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Monday, 29 December 2014

पी के फिल्म क्या हिन्दू धार्मिक भावनाओं के खिलाफ है?

         पी के  फिल्म क्या हिन्दू धार्मिक भावनाओं के खिलाफ है?

          मैं फिल्में बहुत कम देखता हूँ। साल में एक या दो से अधिक फिल्में मेरे खाते में नहीं आतीं वह भी प्राय: तभी देखता हूँ जब मेरी श्रीमतीजी द्वारा किसी फिल्म को देखने की इच्छा व्यक्त करते हुए उसकी अनुशंसा की जाती है। तद्नुसार विगत रविवार को मैं राजकुमार हिरानी की फिल्म 'पी के' देखने गया। मुझे फिल्म बहुत ही अच्छी लगी । फिल्म में एक एलियन चरित्र के माध्यम से जिसे आमीर खान द्वारा निभाया गया है , व्यंग्यात्मक शैली में धर्म के नाम पर होने वाले व्यवसाय को कटघरे में खडा किया गया है।धार्मिक अंतर्विरोधों, अंधश्रद्धा और धर्म के नाम पर होने वाली ठगी को फिल्म बखूबी चित्रित करती है।फिल्म धार्मिक कार्य-व्यवहार तथा विश्वास पर बुनियादी सवाल खडे करती है जो पूरी तरह वाजिब हैं। मुझे फिल्म में कुछ दृश्य और डायलाग जरूर ऐसे लगे जिन्हें मेरे संस्कार बच्चों की उपस्थिति में देखने- सुनने की इजाजत नहीं देते। पर मुझे और मेरी पत्नी को फिल्म की मुख्य स्टोरीलाइन में कोई बात आपत्तिजनक नहीं लगी। जबकि यहाँ यह बताना वाजिब होगा कि मेरी पत्नी धार्मिक प्रवृत्ति की हैं तथा काफी पूजा-पाठ करती हैं।फिल्म आज की तिथि तक रूपए 236 करोड से अधिक का व्यवसाय कर चुकी है (जो वर्ष 2014 में किसी भी हिन्दी फिल्म द्वारा अब तक किया गया अधिकतम व्यवसाय है) और निश्चित रूप से यह राशि खर्च कर फिल्म देखने वाली अधिसंख्य जनता हिन्दू है और इन अधिसंख्य हिन्दुओं में से अनेक को मैंने फिल्म के डायलागों पर ताली बजाते हुए भी पाया।

          पर कुछ हिन्दूवादी संगठनों,धार्मिक हस्तियों तथा नेताओं ने फिल्म का विरोध शुरू कर दिया है। सुब्रमण्यम स्वामी तो यहाँ तक कह बैठे कि फिल्म आई एस आई द्वारा फाइनेंस की गई है। भोपाल और अहमदाबाद में फिल्म के खिलाफ प्रदर्शन की खबरें भी आई हैं। कुछ लोग आमीर खान को कठघरे में खडा कर रहे हैं और तुर्रा यह कि उसके मुसलमान होने का हवाला दे रहे हैं। पर यह लोग इस तथ्य को नजरअंदाज करते हैं कि आमीर खान ऐक्टर भर है और उसका काम निर्देशक के बताए अनुसार ऐक्टिंग करना मात्र है।फिल्म के निर्माता और निर्देशक (करण जौहर एवं राजकुमार हिरानी) हिन्दू हैं।

          ऐसे लोगों द्वारा फिल्म का विरोध करना स्वाभाविक है जिन्हें यह लगे कि फिल्म उनके पेट पर लात मारती है क्योंकि धर्म के नाम पर चल रही उनकी दूकान पर इस फिल्म के कारण असर पडेगा।पर जिन धर्म आधारित संगठनों की ऐसी कोई दुकानदारी नहीं है,उनके द्वारा फिल्म के विरोध का क्या कारण है? एक कारण तो मेरी समझ में यह आया कि फिल्म में एक हिन्दू लडकी को मुस्लिम लडके और वह भी पाकिस्तानी से प्यार करते हुए दिखाया गया है ।इस प्रकार यह तथाकथित 'लव जेहाद' की धारणा के अनुरूप है जिसे पिछले कुछ समय से यह संगठन उछालने की कोशिश कर रहे हैं। यह संगठन उन फिल्मों का विरोध नहीं करते जिनमें हिन्दू लडके को पाकिस्तानी मुस्लिम लडकी से प्यार करते हुए दिखाया जाता है।वी एस नयपाल ने पाकिस्तानी सेना की पृष्ठभूमि वाली मुस्लिम लडकी से शादी की है तो भी वे अटलजी की सरकार के सम्माननीय अतिथि थे।  प्रत्यक्ष तौर पर हिन्दू संगठन लव जेहाद की बात न कहकर हिन्दू धार्मिक भावनाएं आहत होने ,देवी-देवताओं के अपमान और हिन्दू धर्म के उपहास की बात कर रहे हैं। ऐसे लोग शायद इस बात को नजरअंदाज कर रहे हैं कि हिन्दू धर्म में धर्म के नाम पर ठगी करने वाले बाबाओं की बाढ आई हुई है और फिल्म देखने वालों की भारी संख्या यह बताती है जनमत इन बाबाओं के खिलाफ है।यदि वास्तव में लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई होतीं तो वे इतनी बडी संख्या में अपने बाल-बच्चों को लेकर यह फिल्म देखने नहीं जाते। यह तथ्य भी काबिले गौर है कि एकाध वर्ष पहले आई फिल्म 'ओ एम जी' के ऊपर इन संगठनों ने आपत्ति नहीं की थी जबकि उसे देखने पर मुझे वाकई लगा था कि कुछ दृश्य तथा डायलाग हिन्दू भावनाओं को आहत करने वाले हैं।इस कारण यह संभावना बलवती दिखाई देती है कि बदली हुई राजनैतिक परिस्थितियों में इन संगठनों का साहस बढा हुआ है तथा येन केन प्रकारेण यह तत्व अपने एजेंडा को केन्द्र में रखना चाहते हैं। पर यदि ऐसा होता रहता है तो यह प्रधानमंत्री द्वारा प्रशस्त किए जा रहे विकास और सुशासन के मुद्दे को प्रभावित करेगा।

          एक अन्य बात जो ध्यान देने योग्य है वह यह कि फिल्म में कुछ दृश्य और डायलाग ऐसे हैं जिन पर मुस्लिम और ईसाई आपत्ति कर सकते थे पर इन समुदायों ने अब तक फिल्म पर कोई आपत्ति नहीं की है। तो क्या हिंदू जो ऐसे धर्म से ताल्लुक रखते हैं जो यदि जाति प्रथा को छोड दें तो अपने स्वरूप से लोकतांत्रिक हो चुका है,जो स्वभावतया इतना उदार है कि आत्मालोचना उसके लिए नई वस्तु नहीं है अब अनुदार हो चले हैं? निश्चय ही ऐसा नहीं है पर उन्हें ऐसा बनाने की कोशिश हो रही है और ऐसा करते हुए कुछ संगठन भारतीय जनता पार्टी के भीष्म पितामह सदृश लाल कृष्ण आडवानी को भी नजरअंदाज करने के लिए तैयार हैं जिनके अनुसार पी के में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है तथा पी के अच्छी फिल्म है।


Thursday, 25 December 2014

धर्मपरिवर्तन के मुद्दे पर राजनीतिक दलों का प्रवंचनापूर्ण व्यवहार

धर्मपरिवर्तन के मुद्दे पर राजनीतिक दलों का प्रवंचनापूर्ण व्यवहार

          संसद का शीतकालीन सत्र 22 दिसंबर को समाप्त हो गया ।इस सत्र के दौरान लोकसभा में जहाँ तय विधायी कार्यों के निष्पादन की दर 105 % रही वहीं राज्यसभा के लिए यह मात्र 21% रही। राज्यसभा को कुल आवंटित समय के मात्र 1% का उपयोग हुआ और पूरे सत्र के दौरान मात्र 2 सवालों के जवाब दिए गए। इसका एकमात्र कारण यह रहा कि विपक्ष ने धर्मपरिवर्तन का मुद्दा उठाकर इस पर प्रधानमंत्री के जवाब की मांग की और जब सरकार की तरफ से यह कहा गया कि जवाब गृहमंत्री देंगे तो विपक्ष हंगामा खडा करता रहा और उसने संसद को चलने नहीं दिया।

          यहाँ एक बडा प्रश्न यह खडा होता है कि हमारे माननीय सांसदजनों का संसद में दायित्व क्या है? संसद में उनका दायित्व विधायी प्रक्रिया में भाग लेकर उसे संपादित एवं निष्पादित करवाना है न कि संसद को चलने से रोकना और वहाँ हंगामा खडा करना है। हंगामा संसद के बाहर और पूरे देश भर में किया जा सकता है, संसद इसके लिए तो नहीं है।संसद का सत्र समाप्त हो जाने पर जब सरकार ने विलंबित हो गए विधेयकों के लिए अध्यादेश लाने का इरादा जाहिर किया है तो सीताराम येचुरी का कहना है कि यह लोकतंत्र की भावना के विपरीत है और विपक्षी दल राष्ट्रपतिजी से आग्रह करेंगे कि वे इन विधेयकों को मंजूरी न प्रदान करें। यहाँ सवाल यह उठता है कि फिर क्या विपक्ष सरकार को पैरालाइज करना चाहता है।एक तरफ तो वह सरकार को सदन में विधायी काम संपन्न नहीं करवाने देगा और दूसरी तरफ राष्ट्रपति को अध्यादेशों पर हस्ताक्षर करने से भी मना करेगा। विपक्ष के द्वारा ऐसा करना कहाँ तक देशहित में है ?  एक अन्य प्रश्न यह खडा होता है कि हमारे सांसदजन वेतन और भत्ते लेते हैं और जब उसके बाद संसद को चलने नहीं देते ,विधायी कार्यों को संपन्न नहीं करते तो उनके द्वारा संबंधित वेतन एवं भत्तों को क्या वापस नहीं कर दिया जाना चाहिए (कम से कम उनके द्वारा जो संसद के चलने को सक्रिय रूप से बाधित कर रहे हैं)। मेरे विचार से इस संबंध में नियम बनाए जाने की जरूरत है।

          नि:संदेह विपक्ष की धर्मपरिवर्तन संबन्धी जो शंकाएं हैं उनका निराकरण यदि वे प्रधानमंत्रीजी से चाहते थे तो प्रधानमंत्रीजी को ऐसा करना चाहिए था। पर यदि वे यह दायित्व गृहमंत्री को दे रहे थे तो विपक्ष को अपना विरोध दर्ज कराने के बाद विधायी दायित्वों को निभाना था।

          धर्मपरिवर्तन के मसले को विपक्ष स्वयं कितना महत्व देता है इसका पता इससे चलता है कि केरल के मुख्यमंत्री ओमन चंडी ने अलप्पुझा जिले के चेप्पड में आठ ईसाई परिवारों के 30 सदस्यों के हिन्दू धर्मांतरण में हस्तक्षेप करने से यह कह कर इनकार किया है कि राज्य में जबरन या पुनर्धर्मपरिवर्तन जैसा कोई मामला नहीं हुआ है। यह बताता है कि राजनीतिक दलों के मापदण्ड अपने लिए कुछ और हैं दूसरों के लिए कुछ और तथा संसद में किया जाने वाला सारा हंगामा प्रवंचना मात्र है।

Wednesday, 24 December 2014

जब तालिबानी मुकाबिल हो तो खवातीन को लडा दो! (व्यंग्य/Satire)

          जब तालिबानी मुकाबिल हो तो खवातीन को लडा दो!

          कारगिल की लडाई के दौरान कभी-कभी पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सैनिकों से कहते थे कि वे माधुरी दीक्षित के बदले जम्मू-काश्मीर का दावा छोड देंगे और जवाब में भारतीय सैनिक कहते थे कि जम्मू-काश्मीर रहे न रहे माधुरी दीक्षित तो हिंदुस्तान की हैं और हिंदुस्तान की रहेंगी। पर एक खबर के मुताबिक अब पाकिस्तानी तालिबानियों के मुकाबले के लिए पाकिस्तानी सरकार माधुरी दीक्षित के शार्पशूटर रूपी पाकिस्तानी संस्करण उतार रही है। यह वास्तव में पाकिस्तान का आतंकवाद विरोधी महिला कमांडो दस्ता है। कभी शिखंडी  का उपयोग कर अर्जुन ने भीष्म पितामह पर प्रहार किया था। आज पाकिस्तान के शरीफ द्वय(नवाज और राहिल) महाभारत के इस फार्मूले का पाकिस्तान में प्रयोग करने की चेष्टा कर रहे हैं। भीष्म पितामह जहाँ औरतों और नपुंसकों पर शस्त्र नहीं उठाते थे वहीं तालिबानी जेहादियों के बीच अवधारणा है कि औरतों के हाथ मरने वालों को जन्नत नसीब नहीं होती। तालिबानी ठहरा जेहादी जो धर्मयुद्ध लड रहा है,वह भी खुदा के लिए और खुदा का रास्ता जन्नत से होकर ही गुजरता है इसलिए उसकी यह मजबूरी है कि इन महिला शार्पशूटर को देखकर वह किनारा कर ले।पाकिस्तान के इस महिला शार्पशूटर कमांडो दस्ते को सख्त ट्रेनिंग दी गई है और इनका निशाना अचूक है इसलिए इनसे मुकाबिल होने पर पाकिस्तानी तालिबानियों के लिए जन्नत से वंचित हो जाने का डर वास्तविक है।

          अगर तालिबानी एक बार यह इरादा कर भी लें कि चलो इन खवातीन से दो-दो हाथ कर लेते हैं और मरने के बजाय मार कर जन्नत का रास्ता खुला रखेंगे तो फाइटर पायलट आयशा फार्रूख की अगुवाई में  महिला फाइटर पायलट दस्ता बमबारी करने के लिए तैयार है । आयशा की हजार वाट की मुस्कराहट पर तमाम हिन्दुस्तानी यूँ ही मरने को तैयार हो जाएंगे ( वे सभी जिन्होंने हिना खार का पलक-पाँवडे बिछाकर स्वागत किया था और उनके चले जाने के बाद महीनों उनकी खूबसूरती और ड्रेस सेंस की चर्चा करते रहे थे)  पर इनकी टुकडी के महिला बमों की चपेट में आने पर जेहादियों का जन्नत का रास्ता पक्का बंद हो जाएगा। इसलिए फिलहाल जेहादियों को उत्तरी वजीरिस्तान से अफगानिस्तान भागना ही मुफीद दिखाई दे रहा है।

          अपनी तरुणाई के दिनों में मैंने लिखा था- 'अपनी आँखों का सागर यूँ न लहराइए,डूब कर मर न जाएं कहीं। जो डूब गए इनमें एक बार तो शायद फिर न उबर पाएं कहीं।।' मैं तो आखिरकार किसी की आँखों में डूब ही गया जिनमें से आज तक निकल नहीं पाया हूँ। पर इस शेर को और हिजाब के पीछे से झाँकती आँखों को पढने का आनन्द तो मेरे जैसे काफिर ही उठा सकते हैं जो गालिब के इस शेर पर यकीन करते हैं-' हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल बहलाने को गालिब खयाल अच्छा है '। जहाँ तक खवातीन कमांडो देखकर  मरने- मारने के लिए तैयार जेहादियों के भागने की बात है , उनके लिए तो बकौल कतील शिफाई यही कहा जा सकता है- "जिसे मौत भी न मार पाई 'कतील' उसे जिंदगी ने मारा" । इन तालिबानी जेहादियों में से जो बुढापा आने तक शहीद होने से बचे रहेंगे उनके लिए बकौल एक शायर-'क्या खुश्क शेख की जिंदगानी गुजरी,बेचारे की न एक शब सुहानी गुजरी। दोजख के तसब्बुर में बुढापा गुजरा, जन्नत की दुवाओं में जवानी गुजरी।।

Sunday, 21 December 2014

प्रधानमंत्रीजी को बोलना ही पडेगा!

          भाजपा की भगवा ब्रिगेड के सदस्यों के बयानों पर तो प्रधानमंत्रीजी ने संसद सदस्यों की बैठक में माननीयों को अपने बयान पार्टी के विकास और सुशासन के एजेंडे तक सीमित रखने की ताकीद कर दी है पर वे माननीयजन जो आजीवन इसी प्रकार की बयानबाजी करते आए हैं ,स्वयं को कितने दिन और कितना  नियंत्रित रख पाएंगे यह आने वाला समय ही बताएगा। इसके लिए प्रधानमंत्रीजी को समय-समय पर इनकी नकेलें कसते रहना पडेगा।

          पर हिन्दू महासभा और इसके बाद आर एस एस ,विश्व हिन्दू परिषद एवं संघ के अन्य आनुषंगिक संगठनों के सदस्यों एवं पदाधिकारियों द्वारा नाथूराम गोडसे ,धर्म परिवर्तन , कुछ वर्षों में भारत को हिन्दू राष्ट्र बना देने तथा ईसाई एवं मुस्लिम धर्मों को लेकर कही गई बातें निहायत ही सिरफिरेपन की एवं आपत्तिजनक हैं जो निश्चित रूप से सामाजिक सौहार्द्र को प्रभावित कर सकती हैं तथा प्रधानमंत्रीजी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर धार्मिक विवादों और झगडों पर दस वर्ष के लिए निषेध करने संबन्धी बात के विपरीत हैं। इनसे ऐसा लगता है कि जैसे प्रधानमंत्रीजी के विकास और सुशासन के एजेन्डे के समानान्तर कुछ लोग दूसरा एजेन्डा चलाना चाहते हैं। इसलिए भले ही संसद में गृहमंत्री बयान दें , राष्ट्र की जनता को प्रधानमंत्रीजी को यह संदेश देना ही पडेगा कि वे विकास और सुशासन के समानान्तर दूसरे एजेन्डे का अनुमोदन नहीं करते। प्रधानमंत्रीजी को इस देश की जनता ने विकास और सुशासन के नाम पर स्पष्ट एवं भारी बहुमत दिया है और कुछ लोगों के मतिभ्रम के कारण उनके प्रति आम जनता की सद्भावना और विश्वास पर आँच आए यह ठीक नहीं है। इसलिए प्रधानमंत्रीजी को सामाजिक सौहार्द्र को प्रभावित करने वाले किसी भी प्रयास को नकारने एवं नियंत्रित करने के साथ- साथ इस देश के लिए और इस देश की जनता के लिए बोलना ही पडेगा ।


Saturday, 20 December 2014

जब मैंने स्वयं को अपराधी अनुभव किया! (संस्मरण पर आधारित)

          सन  2004 की बात है , मैं उन दिनों बरेली में तैनात था ।नवंबर में मैंने विभागीय निरीक्षण का कार्यक्रम बना कर सभी अधीनस्थ कार्यालयों को प्रेषित कर दिया था और दिसंबर से इस कार्य में लग गया। 22-23 दिसंबर से ठंड अचानक ज्यादा बढ गई और ऐसे में ही किसी दिन (तिथि मुझे याद नहीं है) मेरा शाहजहाँपुर के कार्यालय में जाने का कार्यक्रम पहले से तय था। जिस दिन मुझे जाना था सुबह से ही ठंड बहुत ज्यादा थी। मैंने कमीज के नीचे इनर और ऊपर पूरी बाँह का लाल इमली के ऊन का  स्वेटर पहन  लिया।लाल इमली कंपनी के बंद होने के पहले मेरी माँ ने ऊन खरीद कर यह स्वेटर बनाया था। इसके ऊपर मैंने बंद गले का सूट पहना।पैंट के नीचे भी मैंने इनर पहना था।ऊनी मोजे और जूते ,हाथ में ऊनी दस्ताने तथा कान और गले पर मफलर लपेट कर मैं घर से निकला। लौटने में रात हो जाने का ख्याल कर मैंने अपने ब्रीफकेस में फाइलों के साथ खादी आश्रम से ली गई एक ऊनी शाल भी रख ली। भयंकर कुहरा था जिसमें से बीच-बीच में बूँदें टपक रही थीं। इस मौसम में बस से जाना ठीक न समझ कर मैं रिक्शा कर बरेली रेलवे स्टेशन पहुँच गया।सभी ट्रेनें लेट थीं। दिल्ली- शाहजहाँपुर पैसेंजर जो कई घंटे लेट थी लगभग ग्यारह बजे आई। अन्य कोई ट्रेन थी नहीं इसलिए यह सोचकर कि दो घंटे में तो पहुँच ही जाऊँगा मैं ट्रेन में बैठ गया।

           डिब्बे में भीड नहीं थी। मेरे सामने की बर्थ पर नीचे एक पंद्रह-सोलह साल का लडका कुंडली मुद्रा में सोया हुआ था। पर उसने कुछ ओढा नहीं था और ऐसा लगता था जैसे कमीज के नीचे भी उसने कुछ पहना नहीं था।थोडी देर में लडका उठ गया।उसकी कमीज के सामने के बटन भी टूटे हुए थे।कमीज के नीचे उसने वाकई कुछ नहीं पहना था। उसी के सामने मैं इतने कपडों से लैस बैठा था।मेरा मन कहीं खुद को कचोटने लगा और मैं स्वयं को अपराधी सा अनुभव करने लगा। मुझे निराला की याद हो आई जिन्होंने ठंड से काँपती एक भिखारिन को कहीं से भेंट में प्राप्त कीमती  दुशाला ओढा दिया था। मैंने अपना ब्रीफकेस खोलकर उसमें से  शाल निकाला और उस किशोर से कहा- 'इसे ओढ लो वरना ठंड लग जाएगी। '   मुझे लगा किशोर संकोच कर रहा है इसलिए मैंने फिर कहा- 'अब यह तुम्हारा है।'   किशोर मुस्कराया और शाल लेकर उठ गया तथा डिब्बे में दूसरी तरफ चला गया। एक उम्रदराज सज्जन जो मेरे पास में बैठे थे बोले- 'आप उसे जानते हैं क्या? '   'नहीं'मैंने कहा। 'फिर शाल आपने ऐसे कैसे दे दी'? वे बोले। 'देखिए इस ठंड में वो बच्चा कैसे बिना कपडों के है? '  मैंने कहा।   'वो तो है,पर वो ऐसे ही रहने का आदी हो चुका है।आपकी शाल वो बेच देगा' वे बोले। 'बेच देगा तो बेच देगा,मुझे जो ठीक लगा मैंने किया' मैं बोला। 'आप कहाँ- कहाँ ऐसा कर पाएंगे, भावुकता से जीवन नहीं चला करता' वे बोले। 'आपकी बात ठीक है, पर कभी-कभी मन नहीं मानता।फिर इतना भर कर लेने से मेरा कोई नुकसान नहीं हो रहा है' यह कह कर मैं उठ खडा हुआ क्योंकि शाहजहाँपुर आने वाला था और ब्रीफकेस उठाकर कंपार्टमेंट के दरवाजे की तरफ आ गया। वहाँ दरवाजे पर खडा वह किशोर फिर मुझे मुस्कराता दिखा। पर उसके पास शाल नहीं थी। 'क्या उन सज्जन की बात सही थी, क्या इसने शाल इतनी जल्दी ट्रेन में ही किसी को बेच दी' मैंने मन में सोचा। आखिर मैं उससे पूछ ही बैठा- ' जो शाल मैंने दी थी वो क्या हुई?' किशोर ने शौचालय के बगल लेटी एक बुजुर्ग महिला की तरफ इशारा किया।मेरा शाल वह महिला ओढे थी। 'मेरी माँ है' मेरी आँखों में कौतूहल सा देखकर किशोर वही टूटे बटन की कमीज पहने हुए बोला।

          शाहजहाँपुर स्टेशन आ चुका था। मैं एक बार पुनः स्वयं को अपराधी सा अनुभव कर रहा था और भारी मन लिए स्टेशन पर उतर गया। तब से हर वर्ष जब ठंड जोर पकडती है और मैं बाहर निकलने से पहले सर्दी से बचने के लिए जरा ज्यादा ही कपडे - लत्ते पहनने लगता हूँ मुझे वह घटना याद आ जाती है और एक बार फिर मेरा अपराध बोध जागृत हो जाता है।

Thursday, 18 December 2014

पाकिस्तान आतंकवाद के कितना खिलाफ?

                  पाकिस्तान आतंकवाद के कितना खिलाफ?

          कभी लाहौर के एक कालेज में,जब भारत और पाकिस्तान के विभाजन की बात लगभग तय हो चुकी थी , कुलदीप नैयर के एक सवाल के जवाब में मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा था कि विभाजन के बाद नए राष्ट्रों के बीच कोई द्वेषभाव नहीं होगा और अगर किसी पर कभी कोई संकट आता है तो हम एक साथ खडे दिखाई देंगे। पर आजादी के बाद कभी ऐसा दिखाई नहीं दिया।एक ही मुल्क रहे यह देश सदैव एक दूसरे के कट्टर शत्रु के ही रूप में दिखाई दिए ,भाईचारे की बात तो बहुत दूर है।पर 16 दिसंबर 2014 के दिन पेशावर के आर्मी पब्लिक स्कूल में आतंकवादियों द्वारा मासूम बच्चों की हत्या ने सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं हिन्दुस्तान के साथ पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया क्योंकि यहाँ आतंकवाद का अब तक का भयंकरतम चेहरा दिखाई दिया ।एक अरसे के बाद उक्त दिन दोनों देश साथ खडे दिखाई दिए।भारतीय प्रधानमंत्री ने न केवल अपने दिली दुःख का इजहार किया बल्कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से बात कर जिस भी सहायता की जरूरत हो मुहैया कराने औरआतंकवाद के खिलाफ साथ खडे होने की बात कही जो आजादी के पहले लाहौर के कालेज में जनाब मुहम्मद अली जिन्ना द्वारा व्यक्त की गई भारत-पाक के संकट की घडी में साथ खडे होने की भावना के अनुरूप था। पाकिस्तान में इस आतंकी घटना पर हुई तीव्र प्रतिक्रिया और क्षोभ ने बहुत से लोगों में उम्मीद जगा दी कि अब पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ उठ खडा होगा। पर वास्तविकता इससे बहुत अलग है।

          मैंने 17 दिसंबर को पाकिस्तान के वजीरे आजम जनाब नवाज शरीफ का पाकिस्तान की जनता को संबोधन बहुत ध्यानपूर्वक सुना।इसे सुन कर मुझे इस बात का अहसास हुआ कि जनाब नवाज शरीफ के दिमाग में सिर्फ उस आतंकवाद से लडने की बात है जो उनके अपने देश के लिए खतरा है। उन्होंने अपने मुल्क के अलावा सिर्फ अफगानिस्तान का नाम लिया और अफगानिस्तान के साथ मिलकर आतंकवाद से लडने की बात कही। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तानी सेनाप्रमुख जनरल राहिल शरीफ इसके बारे में विचार- विमर्श करने के लिए काबुल गए हैं। पर उन्होंने एक भी बार अपने भाषण में हिन्दुस्तान का नाम नहीं लिया न ही उस आतंक का कोई जिक्र किया जो समय-समय पर हिन्दुस्तान की जडों को हिलाने की कोशिश करता है और  जिसकी खुद की जडें पाकिस्तान में हैं । न ही उन्होंने  हिन्दुस्तान के साथ मिल कर आतंकवाद के खिलाफ किसी प्रकार की कोशिश करने की कोई मंशा जाहिर की।मैं जनाब नवाज शरीफ की पूरी स्पीच में कहीं कोई संकेत पाने की कोशिश करता रहा कि हिंदुस्तान को प्रभावित करने वाला आतंकवाद उनके जेहन में है पर मुझे यह मिला नहीं।सिर्फ एक स्थान पर मुझे आशा की एक क्षीण किरण दिखाई दी जब उन्होंने  पूरे क्षेत्र से आतंकवाद को खत्म करने तथा पाकिस्तान की जमीन को आतंकवाद के लिए न इस्तेमाल करने देने की बात कही। पर उनकी इस बात को जब मैंने जनाब नवाज शरीफ की पूरी स्पीच के परिप्रेक्ष्य में तौला तो मुझे यह स्पष्ट सा हो गया कि पूरे क्षेत्र से उनका आशय पाकिस्तान -अफगानिस्तान से अधिक नहीं है।इसी तरह उनका पाकिस्तान की धरती को आतंक के खिलाफ न इस्तेमाल न होने देने का जो आश्वासन था वह भी सिर्फ अफगानिस्तान के लिए था। अफगानिस्तान को भी उनका यह आश्वासन सिर्फ इसलिए है कि तहरीके तालिबान पाकिस्तान के लोग बडी आसानी से अफगानिस्तान में जाकर छिप सकते हैं और ऐसी स्थिति में उन पर काबू पाने के लिए अफगानिस्तान का सहयोग पाकिस्तान के लिए जरूरी है।

          काश्मीर में आजादी की तहरीक को नैतिक समर्थन के नाम पर पाकिस्तान का आतंकवादियों को समर्थन जारी रहेगा क्योंकि यह सब कुछ पाकिस्तानी सेना की मिलीभगत से और उसके सक्रिय सहयोग से होता है। भारत और उसकी शक्तिशाली सेना को उलझा कर रखने का पाकिस्तान के पास इससे बढिया दूसरा उपाय नहीं है।इसी तरह 'थाउजैंड कट्स 'की पालिसी के तहत आई एस आई अपने प्राक्सी आतंकवादी संगठनों के माध्यम से भारत को रक्तरंजित करने के प्रयासों में लगा रहेगा और सलाहुद्दीन, रियाज भटकल तथा दाऊद इब्राहिम जैसे भटके हुए भारतीयों को संरक्षण देना तथा जकीउर्रहमान लखवी और हाफिज सईद जैसे पाकिस्तानियों को पोषित करना जारी रखेगा। पाकिस्तान के सियासतदानों का पाकिस्तानी सेना पर कोई नियंत्रण नहीं है। इसके उलट पाकिस्तानी सेना सियासतदानों को नियंत्रित करती है। इसलिए जब तक पाकिस्तानी फौज की नीतियों में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता है भारत पाकिस्तान की तरफ से किसी फौरी राहत की उम्मीद नहीं कर सकता।

          आतंकवाद के खिलाफ लडाई की पाकिस्तान की मंशा पख्तून और बलूच विद्रोहियों तक ही सीमित रहेगी। भारत यदि अमेरिका के सहयोग से पाकिस्तानी फौज पर कुछ दबाव बना सके तो वह कुछ हद तक भारत के लिए पाकिस्तान पोषित आतंकवाद को नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है। परअफगानिस्तान को लेकर अमेरिका की अपनी मजबूरियाँ हैं और जहाँ तक मैं समझता हूँ वह भारत के पक्ष में पाकिस्तानी फौज पर कोई दबाव नहीं बनाएगा। कुल मिलाकर लब्बोलुबाब यह है कि हिंदुस्तान को अपनी लडाई खुद लडनी होगी, आतंकी घुसपैठ को रोकने के लिए सतर्क रहना होगा, गुप्तचर व्यवस्था को चुस्त और चाक-चौबंद बनाना पडेगा,आतंकियों के मुकाबले के लिए सतर्क,समर्पितऔर संगठित बल रखना होगा तथा देश के अल्पसंख्यक समुदाय में आश्वस्ति का एक भाव पैदा करना होगा ताकि उन्हें कोई बरगला न सके।

Wednesday, 17 December 2014

पेशावर( पहले का पुरुषपुर) में नामर्दानगी पर! (गजल)

      -पेशावर( पहले का पुरुषपुर) में नामर्दानगी पर-

ऐ किस्साख्वानी बाजार वाले पेशावर, ये कैसी खबर आती है
असुर आए नए भेस में और मासूमों की जान पर बन आती है।।

कुछ अश्वत्थामाओं ने घुस तमाम द्रौपदियों की कोख उजाड़ी
खून -सने जूते-किताबें देख वो महाभारत फिर याद आती है।।

'पुरुषपुर' तेरे बौद्ध कनिष्क ने भरे-पूरे देश पर राज किया था
ऐ शहर वहीं से नामर्दानगी के कारनामे की ये कैसी बू आती है ।।

 जुदा होकर अलग घर बनाया तो क्या ,हमारा घर एक ही था
 दिल रोए न क्यूँ ,जब तुम्हारे घर में बच्चों की जान जाती है ।।

मेरा बच्चा उसका बच्चा किसी का भी हो, बच्चा तो बच्चा है
जहालतभरी दहशतगर्दी कहर बन क्यूँ इनपे बरस जाती है ।।

खबर ये थी कि एक सौ बत्तीस फरिश्तों की जानें चली गईं
बड़ी खबर ये है कि हैवानियत अब स्कूलों के रास्ते आती है।।

शैतानों को ठिकाने लगाना है तो उन्हें पालना भी तो छोड़ो
बताओ तो कि उनकी राह खुदा तक नहीं दोजख को जाती है।।

कुछ ऐसा करो कि माँ की गोद न किसी बाप का चमन उजड़े
संभल  जाओ कि इंसानियत की रूह भी अब काँप जाती है।।

पड़ोसी के घर लगाई आग की आँच खुद के घर तक आती है
तुम भी समझ लो' संजय' मासूम बेगुनाहों पे भी बन आती है।।
                                                                 -संजय त्रिपाठी

Friday, 12 December 2014

गाँवों के शहरीकरण की अजगरी प्रक्रिया !

          कविवर सुमित्रानंदन पंत के अनुसार 'भारतमाता ग्रामवासिनी' है। डा रामकुमार वर्मा ने  ग्रामवासियों को देवता बताया है- 'हे ग्राम देवता नमस्कार।सोने चाँदी से नहीं किन्तु मिट्टी से तुमने किया प्यार'।  पर इन दिनों नगरों के समीप स्थित गाँवों को निरंतर अस्तित्व के संकट से जूझना पड रहा है क्योंकि इनके समीपवर्ती नगरों की भूख अजगर के समान निरंतर बढती जा रही है और इनका भोजन यही गाँव हैं।समीपवर्ती गाँवों को खाकर भी शहर तृप्त नहीं होता। उसका आकार बढने के साथ-साथ उसकी भूख और बढ जाती है और फिर वह आस -पास के और भी गाँवों को निगलने के लिए तैयार हो जाता है।जितना बडा शहर उसकी भूख उतनी ही ज्यादा है और उसके समीपवर्ती गाँवों का जीवन उतना ही सीमित है। इस देश में गाँधीजी के नाम की कसम सब खाते हैं पर जब गाँव ही नहीं रहेगा तो उनकी स्वावलम्बी गाँव  संबन्धी परिकल्पना का क्या होगा यह सोचने के लिए कोई तैयार नहीं। आज विकास की परिभाषा बदल गई है। शहरीकरण को विकास का पर्याय बताया जा रहा है। कहा जाता है कि कुछ वर्षों के पश्चात भारतवर्ष की पचास प्रतिशत आबादी शहरी होगी और जिस दिन देश की अस्सी प्रतिशत आबादी शहरी हो जाएगी उस दिन भारतवर्ष विकसित देश की श्रेणी में आ जाएगा। पर विकास सस्टेनेबल हो और उससे सामाजिक समस्याएं न पैदा हों इस तरफ सरकार/प्रशासन का ध्यान नहीं है।


          लखनऊ स्थित सुशांत गोल्फ सिटी शहर का हाल ही में विकसित नया हिस्सा है जहाँ उपर्युक्त प्रकार से ही गाँवों को निगल कर शहर के बढ जाने की प्रक्रिया दुहराई गई है। इस शहरीकरण की प्रक्रिया को अंजाम उपहार सिनेमा फेम अंसल ग्रुप द्वारा दिया जा रहा है। जब कोई यहाँ आता है तो यहाँ की हरीतिमा,चौडी सडकें, हरे-भरे पार्क और गोल्फ ग्राउंड देखकर प्रभावित हो जाता है। पर यहाँ मेरे देखने में ऐसी समस्याएं आईं हैं जो सस्टेनेबल डेवलपमेंट की शर्तों को झुठलाती हैं। पहली बात तो यह कि तमाम ऐसी आबादी का जो खेती पर निर्भर थी ,आजीविका का साधन समाप्त हो गया है। इनमें से कुछ भूमिहीन मजदूर बन गए हैं, कुछ छोटा-मोटा रोजगार कर रहे हैं और कुछ निठल्ले बैठकर दिन गुजार रहे हैं। जि न्होंने इस हाईटेक सिटी की योजना आते ही अपनी जमीन बेच दी उन्हें ज्यादा मुआवजा नहीं मिला। इसलिए वे उन लोगों की तुलना में स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं जिन्होंने अपनी जमीन बाद में बेची। ऐसे तमाम लोग जिन्हें अच्छा मुआवजा मिला है पढे -लिखे या स्किलफुल नहीं हैं। उन्होंने अपना पैसा बैंक में जमा कर दिया है तथा इसी जमा-पूँजी के सहारे जीवन काट रहे हैं। गाँव के कुछ लोगों ने अभी भी और अच्छा पैसा मिलने की आशा में अपनी कुछ जमीन रोक रखी हैं और अपना घर बचा रखा है। गाँव में आपको शराब की दूकान और मुर्गे भी बिकते हुए मिल जाएंगे जो इस बात का द्योतक है कि गाँव में अनेक लोग चार्वाक दर्शन के अनुयाई बन चुके हैं तथा वे बिना शराब और मुर्गे के भोजन नहीं करते और अपनी जमा-पूँजी इसी पर खर्च कर रहे हैं। इनमें जो थोडा बुद्धिमान हैं उन्होंने रोजमर्रा की जरूरत के सामान,, पान-गुटखा सिगरेट तंबाकू या सब्जी की दूकान डाल ली है। पढाई,स्किल या फिर अनुभव एवं मार्गदर्शन के अभाव में पास में पैसा होते हुए भी कोई बडा काम करने की ये नहीं सोच सकते। पर पास में पैसा है तो अनाप-शनाप खर्च ये लोग करने में नहीं हिचकते हैं , यथा मेरी जानकारी में आया कि एक व्यक्ति ने जो अपनी जमीन बेच चुका है तथा अब सब्जी का ठेला लगाता है अपनी बेटी का जन्मदिन मनाया तथा उसमें दो लाख रूपए व्यय किए। उनके लिए जो निठल्ले हैं और यह समझते हैं कि वे बिना कुछ किए अपनी जमा पूँजी के सहारे अपने दिन काट सकते हैं ,जुआ खेलना समय व्यतीत करने का सबसे अच्छा साधन है।गाँव में आपको जुए की महफिल दिन भर जमी हुई मिलेगी।

          अब इस शहरीकृत विकास का दूसरा पक्ष देखिए। तमाम लोगों ने इस नवविकसित क्षेत्र में घर, फ्लैट या जमीन खरीदे। इनकी भी दो श्रेणियाँ हैं। एक तो वे जिन्होंने दो का चार बनाने की दृष्टि से अपना पैसा इन्वेस्ट किया। ऐसे लोग काफी खुश हैं क्योंकि घर और जमीन दोनों के दाम काफी बढ गए हैं और उन्हें लग रहा है कि उन्हें अपनी पूँजी पर बहुत अच्छा रिटर्न मिल रहा है। दूसरी श्रेणी ऐसे लोगों की है जिन्होने रहने के लिए एक आशियाना पाने की दृष्टि से घर या फ्लैट लिए । इनमें से अधिकांश ने लोन लिया है। लोन का भार कम करने की दृष्टि से घर या फ्लैट मिलते ही इन्होंने आकर रहना शुरू कर दिया। इनमें से भी बहुत से लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं क्योंकि घर बनाते समय कंपनी द्वारा कई वादे पूरे नहीं किए गए यथा टीकवुड के स्थान पर शीशे के दरवाजे लगा दिए गए हैं। बात करने पर कंपनी के साहबान  कहते हैं कि आप हमारा ब्रोशर देख लीजिए उसमें लिखा हुआ है कि जहाँ कंपनी उचित समझे वह परिवर्तन कर सकती है। घरों में फिटिंग मे सबस्टैंडर्ड सामग्री प्रयोग में लाई गई है। इस कारण पानी के रिसाव तथा दीवारों में आर्द्रता की समस्या आम है। दरवाजों में दिए गए लाक ठीक से काम नहीं करते। इसके कारण या तो दरवाजा बंद नहीं होता या जहाँ बंद होता है वहाँ कई बार लाक के अचानक खराब हो जाने के कारण आदमी अंदर ही लाक रह जाता है। घरों को तैयार कर दिए जाने में बैकलाग बहुत ज्यादा है।इस कारण जिन लोगों ने लोन लिया है वे परेशान हैं क्योंकि घर तो मिला नहीं, जिस घर में वे रह रहे हैं उसका किराया दे रहे हैं साथ ही लोन की किश्त अलग दे रहे हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें अब कंपनी कह रही है कि वह उन्हें घर देने की स्थिति में नहीं है और वे ग्यारह प्रतिशत ब्याज  की दर से अपना पैसा वापस ले लें क्योंकि जिस स्थान पर नियत योजना थी वहाँ जमीन मिल नहीं सकी और यदि उन्हें घर चाहिए ही तो वे अन्यत्र जहाँ घर बन रहे हैं वहाँ ले लें पर उन्हें पैसा वर्तमान मार्केट रेट से देना होगा जिसमें पिछला पैसा एडजस्ट कर दिया जाएगाा। वह व्यक्ति स्वयं को ठगा महसूस करता है क्योंकि पाँच साल पहले जब उसने घर बुक किया था तब से अब तक मार्केट रेट दोगुना हो चुका है। अनेक लोग न्यायालय चले गए हैं परंतु कंपनी के पास पैसे की कमी नहीं है और जैसाकि एक सज्जन ने मुझे बताया कंपनी ने अपने मुकदमे लडने के लिए 22 वकीलों का पैनल बना रखा है।

          कुल मिलाकर नगरीकरण की इस अजगरी व्यवस्था में अनेक खामियाँ हैं जिसमें मध्यम वर्ग का तेल निकालकर(जिन्होंने घर की आशा में पैसा लगाया) तथा गरीब वर्ग का खून चूसकर पूँजीपति वर्ग तथा उनके साथ जुडा सपोर्ट ग्रुप जिसमें बिल्डर ,ठेकेदार तथा जमीन के दलाल शामिल हैं लाभ उठा रहा है। अनेक नेताओं तथा बडे नौकरशाहों के भी बंगले यहाँ हैं। कानाफूसी है कि
यह ऐसे नहीं आबंटित हुए हैं।  सरकारें यदि वास्तव में गरीबों की हितैषी हैं तो उन्हें इस अजगरी प्रक्रिया को दुरुस्त करने की तरफ ध्यान देना चाहिए।
          









Wednesday, 3 December 2014

भोपाल की वो सर्द रात !


                                                          भोपाल की वो सर्द रात

           आज से तीस वर्ष पूर्व मैंने कम्बाइंड डिफेन्स सर्विसेज की लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की थी और मुझे साक्षात्कार हेतु 15 दिसम्बर ,1984 के दिन भोपाल सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड के समक्ष उपस्थित होना था। दिनांक 2-3 दिसम्बर ,1984 की रात भोपाल गैस काण्ड घटित हो गया और मैं यह आशा कर रहा था कि साक्षात्कार स्थगित हो जाएगा परंतु ऎसी कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई यद्यपि इस बीच यह खबर भी अखबारों में आ गई कि यूनियन कार्बाइड के प्लांट में बची हुई एम आइ सी गैस को भी खत्म करने के लिए उसे 16 दिसम्बर के दिन पेस्टिसाइड में परिवर्तित किया जाएगा।

          अंततोगत्वा मैं 14 दिसम्बर के दिन लखनऊ से भोपाल के लिए रवाना हो गया। इसके पूर्व रेलवे स्टेशन पर मेरी और मेरे पिताजी की बातचीत सुनकर एक बुजुर्ग सज्जन पास आए और कहने लगे- 'आप भोपाल जा रहे हैं? इस समय वहाँ जाना ठीक नहीं है।' जब हमने उन्हें प्रयोजन बताया तो कहने लगे-' मैं तो मानवता के नाते आप को मना कर रहा था,बाकी आपकी मर्जी।

          ट्रेन में मेरे साथ एक बंगाली परिवार बैठा था जो भोपाल से लखनऊ किसी विवाह समारोह में भाग लेने आया था और उसके उपरान्त वापस भोपाल लौट रहा था। उन लोगों ने बताया कि जिस रात गैस का रिसाव हुआ उन लोगों की नींद रात में तकलीफ होने के कारण खुल गई। किसी के द्वारा यह बताने पर कि यूनियन कार्बाइड में गैस लीक हो गई है वे परिवार सहित कार में बैठकर तुरंत शहर से बाहर चले गए। उन्होंने बताया कि इस समय भी लोग भोपाल छोडकर भाग रहे हैं ,अधिकांश घरों में ताले बंद हैं तथा प्रशासन ने इस आशय की घोषणा शहर में करवा दी है कि जो लोग ताला लगा कर घर छोडकर जा रहे हैं उनके यहाँ यदि ताला टूट जाता है या अन्य कोई घटना घट जाती है तो प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

           सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड के साक्षात्कार पाँच दिनों तक चलते हैं तथा साक्षात्कार स्थल तक  उम्मीदवारों को ले जाने और उनके रहने आदि की व्यवस्था बोर्ड के द्वारा ही की जाती है। मैं चिंतित था कि पता नहीं साक्षात्कार होगा या नहीं और यदि साक्षात्कार नहीं होता है तो  मुझे वापस लौटना होगा तथा जब तक वापस लौटना नहीं हो पाता है तब तक कहीं रहने की व्यवस्था करनी होगी और जैसा कि सूचनाएं मिल रही थीं भोपाल में प्राय: अधिकांश प्रतिष्ठान बंद थे और इस स्थिति में मैं क्या करूँगा। एक सहयात्री युवा सज्जन  लखनऊ के थे और नाबार्ड की भोपाल शाखा में तैनात थे । उन्होंने मुझे अपना पता और फोन नं. दिया एवं कहा कि किसी भी तरह की परेशानी होने पर मैं उनसे संपर्क कर लूँ या फिर उनके आवास पर आ जाऊँ।  ट्रेन लेट हो गई थी और रात 1 बजे के लगभग भोपाल पहुँची। पहाडियों में बसा भोपाल शहर रोशनी में जगमगाता हुआ दूर से सुंदर दिखाई दे रहा था , पर इस शहर के आँचल तले दूसरा ही नजारा था जो मैंने वहाँ पहुँचने पर देखा। मुझे कुछ गंध का भ्रम हुआ और जब मैंने एक सहयात्री से इसकी चर्चा की  तो वे हँसने लगे और बोले कोई गंध नहीं है , मनोवैज्ञानिक कारणों से आपको ऐसा लग रहा है।

          भोपाल स्टेशन पर गाडी पहुँची ही थी और अभी रुकी भी नहीं थी कि स्टेशन से धडाधड यात्री मय माल-असबाब के चढने लगे। कुली अलग सामान लादे-फाँदे चढे चले आ रहे थे। हम उतरने वालों के लिए उतरना मुश्किल हो गया था । किसी तरह स्टेशन पर उतरे तो वहाँ अलग ही दृश्य था। चारों तरफ एक जन सैलाब सा दिख रहा था और प्राय: सभी के सर पर गठरी या कुछ सामान लदा हुआ था। अनेक लोग कुली से बात कर रहे और कुली उन्हें आश्वासन दे रहे थे कि वे उन्हें किसी न किसी ट्रेन में सामान सहित घुसा देंगे। कुल मिला कर आलम यह था कि जैसे पूरा भोपाल शहर ही भोपाल छोडकर भाग रहा हो । किसी तरह हम लोग उतरे और अन्य यात्री तो अपने-अपने गंतव्य की तरफ चल दिए और मैं मन में किंकर्तव्यविमूढता का भाव लिए टू टायर वेटिंग रूम की तरफ आ गया।

          वेटिंग रूम में मैं एक आराम कुर्सी पर बैठ गया। मेरी आँखों से नींद गायब थी और मैं पूरी रात भर भोपाल स्टेशन पर  सामान लिए हुए और ट्रेनों में बैठकर भागते हुए लोगों को देखता रहा ,साथ ही मन में एक चिंता समाई हुई थी कि दिन में मुझे क्या करना होगा। खैर प्रात: लगभग चार बजे मुझे एक समवयस्क युवक दिखाई पडा और मुझे लगा कि हो न हो यह भी मेरे ही पथ का राही है। जब मैंने बातचीत की तो मेरा अनुमान सत्य निकला । वे भी मेरी ही तरह साक्षात्कार के लिए हरियाणा से आए हुए एक यादवजी थे। मन में एक सांत्वना का भाव आया कि चलो  एक से दो तो हुए।  प्रात: साढे छ: बजे मैंने फिर एक युवक को कुर्सी पर बैठकर पुस्तक पढते पाया और उन्हें भी अपने जैसा समझ कर जब बात की तो पता लगा कि वे आलोक पाराशर हैं जो सेंट जेवियर्स लेबर इंस्टीट्यूट,राँची से एम.बी.ए. कर रहे हैं तथा मेरी ही तरह साक्षात्कार देने आए हैं। अब हम तीन लोगों की तो टोली हो ही गई । सेलेक्शन बोर्ड के लोगों ने दिन में बारह बजे का समय स्टेशन पर मिलने के लिए दिया था। हम लोग बाहर की खाक छनने के लिए निकल पडे। स्टेशन के सामने कुछ होटल थे जहाँ पोहे के बडे-बडे ढेर लगे हुए थे । होटल वालों ने बताया कि खाने के लिए यही पोहा और चाय  है तथा दस बजे के बाद वह भी नहीं मिलेगा क्योंकि वे सब दस बजे होटल बंद करके भोपाल से बाहर चले जाएंगे । दरअसल भोपाल की जनता 2-3 दिसंबर की घटना को देखते हुए एम.आइ. सी. यानी कि मिथाइल आइसो सायनेट गैस को पेस्टिसाइड में परिवर्तित कर खत्म करने की योजना से बेहद डरी हुई थी। हम लोग पोहा और चाय का सेवन करके तथा दूकान आदि ढूँढकर कुछ अन्य सामान खरीदकर वापस स्टेशन की तरफ लौटे। रास्ते में हमने कुछ लोगों से बात करने की कोशिश की पर लोग प्राय: बात करने के मूड में नहीं थे। एक मौलाना साहब ठेले पर सामान आदि लादे चले आ रहे थे । उनसे जब हम लोगों ने बात करने की चेष्टा की तो पता लगा कि वे भी एम.आई.सी. के डर से शहर छोडकर जा रहे थे। उन्होंने बताया कि गैस के प्रभाव से उनकी माताजी का निधन हो गया है तथा वे बात करने में असमर्थ हैं।  जब व्यक्ति बहुत दु:खी अवस्था में या अवसादग्रस्त हो और फिर से सामने मौत का डर सामने मंडराता दिखाई दे रहा हो तो उसका मौन हो जाना बहुत ही स्वाभाविक है।

         स्टेशन पर बारह बजे सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड की गाडी आई । अब तक तीन उम्मीदवार और आ गए थे और हम छ: लोग उसमें बैठकर कैंट स्थित बोर्ड आ गए। बोर्ड में सामान्यत: जिस दिन उम्मीदवार पहुँचते हैं उस दिन केवल फार्म आदि भरवाया जाता है, पर हम लोगों से कहा गया कि अगले दिन होने वाले सारे टेस्ट ( जो साइकोलॉजिकल टेस्ट होते हैं) उसी दिन शाम को हो जाएंगे । शाम को हमें फार्म आदि भरवाने के लिए एक सज्जन आए जो जे.सी.ओ. रैंक के थे, हालांकि सामान्यत: इस कार्य के लिए कोई मेजर रैंक का अधिकारी आया करता है। उन्होंने कहा - 'स्थिति यह है कि पूरा भोपाल शहर छोडकर भाग रहा है पर फौजी आदमी बांड से बँधा हुआ है वह भाग भी नहीं सकता और शाम को अपनी चिंताओं को परे रखकर पेट में शराब आदि डालकर सो जाता है। चीफ मिनिस्टर को क्या है, वह तो कल मास्क पहनकर अपने चमचों से पूछ रहा था कि उस पर वह कैसा लग रहा है। जहाँ भी स्थिति खराब होती है आर्मी बुला ली जाती है और फौजी आदमी अपनी जान की परवाह न कर काम पर लग जाता है।' उनके जाने के बाद एक सरदारजी आए जो साइकोलॉजिस्ट थे। उन्होंने ऐसी परिस्थिति में  भी भोपाल आने पर हम सबको बहादुर बताया। साइकोलॉजिकल टेस्ट खत्म होने के बाद बताया गया कि हम सब को अगले दिन प्रात: सात बजे नहा-धोकर और नाश्ता आदि करके तैयार हो जाना है। उस दिन कोई भी टेस्ट नहीं होगा पर हम सबको अपनी डॉरमिटरी में ही रहना है। यदि गैस लीक होती है तो तुरंत एक साइरन बजेगा और नियत स्थान पर बस खडी रहेगी जिसमें हम सबको बैठ जाना है।वह बस हम सबको लेकर बीस कि.मी. दूर बैरागढ कैंट चली जाएग़ी। अगले दिन हम लोगों ने दिए गए निर्देशों का पालन किया पर गैस लीक की कोई घटना नहीं हुई और न ही हम सबके बैरागढ जाने की नौबत आई। 

          अगले चार दिनों तक हम लोगों के साक्षात्कार अच्छी तरह संपन्न हुए और हममें से तीन - मुदित शर्मा, आलोक पाराशर और आर एस यादव चयनित होकर सैन्य अधिकारी बने। मेरे उसी बैच के एक साथी आर. के. ठाकुर अगले बैच में चुने गए। वे लोग मेरा इंतजार करते रहे कि मैं अगले बैचों में उन्हें ज्वाइन करूँगा पर ऐसा कुछ नहीं हुआ । मेरे इन मित्रों से मेरा कुछ  समय तक पत्राचार रहा पर अब मैं आउट आफ टच हूँ।