-नायाब बिगाडने वाले"  से प्रेरित होकर होली पर दो गजलें-

                            (1)
 मेरे दिल में आग लगा जाते हैं तुझपे दाग लगाने वाले
होली के नाम  बुत-ए-नायाब- को छूकर  जाने वाले

जल जाते नहीं क्यूँ कलेजे को   राख ये कर जाने वाले
बेहया बन होली में  बेबाक ये तेरे करीब चले आने वाले

दोस्त कह के खुद को मेरा तुझपे  गुलाल मल जाने वाले
क्या करें इस होली का हम हैं जी मसोस के रह जाने वाले

तेरे हुस्न पे साया औरों का कंबख्त ये रंग लगाने वाले
आज बन के रकीब 'संजय'  जी को  हैं ये जलाने वाले

                            (बुरा न मानो होली है)

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                               (2)
 ये निगोड़ी होली सिर्फ मेरे- तेरे दरम्याँ  क्यूँ न रह जाती
ऐ मेरी हीर होली में  तू सिर्फ इस  राँझे की क्यूँ न रह जाती

 मेरे प्रेम की शीतल जलधार ही तुझे  जो भिगो पाती
मेरी रूह  जलन की आग से छुटकारा पा भी जाती

प्यार के उजले गुलाल से  ये मूरत और उजली हो जाती
उसके आगे अजंता की मूरत भी फीकी पड़ जाती

सतरंगी होली में रंगी तेरी ये मूरत अब  देखी न जाती
वही संगमरमर की मूरत तुझमें फिर से नजर आ जाती

 बेदाग-उजली- शफ्फाक हमें नजर फिर से तू आ जाती
 हुई  होली बेहिसाब 'संजय' काश अब बीत भी जाती
- संजय त्रिपाठी




Tuesday, 3 March 2015

जम्मू एवं काश्मीर के बेमुरौव्वत आशिक ! ( राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी)

                    इतने जालिम न बनो कुछ तो मुरौव्वत रखो
                    तुम पे मरते हैं तो क्या मार ही डालोगे

          जी हाँ , कुछ ऐसी ही सदा इन दिनों जम्मू एवं काश्मीर की फजाओं में बी जे पी और पी डी पी की बेमेल शादी के बाद सुनाई  दे रही है। पर पी डी पी ऐसी बेमुरौव्वत आशिक है कि  उसे महबूब की सदा सुनाई नहीं दे रही है और न ही महबूब की रुसवाई की उसे परवाह है। सो पहले तो मुफ्ती साहब ने पाकिस्तान और दहशतगर्दों का शुक्रिया अदा कर डाला। इसके बाद भी जैसे कसर कम रह गई थी इसलिए अगले दिन पी डी पी ने अफजल गुरू के शव की माँग कर डाली। यह बी जे पी को पी डी पी द्वारा स्पष्ट  संकेत है कि जम्मू- काश्मीर में वह अपनी शर्तों पर और अपनी सुविधा के अनुसार सरकार चलाएगी । बी जे पी को उसके पीछे-पीछे चलना होगा।

          पर सवाल यह है कि बी जे पी कहाँ तक पी डे पी के पीछे चल पाएगी। जैसा कि आज मैंने समाचारपत्रों में पढा पी डी पी ने इस तरह के स्टेटमेंट अपनी कोर कांस्टीच्युएन्सी को यह संदेश देने के लिए दिया है कि उन्होंने बी जे पी के गलबहियाँ डालते समय समर्पण नहीं कर दिया है। पर यह मजबूरी तो बी जे पी के सामने भी है कि वह अपने मतदाताओं के सामने मजबूर नहीं दिख सकती। जिस राष्ट्रवाद का दम बी जे पी भरती रही है अगर पी डी पी ने उसी पर चोट करनी शुरू कर दी तो बी जे पी को अंततोगत्वा मुफ्ती की सरकार के समर्थन से हाथ वापस खींचने ही पडेंगे। इसलिए अगर मुफ्ती साहब इसी राह पर चलते रहे तो उनकी सरकार की जिन्दगी गिने- चुने दिनों की है ।

             यदि ऐसा हुआ तो पाकिस्तान,हुर्रियत और आतंकियों को यह कहने का मौका मिलेगा कि हिन्दुस्तान भरोसे के काबिल नहीं और जम्हूरियत के रास्ते चलकर काश्मीरियों को न्याय नहीं मिल सकता । कहीं मुफ्ती साहब एक सोचे-समझे गेमप्लान के तहत तो नहीं काम कर रहे हैं जिसमें काश्मीर को लेकर तथाकथित अन्य स्टेकहोल्डर ( पाकिस्तान, हुर्रियत और आतंकवादी) शामिल हैं ? हमारी केन्द्रीय सरकार को फिलहाल 'वेट एवं वाच' की नीति पर चलते हुए इन पहलुओं पर भी गौर करना चाहिए क्योंकि काश्मीर में सबसे बड़ा स्टेकहोल्डर भारतवर्ष है।

          भाजपा और पी डी पी का जम्मू एवं काश्मीर में गठबंधन मुझे आजादी के पहले केन्द्र में गठित मुस्लिम लीग और कांग्रेस के उस संयुक्त मंत्रिमंडल की याद दिला रहा है जिसमें काम करने के बाद नेहरूजी,पटेल और कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं को इस बात का अहसास हो गया कि मुस्लिम लीग के साथ मिलकर काम करना असंभव है और पार्टीशन की बात मानकर रोज-रोज की चख-चख और मुस्लिम लीग के ब्लैकमेल से मुक्ति पा लेना बेहतर विकल्प है। उस मामले में मुस्लिम लीग की मंशा शुरू से ही साफ नहीं थी तथा वह भारत की अखंडता के प्रति प्रतिबद्ध नहीं थी। यदि जम्मू एवं काश्मीर में गठबंधन के घटक दोनों दल समझदारी का परिचय देते हुए गठबंधन के रबर को इतना न खींचें कि वह टूट जाए तो आज के दौर में जम्मू एवं काश्मीर के लिए इससे अच्छी कोई बात नहीं होगी । यह लोकतंत्र में जम्मू एवं काश्मीर के आवाम के भरोसे को कायम रख सकेगा। उसमें भरोसा तो उसने वोट देकर पहले ही जता दिया है। इस गठबंधन की सफलता से यह भी साबित हो सकेगा कि जम्हूरियत में दरिया के दोनों साहिल आवाम की बेहतरी के धारे से एक दूसरे के साथ जुड भी सकते हैं और तरक्की के लिए जम्हूरियत से बेहतर रास्ता नहीं है बस इरादों में ईमानदारी होनी चाहिए।  पर अगर मंशा  साफ नहीं है तो इस प्रयोग का असफल होना तय है।  जम्मू एवं काश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को किसी भी तरह का धक्का  दहशतगर्दी के फिर सिर उठाने का सबब बन सकता है।

          अगर मुफ्ती साहब की बात सही है और जम्मू एवं काश्मीर में आज  यह सरकार पाकिस्तान के सहयोग से अस्तित्व में आ सकी है तथा ऐसी कोई सकारात्मक प्रगति हुई है कि पाकिस्तान अब हमसे सहयोग करने लगा है तो भी उसे जनता के सामने स्ष्टत: लाया जाना चाहिए ताकि चीजों को सही पृष्ठभूमि में सभी देख सकें। हो सकता है कि ट्रैक 2 डिप्लोमैसी के तहत कुछ चल रहा हो और फिलहाल सरकार उसे गुप्त रखना चाहती हो। वाजपेयीजी के समय में भी ट्रैक 2 डिप्लोमैसी खूब चली थी , फिर भी तमाम सारी समस्याएँ पैदा हुई थीं। पर मुशर्रफ साहब का कहना है कि वाजपेयीजी कुछ दिन और रहे होते तो काश्मीर समस्या हल हो गई होती । यह भी हो सकता है कि इस सब में अमेरिका का दबाव काम आया हो। पर या तो चीजों को स्पष्ट तौर पर सामने  रख दीजिए या फिर परदे के पीछे ही रखिए और जब कुछ फलीभूत हो जाए तब सामने रखिए। मुफ्ती सरकार तो बी जे पी के शासनकाल में जम्मू एवं काश्मीर की समस्या की दिशा में मोदी सरकार की तरफ से पहला कदम भर है। अगर मुफ्ती साहब ने अपनी कोर  कांस्टीच्युएन्सी को ध्यान में रखकर यह स्टेटमेंट दिया है तो भी उन्हें गठबंधन चलाना है तो बयान जिम्मेदारी के साथ सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर  देना चाहिए था।  ऐसा न करना उनके इरादों की ईमानदारी पर सवालिया निशान खडे करता है।