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Tuesday, 29 December 2015

डायल नं. 100 फार दिल्ली पुलिस ( आप बीती)

        मैं दिनांक 28 दिसंबर 2015 को एक बैठक में भाग लेने कोलकाता से दिल्ली गया था। मैंने एक ब्रीफकेस में एक जोड़ी कपड़े, एक ऊनी शाल, स्लीपर, शेविंग किट एवं सोप इत्यादि रोजमर्रा की जरूरत का सामान,आते समय का एयर टिकट और बोर्डिंग पास, आई सी आई सी आई बैंक का डेबिट कार्ड और कुछ साहित्य लेखन जो मैं कर रहा था ,वह एक फोल्डर में सहेज रख दिया था। बैठक लगभग पौने एक बजे समाप्त हुई। एक अधिकारी ने मुझसे चाय पीने का आग्रह किया और मैं पन्द्रह मिनट के बाद बाहर निकला और साउथ ब्लाक के सामने आटो देखने लगा। एक आटो के इनकार के बाद दूसरे आटो वाले ने मुझे शिवाजी स्टेडियम मेट्रो स्टेशन 60 रुपए में ले जाना मंजूर किया जहाँ से मुझे एयरपोर्ट के लिए पाँच बजे कोलकाता की निर्धारित वापसी उड़ान हेतु मेट्रो पकडनी थी। आटो वाले ने मुझे लगभग एक दस पर शिवाजी स्टेडियम पर उतार दिया, मैंने उसे पैसे दिए और तभी मेरे एक मित्र का फोन आने लगा, मैं मित्र से बात करने लगा । मेरा ब्रीफकेस अभी आटो में ही था।मैंने बात समाप्त होने पर नजर उठाई तो आटो जा चुका था। 
        मीटिंग की फाइल मेरे पास थी, वापसी का एयर टिकट और पैसे तथा एक और डेबिट कार्ड मेरे कोट की जेब में थे। मैंने फिर से उन्हीं मित्र से बात की जो दिल्ली के स्थानीय हैं। उन्होंने मुझे 100 नं डायल करने का सुझाव दिया।इसके साथ ही 100 नं की कहानी शुरू होती है।
        100 नं पर फोन एक महिला ने उठाया और बात सुनने पर मुझसे पूछा कि क्या मुझे आटो का नं याद है? मैंने कहा नहीं। फिर उसने मुझसे थाना क्षेत्र पूछा। मैंने कहा मुझे नहीं मालूम, मैं बाहरी आदमी हूँ। फिर उसने ही मुझे बताया कि संबन्धित क्षेत्र कनाट प्लेस थाने के अंतर्गत आता हैं। मैंने थाने की स्थिति से अनभिज्ञता जाहिर की।मैंने कहा कि मैं दिल्ली से बहुत वाकिफ नहीं हूँ। महिला ने कहा कि वह मेरे पास किसी को भेज रही है।
       इस बीच मैंने वहाँ खड़े आटो वालों से दरियाफ्त की। उन लोगों ने कहा कि अगर उसी स्टैंड का आटो होता तो वे खोज सकते थे । पर दूसरे स्टैंड का आटो होने पर बिना नं के ढूँढ पाना मुश्किल है। पर एक आटो वाले ने कहा कि वहाँ सी सी टी वी कैमरा लगा हुआ है और उसमें देखने पर आटो का नं पता लग जाएगा।
         इस बीच मुझे ब्रीफ केस में रखे डेबिट कार्ड का ख्याल आया। मैंने अपने एक मित्र को बैंक का एकाउंट नं बताकर डेबिट कार्ड लाक करवाने के लिए कहा। मित्र तकनीकी निपुणता रखते हैं। उन्होंने कार्ड तुरंत आनलाइन लाक कर दिया और मेरे मोबाइल में मेसेज आ गया।
        मैंने दो बजे तक 100 नं के आश्वासन के फलीभूत होने का इंतजार दिया। दो बजे के बाद मैंने 100 नं पुन: डायल दिया। इस बार किसी पुरुष ने फोन उठाया। उसने मुझे कहा कि मैं यथास्थान खड़ा रहूँ और जल्दी ही कोई मेरे पास पहुँचेगा। जब ढाई बज गए तो मैंने पुन: 100 नं डायल किया । इस बार फिर किसी पुरुष ने फोन उठाया। उसने पूरी कहानी और दो बार 100 नं डायल करने की बात बताने पर कहा कि वह किसी को भेज रहा है । मैंने कहा मैं अब और इंतजार नहीं कर सकता हूँ क्योंकि मुझे पाँच बजे फ्लाइट पकड़नी है। उसने कहा कि मैं थोड़ी देर रुकूँ। मैंने कहा कि ठीक है मैं पन्द्रह मिनट और रुकता हूँ। फिर उसने मुझे कनाट प्लेस पुलिस स्टेशन जाने का सुझाव दिया। यह कहने पर कि मेरे पास ज्यादा समय नहीं है उसने कहा कि जहाँ मैं खड़ा हूँ वहाँ से पुलिस स्टेशन ज्यादा दूर नहीं है,बमुश्किलन पाँच मिनट लगेगा, मैं किसी से पूछकर चला जाऊँ। खैर मैं पूछने के लिए आटो स्टैंड से नीचे उतरने को ही था कि फोन आ गया और फोन दिल्ली पुलिस का था। मुझसे बात करने वाले पुलिसकर्मी ने कहा कि मैं कहाँ खडा हूँ वे लोग देख नहीं पा रहे हैं। थोड़ी देर बातचीत के बाद मैं उनकी पी सी आर वैन लोकेट कर सका और वहाँ पहुँचा । पुलिसकर्मी ने मुझसे पूछ कर कुछ बातें नोट की फिर मुझसे पुलिस स्टेशन चलने का आग्रह किया। मैंने उससे कहा कि मुझे फ्लाइट पकड़नी है। पुलिसकर्मी ने कहा समय नहीं लगेगा मैं साथ आऊँ। खैर मैं पुलिस भाई के साथ कनाट प्लेस पुलिस स्टेशन पहुँचा जो पास में ही था। वहाँ इंसपेक्टर साहब ने मुझसे हाथ मिलाया, वाकया पूछा और तहरीर देने के लिए कहा। फिर एक महिला पुलिसकर्मी को मुझे उसकी फोटो प्रति देने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि यदि मेरा ब्रीफ केस मिल जाता है तो मुझे लौटा दिया जाएगा। महिला पुलिसकर्मी से फोटो प्रति  लेकर मैं भागा क्योंकि तब तक साढ़े तीन बज चुके थे। शिवाजी स्टेडियम मेट्रो स्टेशन पहुँचने पर एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रेस के लिए दस मिनट इंतजार करना पड़ा। एयरपोर्ट में एयर इंडिया के काउंटर पर पहुँचते-पहुँचते चार बज गए। सवा चार बजे तक बोर्डिंग पास ईश्यू होना था। उसके लिए लंबी लाइन थी। खैर थोड़ी देर में एनाउंसमेंट हुआ कि कि अगर 764 नं की कोलकाता फ्लाइट के लिए कोई यात्री है तो आगे आ जाए।
परिणामस्वरूप मैं लाइन जंप कर आगे आ गया। मेरा बोर्डिंग पास देते हुए ट्रैफिक असिस्टेंट ने मुझे जल्दी जाने के लिए कहा। मैं भागते-भागते गेट 30 बी पर पहुंचा और अंततोगत्वा फ्लाइट बोर्ड कर सका।
       कोलकाता लैंड करने के बाद जब मैं घर पहुँचा तो श्रीमती जी ने ब्रीफकेस के बारे में दरियाफ्त की । उन्हें वास्तविकता बताई। इस पर उनका कहना था कि पिछले महीने मैंने सत्यनारायण भगवान की कथा करवाने से इंकार किया था इसीलिए मेरा सामान साधूराम बनिया के सामान की तरह गायब हुआ। दूसरे मैंने ब्रीफकेस से मद्भगवद गीता यह कह कर निकलवा दी थी कि सामान अधिक हो जाने के कारण उसे रखने के लिए जगह नहीं थी। गनीमत है कि मुझे साधूराम बनिया की तरह जेल नहीं जाना पड़ा। उन्होंने पाकेट साइज हनुमान चालीसा के बारे में पूछताछ की। वह मेरी पाकेट में है मैंने कहा। 'इसीलिए बच गए वरना साधूराम बनिया की तरह जेल चले गए होते' श्रीमतीजी का कहना था । बहरहाल मैंने श्रीमतीजी की बात मान ली है और जल्दी ही मेरे घर में सत्यनारायण व्रत कथा का आयोजन होने वाला हैं। चलिए देखते हैं जैसे साधूराम बनिया का सामान मिल गया शायद वैसे ही मेरा भी सामान मिल जाए!

Sunday, 27 December 2015

~-बिछुडना पिता से (कविता) -~

~-  बिछुडना पिता से -~
(एक वर्ष पूर्व लिखी गई कविता )

एक खोया हुआ सामान ढूँढते-ढूँढते
तमाम वस्तुओं को उलटते-पुलटते
मिल गया मुझे वर्षों पुराना एक राशनकार्ड
कुछ फोटोग्राफ, पेंशन के कुछ कागजात
मन दुःख और विषाद से भर गया
फोटोग्राफ से झाँक रहे थे दिवंगत पिता
पेंशन के कागजातों में उनका नाम था
तेरह वर्ष पूर्व मैंने उन्हें खो दिया था
दिल का एक कोना खाली हो गया था
आज तक कुछ भी न उसे भर सका था

स्मृतियाँ पुरानी कौंध आईं
जब झटका सा लगा था
आपके पिता अधिकतम जिएंगे छः माह
भविष्यवक्ता सदृश डा पटेल ने कहा था
कैंसर के भयंकर रूप के
वे शिकार हैं
दशा ऐसी विकट है कि
कुछ भी कहना बेकार है

घर आनेे पर साढ़े तीन वर्षीय पुत्र
मेरी गोद में चढ़ गया
उसने कुछ कहा
जिससे वज्रपात सा हुआ
बोला आज मैंने देखा है
बाबा के पापा को
वहीं खड़े थे और उन्होंने
चूमा मेरे माथे को
मेरी स्थिति ऐसी थी
जिसे काटो तो खून नहीं
क्या यहाँ सब कुछ
विज्ञान की परिधि में नहीं
पिता को स्वास्थ्य संबन्धी
थी कुछ शिकायत
पर उनसे बिछड़ने मात्र की
कल्पना थी मेरे लिए हृदयविदारक

नियति के क्रूर हाथों को
अगले पाँच महीने तक मैं देखता रहा
जिनसे वह मेरे पिता को छीनती रही
और मैं बेबस-अबस देखता रहा
अंततः बीस फरवरी दो हजार एक के दिन
मैंने उन्हें खो दिया
पर मुझे यह सोच कर
हृदय में संतोष मिला
स्थाई बन गए कष्टों से आखिर
उन्हें छुटकारा मिला

पाँच महीनों की परीक्षा भरी
उस अवधि के दौरान
हुआ मुझे दुनिया की अच्छाइयों
और अच्छे लोगों का ज्ञान
मित्र और परिचित
 जो हौसला बँधाते रहे
अपना कीमती समय दे
 मेरे पास आते रहे
कार्यालय के साथी
जो खून देने आगे आए
डा चिटणीस जिन्होंने चिकित्सक से
दार्शनिक बन दिलासा दी
मेरे श्याले जिन्होंने सात समंदर पार से
मुझे सही चिकित्सकीय सलाह दी
मेरी बहन के घर के लोग
जिन्होंने समय-समय पर व्यवस्थाएँ कीं
मेरे मित्र जिन्होंने अर्थ की आवश्यकता होने पर
निःसंकोच बताने के लिए कहा
वे लोग जो अलग-अलग प्रांतों के थे
पर मेरे पिता को आगे आकर कंधा दिया
उन सबके प्रति मैं सदैव
कृतज्ञता से भरा रहता हूँ
ऐसे अच्छे लोगों से दुनिया आबाद रहे
यही कामना करता हूँ
- संजय त्रिपाठी


Saturday, 26 December 2015

मोदी जी ने डाल दिया चक्कर में !

          जब से मोदी जी अचानक पाकिस्तान हो आए हैं मुझे यह गीत फिल्मी गीत याद आ रहा है -"उन्हीं से मुहब्बत उन्हीं से लडाई, अजी मार डाला दुहाई-दुहाई।" ऐसा लगने लगा है जैसे कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते उन प्रेमियों की तरह हैं जो आपस में खूब झगडते भी हैं और फिर एक दूसरे को मनाने की कोशिश भी करते हैं यानी कि 36 से 63 और 63 से 36 का सिलसिला चलता ही रहता है।
          प्रधानमंत्री एवं भाजपा के कुछ विरोधी यथा नेशनल कांफ्रेंस और साम्यवादियों ने तो अपनी नीतियों के प्रति वैचारिक ईमानदारी दिखाते हुए इस कदम का स्वागत किया। पर जद यू ,आप और कांग्रेस जैसे दल जो मोदी विरोधी राजनीति के केन्द्र में स्वयं को स्थापित करना चाहते हैं बडे पसोपेश में हैं। विरोध तो करना ही है पर सबके तर्क अलग-अलग हैं। के सी त्यागी को अचानक हेमराज की याद आ गई है । आनंद शर्मा के मुताबिक मोदी सरकार की पाकिस्तान को लेकर कोई नीति नहीं है। शिवसेना को भी उन्हीं से मुहब्बत उन्हीं से लडाई की तर्ज पर कुछ दिन चिल्लाने का मौका मिल गया है। एक कांग्रेसी भाई को तो मैंने फुसफुसाकर यह कहते सुना कि हमारे अय्यरजी पाकिस्तानियों को मोदीजी को हटाने की जो सलाह दे आए थे उसी से डरकर मोदीजी पाकिस्तानियों से दोस्ती करने पहुँच गए। खुर्शीद जी जिन्होंने मोदी को पाकिस्तान से बातचीत बंद करने के लिए पानी पी-पीकर पाकिस्तान में कोसा था पता नहीं अपने और कांग्रेसी भाइयों की राय से इत्तफाक रखते हैं या नहीं ! है न मामला चक्करदार !

         वैसे मोदी जी आपके इस कदम से चक्कर में तो मैं भी पड गया हूँ और मैं क्या आधा से हिन्दुस्तान चक्कर में है। ये मोदी की खोपडी में क्या समाया कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान में पनप रहे आतंकवाद की तरफ उँगली उठाने के बाद मोदी जी उसी पाकिस्तान में पहुँच गए। क्या वे बाजपेयी जी के पदचिह्नों पर हैं ? तो क्या फिर अब कारगिल फिर से दुहराया जाएगा? शरीफ साहब बार-बार नेक इरादों का इजहार करते हैं। पर पाकिस्तानी आर्मी हमेशा कबाब में हड्डी बनने को तैयार रहती है। तो क्या अब पाकिस्तानी सेना अपने इरादों में बदलाव लाने को तैयार हो गई है , या फिर गलबहियाँ की फोटो खिंचवाने, मुस्कराहटों के साथ हाथ मिलाने और ये दोस्ती हम नहीं छोडेंगे की तर्ज पर हाथों में हाथ डाले निकलने और भेंटों के आदान-प्रदान के कुछ अरसे बाद फिर आतंकवादी हमले, सीमा पर गोलीबारी या फिर हमारे जवानों पर घात लगाकर हमले की पुरानी कहानी दुहराई जाएगी। 

         मोदीजी बहुत बडा दाँव आपने खेला है। पर चलिए उम्मीद रखते हैं कि आपने गुणा-जोड बाकी भाग सब ठीक से कर लिया होगा। आखिर आप राजनीति के कच्चे खिलाडी तो हैं नहीं और न ही अब तक कूटनीति के कच्चे खिलाडी साबित हुए हैं जिसकी उम्मीद बहुत से लोग लगाए बैठे थे। पर अब आपके इस कदम से ऐसे लोगों की बाछें खिल गई हैं। उन्हें लग रहा है कि अब उनकी उम्मीद पूरी हो जाएगी। 

          पर उनकी उम्मीदें सही न साबित होंऔर आप अपनी जगह सही साबित हों तो शायद यह इस देश के साथ-साथ इसके आस-पडोस के लिए भी अमन चैन और तरक्की का रास्ता खोलेगा। इतिहासपुरुष नाउम्मीदी में भी उम्मीद और इसके लिए नए-नए तरीके तलाशते हैं और इंशा अल्लाह आप वह इतिहास पुरुष साबित हों। एक संघी भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती भरा रिश्ता कायम कर सके तो इससे बढकर भारतीय लोकतंत्र की सफलता का उदाहरण क्या होगा।





Thursday, 24 December 2015

सामीप्य (कविता)

          ~-सामीप्य-~
(लगभग बीस वर्ष पूर्व मेरे द्वारा लिखी गई कविता)

अब तक जो रहा विरह -विदग्ध था
उसे मिला मलय समीर ललित था
ज्योति पे मर मिटने को शलभ था
प्रिये प्रीति के आतप से यह
अंतस क्यों इतना रहा झुलस था।।

प्रसूनों से शोभित उपवन था
तुमसे सुरभित मेरा मन था
पुष्प का रस पाने को मधुकर था
कलिके नयनों ने पान किया वह
मकरंद क्यों इतना रसकर था।।

नभ से बरस पडने को मेह था
हृदय में उमड रहा नेह था
स्वाति की बूँद पाने को चातक था
सलिले अंतस की तृषा बुझाने में
क्या अब भी कुछ बाधक था।।

प्रकृति थी लिए सौंदर्य बिखरा सा
तुम थीं व्यक्तित्व लिए प्रेमपगा सा
अंधे को जैसे मिल गया दो-दो नयन था
मृदुले इससे भी बढकर अब
जग में क्या कुछ सुंदर था।।

तुममें खो जाने को मन व्याकुल था
स्वयं में तुम्हें बसा लेने को अंतर आकुल था
विधाता ने दिया जैसे मुँहमाँगा वर था
मधुरे तुम्हारे सामीप्य से भी बढकर
क्या जग में कुछ सुखकर था।।


Thursday, 26 November 2015

दिल में ये पिघलता सा क्या है (गजल)

                 ~-गजल-~
     तेरे अफसाने से दिल में ये पिघलता सा क्या है
     कौन सा गुबार ये हलक में अटकता सा क्या है

     घूँघट में छिपे चेहरे पर दफन कितनी शिकनें हैं
     परदे से बाहर आने को ये मचलता सा क्या है 

     जुगनू है, गुहर है या फिर दर्द ए आब कह लो
     नम आँखों से ये रह-रह ढलकता सा क्या है

     दिलोदिमाग के मोम को ये किसने दे दी आँच
     सीने के अंदर ये कुछ-कुछ टहकता सा क्या है

     बजाए नींद के आँखों में अश्क आ जाएं हुजूर
     कहानियाँ ये कैसी विधाता रचता सा क्या है

     ढला हुआ मंजर एक बार फिर से जिंदा हो गया
     उसकी कलम से'संजय'जादू छलकता सा क्या है

      -संजय त्रिपाठी 
  (आदरणीय कमलाकान्त त्रिपाठी जी द्वारा इन दिनों लिखे जा रहे उपन्यास से प्रेरित होकर)

Wednesday, 25 November 2015

सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता

         
        सहिष्णुता पर छेड़ी गई ( मैं जान-बूझ कर छिड़ी नहीं छेड़ी शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ) बहस एक बडा सवाल यह खड़ा करती है कि क्या भारत पिछले एक साल में बदल गया है। क्या एक-डेढ़ साल पहले या जैसाकि आमिर खान कहते हैं छ: - सात माह पहले हमारे देश में सहिष्णुता थी और अचानक सब कुछ बदल गया है और लोग असहिष्णु हो गए हैं, उदार से अनुदार हो गए हैं।
          जो लोग इससे सहमत हैं उन्हें फिर यह भी मानना पड़ेगा कि जिनका भी एजेंडा लोगों को असहिष्णु बनाना है उन्होंने बहुत कम समय में बड़ी सफलता हासिल कर ली है और पूरे भारत की जनता बेवकूफ है जिसे आसानी से बरगलाया जा सकता है। 
          पर मेरा अपना मानना है कि ऐसा नहीं है। यह देश वही है, लोग वही हैं। सत्ता बदलने से लोग यानी देश की आम जनता नहीं बदल जाती। सत्ता का बदलाव लोकतंत्र का हिस्सा है। सत्ता के बदलाव का यह आशय भी नहीं कि किसी को देश का सर्वाधिकार सौंप दिया गया है। जनता ने जिन आशाओं के साथ सत्ता सौंपी है, यदि कोई उसका गलत आशय निकालता है अथवा जनता की आशाओं पर तुषारापात करता है तो जनता के सामने लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जब भी चुनाव होते हैं सत्ताधारियों को बाहर का रास्ता दिखाने का विकल्प खुला रहता है।
          सहिष्णुता पर छेड़ी गई बहस का वास्तविक मंतव्य देश की उदार परंपरा पर जोर देना और अनुदार तत्वों को हतोत्साहित करना होता तो ठीक था, पर इसने राजनीतिक स्वरूप अख्तियार कर लिया है और स्थिति यह है कि बी जे पी के पक्षधर इस बहस को खारिज कर रहे हैं और विरोधी दल केन्द्र के वर्तमान सत्ताधारी दल को कटघरे में खड़ा करने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि स्थिति यह है कि सांप्रदायिक मामलों में यदि साम्यवादियों और अपेक्षाकृत नए दलों को छोड़ दिया जाए तो किसी का भी दामन पाक- साफ नहीं है। अगर ऐसा होता तो 1969 का गुजरात दंगा नहीं होता, 1984 के दंगों की सिखों को विभीषिका नहीं झेलनी पड़ी होती,1989 का भागलपुर दंगा नहीं होता, मैलियाना और हाशिमपुरा के कांड नहीं होते, 1992 के मुंबई दंगे नहीं होते, 2002 में गुजरात के दंगे नहीं होते और न ही 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे होते। यदि ऐसा होता तो तमाम काश्मीरी पंडितों को अपने ही देश में बेघर होना और दर-बदर भटकना नहीं पड़ता। साम्यवादी भी उदार तो कतई नहीं कहे जा सकते। तसलीमा नसरीन के साथ उनका व्यवहार सबको मालूम है। कालबुर्जी और पनसारे की हत्या तथा दादरी मामले में जैसे ऐसा मान लिया जा रहा है कि राज्य सरकारों को कुछ करना ही नहीं था। 
          मैंने कई बार इस आशय के वक्तव्य पढ़े हैं कि भारत हिन्दू बहुसंख्यकों के कारण धर्म निरपेक्ष है। पर मुझे लगता है कि भारत हिन्दू बहुसंख्यकों के साथ-साथ अल्पसंख्यक मुस्लिमों, ईसाइयों और सिखों के कारण भी धर्मनिरपेक्ष है। इस देश की धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक सौहार्द्र के प्रति मुस्लिम प्रतिबद्धता का प्रमाण यह है कि 20 करोड़ भारतीय मुस्लिमों में से अब तक सिर्फ 21 के आई एस आई एस के साथ जाने की सूचना है जबकि सभी योरपीय देशों से हजारों की तादाद में मुस्लिम आई एस आई एस के साथ हैं। प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष कहा था कि भारत का मुसलमान अल कायदा को फेल करेगा और भारतीय मुसलमान इस बात पर खरा उतरा है। अल कायदा के साथ जाने वाले भारतीय मुसलमानों की संख्या भी नगण्य है। पाकिस्तान में आधारित आतंकवादी संगठन और आई एस आई लंबे समय से भारतीय मुसलमानों को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं। पर कुछ ही मुसलमान हैं जो उनके झाँसे में आए हैं । भले ही भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं पर तब भी भारत मुस्लिम आबादी के लिहाज से दुनिया के प्रथम कुछ देशों में है । जिस तरह मुस्लिम और योरपीय देशों में मुस्लिम आबादी का एक हिस्सा आतंकी संगठनों के बहकावे में आया है यदि उससे तुलना करें तो भारत के मुसलमानों ने उन्हें नकार कर भारत को आतंक के साये से एक बड़ी हद तक महफूज रखा है। भारत के ईसाई समुदाय की सांप्रदायिक मामलों मे संलग्नता न के बराबर रही है। सिख समुदाय की जहाँ तक बात है उनकी सक्रियता से ही पंजाब में पाकिस्तान के समर्थन से चल रहा खलिस्तान आंदोलन कुचला जा सका। इसलिए भारत की धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सौहार्द्र में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक सभी संप्रदायों का समान रूप से योगदान है। इनमें से अधिकांश को अपनी दो वक्त की रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। धार्मिक- सांप्रदायिक विवाद खड़े करने के लिए समय उन लोगों के पास हो सकता है जो इन चिन्ताओं से मुक्त हों। जब कोई यह कहता है कि देश में असहिष्णुता बढ़ गई है तो वह इन तमाम हिन्दुओं,मुसलमानों,सिखों और ईसाइयों की नीयत पर सवाल लगाता हैं। 
          जो साधन संपन्न है वह देश छोड़ कर जा सकता है पर जो दो रोटी के लिए संघर्ष करता है उसे तो इसी देश में रहना है । जब देश विभाजन की विभीषिका झेल रहा था तब इस देश में आज रहने वाले तमाम मुसलमानों या उनके पूर्वजों ने तरह-तरह का डर दिखाए जाने के बावजूद इस देश को नहीं छोड़ा । आज किसी महंत आदित्यनाथ, साक्षी महाराज या साध्वी के बयान भर या दादरी कांड के कारण वे देश छोड़ने की क्यों सोचें ( यही वह रास्ता है जो आमिर खान उन्हें दिखाने की कोशिश कर रहे हैं) । उन्हें यहीं जीना -मरना है और अपना तथा अपनी पीढ़ियों का भविष्य बनाने और स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश करना है। 
         यदि कोई यह कहता है कि सत्ताधारी दल के और उसके आनुषंगिक संगठनों कुछ सदस्य अनर्गल बयान देकर माहौल खराब कर रहे हैं तथा उन्हें नियंत्रित किया जाए, साथ ही कुछ राज्य भी धुर दक्षिणपंथी एवं सांप्रदायिक तत्वों पर लगाम लगाने में असफल हैं जिससे साहित्यिक सृजनशीलता और सांप्रदायिक स्थिति प्रभावित हो सकती है या हो रही है एवं इसे नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए जाएं तो बात मेरी समझ में आती है और मैं इसका समर्थन करता हूँ।
         पर यदि कोई यह कहता है कि देश में पिछले कुछ महीनों में अचानक असहिष्णुता बढ़ गई है, भारतवासी असहिष्णु हो गए हैं और इससे सामान्य रूप से जान-माल का खतरा पैदा हो गया है तथा एक डेढ़ वर्ष पूर्व देश में रामराज्य की स्थिति थी, शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पिया करते थे तो यह एक राजनीतिक बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं है जिससे देश को कोई लाभ नहीं अपितु नुकसान ही होगा।

सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता

         
        सहिष्णुता पर छेड़ी गई ( मैं जान-बूझ कर छिड़ी नहीं छेड़ी शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ) बहस एक बडा सवाल यह खड़ा करती है कि क्या भारत पिछले एक साल में बदल गया है। क्या एक-डेढ़ साल पहले या जैसाकि आमिर खान कहते हैं छ: - सात माह पहले हमारे देश में सहिष्णुता थी और अचानक सब कुछ बदल गया है और लोग असहिष्णु हो गए हैं, उदार से अनुदार हो गए हैं।
          जो लोग इससे सहमत हैं उन्हें फिर यह भी मानना पड़ेगा कि जिनका भी एजेंडा लोगों को असहिष्णु बनाना है उन्होंने बहुत कम समय में बड़ी सफलता हासिल कर ली है और पूरे भारत की जनता बेवकूफ है जिसे आसानी से बरगलाया जा सकता है। 
          पर मेरा अपना मानना है कि ऐसा नहीं है। यह देश वही है, लोग वही हैं। सत्ता बदलने से लोग यानी देश की आम जनता नहीं बदल जाती। सत्ता का बदलाव लोकतंत्र का हिस्सा है। सत्ता के बदलाव का यह आशय भी नहीं कि किसी को देश का सर्वाधिकार सौंप दिया गया है। जनता ने जिन आशाओं के साथ सत्ता सौंपी है, यदि कोई उसका गलत आशय निकालता है अथवा जनता की आशाओं पर तुषारापात करता है तो जनता के सामने लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जब भी चुनाव होते हैं सत्ताधारियों को बाहर का रास्ता दिखाने का विकल्प खुला रहता है।
          सहिष्णुता पर छेड़ी गई बहस का वास्तविक मंतव्य देश की उदार परंपरा पर जोर देना और अनुदार तत्वों को हतोत्साहित करना होता तो ठीक था, पर इसने राजनीतिक स्वरूप अख्तियार कर लिया है और स्थिति यह है कि बी जे पी के पक्षधर इस बहस को खारिज कर रहे हैं और विरोधी दल केन्द्र के वर्तमान सत्ताधारी दल को कटघरे में खड़ा करने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि स्थिति यह है कि सांप्रदायिक मामलों में यदि साम्यवादियों और अपेक्षाकृत नए दलों को छोड़ दिया जाए तो किसी का भी दामन पाक- साफ नहीं है। अगर ऐसा होता तो 1969 का गुजरात दंगा नहीं होता, 1984 के दंगों की सिखों को विभीषिका नहीं झेलनी पड़ी होती,1989 का भागलपुर दंगा नहीं होता, मैलियाना और हाशिमपुरा के कांड नहीं होते, 1992 के मुंबई दंगे नहीं होते, 2002 में गुजरात के दंगे नहीं होते और न ही 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे होते। यदि ऐसा होता तो तमाम काश्मीरी पंडितों को अपने ही देश में बेघर होना और दर-बदर भटकना नहीं पड़ता। साम्यवादी भी उदार तो कतई नहीं कहे जा सकते। तसलीमा नसरीन के साथ उनका व्यवहार सबको मालूम है। कालबुर्जी और पनसारे की हत्या तथा दादरी मामले में जैसे ऐसा मान लिया जा रहा है कि राज्य सरकारों को कुछ करना ही नहीं था। 
          मैंने कई बार इस आशय के वक्तव्य पढ़े हैं कि भारत हिन्दू बहुसंख्यकों के कारण धर्म निरपेक्ष है। पर मुझे लगता है कि भारत हिन्दू बहुसंख्यकों के साथ-साथ अल्पसंख्यक मुस्लिमों, ईसाइयों और सिखों के कारण भी धर्मनिरपेक्ष है। इस देश की धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक सौहार्द्र के प्रति मुस्लिम प्रतिबद्धता का प्रमाण यह है कि 20 करोड़ भारतीय मुस्लिमों में से अब तक सिर्फ 21 के आई एस आई एस के साथ जाने की सूचना है जबकि सभी योरपीय देशों से हजारों की तादाद में मुस्लिम आई एस आई एस के साथ हैं। प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष कहा था कि भारत का मुसलमान अल कायदा को फेल करेगा और भारतीय मुसलमान इस बात पर खरा उतरा है। अल कायदा के साथ जाने वाले भारतीय मुसलमानों की संख्या भी नगण्य है। पाकिस्तान में आधारित आतंकवादी संगठन और आई एस आई लंबे समय से भारतीय मुसलमानों को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं। पर कुछ ही मुसलमान हैं जो उनके झाँसे में आए हैं । भले ही भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं पर तब भी भारत मुस्लिम आबादी के लिहाज से दुनिया के प्रथम कुछ देशों में है । जिस तरह मुस्लिम और योरपीय देशों में मुस्लिम आबादी का एक हिस्सा आतंकी संगठनों के बहकावे में आया है यदि उससे तुलना करें तो भारत के मुसलमानों ने उन्हें नकार कर भारत को आतंक के साये से एक बड़ी हद तक महफूज रखा है। भारत के ईसाई समुदाय की सांप्रदायिक मामलों मे संलग्नता न के बराबर रही है। सिख समुदाय की जहाँ तक बात है उनकी सक्रियता से ही पंजाब में पाकिस्तान के समर्थन से चल रहा खलिस्तान आंदोलन कुचला जा सका। इसलिए भारत की धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सौहार्द्र में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक सभी संप्रदायों का समान रूप से योगदान है। इनमें से अधिकांश को अपनी दो वक्त की रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। धार्मिक- सांप्रदायिक विवाद खड़े करने के लिए समय उन लोगों के पास हो सकता है जो इन चिन्ताओं से मुक्त हों। जब कोई यह कहता है कि देश में असहिष्णुता बढ़ गई है तो वह इन तमाम हिन्दुओं,मुसलमानों,सिखों और ईसाइयों की नीयत पर सवाल लगाता हैं। 
          जो साधन संपन्न है वह देश छोड़ कर जा सकता है पर जो दो रोटी के लिए संघर्ष करता है उसे तो इसी देश में रहना है । जब देश विभाजन की विभीषिका झेल रहा था तब इस देश में आज रहने वाले तमाम मुसलमानों या उनके पूर्वजों ने तरह-तरह का डर दिखाए जाने के बावजूद इस देश को नहीं छोड़ा । आज किसी महंत आदित्यनाथ, साक्षी महाराज या साध्वी के बयान भर या दादरी कांड के कारण वे देश छोड़ने की क्यों सोचें ( यही वह रास्ता है जो आमिर खान उन्हें दिखाने की कोशिश कर रहे हैं) । उन्हें यहीं जीना -मरना है और अपना तथा अपनी पीढ़ियों का भविष्य बनाने और स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश करना है। 
         यदि कोई यह कहता है कि सत्ताधारी दल के और उसके आनुषंगिक संगठनों कुछ सदस्य अनर्गल बयान देकर माहौल खराब कर रहे हैं तथा उन्हें नियंत्रित किया जाए, साथ ही कुछ राज्य भी धुर दक्षिणपंथी एवं सांप्रदायिक तत्वों पर लगाम लगाने में असफल हैं जिससे साहित्यिक सृजनशीलता और सांप्रदायिक स्थिति प्रभावित हो सकती है या हो रही है एवं इसे नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए जाएं तो बात मेरी समझ में आती है और मैं इसका समर्थन करता हूँ।
         पर यदि कोई यह कहता है कि देश में पिछले कुछ महीनों में अचानक असहिष्णुता बढ़ गई है, भारतवासी असहिष्णु हो गए हैं और इससे सामान्य रूप से जान-माल का खतरा पैदा हो गया है तथा एक डेढ़ वर्ष पूर्व देश में रामराज्य की स्थिति थी, शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पिया करते थे तो यह एक राजनीतिक बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं है जिससे देश को कोई लाभ नहीं अपितु नुकसान ही होगा।

Tuesday, 24 November 2015

An open letter to Aamir Khan

Aamir you can afford to leave India not others!

        Aamir Khan your wife has been suggesting to leave India due to increasing intolerance along with the family for safety of your child ! You say that is a big and disastrous statement for Kiran to make. I agree with you that it is a big and disastrous statement but the problem is that you seem to be in agreement with her. You didn't try to reassure her.
          For you and your wife your child is important, but for million others their children are important and the problem is they have not made millions like you. So they can not look towards greener pastures like you. A majority of them can not even think of leaving this country.They were born here, they will die here irrespective of what happens to their children.Despite of all talks of despondency by you they have to earn their bread and butter here itself and have to train their children for the same here itself. When 1969 riots happened in Gujarat, when Bhagalpur happened in 1989, when Muslims were butchered by state forces in Maliana and Hashimpura, when Sikhs were butchered in 1984, when Kashmiri Pandits were driven out of their homes in their own country and when Gujrat 2002 and Mujaffarnagar 2013 happened, they all- Hindus,Muslims and Sikhs faced it with forbearance and rose in life to make their lives again. Even today they have got no justice, but still have some hope for the future. They never talk of leaving this country rather they struggle everyday.
         During my journeys to Delhi from Bareilly on Intercity Express a lot of Muslims used to board It at Gajraula,Amroha and many other small stations towards Delhi. I used to listen their discussions which had a certain element of worries of Muslim world. But they all used to agree ultimately that there is no country like India in the world which welcomes all the religions with both hands. India is made up of millions of these people- Hindus,Muslims, Christians as well as Sikhs- majority of them marginalised- who never lost hope on the idea of India and it survives due to them. It is God's Grace that its survival is not dependent on people like you whose wives sitting in one of the world's most costly locations in posh bungalows and flats with armed security guards around suggest that India has become a banana republic and people living luxurious life should leave the country. 
          As I read the news item about you, I see your photograph in the corner on the occasion of Id with your wife Kiran and child Azad in jovial mood enjoying festivities and I don't see even a shred of fear. It is very easy to sit in safe and luxurious environs and condemn your country and its people telling they have become intolerant but difficult to do something really worthwhile for the country. 
       I don't think you are not aware of your potential. People of this country have showered their so much love and affection upon you. Had you given call for a cause they would have stood behind you . Had you led, they would have marched in hordes. You can have direct access to Prime Minister. You could have put up problems before him and given suggestions. Instead of that you preferred to malign the country and its people .
        When you say intolerance has increased in the last six-eight months, you mean people have changed. They have become intolerant from tolerant. I don't think it is so. People are the same. Their thoughts are same. Country is same.Since rightists are in power, right and ultra-right forces have become more assertive. But it doesn't mean that people and country have changed. They are the same very people who loved you, who made you a star. Please don't blame them for the statements of some insane right wingers and stray communal incidences. Pl. don't give a chance to enemies of the country to laugh over us. India has survived and overcame far more serious communal disturbances and challenges. India has made you great, you help it in achieving greatness.


Monday, 23 November 2015

जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं (गजल)

   वर्ष 1992 में लिखी गई मेरी आरंभिक   गजलों में एक                
                        ~ - गजल-~

मार देते हैं चश्म ए सियाह से पर जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।
यूँ किए जाते हैं रोज हम पर सितम पर जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

उन आँखों की मौज ए कौसर में डूबे जाते हैं हम
बचाने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

शमशीर ए आबदार हैं वो रोज घायल हुए जाते हैं हम ।
मरहम भी नहीं लगाते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

पी उन निगाहों के पैमाने मदहोश हो गिर-गिर जाते हैं हम।
उठाने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

जब पलक झपकाते हैं कहीं गिरफ्तार हुए जाते हैं हम।
कफस खोलने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

नीम निगाहों से देख लेते हैं वो इक तूफान से घिर जाते हैं हम।
सहारा देने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

देख गजालचश्म की आँखें किसी वन में राह भटक जाते हैं हम।
राह दिखाने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

जहर भी है आब ए हयात भी है वहाँ मरकर जिए जाते हैं हम।
पर यूँ पेश आते हैं वो जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।

दुनिया जान भी गई है 'संजय' किस मर्ज में मुबतला हो गए हैं हम ।
दवा देने भी नहीं आते हैं जैसे उन्हें कुछ अहसास नहीं।।        -संजय त्रिपाठी








Saturday, 21 November 2015

नितीश : चुनौतियाँ और संभावनाएं

          वोटिंग पैटर्न का विश्लेषण तर्कसंगत रूप में करना दुष्कर कार्य है। पर कई बार चुनाव की एक थीम बन जाती है जिसे चुनाव विश्लेषक प्रायः लहर का नाम दे देते हैं और जब इसका प्रभाव होता है तो जाति,धर्म जैसे मुद्दे गौण हो जाते हैं। अनेक चुनाव इसके साक्षी हैं। पर थीम या लहर जैसा कुछ बिहार के इस चुनाव में दिख नहीं रहा था। नि:संदेह बिहार चुनाव में लालू यादव का स्ट्राइक रेट नीतिश से बेहतर रहा है। पर फिर भी यह मानना होगा कि जनता के सामने यह स्पष्ट था कि मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ही होंगे। इसलिए लालू की छत्रछाया बाधा नहीं बनी और नीतिश के गुड गवर्नेंस के रिकार्ड के कारण उनके विरुद्ध एंटी इन्क्यूम्बेन्सी का फैक्टर नहीं था। अतः जीत का श्रेय तो उन्हें देना पड़ेगा । लालू का एक कमिटेड वोट बैंक है और शायद इस कारण लालू एवं नीतिश समझौते के बड़े गेनर लालू प्रसाद रहे हैं।
        मैंने अपने पूर्व ब्लाग में बात की है बिहार के चरित्र और उस परिप्रेक्ष्य में नीतिश की महत्वाकांक्षाओं की। नीतिश में क्षमता और योग्यता है । सुशील मोदी जब साथ थे तो नरेन्द्र मोदी का प्रोजेक्शन शुरू हो जाने के बावजूद नीतिश कुमार को प्राइम मिनिस्टीरियल मैटेरियल बताया करते थे। यह तो जब ऊपर से अलग होने के निर्देश आ गए तो उन्हें अलग होना पड़ा और फिर जबान भी बदल गई। 
          पर अब नीतिश ने जिस आदमी का साथ पकड़ा है वह पूरी कीमत वसूलना जानता है और तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री तथा तेजप्रताप को मंत्री बनाकर नीतिश ने उसकी अदायगी की शुरुआत भी कर दी है। इस कीमत अदायगी को मैनेज करना और लालू को बिहार में महाराष्ट्र के बाला साहब ठाकरे की जैसी भूमिका अख्तियार करने से रोक पाना नीतिश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं। अगर वे इसमें सक्षम रहते हैं तो नि:संदेह विपक्ष के लिए वे एक समन्वय का बिन्दु बनकर उभर सकते हैं। नीतिश कुमार यह महत्वाकांक्षा रखते भी हैं। उन्होंने राहुल गाँधी,केजरीवाल और ममता बनर्जी से बार-बार संपर्क कर यह भूमिका पाने का प्रयास भी किया है। भारतीय राजनीति में राजनीतिज्ञ की सर्वाधिक उपयोगिता वोट कैचर राजनीतिज्ञ के रूप में समझी जाती है और अगर नीतिश इस रूप में औरों को उपयोगी लगेंगे तो वे उन्हें रास्ता देने के लिए तैयार रहेंगे। फार्रूख अब्दुल्ला ने तो उनकी इस भूमिका का समर्थन भी कर दिया हैं। जहाँ तक राहुल गाँधी की बात है, एक तो उन्होंने अब तक एक राजनीतिज्ञ के रूप में मैच्योरिटी नहीं दर्शाई है, दूसरे जब भी जिम्मेदारी सर पर आती दिखती है तो वे उससे भागते हुए दिखाई देते हैं । इसलिए मुझे नहीं लगता कि वे नीतिश के रास्ते में कंटक बनेंगे।   
            किसी भी प्रकार के झगड़े की स्थिति में लालू प्रदेश में और लालू तथा मुलायम की जोड़ी राष्ट्रीय स्तर पर उनका रास्ता अवरुद्ध करेगी। पर भविष्य के गर्त में क्या छिपा है यह तो कोई कह नहीं सकता। वैसे भारतीय राजनीति को नरेन्द्र मोदी के एक काउन्टर मैग्नेट की जरूरत तो है ही क्योंकि absolute power का परिणाम कभी भी अच्छा नहीं होता।

Friday, 20 November 2015

क्या नितीश कुमार का सपना साकार होगा?

                         दृश्य-1
          23 नवंबर, 2005 के दिन मैं दार्जिलिंग में एक कांफ्रेंस में भाग लेने के बाद न्यू जलपाई गुड़ी से बरेली के लिए एक सायंकालीन एक्सप्रेस ट्रेन से जो दिल्ली जाती थी, रवाना हुआ। साथ में मेरे मित्र एस पी तिवारी जी थे। समाचार आ चुका था कि बिहार में एक अरसे के बाद लालूजी की निर्णायक हार हुई है और एन डी ए गठबंधन विजयी हुआ है और 24 नवंबर,2005 को नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण करने वाले हैं। 
          ए सी 3 कंपार्टमेंट था।रात ग्यारह बजे मैं ऊपर की बर्थ पर सोने की कोशिश में था। नीचे की बर्थ पर तिवारी जी सो रहे थे । लगभग साढे ग्यारह बजे अचानक किसी के जोर-जोर से गाने की आवाज आने लगी-'चल-चल मेरे हाथी......'। ट्रेन में वैसे भी मेरे लिए सोना मुश्किल रहता है,ऊपर से यह विघ्न! फिर मन में सोचा बिहार-झारखंड का इलाका हैं। कानून को वैसे भी यहाँ लोग अपने अँगूठे तले रखते हैं। ज्यादा बोलना ठीक नहीं है। गाने वाला शायद कुछ गाने गाकर शांत हो जाएगा। पर बंदा था कि बुलंद आवाज में एक के बाद एक गाने गाता गया और मैं उसे कोसता रहा। खैर, 24 नवंबर की तिथि शुरू हो गई और पता नहीं कब देर रात गए मुझे नींद आ गई और मैं सो गया।
        लगभग चार बजे सुबह बगल से जोरों से आ रहे झगड़े के स्वर ने मुझे जगा दिया। कोई कह रहा था-"गाना गाता है, ,बहू-बेटी के आगे गाना गाता है ,मड़वारी है " । 
फिर धपाक-धपाक-धपाक आवाज आई। 
अब अन्य कोई बोल रहा था- " न टिकट है,न रिजर्वेशन "। 
फिर पहला स्वर बोला- "रात भर से टी टी को हवा दे रहा है।" 
 फिर दूसरा स्वर- " किसी से खुद को जार्ज फर्नांडीज का साथी बता रहा है, और किसी से नीतिश कुमार का।"
 पुन: पहला स्वर- " ऐसे ही रात भर से सबको हवा देकर बैठा हुआ है"।
 तब तक वहाँ नीचे से उठकर तिवारी जी भी पहुँच गए थे। कोई कह रहा था- "इसे पुलिस के पास ले चलो" । 
फिर आवाज आई - "इसे टी टी के पास ले चलो", यह तिवारी जी थे।
 फिर पहले वाला स्वर बोला-"अभी तो सरकार बनिबै नहीं किहा और आप सबका ई हाल है।"

                          दृश्य-2
15 नवंबर, 2015 के दिन मेरे एक सहकर्मी श्री गौतम सिन्हा छुट्टी लेकर छठ पूजा के उपलक्ष्य में परिवार के साथ हावड़ा से रेलगाड़ी द्वारा स्लीपर क्लास में अपने घर नालंदा जा रहे हैं। सभी अपनी-अपनी बर्थ पर सो रहे हैं। रात 2 बजे झाझा के पास एक कोई व्यक्ति जोर-जोर से डंडा पटकता है और कहता है- "उठो।" 
गौतम सिन्हा जाग जाते हैं। कहते हैं-" अरे भाई, मेरा बख्तियारपुर तक परिवार के साथ रिजर्वेशन है। कहीं और जगह देख लो"। गौतम सिन्हा के अनुसार संबन्धित व्यक्ति देखने में नेता लग रहा है।
नेता जैसा व्यक्ति-" मालूम है। पर जानते नहीं हो लालू का राज आ गया है। उठ जाओ और बैठने दो।"
गौतम सिन्हा- " लालू का राज है! नीतिश का राज नहीं है?"
ऊपर की बर्थ पर लेटा एक व्यक्ति जोर से चिल्लाता है- " क्या है नींद खराब कर रहे हो? रिजर्वेशन होने के बाद भी चैन से सोने नहीं दे रहे हो।"
नेता जैसा व्यक्ति- " अब. .......का राज है। दो-तीन मर्डर और कर दूँगा तो क्या फर्क पडेगा?"
गौतम सिन्हा- " इतनी सी बात पर मर्डर करने की जरूरत नहीं हैं। सात नं बर्थ टी टी की है। वो ए सी कंपार्टमेंट में चला गया है। उधर चले जाओ।"
नेता जैसा व्यक्ति यह बड़बड़ाते हुए कि दो-तीन मर्डर और कर दूँगा तो क्या फर्क पड़ेगा, सात नं बर्थ की तरफ चला जाता है।

                       दृश्य-3
(जो पूरे भारत ने आज विभिन्न टी वी चैनलों पर देखा ) - आज 20 नवंबर, 2015 के दिन नीतिश कुमार जी ने 28 मंत्रियों के साथ पाँचवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। इस मौके पर नौ राज्यों के मुख्य मंत्री और शीला दीक्षित- केजरीवाल, बाबूलाल मरांडी-हेमंत सोरेन, शरद पवार- रामदास कदम,ममता बनर्जी- सीताराम येचुरी जैसे परस्पर विरोधी तत्व, केन्द्र के सत्ता पक्ष की तरफ से वेंकैया नायडू एवं रूडी सहित विरोध पक्ष के अनेक नेता एवं विभिन्न राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि मौजूद हैं।
          शपथ ग्रहण के मौके पर इतने बड़े जमावड़े के अनेक निहितार्थ लगाए जा रहे हैं। पर इसमें सबसे बड़ा निहितार्थ यह है कि नीतिश कुमार अखिल भारतीय स्तर पर अपनी स्वीकार्यता दिखा कर नरेन्द्र मोदी के सामने खुद को एक काउन्टर मैग्नेट के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहते हैं। पर शाम को तेजस्वी यादव की उपमुख्यमंत्री के तौर पर घोषणा के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि नीतिश कुमार का वर्तमान शासनकाल लालूजी की छत्रछाया के कारण तलवार की धार पर चलने के समान है। यदि इसके बाद भी वे अपनी साफ-सुथरी और विकास पुरुष की छवि को बचाए रखने में समर्थ होंगे तो यह चमत्कार से कम नहीं होगा और उस स्थिति में ही वे नरेन्द्र मोदी के विकल्प के तौर पर खुद को प्रोजेक्ट करने में सक्षम हो सकेंगे। एक सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या बिहार बदलेगा और यदि हाँ तो किस दिशा में बदलाव होगा। यदि नीतिश कुमार यह बदलाव सकारात्मक दिशा की तरफ कर सकने में स्वयं को सक्षम साबित करते हैं तभी वे स्वयं को नरेन्द्र मोदी के विकल्प के तौर पर पेश कर सकेंगे। 



Sunday, 15 November 2015

राष्ट्रहित और धार्मिक हीनभावनाएं (टीपू सुल्तान के प्रसंग में विमर्श)

पुष्यमित्र उपाध्याय-
          वैसे मेरे विचार में जब देश की सबसे बड़ी समस्या वर्ग संघर्ष के इतिहास के कारण ही उपस्थित है, तो इन इतिहासों पर चर्चा जरुरी है, और निश्चित ही ये केंद्र होने भी चाहिए | टीपू जरूर रहे होंगे देश भक्त और समाज को जोड़ने वाले , लेकिन कब? जब अंग्रेज छाती पर चढ़ आये तब ? जब सत्ता छिनती दिखी तब जागा एकता का भाव? उससे पहले तो काटम काट ही मचाये हुए थे इनके पूर्वज और ये | वर्तमान केवल उन लोगों की जयंती मनाता है जो निर्विवाद रूप से नायक रहे थे, जिन्होंने किसी भी अन्य वर्ग का दमन कर अपना सिक्का नहीं चमकाया | वैसे अंग्रजो का आना भी इस देश की मूल सभ्यता के लिए जरुरी था वरना मैं आज परवेज होता और आप शाहबाज़ , हाँ जो अत्याचार और लूट पाट हुई बस वो नहीं होना था।

कमलाकान्त त्रिपाठी-
          मराठों का इतिहास क्यों भूलते हैं? राघोबा की फ़ितरत से अंग्रेज़ों के सामने मुंह की खा गए. वरना मुग़ल सल्तनत के उत्तराधिकारी होने से कोई अन्य शक्ति रोक नहीं सकती थी. 1761 के बावजूद.

पुष्यमित्र उपाध्याय-
          सर ऐसे किन्तु परन्तु तो काफी सारे हैं, अगर गद्दारी न होती , एकता होती तो हम गुलाम ही कहाँ बनते?

मेरी प्रतिक्रिया-
          पुष्यमित्र उपाध्याय जी, पहले तो हिन्दू धर्म को इतना कमजोर मत समझिए कि आप परवेज होते और मैं शहबाज होता। हिन्दू धर्म की पाचक क्षमता, मौके के अनुकूल खुद को ढाल लेने और पैसिव प्रतिरोध की शक्ति, लचीलापन और समुत्थान शक्ति जबर्दस्त हैं। इस्लाम के आगमन के पहले भारत में जो भी आए उन्हें हिन्दू धर्म पचा गया। शक, कुषाण और हूण कहाँ हैं पता नहीं चलता। केरल में जहाँ यहूदी और ईसाई धर्म इस्लाम से भी पुराने हैं वहाँ एक मलयाली हिन्दू, ईसाई और यहूदी में आप आसानी से भेद नहीं कर करते। महाराष्ट्र में मैं लंबे अरसे तक रहा हूँ। वहाँ भी ऐसा ही है। कुछ लोगों को मैं नाम से महाराष्ट्रियन हिन्दू समझता था । बाद में मुझे पता चला कि वे लोग यहूदी यानी कि Jew हैं। 
          इस्लाम पहला ऐसा संगठित धर्म था जिसने हिन्दू धर्म के सामने चुनौती प्रस्तुत की। भारत में आए इस्लाम के अनुयाई बेहतर तकनीक और युद्धनीति के जानकार थे और इसके बल पर अपना सत्ता विस्तार करते गए। तथापि इस्लाम की शरण लेने वाले भारतवासियों में एक बड़ी संख्या उन लोगों की थी जो सत्ता से जुड़े रहना या उसके निकट रहना चाहते थे अन्य बड़ी संख्या उन लोगों की थी जो गरीबी और जहालत में थे और जिन्हें लगा कि इस्लाम की शरण लेने से उन्हें राहत मिलेगी। जबरन धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बनाए जाने की घटनाएँ अपेक्षाकृत कम हुई हैं और यदि औरंगजेब के उत्तरवर्ती शासनकाल या काश्मीर में जबरन परिवर्तन को छोड़ दिया जाए तो ऐसा प्राय: युद्ध आदि के दौरान या फिर राजनीतिक विरोध होने पर ही होता था। भारतवर्ष के उन मुस्लिम शासकों में से भी जिन्होंने जजिया कर लगाया, अधिकांश ने ब्राह्मणों को इससे मुक्त रखा। यह इस बात का परिचायक है कि उनमें हिन्दू धर्म के लिए कहीं कुछ tolerance था। एक मध्यकालीन मुस्लिम इतिहासकार ने इस्लामी कानून और शासन व्यवस्था के संदर्भ में लिखा है कि भारतवर्ष में मुस्लिम दाल में नमक के बराबर हैं इसलिए उन व्यवस्थाओं को यहाँ लागू करना संभव नहीं है। भारतवर्ष में मुस्लिम जनसंख्या अधिकतम 15 % के आस-पास ही रही। 
         इस प्रकार भारतवर्ष ने अरब से उठी इस्लाम की आँधी को झेल लिया पर इस्लाम को स्थान देने के बाद भी अपने पुराने धर्मों, संप्रदायों को तो बचाए रखा ही, पूरे दक्षिण पूर्व एशिया को भी सुरक्षित रखा। कमलाकान्त त्रिपाठी जी की इस बात से सहमत हूँ कि अँगरेजों के आगमन के समय मराठा शक्ति मुगलों सहित अन्य सभी स्थानीय शक्तियों पर भारी थी। पर अपने आगमन के साथ ब्रिटिश ने उनका भी भाग्य निर्धारण कर दिया । इतिहास हमेशा if एवं but के लिए स्थान छोड़ देता है।
        जो कुछ भी हो इतिहास का वह युग बीत चुका है और भारतवर्ष की यदि उन्नति करनी है तो हम सबको मिल- जुल कर रहना पड़ेगा। जख्मों को बार-बार कुरेदना,याद करते रहना और यह भाव रखना कि कोई उन्हें सहलाए हीनभावना का परिचायक मात्र है और इस प्रकार की हीनभावना का हमें राष्ट्रहित में परित्याग करना चाहिए। इतिहास विषयक चर्चा- परिचर्चा और संवाद में कोई हर्ज नहीं है पर यह हमारी जानकारी,कुछ सीखने और बेहतरी के लिए होना चाहिए न कि वह हमारे ऊपर इतना हावी हो जाए कि हमारे वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करने लगे।

Saturday, 14 November 2015

क्या इतिहास हमारे लिए वर्तमान की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है ?

क्या इतिहास हमारे लिए वर्तमान की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है ?
          कर्नाटक में टीपू सुल्तान को लेकर संग्राम छिड़ा हुआ है। इसके कारण तीन लोग कालकवलित हो चुके हैं और साम्प्रदायिक संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई है।
          एक वर्ग का कहना है वह महान देशभक्त और योद्धा था। दूसरे वर्ग का कहना है कि वह निरंकुश साम्प्रदायिक अत्याचारी शासक था।
          दो सौ वर्ष पूर्वकाल के इस राजा ने उस समय क्या किया था , वह अचानक आज हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण हो गया है कि उसके पीछे हम आज आपसी सद्भाव को नष्ट करने पर आमादा हैं। हर व्यक्ति में गुण- अवगुण होते हैं। शायद टीपू के साथ भी ऐसा रहा होगा। किसी के भी अवगुण अनुकरणीय नहीं हो सकते। पर इससे उसके गुण उपेक्षणीय नहीं हो जाते। मेरी यह चेष्टा होती है कि मेरे अधीनस्थ या साथ जो भी लोग काम करते हैं ,मैं उनके गुण और अवगुण दोनों ही समझूँ। फिर मेरा यह प्रयास रहता है कि उनके अवगुण कार्य- कलाप को कम से कम प्रभावित करें तथा उनके गुणों का अधिक से अधिक लाभ उठाया जाए। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब एक के बाद एक भारतीय रियासतें अँगरेजों के आगे दम तोड़ रही थीं, टीपू सुल्तान को इस बात का श्रेय है कि उसने उनसे बीस वर्षों तक लोहा लिया । उसकी बहादुरी को उसके विरोधी भी स्वीकार करते थे।
          टीपू के समय न तो धर्मनिरपेक्षता के नारे लगते थे और न ही मानवाधिकारों की बात करने वाली संस्थाएँ थीं। भारतीय इतिहास के मध्य युग में मुगल शासकों का युग अपेक्षाकृत उदारता का समझा जाता है । पर औरंगजेब एवं कुछ अन्य छुटभैये मुगल शासकों के अलावा जहाँगीर और शाहजहाँ के समय में भी छिटपुट घटनाएँ हुईं जिन्हें हिन्दुओं के ऊपर अत्याचार की श्रेणी में रखा जा सकता है। पर पहले तो यह घटनाएँ छिटपुट थीं, दूसरे कई बार ऐसी घटनाओं के पीछे प्रजा का विद्रोही हो जाना या ऐसे राजा का अधीन होना जो मुगल सत्ता को चुनौती दे रहा हो, जैसे राजनीतिक कारण होते थे। पुनश्च इस्लाम राज्याश्रित धर्म था ही, हिन्दू धर्म का उस युग में यह दर्जा नहीं था।शायद यही कारण है कि इतिहास का आकलन करते समय जहाँगीर और शाहजहाँ को औरंगजेब की श्रेणी में नहीं रखा जाता। मेरे अपने विचार से टीपू सुल्तान ने जहाँ भी हिन्दुओं का दमन किया- नायरों का या फिर कूर्गों का तो उसके पीछे धार्मिक से अधिक राजनीतिक कारण थे। यह जरूर है कि इस दमन के लिए अपनाए गए तरीकों को सभ्य या न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। पर सवाल यह है कि क्या मात्र इन घटनाओं के आधार पर टीपू का मूल्यांकन किया जाना उचित है। इतिहास जब भी किसी का मूल्यांकन करता है तो निरपेक्ष रूप से करता है, हिन्दू या मुस्लिम का चश्मा चढ़ाकर नहीं।
          यदि हम दो सौ,चार सौ, हजार और दो हजार साल पुराने झगड़े लेकर बैठने लगेंगे तो शायद इस देश में कोई शांति से बैठ नहीं पाएगा। फिर तो सबसे पहले लोगों को प्रधानमंत्री मोदी जी के इंग्लैंड जाने का विरोध करना चाहिए था क्योंकि अँगरेजों से हमें इतिहास पर आधारित अनेक शिकायतें हैं, फिर अब उनसे दोस्ती क्यों। दलितों को ब्राह्मणों और क्षत्रियों पर पिल पडना चाहिए। वेदों में जिन्हें धृतवर्ण:,अनासः,मृगयु कहा गया है उन्हें ऐसा कहने वाले के वंशजों के खिलाफ मोर्चा खोल देना चाहिए। वस्तुत: शास्त्रों में अनेक जातियों और समूहों के लिए ऐसी बातें कही गई हैं जो उनके लिए शिकायत का कारण हो सकती हैं।इनमें आज की कुछ प्रतिष्ठित जातियाँ भी हैं। फिर महिलाएँ पुरुषों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दें। उनके पास इतिहासगत आधार पर ऐसा करने के लिए अनेक कारण हैं। कल मेरे किसी पूर्वज ने यदि कुछ किया था जो आज किसी को नागवार गुजरता है क्या आज उसका दंड मुझे मिलना चाहिए इसके बावजूद कि मैं उसका समर्थन नहीं करता?
         हमें अपना वर्तमान सुधार कर अपना भविष्य सँवारना चाहिए या भूतकाल में जीते रहकर अपना वर्तमान बिगाड़ना और भविष्य चौपट करना चाहिए, यह विचार करने का विषय है। कल मैंने किसी की टिप्पणी पढ़ी कि बच्चे विज्ञान पढ़ना चाहते हैं पर हम उन्हें इतिहास पढ़ाना चाहते हैं। वस्तुत: उपर्युक्त वाक्य का अंतिम हिस्सा होना चाहिए कि हम उन्हें इतिहास के आधार पर आपस में भिड़ाना चाहते हैं। आज वेंकैया नायडू जी का कथन पढ़ा- Tipu row uncalled for. यदि किसी को टीपू की जयंती मनाया जाना पसंद नहीं है तो वह विरोध वैचारिक और चर्चा गत आधार पर होना चाहिए न कि इसे एक नए सांप्रदायिक संघर्ष का रूप दिया जाना चाहिए। जैसाकि प्रधानमंत्री जी कहते हैं हमारी लड़ाई आपस में नहीं गरीबी के खिलाफ है, विकास के लिए है ; फिर क्यों हम बार-बार आपस में लड़ने के लिए तत्पर हो जाते हैं और क्यों नहीं सत्तारूढ़ दलों समेत समस्त राजनीतिक दल इसके खिलाफ एक स्वर में बोलते हैं। क्यों वे भी एक बाँटने वाली सीमारेखा के इधर या उधर खड़े दिखाई देते हैं - Just to score political points?

Sunday, 8 November 2015

Warning bell for P M Modi (A discussion)

        Here I'm placing an online discussion with my friend Raghuvansh Mani ji regarding PM Modi. 

 Vidyadhar Mishra (Friend of my friend Raghuvansh Mani)-
          Modi has been PM for only one year. Those before him never saw the problems. Imagine, Secondary schools in UP never had toilets for girls and this was taken as normal by the great seculars of India. Now that the fanatic Hindu has become PM, he has addressed the problem and he is addressing many more issues to make India a clean and safe place for the poor. Many forward castes cannot digest the fact that an OBC has become PM and is discharging his responsibilities so well that put all his predecessors in shame.

Raguvansh Mani (My friend, leftist by thoughts )-
          He is not that great, He is simply talking and talking. There is hardly any change in the prospects here. It is irrelevant to compare him with Nehru, Indira or even Rajiv. they brought sea change in the history of this country.

Myself-
          I accept Raguvanshji that Nehruji and Indira were Great despite of all their shortcomings. But I fail to understand how Rajiv Gandhi joins the category of Greats with his faltering on Shahbano case by submitting to fundamentalists, then repeating the same by allowing shilanyas at Ramjaanmbhoomi.The only thing that is often repeated by the Congress in his favour is that he introduced computers to India. Computers are prevalent in the whole world now and any way they would have been introduced to India.Rajiv Gandhi is primarily responsible for rise of fundamentalism in India as he gave long rope to such elements.He was a mediocre person thrust upon the nation by Indira Gandhi and Congress Party. Nehru had eighteen years behind him and Indira fifteen years as PM for all their Greatness. It is true that although Modi has only one and half years as PM behind him,he is losing time very fast and even the good efforts by him are at the risk of going to dustbin due to rogue elements of his party.He has to act fast if he wants to be remembered as PM of India by future generations.

Raguvansh Mani-
          Yes. Rajiv Gandhi failed on certain issues that you mentioned but his achievements are better than Modi, the talkative. Remember his Operation Blackboard and New Education Policy along with the Panchayati Raj and Empowerment of Women. There may be some disagreement on those issues but he implemented them sincerely. We should not forget that the computer matter could not be introduced in the time of Indira Gandhi, but only during the regime of Rajiv Gandhi. At least he exhibited the will power to do so. Modi has yet to start his machine.

Myself-
         Implementation of a scheme is different from standing for principles.It is standing for principles and even being ready to make sacrifices for, that in my view makes a difference between mortals and everlasting Greats. On that count Rajiv Gandhi who had come to power with immense goodwill of people failed miserably. He capitulated before fundamentalists and ultimately lost power.
         Ironically here I find an analogy with Narendra Modi.Modi also came to power with immense goodwill and hope of people who believed he was a doer of things.Now if he doesn't act decisively against fundamentalists of his party and tightens noose around them , he is also on the verge of losing his credibility with the people amid combined onslaught of opposition and leftists forces. On this score, his action in favour of pluralistic culture of the country or disregard and inaction for the same otherwise,will decide whether he has any shred of Greatness in him or merely a talker. I don't think he can wait as the moment has arrived. I had some expectations on this count as he had reined in the the VHP and some other Sangh affiliated Organisations in the later years of his reign in Gujrat but so far it has not happened during his present stint as PM. Now he has the virtual risk of losing the plot. So far as implementation of schemes is concerned Modi can also say that now India's GDP has surpassed that of China and India has emerged as biggest investment destination of the world. He can count many other schemes, but I don't think that can place him in the category of Greats if he fails on the front of unity,integrity and plurality of the country and allows his partymen or affiliates to have a field day for attacking these core values of the nation.

Raguvansh Mani-
          The point is that the previous PMs had fared better than the present PM. Implementation of programmes is more Important than keep on talking. So, this PM wil have to prove himself by his work and not by his talks. I think it was the right wing that produced the communal politics in India. It is good to stand by principles, but wrong to stand by the principles that create disturbances in the society. Manish ji (I've not quoted Manishji's comment here which Raghuvanshji is reacting to) it is strange to find you saying things like Indira played some role in the increase of population. She was the first PM to make an attempt to put a check on population. You should not forget that one of the reasons of her fall after the Emergency was the Nasbandi karyakram. After her no PM has tried to put a check on this issue. You are young enough to know the actual situation when operation Blue Star was ordered. The case of Sikh killings was not organised. it took place after the assasination of Mr Gandhi. Many RSS leaders were emotional enough to declare the bycott of Sikhs those days. Mr. Adwani told Indira to do something after the assasination of Lalit Makan. Now people are so political that they say anything to get their political aims. No doubt India was defeated in the Indo-China war. But the Indian army was not prepared for that attack. Nehru was certainly not a great leader to lead a war. But he was a great leader of peace. There cannot be any comparison between him and this PM of yours. Fundamentalism was fired on the mistakes of Rajiv by Adwani and his RathYatra. But no BJP propagandist will talk of the communal frenzy created in those days. Well,they are always selective. You should see the negative and positive aspects both at a time. Our past leaders had their drawbacks, but they had great qualities too, and they performed very well. Modi has yet to show his ability. But for many he is no less than God.
          Sanjay ji , I agree that the political principles are very important. Nerendra Modi is a flower bloomed on the stem of RSS. I don't think he will act aginst these institutions. Let us see and hope for better.

My finishing comment-
        As I've said above in my comment, the moment for Modi to act and prove that along with the unity and integrity of India he is committed towards preserving its plural culture and ethos also, has arrived. Mere telling that so and so have been reprimanded won't do. It feels like a farce when the so-called reprimanded persons again speak in the same voice after a few days only. P M should be seen acting decisively. Otherwise he is on the verge of losing the plot as shown now by the result of Bihar elections.

Monday, 26 October 2015

~ गजल ~  (गीता की वतन वापसी पर)


~गजल  (गीता की वतन वापसी पर ) ~

बिछड़ी दुख्तर को फिर से घर मिले
जलावतन को उसका वतन मिले ।।

इस नीले अंबर की छत के तले 
गर चाँद ढले तो सूरज निकले ।।

नफरत की धूप से जो धरती जले
तन-मन पर कोई चंदन आन मले ।।

कुछ इधर बदले कुछ उधर बदले 
चलो फिर से मुहब्बत की बात चले ।।

इंसानियत का रुतबा सबसे पहले 
सारे मजहब इसी की छाँव पले ।।

लोगों के दिलों में गरमाहट फैले
मुल्की रिश्तों पे जमी बर्फ पिघले ।।

चलो कहीं  तो कोई शजर हिले
यहाँ कुछ फूल गिरें कुछ हवा चले ।।

हो अमावस  की काली रात भले
'संजय' चाँद-सितारों की भी बात चले ।।
           - संजय त्रिपाठी 



Wednesday, 21 October 2015

~ मुख पर कालिख पोतने के खेल की महत्ता (व्यंग्य)~          

~ मुख पर कालिख पोतने के खेल की महत्ता (व्यंग्य)~
          मुख पर कालिख पोतने का खेल छूत की बीमारी की तरह मुंबई से दिल्ली पहुँच गया वैसे ही जैसे डेंगू महामारी के रूप में पहले दिल्ली में फैला फिर मुंबई पहुँच गया । मुंबई किसी का अहसान अपने सर पर नहीं रखती तुरंत अहसान चुका कर हिसाब बराबर करती है। दिल्ली से गिफ्ट में डेंगू मिला था सो मुंबई ने उसे बदले में कालिख पोतो खेल का गिफ्ट दे दिया।
        लोकसभा चुनावों के कुछ पहले जूता फेंक और फिर पर थप्पड मार खेलों का दौर चला था। जूता फेंक खेल का प्रेरणास्रोत ईराक का पत्रकार था जिसने बुश पर जूता फेंका था। विदेशी प्रेरणास्रोत वाले इस खेल में हमारे खिलाड़ी निपुण नहीं थे । इसलिए इसका लक्ष्य जो भी होते थे, वे दाएं- बाएं या ऊपर- नीचे झटके से इधर-उधर हो, झुक कर बच लेते थे। यही कारण था कि यह खेल लोकप्रिय नहीं बन सका और जल्दी ही अवसान को प्राप्त हो गया।
         थप्पडमार खेल, जूता फेंक खेल की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय हुआ। गाहे-बगाहे इसका नमूना अभी भी देखने को मिल जाता है। लोकसभा चुनावों के पहले इसकी लोकप्रियता का आलम ये था कि जब एक केन्द्रीय मंत्री को किसी ने थप्पड मारा तो अन्ना हजारे सदृश पुण्यात्मा कह बैठा- बस एक ही थप्पड! पर इस खेल के साथ एक समस्या यह है कि कई बार लक्ष्य के साथी, खिलाड़ी के सफल या असफल प्रयास के बाद उस पर आफत बन कर बरस पड़ते हैं और इस बरसात से खिलाड़ी के अधमरा हो जाने के बाद पुलिस की गिरफ्तारी का छाता ही बचा पाता है। दूसरे कई बार जो लक्ष्य होता है वह खिलाड़ी के घर उसकी कुशल-क्षेम पूछने पहुँच जाता है और इस प्रकार मसीहा की ख्याति प्राप्त कर लेता है या फिर उस श्रेणी में आने का प्रयास करता है। इससे खिलाड़ी की सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है और उसका असर उल्टा हो जाता हैं। 
          खैर कुछ भी हो, यह तो मानना पड़ेगा कि जूता फेंक और थप्पड मार दोनों ही खेलों में हिंसा का समावेश है। इसलिए इन विधाओं में हाथ आजमाने वाले खिलाड़ी नए वैकल्पिक खेल की तलाश में थे और यह मिला है कालिख पोतने के खेल के रूप में।हमारे देश में राजनीति में परम्परा बन गई है कि जिन सिद्धांतों की दुहाई दी जाए, उनका उल्टा किया जाए। सो ऐसे राजनीतिक दल और संगठन जिन्हें तोड-फोड़ और हिंसा से कोई परहेज नहीं है, कह रहे हैं कि कालिख पोतने के नायाब खेल को उन्होंने इसलिए शुरू किया है कि यह अहिंसक है। बिना किसी प्रकार की हिंसा का प्रयोग किए इसके द्वारा विरोध प्रकट किया जाता है। उनका मानना है कि यदि गाँधीजी होते तो इस अहिंसक विरोध प्रदर्शन के लिए उनकी सराहना करते। उनका कहना है कि इस शांतिपूर्ण प्रयास के लिए उनके संगठन का नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी प्रस्तावित किया जाना चाहिए। दूसरे इस खेल के प्रतिपादकों का कहना है कि यह बड़ा ही फेयर यानी कि निष्पक्ष खेल है। इसमें कालिख पोतने वाले को तो ख्याति मिलती ही है, जिसके कालिख पोती जाती है वह भी कालिख लगाए-लगाए प्रेस-कांफ्रेंस करता है या स्टेटमेंट देता है और इस प्रकार उसे भी ख्याति मिलती है। इस खेल के समर्थक इसके पक्ष में यह दलील भी देते हैं कि इसकी प्रेरणा उन्हें देश के सर्वाधिक लोकप्रिय त्योहार होली से मिली है। इस तरह इस खेल को अपनाना देश की सांस्कृतिक परंपरा के अनुकूल है। इसलिए भारतीय संस्कृति का अनुसरण करने वाले सभी लोगों को इस खेल से कोई परहेज नहीं करना चाहिए और इसकी सराहना करनी चाहिए। उनका कहना है कि वे इस खेल को ओलिम्पिक खेलों में शामिल करने का प्रस्ताव करेंगे और विभिन्न देशों की सरकारें तथा स्पोर्ट्स एसोसिएशन उन्हें इसके लिए समर्थन प्रदान करें। वे इस खेल को देश में इतना लोकप्रिय बना देना चाहते हैं कि सभी लोग एक-दूसरे के कालिख पोतने के प्रयास में लग जाएं और सदैव लगे रहें। इससे यह लाभ होगा कि देश के सारे लोगों में एकरूपता आएगी और सभी एक ही रंग के दिखेंगे। इस प्रकार सामाजिक भेदभाव को मिटाने में सफलता मिलेगी। इस खेल के एक अन्य पक्षधर ने कहा कि चूँकि कालिख और आई एस आई एस के झंडे का रंग एक ही है इसलिए एक बडा लाभ यह है कि तमाम सारे कालिख पुते लोगों को आई एस आई एस अपना समर्थक समझेगा और भारत पर हमले की बात नहीं सोचेगा । कालिख पोतने के इतने सारे लाभ सुनकर इस खेल के प्रतिपादकों और अनुयाइयों दोनों के प्रति मैंने अपना सर श्रद्धावनत कर दिया हैं। मेरे विचार से कालिख पोतने के खेल में हमारी परंपरागत निपुणता देखते हुए इसे राष्ट्रीय खेल बना देना चाहिए। वर्तमान राष्ट्रीय खेल हाकी में वैसे भी इन दिनों हम हारते ही रहते हैं। जब यह खेल हमारे राष्ट्रीय खेल और साथ ही ओलम्पिक खेल का गौरव प्राप्त कर लेगा तो एक बड़ा लाभ यह होगा कि विदेशों में इस खेल के कोच की भारी माँग होगी और यह कार्य हमारे ही देश के लोग करेंगे। फिर विभिन्न देशों में कालिख पोतने के लीग टूर्नामेंट शुरू होंगे जिसमें हमारे देश के लोगों की निपुणता देखते हुए उन्हें खिलाड़ी के रूप में खेलने का मौका मिलेगी। इस प्रकार हमारे देश के तमाम लोगों के लिए रोजगार का सृजन होगा।
         एक खबर यह भी है कि पूर्वी भारत के एक राज्य में पुनः ब्रिटिश भारत की पुरानी राजधानी को देश की राजधानी बनाने की माँग उठाई जाने वाली है। इस माँग के समर्थकों का कहना है कि देश की राजधानी को छुआछूत के रोगों से विरत रहना चाहिए पर हाल में छुआछूत के रोग फैलने से पता चलता है कि दिल्ली और मुंबई इस पैमाने पर खरे नहीं उतरते। ब्रिटिशकालीन भारत की पुरानी राजधानी ने कालिख पोतने के खेल से विरक्ति दिखाई है और इस प्रकार उक्त पैमाने पर यह नगर खरा उतरता है। इसलिए माँग की जाएगी कि अंग्रेजों द्वारा स्थापित ब्रिटिशकालीन भारत की पहली राजधानी को पुन: देश की राजधानी के रूप में उसका गौरव वापस किया जाए। इस पूर्वी राज्य के पड़ोसी देश के साथ पोरस बॉर्डर के कारण पड़ोसी देश के रास्ते अवैध रूप से भारत आने -जाने वालों को काफी सुविधा रहती है । इसलिए भारत से अवैध प्रेम की चाह में भारत आने-जाने की इच्छा रखने वाले लोग भी इस माँग के पक्षधर हैं क्योंकि अपने कारनामों को अंजाम देने के लिए दिल्ली तक का सफर करने में इन्हें अनेक खतरे उठाने पड़ते हैं। मुहब्बत के सफर को आग का दरिया बनाकर और उसमें डूबकर जाने से फिर इन्हें छुट्टी मिलेगी और इनका सफर आसान हो जाएगा। जब चाहा बॉर्डर के इधर राजधानी में और जब चाहा उधर राजधानी में । फिर अवैध मुहब्बत का ये कारोबार निर्बाध गति से चल सकेगा।-संजय त्रिपाठी

Tuesday, 20 October 2015

For Communal amity P M Modi should speak

         When P M Narendra Modi spoke on 14th of October on the Dadri/ Bisahda incidence, more than after a fortnight and said such incidents including cancellation of Ghulam Ali's concert were undesirable, saddening and unfortunate, his critics condemned it as too late and soft. P M said B J P didn't support such happenings. However he said Central Govt. had nothing to do with the incidents and by levelling accusations at his door the opposition was trying to polarize the polity. 
          While PM's speaking on the issue at last is relieving, I find objections of his detractors valid when they say P M's reaction is weak, mild and late. PM is also not off the mark when he says that Dadri like incidences are being used to corner him. The vicious debate that is going around cow and beef makes me feel as if there are no seculars in the country ,there are only pro Hindu or pro Muslim people. Some people are very insistent upon stressing that eating beef is not a crime . It is implicit in such an argument that whosoever wants, can take beef. They don't care how much explosive this issue may become(actually it has already become) and endanger the social harmony. My better half has done research work on communal politics during British Period and her research work shows that cow and beef issue have been a major cause and source of many Hindu-Muslim riots during British rule. People should learn from Mughal rulers who were well aware of the issue and most of them had banned cow slaughter to keep social harmony intact and avoid communal rift in the society.It is sad that today's politicians and even so called intellectuals who have been advocating beef, can't understand this fact. There are people and always will be who insist that cow is mother like for them, it is a matter of religion and they won't hesitate to go any extent to save her.
          P M is under continuous scrutiny due to 2002 Gujarat riots which happened during his Chief Ministership of the Gujarat state. Since then he has been painted as a vllain and demonized by his opponents. They are hell bent upon keeping him on tenterhooks.They are not expected to allow a let up in their efforts. P M Modi's any faltering or slackness is an opportunity for them.
         In the above context I would like to make a reference regarding Rajiv Gandhi who came to power with immense goodwill of the people. But he faltered while finding a solution for the Shah banoo case. He overrode court judgement and passed a legislation to undo steps taken by the court to mitigate miseries of divorced are separated Muslim women. Since then the downward slide for him began.
          So it is P M Modi who has to take precaution and not give anyone an opportunity to cast aspersions on his performance as P M of this country. He should remember words of former P M A. B. Bajpayi who advised him to follow Rajdharma. As the P M himself has said so many times, maintaining sanctity of the Constitution of India is most important task for him. When any incidence takes place which attacks the very tenets or spirit of this constitution, he should be vocal in condemning it and announcing as well as initiating tough measures to control the damage immediately. He should not leave this job to his deputies or even President. People want to listen him as he is virtual head of the executive and President is only a figurehead. It will be reassuring for the people and deprive his adversaries of an opportunity to strike upon him.

Monday, 19 October 2015

पुरस्कार वापसी का लाइव परफारमेंस!

          मुनव्वर राणा साहब ने पुरस्कार वापसी का क्रम शुरू होने के बाद अपने घोषणा की थी कि वे पुरस्कार वापस नहीं करेंगे । फिर तीन-चार दिन में ऐसा क्या घट गया कि उन्हें इसका लाइव परफारमेंस देना पड़ गया। मुनव्वर साहब ने कहा कि उन्हें डर है कि कोई रात में घर में घुस कर उन्हें मार डालेगा और उन्हें कोई बचाने वाला नहीं हैं। वे यह किसके लिए कह रहे थे। कौन लोग हैं यह।
          फिर जो डर जाए वह साहित्यकार कैसा? सोलझेनित्सिन ने साइबेरियाई गुलाग में डाले जाने की कोई परवाह नहीं की और बेहतरीन साहित्य सृजित किया। फिर आपको किसने रोका है? साहित्यकारों के द्वारा सरकार की आलोचना किया जाना, पुरस्कार वापस किया जाना देश में लोकतंत्र की बहाली की गवाही देता है । 
          पर बात यह कही जा रही है कि देश में फासीवाद आ गया है। अगर ऐसा है तो जनता को जगाने से और फासीवाद के विरुद्ध आंदोलन खड़ा करने से आपको किसने रोका है? राजनीतिज्ञों के लिए अपना हित पहले है, वे वही बात करेंगे भले ही किसी भी पार्टी के हों। पर आप साहित्यकार हैं,उनकी बात से व्यथित हुए बिना, अपनी लेखनी को विराम दिए बिना,तूफानों में भी दिया जलाए रखकर विरोध कीजिए, बिना किसी राजनीति का हिस्सा बने । जब आप राजनीति का हिस्सा बनते हैं तो विरोध बेमानी हो जाता है। 
          आज मुनव्वर राना साहब को जब साहित्य अकादमी द्वारा दिये गये स्मृति चिह्न को टी वी के ए बी पी चैनल वालों के समक्ष वापस रखते देखा जिसमें रुपहले अक्षरों में साहित्य लिखा हुआ था तो लगा कि जैसे कोई साहित्य पर तमाचा मार रहा है। साहित्य अकादमी में मात्र पाँच सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत होते हैं । शेष 90 से भी अधिक सदस्य साहित्यकारों के अपने होते हैं। फिर भी यदि वे साहित्य अकादमी से मनोवांछित परिणाम हासिल नहीं कर सकते हैं तो इन साहित्यकारों का खुदा ही मालिक है।
           यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि कोई मुझे दक्षिणपंथी विचारधारा का न समझ ले । मैं समाजवादी विचारों का पक्षधर हूँ ( इन दिनों प्रचलन में आ गए परिवारवादी समाजवाद का नहीं) और यह बात पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि भारतवर्ष के सामने तरक्की के रास्ते पर चलने के लिए बहुधर्मी एकता और सद्भाव के सिवा कोई रास्ता नहीं है और इसे सुनिश्चित करने में देश के सबसे बड़े दो धार्मिक समूहों हिन्दू और मुस्लिम दोनों की जिम्मेदारी अन्य मतावलंबियों से कहीं अधिक है। पर दोनों ही समुदायों में ऐसे लोग हैं जो सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुँचाने पर आमादा हैं। जरूरत इस बात की है कि जहाँ भी आग लगाई जाती है उसे हवा देने के बजाय बुझाने का प्रयास किया जाए। पर आग लगाने और हवा देने वाले ही ज्यादा दिखाई दे रहे हैं, बुझाने वाले नहीं । आज फार्रूख अब्दुल्ला साहब ने तो लोगों को अब्दुल रशीद के मुँह पर कालिख पोते जाने के संदर्भ में देश के टुकड़े देखने की चेतावनी दे डाली है। पर उनके द्वारा गोमांस पार्टी दिए जाने वे कुछ नहीं बोले थे। रशीद साहब कालिख पुता चेहरा दिखाकर कह रहे हैं कि दुनिया देख ले कि भारत काश्मीरियों के साथ कैसा व्यवहार करता हैं। सवाल यह है कि कुछ गुंडे - मवाली लोगों के व्यवहार को क्या पूरे भारत के व्यवहार की संज्ञा दी जा सकती है? यह व्यक्ति गोमांस पार्टी आयोजित करने के बाद अब गाँधीजी का नाम उद्धृत कर रहा है।
          कई वर्ष पूर्व एक मुख्यमंत्री के शासनकाल में मुस्लिम गाँवों में कत्लेआम हुआ। कुछ वर्षों पहले उस मुख्यमंत्री के परिवार के एक सदस्य ने मेरी उपस्थिति में कहा - बाबूजी ने कहा कि सालों को काट कर फेंक दो । मैं यह सुन कर अवाक रह गया। वह मुख्यमंत्री एक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टी के थे । मेरे कई साम्यवादी मित्र हैं और इनमें से कई हैं जिन्हें थोड़ा सा उकसाइए तो एक धर्म विशेष के खिलाफ उनकी असली भावनाएं सामने आ जाती हैं। कहने के लिए लोग तरह- तरह के वामपंथी साहित्यकार संगठन बनाकर उसके पदाधिकारी और सदस्य बन कर घूमते हैं। पर एक बार ये आपको अपना करीबी समझने लगें फिर देखिए मंच पर दिए जाने वाले अपने भाषणों से अलग हट कर धर्म विशेष और कुछ जातियों के बारे में कैसे विचार व्यक्त करते हैं। 
          पहले जब धर्मनिरपेक्षता विरोधी और धर्मांधतापूर्ण घटनाएँ घट रही थीं तब इन साहित्यकारों का विवेक नहीं जागा। अब जब एक अलग विचारधारा की सरकार है तब साहित्यिक पुरस्कार वापस किए जा रहे हैं। यह इस आशंका को बल देता है कि साहित्यिक पुरस्कार वापस करने के पीछे राजनीतिक कारण हैं। अन्यथा क्या पुरस्कार वापस करने वालों को कलर ब्लाइंडनेस है जो उन्हें पहले घट रही धर्मनिरपेक्षता विरोधी घटनाएँ नहीं दिखाई देती थीं। स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले राजनीतिज्ञों एवं उसका झंडा उठाने वाले समाज के अन्य वर्गों के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार के कारण ही आज भाजपा सत्ता में है। यह दोगलापन है जिसके कारण साहित्यकार अप्रभावी हो रहे हैं। 
          ए बी पी टी वी चैनल वालों ने जब साहित्यकारों के साथ राकेश सिन्हा, संबित पात्रा और अतुल अनजान को बैठा दिया तभी साहित्यकारों को  समझ लेना चाहिए था कि बहस अंततोगत्वा साहित्यिक नहीं बल्कि राजनीतिक होने जा रही है। ए बी पी चैनल वालों को तो एक स्कूप मिल गया जिसे वे एक-दो दिनों तक भुनाते रहेंगे। 

Tuesday, 13 October 2015

चंद सिरफिरे समाज को बाँट नहीं सकते!

          मजहबी नफरत की बुनियाद पर पले लोग अच्छे और बुरे का, स्याह और सफेद का भेद नहीं कर करते। जो इनके प्रभाव में आ जाते हैं वे भी नहीं कर सकते। यह नफरत तनिक सी देर में हवा के एक बहाव से बवंडर और फिर प्रचंड तूफान में परिवर्तित हो जाता है और फिर बिना इस बात की परवाह किए कि कौन सा पेड़ बबूल का है और कौन सा आम का सबको धराशायी करता जाता है। बबूल का पेड़ जहाँ गिरा वहीं लोगों को शिकार बनाकर उन्हें लहूलुहान करता है ,वहीं आम के पेड़ों से गिरे सभी आम नफरत के व्यापारियों की टोकरी में गिरते हैं और यही उनका कैपिटल गेन है जिस पर उन्हें कोई टैक्स नहीं देना होता।
          दादरी के बिसहडा गाँव मे भी यही हुआ। 8 अक्टूबर को देश ने वायुसेना दिवस मनाया । पर इसके चंद दिनों पहले नफरत के तूफान में एक वायुसैनिक के पिता की जान चली गई और वायुसेना दिवस के दिन वह मजहबी तूफान की चपेट में आ गए अपने भाई की शुश्रूषा में लगा हुआ था। मजहबी नफरत के व्यापारी आम की फसल की बोहनी में लगे हुए हैं क्योंकि गाय मुख्य चर्चा में आ गई है। कोई सीना ठोंककर अपने को बीफ ईटर बता रहा है, कोई स्वयं को इस मामले में वशिष्ठ की परंपरा का अनुगामी बता रहा है। कोई कह रहा है कि कई हिन्दू बीफ खाते हैं तो कोई ऋषियों-मुनियों को बीफ खाने वाला बता रहा है तो कोई गौहत्या की बात कहकर ऐसा करने वालों को चेतावनी दे रहा है और सरकार से गौहत्या बंद कराने की माँग कर रहा है। इस स्थिति में सारे मजहबियों- क्या हिन्दू और क्या मुसलमान- की पौ-बारह है। राजनीतिक रोटियों को सेंकने का यही सबसे अच्छा मौका हैं सो सेंकी जा रही हैं।
          यह तो भला हो बिसहडा गाँव वालों का जो उन्हें अक्ल आ गई और उन्होंने दिनांक 11 अक्टूबर के दिन हकीम की दो बेटियों का गाँव में विवाह आयोजित कर सिद्ध कर दिया कि हिन्दू और मुसलमान अब भी साथ-साथ हैं और आगे भी रहेंगे। चंद सिरफिरे लोग समाज को कुछ समय के लिए उकसा सकते हैं पर बाँट नही सकते।

अकादमी पुरस्कार वापस करना कितना प्रासंगिक ?

                                      अकादमी पुरस्कार वापस करना कितना प्रासंगिक ?
          नयनतारा सहगल के पुरस्कार वापस करने के बाद से साहित्य अकादमी पुरस्कारों को वापस करने की होड़ लगी हुई है और अब तक 25 साहित्यकार पुरस्कार वापस कर चुके हैं। कल मैंने अकादमी पुरस्कार वापस करने के संबन्ध में मुनव्वर राणा और असगर वजाहत साहब के विचार पढ़े थे कि वे ऐसा करने वालों की इज्जत करते हुए भी इस उपाय के प्रभावी होने में विश्वास नहीं करते हैं । अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी साहित्यकार मृदुला गर्ग ने बड़ा मौजूँ सवाल उठाया है कि पुरस्कार वापस कर या अकादमी से इस्तीफा देकर साहित्यकारगण क्या अकादमी की स्वायत्ता के लिए खतरा नहीं पैदा कर रहे हैं। उनका कहना है कि सभी राज्यों में फैली हिंसक असहिष्णुता का और इस सबके प्रति केन्द्र और राज्य सरकारों की उपेक्षापूर्ण दृष्टि का वे पुरजोर विरोध करती हैं। जो भी लोग पुरस्कार लौटा रहे हैं या त्यागपत्र दे रहे हैं उनके साथ वे सहानुभूति रखती हैं। उनका कहना है कि स्वनियुक्त नैतिक पहरेदारों द्वारा एकांगी सांस्कृतिक मूल्य व्यवस्था थोपने का विरोध और असहिष्णुता से असहमति लेखन का अंतर्निहित तत्व है।

         परंतु त्यागपत्र देकर और पुरस्कार वापस कर विरोध का जो तरीका अपनाया जा रहा है वह ऐसा दर्शाता है जैसे कि साहित्य अकादमी कोई स्वायत्त संस्था न होकर सरकार की ही एक शाखा है। मृदुला गर्ग का कहना है कि साहित्यकारों द्वारा ऐसा किया जाना सरकार को साहित्य अकादमी में अपने प्रतिनिधियों को नियुक्त करने का अवसर प्रदान कर सकता है। संस्कृति मंत्री कह ही चुके हैं कि अकादमी में विरोध पर उनकी नजर है। नि:संदेह साहित्य अकादमी को कालबुर्जी की हत्या की निंदा करनी चाहिए थी और शोक सभा आयोजित करनी चाहिए थी। केवल साहित्य अकादमी के ही पुरस्कार क्यों लौटाए जा रहे हैं, अन्य सरकारों द्वारा दिए गए अन्य पुरस्कार भी लौटाए जाने चाहिए थे (एक समाचार के अनुसार नृत्यांगना माया राव ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार वापस लौटाने की घोषणा की है)।

          मृदुला गर्ग आशंका व्यक्त करती हैं कि सरकार के स्थान पर साहित्यकारों की अपनी विधिवत निर्वाचित स्वायत्त संस्था को प्रहार का केन्द्र बनाकर उसे कमजोर किया जा रहा है। साहित्यकार स्वयं आपस में झगड़ कर सरकार के लिए स्वायत्त संस्था को अधिकृत कर लेने का रास्ता साफ कर रहे हैं।

         मेरा अपना मत है कि जब विभिन्न लेखकों/रचनाकारों को पुरस्कार विभिन्न सरकारों के शासनकाल में प्रदान किए गए हैं तो उन्हें आज वापस करना जब एक अलग विचारधारा वाली सरकार है जिसने यह पुरस्कार नहीं प्रदान किए थे , उनकी वापसी के औचित्य को सिद्ध नहीं करता। इसी आधार पर आज पुरस्कार वापस करने वाले अपनी तुलना रवीन्द्रनाथ टैगोर से नहीं कर सकते हैं। कविगुरु ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई नाइटहुड की उपाधि ब्रिटिश सरकार को ही लौटाई थी। इंद्रजीत हाजरा का कहना है कि इस प्रकार का विरोध अवांछित तौर पर भारत के विधिक अस्तित्व पर सवाल उठाता है और मैं उनसे सहमत हूँ। देश में दक्षिणपंथी तत्वों के अत्युत्साह के कारण कहीं- कहीं अतिरंजित स्थिति देखने में आ रही है उसके बावजूद भारत " बनाना रिपब्लिक" नहीं बन गया है। जहाँ भी अति की स्थिति है उसको नियंत्रित करने हेतु सरकार पर दबाव बनाने के और भी तरीके हैं। परंतु पुरस्कृत साहित्यकार जो रास्ता अपना रहे हैं वह विश्व में भारत को सीरिया,इराक और अफगानिस्तान की श्रेणी में लाकर खड़ा करता है जहाँ फिलहाल आप अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की बात ही नहीं सोच सकते। कम से कम दुनिया को गलत संदेश देने से हमें परहेज करना चाहिए।

          जब इस प्रकार के विरोध प्रदर्शन के पीछे राजनीति होने की बात कही जाती है तो वह निराधार नहीं है। मैलियाना और हाशिमपुरा के नरसंहारों तथा बाबरी मस्जिद के विध्वंस के समय स्थिति कम सांप्रदायिक नहीं थी । तब हमारे पुरस्कृत साहित्यकारों ने यह रास्ता क्यों नहीं अपनाया। सवाल यह भी है कि क्या समस्त पुरस्कार कार्यकर्ताओं द्वारा पुरस्कार लौटा देने के साथ ही विरोध की भी इतिश्री हो जाएगी। त्यागपत्र दे देने और पुरस्कार लौटा देने का निर्णय मुझे "पैसिव" विरोध का लगता है जो सक्रिय या पुख्ता विरोध का तरीका नहीं है और ड्राइंगरूम में बैठकर लिया गया निर्णय प्रतीत होता है जिसका असर सीमित होगा और कुछ दिनों में समाप्त हो जाएगा। विरोध व्यक्त करने के लिए यदि हमारे साहित्यकार अन्य सक्रिय तरीके अपनाते जिनमें नैरंतर्य का समावेश रहता जो समाज को लंबे समय तक अनुप्राणित कर सकता तो वह अधिक कारगर सिद्ध होता।

Wednesday, 7 October 2015

बिसाडा के सरताज से हमें और भी सरताज चाहिए!

       
          दादरी के बिसाडा गाँव में गौकसी की अफवाह के कारण हुई मुहम्मद अखलाक की हत्या के बाद उक्त घटना को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही राजनीति जोरों पर है। पर इस सबके बीच उनके बड़े पुत्र वायुसेना में कारपोरल के रूप में कार्यरत सरताज ने बड़े ही संयम के साथ अपनी बात रखी है जो गौर करने लायक है-
         " हमारी पीड़ा समझने के बजाय राजनीतिज्ञों को अपनी राजनीति की फिक्र है। मेरे पिता की मृत्यु राजनीति का विषय बन गई है। बहुत से राजनीतिज्ञ मेरे घर पर सिर्फ इसलिए आए कि मीडिया में उनका नाम आए।"
          " मेरा परिवार देशभक्त है। इसी कारण मैंने वायुसेना में नौकरी की है। सांप्रदायिक सद्भाव लोकतंत्र का मूल तत्व हैं। हमारा देश सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जाना जाता है। मेरी अपील है कि लोग शांति भंग न करें।"
          " न्याय इस प्रकार का होना चाहिए कि एक उदाहरण बने। लोगों के दिमाग से डर दूर करें। यह घटना इस तरह की अंतिम घटना होनी चाहिए। यद्यपि मैं सीमा पर तैनात नहीं हूँ, मैंने समर्पण के साथ देश के लिए काम किया है। मेरा छोटा भाई दानिश भी सेना में जाने के लिए तैयारी कर रहा था। घटना से एक घंटा पहले मैंने परिवार के साथ बात की थी और सब कुछ सामान्य था। बिना किसी कारण के मेरे पिता को मार दिया गया।........कोई उनकी मदद के लिए नहीं आया"।
          इस देश के एक नागरिक के तौर पर हम तुमसे माफी माँगते हैं सरताज! जिन परिस्थितियों में तुम्हारे पिता का इंतकाल हुआ उसमें तुम्हें किस तरह का सदमा पहुँचा होगा ,हम समझ सकते हैं। तुम्हारे ऐसे और भी सरताजों की इस देश को बहुत जरूरत है।
          दादरी की घटना पर एक तरफ गृह मंत्रालय ने राज्यों को एडवाइजरी जारी करते हुए कहा है कि साम्प्रदायिक घटनाओं को जिनसे देश की धर्मनिरपेक्षता कमजोर पड़ सकती है और जिनके द्वारा धार्मिक भावनाओं को भुनाने का प्रयास किया जाए, तनिक भी बर्दाश्त न किया जाए (मंत्रालय ने दादरी की घटना पर उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी थी जो उसे प्राप्त हो चुकी है)। दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री संजीव बाल्यान का कहना है कि गोमांस की अफवाह के बाद भीड़ के द्वारा अखलाक की हत्या पूर्वनियोजित न होकर तात्कालिक रूप से घटित हुई और एक हादसा है। उनका यह भी कहना है कि यह साम्प्रदायिक घटना नहीं है और इसे साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास न किया जाए। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से गौकसी की घटनाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए कहा हैं। बी जे पी विधायक संगीत सोम का कहना है कि अखलाक की हत्या के मामले में पकड़े गए लोग बेगुनाह हैं और सही हत्यारों को पकड़ा जाए। उन्होंने भी कहा है कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री और राज्यपाल से मिलकर गोकसी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग करेंगे । साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ अपने बयान अलग दे रहे हैं। दिनांक 6/10/2015 की रात्रि की एक खबर यह भी है कि भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने उत्तेजक बयानबाजी करने वाले अपने नेताओं को दादरी मामले से दूर रहने की सलाह दी है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घटना की निन्दा करते हुए कहा है कि समाज के सभी जिम्मेदार तत्वों की जिनमें केन्द्रीय और राज्य सरकार शामिल हैं, यह सुनिश्चित करना जिम्मेदारी है कि इस प्रकार की घटनाएँ न घटित हों।
          इन सबसे अलग उत्तरप्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खान साहब ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को चिट्ठी लिखी है जिसमें गुहार लगाई गई है कि मोदी जी की सरकार आर एस एस और उसके आनुषंगिक संगठनों को परोक्ष सहायता दे रही है ताकि वे अल्पसंख्यक समुदायों को भयग्रस्त कर उनका धर्म परिवर्तन कर दें और भारत 2022-23 तक हिन्दू राष्ट्रीय बन जाए।
          इस विषय पर मेरा अपना मत है कि- 1.यद्यपि केन्द्र सरकार के नं 2 एवं नं 3 यानी कि श्री राजनाथसिंह और श्री अरुण जेटली ने अपना अभिमत दे दिया है तथापि उन्होंने जो बात कही है वह प्रधानमंत्री की तरफ से आनी चाहिए क्योंकि नदी की धारा सदैव पर्वत शिखर से सागर की तरफ बहती हैं। प्रधानमंत्री यदि स्पष्टतः गृह मंत्रालय द्वारा कही गई बात को अपने मुखारबिन्दुओं से व्यक्त करते हैं तो इससे पूरे देश में एक संदेश जाएगा और उनकी अपनी पार्टी के भडकाऊ बयान देने वाले तत्वों पर लगाम लगेगी। यह एक संवेदनशील मसला है और उन्हें इसे अपने मातहतों के सुपुर्द कर निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। एक तरफ गृह मंत्रालय तथा अरुण जेटली के बयान और दूसरी तरफ संजीव बाल्यान और संगीत सोम त़था कुछ अन्य भाजपा नेताओं के बयान इस धारणा को बल देते हैं कि सरकार दो स्वर में बोलती है। फिर भी यह एक शुभ संकेत है कि पी एम ओ ने मामले की रिपोर्ट गृह मंत्रालय से माँगी है।
2. स्थानीय भाजपा नेता संजय राणा (जिनके पुत्र की गिरफ्तारी मामले में हुई है) का कहना है कि उन्होंने रात्रि10.26 पर पुलिस को फोन किया। इसी से कुछ मिनट पहले मुहम्मद अखलाक(जिनकी हत्या की गई) ने गाँव के अपने एक मित्र को फोन कर मदद का आग्रह किया था। उसने भी संजय राणा के फोन के कुछेक मिनट पहले पुलिस को फोन किया था । रात्रि में 10.50 पर पुलिस पहुँच गई। इस बीच मुहम्मद अखलाक को मरणान्तक चोट लग चुकी थी तथा उनका छोटा पुत्र दानिश गंभीर रूप से घायल हो चुका था। संजय राणा का यह भी कहना है कि घटना में कोई बाहर का व्यक्ति नहीं था। सभी गाँव के ही लोग थे ।
          यहाँ यह ज्वलंत प्रश्न यह है कि गाँवों की जो संस्कृति है उसमें सभी एक दूसरे को बिना जाति-धर्म के भेदभाव के चाचा,ताऊ, बेटा,भतीजा के रूप में संबोधित करते और जानते हैं। गाँवों का वातावरण इतना सांप्रदायिक या हिंसक कैसे हो गया है कि लोग नाते-रिश्ते भूल कानून को अपने हाथ में लेने लगे हैं और अपनों में से ही किसी की हत्या करने पर उतारू हो गए। गाँवों के वातावरण को विषाक्त होने और वहाँ के सामाजिक संतुलन के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न होने से कैसे बचाया जाए, इस पर विचार करने की जरूरत है।
          रात गए गाँव के मंदिर से लोगों को एकत्रित करने के लिए उद्घोषणा और रात साढ़े दस बजे भीड़ का मुहम्मद अखलाक के घर की तरफ जाना नियोजित हमले की तरफ इशारा करते हैं । इसके क्या कारण थे और इसके पीछे किसका दिमाग था, इस बात की तहकीकात की जरूरत है।
3. श्री आजम खान दादरी के मसले पर जब संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी लिखते हैं तो एक प्रकार से अपनी ही सरकार जिसमें वे मंत्री हैं, की विफलता को स्वीकार करते हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है। इसलिए कम से कम यह पत्र लिखने के पहले उन्हें समाजवादी सरकार से इस्तीफा दे देना चाहिए था क्योंकि उनका यह कदम बताता है कि उन्हें अपने दल और उसके नेतृत्व तथा स्वयं अपने मुख्यमंत्री पर भी भरोसा नहीं है अन्यथा उनसे बात करने के बजाय वे सीधे संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी क्यों लिखने लगते। दूसरे देश के सबसे बड़े प्रदेश के सत्ताधारी दल के प्रमुख राजनीतिज्ञ के तौर पर उन्हें सीधा यू.एन. जाने के बजाय पहले देश के भीतर अपनी समस्या को उठाना चाहिए था। यू एन जाने का विकल्प यह दर्शाता है कि जैसे इस देश में आजम खाँ के लिए कोई ठौर नहीं रह गया है। यह देश में और बाहर भी एक गलत संदेश देता है। यह दायित्व केन्द्र के साथ- साथ प्रदेश सरकार का भी है कि दादरी जैसी घटनाएँ न हों।
4. सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को इस मसले पर मिल-बैठकर विचार करना चाहिए और इस बारे में एकमत पर पहुँचना चाहिए कि वे गाय नामक निरीह प्राणी के नाम पर राजनीति नहीं करेंगे और न ही किसी के द्वारा इस पर की जाने वाली राजनीति को प्रोत्साहित करेंगे। साथ ही इस प्रकार की सारी स्थितियों को समाप्त करेंगे जो गाय के नाम पर राजनीति को अवसर देती हैं।

बिसाडा के सरताज से हमें और भी सरताज चाहिए!

       
          दादरी के बिसाडा गाँव में गौकसी की अफवाह के कारण हुई मुहम्मद अखलाक की हत्या के बाद उक्त घटना को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही राजनीति जोरों पर है। पर इस सबके बीच उनके बड़े पुत्र वायुसेना में कारपोरल के रूप में कार्यरत सरताज ने बड़े ही संयम के साथ अपनी बात रखी है जो गौर करने लायक है-
         " हमारी पीड़ा समझने के बजाय राजनीतिज्ञों को अपनी राजनीति की फिक्र है। मेरे पिता की मृत्यु राजनीति का विषय बन गई है। बहुत से राजनीतिज्ञ मेरे घर पर सिर्फ इसलिए आए कि मीडिया में उनका नाम आए।"
          " मेरा परिवार देशभक्त है। इसी कारण मैंने वायुसेना में नौकरी की है। सांप्रदायिक सद्भाव लोकतंत्र का मूल तत्व हैं। हमारा देश सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जाना जाता है। मेरी अपील है कि लोग शांति भंग न करें।"
          " न्याय इस प्रकार का होना चाहिए कि एक उदाहरण बने। लोगों के दिमाग से डर दूर करें। यह घटना इस तरह की अंतिम घटना होनी चाहिए। यद्यपि मैं सीमा पर तैनात नहीं हूँ, मैंने समर्पण के साथ देश के लिए काम किया है। मेरा छोटा भाई दानिश भी सेना में जाने के लिए तैयारी कर रहा था। घटना से एक घंटा पहले मैंने परिवार के साथ बात की थी और सब कुछ सामान्य था। बिना किसी कारण के मेरे पिता को मार दिया गया।........कोई उनकी मदद के लिए नहीं आया"।
          इस देश के एक नागरिक के तौर पर हम तुमसे माफी माँगते हैं सरताज! जिन परिस्थितियों में तुम्हारे पिता का इंतकाल हुआ उसमें तुम्हें किस तरह का सदमा पहुँचा होगा ,हम समझ सकते हैं। तुम्हारे ऐसे और भी सरताजों की इस देश को बहुत जरूरत है।
          दादरी की घटना पर एक तरफ गृह मंत्रालय ने राज्यों को एडवाइजरी जारी करते हुए कहा है कि साम्प्रदायिक घटनाओं को जिनसे देश की धर्मनिरपेक्षता कमजोर पड़ सकती है और जिनके द्वारा धार्मिक भावनाओं को भुनाने का प्रयास किया जाए, तनिक भी बर्दाश्त न किया जाए (मंत्रालय ने दादरी की घटना पर उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी थी जो उसे प्राप्त हो चुकी है)। दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री संजीव बाल्यान का कहना है कि गोमांस की अफवाह के बाद भीड़ के द्वारा अखलाक की हत्या पूर्वनियोजित न होकर तात्कालिक रूप से घटित हुई और एक हादसा है। उनका यह भी कहना है कि यह साम्प्रदायिक घटना नहीं है और इसे साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास न किया जाए। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से गौकसी की घटनाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए कहा हैं। बी जे पी विधायक संगीत सोम का कहना है कि अखलाक की हत्या के मामले में पकड़े गए लोग बेगुनाह हैं और सही हत्यारों को पकड़ा जाए। उन्होंने भी कहा है कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री और राज्यपाल से मिलकर गोकसी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग करेंगे । साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ अपने बयान अलग दे रहे हैं। दिनांक 6/10/2015 की रात्रि की एक खबर यह भी है कि भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने उत्तेजक बयानबाजी करने वाले अपने नेताओं को दादरी मामले से दूर रहने की सलाह दी है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घटना की निन्दा करते हुए कहा है कि समाज के सभी जिम्मेदार तत्वों की जिनमें केन्द्रीय और राज्य सरकार शामिल हैं, यह सुनिश्चित करना जिम्मेदारी है कि इस प्रकार की घटनाएँ न घटित हों।
          इन सबसे अलग उत्तरप्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खान साहब ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को चिट्ठी लिखी है जिसमें गुहार लगाई गई है कि मोदी जी की सरकार आर एस एस और उसके आनुषंगिक संगठनों को परोक्ष सहायता दे रही है ताकि वे अल्पसंख्यक समुदायों को भयग्रस्त कर उनका धर्म परिवर्तन कर दें और भारत 2022-23 तक हिन्दू राष्ट्रीय बन जाए।
          इस विषय पर मेरा अपना मत है कि- 1.यद्यपि केन्द्र सरकार के नं 2 एवं नं 3 यानी कि श्री राजनाथसिंह और श्री अरुण जेटली ने अपना अभिमत दे दिया है तथापि उन्होंने जो बात कही है वह प्रधानमंत्री की तरफ से आनी चाहिए क्योंकि नदी की धारा सदैव पर्वत शिखर से सागर की तरफ बहती हैं। प्रधानमंत्री यदि स्पष्टतः गृह मंत्रालय द्वारा कही गई बात को अपने मुखारबिन्दुओं से व्यक्त करते हैं तो इससे पूरे देश में एक संदेश जाएगा और उनकी अपनी पार्टी के भडकाऊ बयान देने वाले तत्वों पर लगाम लगेगी। यह एक संवेदनशील मसला है और उन्हें इसे अपने मातहतों के सुपुर्द कर निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। एक तरफ गृह मंत्रालय तथा अरुण जेटली के बयान और दूसरी तरफ संजीव बाल्यान और संगीत सोम त़था कुछ अन्य भाजपा नेताओं के बयान इस धारणा को बल देते हैं कि सरकार दो स्वर में बोलती है। फिर भी यह एक शुभ संकेत है कि पी एम ओ ने मामले की रिपोर्ट गृह मंत्रालय से माँगी है।
2. स्थानीय भाजपा नेता संजय राणा (जिनके पुत्र की गिरफ्तारी मामले में हुई है) का कहना है कि उन्होंने रात्रि10.26 पर पुलिस को फोन किया। इसी से कुछ मिनट पहले मुहम्मद अखलाक(जिनकी हत्या की गई) ने गाँव के अपने एक मित्र को फोन कर मदद का आग्रह किया था। उसने भी संजय राणा के फोन के कुछेक मिनट पहले पुलिस को फोन किया था । रात्रि में 10.50 पर पुलिस पहुँच गई। इस बीच मुहम्मद अखलाक को मरणान्तक चोट लग चुकी थी तथा उनका छोटा पुत्र दानिश गंभीर रूप से घायल हो चुका था। संजय राणा का यह भी कहना है कि घटना में कोई बाहर का व्यक्ति नहीं था। सभी गाँव के ही लोग थे ।
          यहाँ यह ज्वलंत प्रश्न यह है कि गाँवों की जो संस्कृति है उसमें सभी एक दूसरे को बिना जाति-धर्म के भेदभाव के चाचा,ताऊ, बेटा,भतीजा के रूप में संबोधित करते और जानते हैं। गाँवों का वातावरण इतना सांप्रदायिक या हिंसक कैसे हो गया है कि लोग नाते-रिश्ते भूल कानून को अपने हाथ में लेने लगे हैं और अपनों में से ही किसी की हत्या करने पर उतारू हो गए। गाँवों के वातावरण को विषाक्त होने और वहाँ के सामाजिक संतुलन के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न होने से कैसे बचाया जाए, इस पर विचार करने की जरूरत है।
          रात गए गाँव के मंदिर से लोगों को एकत्रित करने के लिए उद्घोषणा और रात साढ़े दस बजे भीड़ का मुहम्मद अखलाक के घर की तरफ जाना नियोजित हमले की तरफ इशारा करते हैं । इसके क्या कारण थे और इसके पीछे किसका दिमाग था, इस बात की तहकीकात की जरूरत है।
3. श्री आजम खान दादरी के मसले पर जब संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी लिखते हैं तो एक प्रकार से अपनी ही सरकार जिसमें वे मंत्री हैं, की विफलता को स्वीकार करते हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है। इसलिए कम से कम यह पत्र लिखने के पहले उन्हें समाजवादी सरकार से इस्तीफा दे देना चाहिए था क्योंकि उनका यह कदम बताता है कि उन्हें अपने दल और उसके नेतृत्व तथा स्वयं अपने मुख्यमंत्री पर भी भरोसा नहीं है अन्यथा उनसे बात करने के बजाय वे सीधे संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी क्यों लिखने लगते। दूसरे देश के सबसे बड़े प्रदेश के सत्ताधारी दल के प्रमुख राजनीतिज्ञ के तौर पर उन्हें सीधा यू.एन. जाने के बजाय पहले देश के भीतर अपनी समस्या को उठाना चाहिए था। यू एन जाने का विकल्प यह दर्शाता है कि जैसे इस देश में आजम खाँ के लिए कोई ठौर नहीं रह गया है। यह देश में और बाहर भी एक गलत संदेश देता है। यह दायित्व केन्द्र के साथ- साथ प्रदेश सरकार का भी है कि दादरी जैसी घटनाएँ न हों।
4. सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को इस मसले पर मिल-बैठकर विचार करना चाहिए और इस बारे में एकमत पर पहुँचना चाहिए कि वे गाय नामक निरीह प्राणी के नाम पर राजनीति नहीं करेंगे और न ही किसी के द्वारा इस पर की जाने वाली राजनीति को प्रोत्साहित करेंगे। साथ ही इस प्रकार की सारी स्थितियों को समाप्त करेंगे जो गाय के नाम पर राजनीति को अवसर देती हैं।

Saturday, 19 September 2015

दिल में एक हूक सी उठती है!

          अगस्त माह के प्रारंभ में यह महाशय एक दिन यूँ प्रात: मेरे सुपुत्र की पुस्तकों के ऊपर विश्राम करते हुए मिले। मैंने कहा शायद यह पूर्वजन्म के कोई पुस्तक प्रेमी होंगे। इन्हें मेरे घर से और हम लोगों से जाने कैसा लगाव हो गया कि बस जब देखो तब घर में ही मंडराने लगे। एक-दो दिन बाद घर के सामने के बरामदे में सफाई करने आई श्यामा को एक सांप दो टुकड़ों में मिला। श्यामा का कहना था कि उसे इन महाशय ने ही मारा होगा।यदि मेरी श्रीमतीजी इन्हें भगातीं तो मेरे पास आकर अपनी भाषा में कुछ शिकायत सी करते। यदि श्रीमती जी आगे से भगातीं तो पीछे की तरफ से आ जाते। श्रीमतीजी इनके इंटेलीजेन्स का लोहा मान गईं। उन्होंने भी इनसे बातचीत करना शुरू कर दिया । ये अपनी भाषा में बोलते और वो अपनी भाषा में बोलतीं। पर एक दिन इन्होंने हद कर दी। इन्होंने श्रीमती जी के पूजाघर में जाकर पॉट्टी कर दी। उस दिन से श्रीमती जी इन्हें भगाने पर कुछ ज्यादा ही लग गईं। पर यह मानने वाले कहाँ थे ,जब देखो तब चले आते थे। 

           14 अगस्त को जीजाजी आए हुए थे। मैं और वो एक ही कक्ष में सो रहे थे। रात में लगभग 1 बजे इनके म्याऊँ-म्याऊँ के स्वर से नींद खुल गईं। मैंने कह- अच्छा हुआ यहाँ आए हो वरना मालकिन के पास जाकर बोलते तो अभी तुम्हें बाहर करतीं, डिस्टर्ब मत करो और सो जाओ। इसके बाद मैं पुनः सो गया। 

           अगले दिन दोपहर में जब मैं दोपहर में कार्यालय से घर खाना खाने आया तो श्रीमतीजी मुझसे शोक संतप्त स्वर में बोलीं- 'सुनिए जी,वो बिल्ली का बच्चा मर गया ',  मैं अवाक रह गया।  ' पर वो रात में तो कमरे में था' - मैंने कहा। 'हाँ, पर श्यामा उसे रोटी देने गई तो वह पेड़ के पास मरा पड़ा था। श्यामा कह रही है कि उसे कुत्तों ने मार दिया।'  मैंने कहा कि हो सकता है कि वो कोई और हो पर अगले दिन से जब यह महाशय कई दिन तक नहीं दिखाई दिए तब यह सुनिश्चित हो गया कि श्यामा द्वारा दी गई खबर सही थी।अब इनकी यह तस्वीर ही स्मृति रूप में शेष है जिसे देख कर दिल में हूक सी उठती है।

Thursday, 17 September 2015

Dengue and Swachchha Bharat Abhiyan(Clean India Drive)


          News of Dengue epidemic in Delhi reminds me of an incident of last year. One year ago on 15th of August little Pragyan (6 years old) was with us. She had come from U S A along with her family. Her mother is my sister-in-law. We visited many places of Kolkata along with her. On 15th of August we went to Garia Hat Junction. While her mother was busy shopping with my wife, I was taking care of Pragyan. In the hot and humid weather of Kolkata Pragyan became restless and so leaving her mother for shopping, I took Pragyan to my sister's house which was nearby. After resting for sometime in a room which was A.C. cooled, she became her usual self and started singing & dancing. After sometime, I listened her singing while swaying- "Tomorrow I'll go to my favourite country,I''ll go to U S."  I asked her if U S was her favourite country. She confirmed it in affirmative. I again asked her- " Is India  not your favourite country". "Yes,I like India but India is not my favourite country."   "Why?", I again asked. "Because there is so much filth and squalor here", she replied. After sometime she asked-" Why is no fine imposed here when people through garbage on the road ?" I had no answer,so I kept mum. She said again-" In U S, if you litter on the road you have to pay 200 Dollars" . I was looking for an answer to save honour of my country. That morning I had listened Prime Minister's speech from the ramparts of Red Fort wherein he had announced that" Swachh Bharat Abhiyan" will be started to make India neat & clean. So I took a refuge under P M`s speech. I told Pragyan , that day our P M had made announccement that "A swachchh Bharat Abhiyan" would be started. I assured her when she would come back next time to our country,she would find a neat and clean India.

          But after one year when I look at the situation around me, I feel still a lot has to done. After Govt. announcement of " Swachchha Bharat Abhiyan", there is some improvement but not overall improvement. The basic reason is, after the P M started the 'Swachchha Bharat Abhiyan' last year on Gandhi Jayanti, Govt. officials used it for photo-ops with brooms and after an initial enthusiasm of a few days, the movement has been forgotten and now it seems that the programme has even lost steam . For its sucess 'Swachchha Bharat Abhiyan' has to be a permanent feature and not 'once a year rhetoric'.

       Day before Yesterday, I was at Syaldah station. It had rained for nearly fifteen minutes and the surroundings around Syaldah could be seen in pathetic condition. Being one of the main Railway Stations of a prominent Metropolis we should be able to showcase it for others, but alas! It is not so.

          Had we taken P M's 'Swachchha Bharat Abhiyan' to our heart and ensured a neat and clean Delhi with no scope for water logging ,filth and squalor ; we won' t have had to listen such news that there were no beds available for Dengue patients in the hospital and twenty lives have been lost to Dengue. A fairly good number are of young children! It is heart wrenching to see people crying for their young ones who have been lost to Dengue and could have been saved if citizens of country as well as civic authorities and administration been vigilant to maintain cleanliness.

          To be on par with other leading nations of the world, it is necessary that we inculcate habit of cleanliness in every citizen of our country, ensure that our public places are neat and clean, no one litters or throws garbage on the road or unspecified places and there is a proper disposal system for the solid as well as liquid waste. Cleanliness drive has not to be an annual ritual or once a year affair . It has to be part of our daily routine and become a habit with us.We have to be ever vigilant to ensure neat and clean surroundings.

          While Municipalities and Govt. officials have to play an important role in" Swachchha Bharat Abhiyan" , it must be kept in mind and also ensured that every Indian citizen plays an equally important role. To fulfill the purpose, inspiration and punishment both have to be utilised as tools. Govt. should not hesitate to take help of NGOs and all kind of other institutions. Only then " The Swachchha Bharat Abhiyan " could truly be successfull. Let us not wait for Gandhi Jayanti.