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Wednesday, 29 October 2014

चाँद जो नहीं है फिर चाँदनी जहाँ में बिखरेगी कैसे (गजल)

                              
                                 गजल

चाँद जो नहीं है फिर चाँदनी जहाँ में बिखरेगी कैसे
धरती दिखी नहीं आफताब बेताब न भी हो तो कैसे।। 

फूल जब नहीं है भँवरा यहाँ गुनगुनाए भी तो कैसे
शरीके हयात है नहीं पड़ोसियों से मन लगाएं कैसे।।

 तुम्हारी और बेटे की आवाज आती रहती सी हो जैसे
टूटी हुई है कमर  दवा ले फिर भी उठता हूँ कैसे ।।

किसी तरह हिम्मत कर बनाता हूँ रोटियाँ  कैसे
माँ को खिलाता हूँ और खुद भी खाता हूँ कैसे।।

 क्या सोचती हो एक पहिए से ये गाड़ी चलेगी कैसे
तुम जो चली गई हो फिर भी गृहस्थी सजेगी कैसे।।

इस शहर में नवाबी मिजाज के लोगों से बाबस्ता हूँ
 अच्छा है मिल गए हैं चंद दोस्त करके भी कैसे।।

उम्मीद है जब आओगे तो घर को उम्दा ही पाओगे
सजा रहा है घर को 'संजय' जतन करके भी कैसे।।
                                -संजय त्रिपाठी

Monday, 6 October 2014

स्वच्छता अभियान और कचरा बीनने वाला वर्ग !

          मोदीजी द्वारा गाँधी - जयंती से आरंभ किए गए  स्वच्छता अभियान के संदर्भ में  माननीय प्रधानमंत्रीजी का ध्यान समाज के एक वर्गविशेष की तरफ दिलाना चाहता हूँ जो समाज में हाशिए पर होने के बावजूद इस कार्य में सर्वाधिक योगदान करता है.यह तबका है कूडा-कचरा बीनने वालों का. चार पैसे पाने की आशा में इस वर्ग के लोग  इस कार्य के साथ संलग्न बीमारियों के खतरे की परवाह किए बिना कचरा बीनने के काम में लगे रहते हैं. कई बार इनमें बच्चे होते हैं जिन्हें शायद बाल श्रम नियंत्रण कानून के अनुसार काम नहीं करना चाहिए पर पेट की आग इन्हें काम करने के लिए मजबूर करती है. आज से आठ-नौ   वर्ष पूर्व मैं बरेली में रहा करता था. मेरे घर से कुछ आगे जाकर म्युनिसिपैलिटी की कचरागाडी का एक कैरियर रहा करता था जिसमें लोग कचरा डाला करते थे .बहुत सा कचरा बाहर भी निकल कर पडा रहता था एक परिवार भोर में ही आकर वहाँ कचरा बीनने में लग जाता था. एक बुजुर्ग जो शायद बच्चों का पिता था और साथ में चार-पाँच छोटे बच्चे रहते थे. यह बच्चे उक्त स्थान पर कचरा बीनने के बाद शायद पास-पडोस के दूसरे कचरे के ढेरों की तरफ चले जाते थे.  बच्चे श्याम वर्ण के होने के बावजूद सुंदर थे और उन्हें देखकर मैं सोचता कि शायद यही जरा साफ-सुथरे और किसी विद्यालय में होते तो कितने अच्छे लगते. एक दिन मेरी श्रीमतीजी कुछ कचरा उक्त स्थान पर डालने गईं और   जब उन बच्चों को कचरा छाँटते देखा तो व्यथित हुईं क्योंकि वहाँ बहुत सी ऐसी सामग्री पडी थी जो बच्चों को नहीं छूना चाहिए. इसके बाद मेरी श्रीमतीजी उन बच्चों को बुलाकर कई बार खाने-पीने का सामान दे दिया करती थीं.

          मैं माननीय प्रधानमंत्रीजी से अनुरोध करता हूँ कि स्वच्छता के कार्य में  इस वर्ग के लोगों द्वारा किए जा रहे योगदान को देखते हुए ( भले ही वे ऐसा मजबूरीवश कर रहे हों ) इन्हें बूट तथा दस्ताने आदि प्रदान किए जाएं तथा इन्हें सुरक्षित ढंग से कचरा बीनने का तरीका बताया जाए. साथ ही इनके बच्चों के लिए अनौपचारिक रूप से शिक्षा देने  की व्यवस्था की जाए क्योंकि इनके लिए औपचारिक रूप से विद्यालयों में जाकर शिक्षा ग्रहण करना शायद  पारिवारिक हालातों के कारण संभव न हो. साथ ही कचरे का संग्रहण यदि आरंभिक या घरों के स्तर से ही चार भागों : 1.-सामान्य कचरा , 2.- बायोडिग्रेडेबल 3.- जूठन एवं खाद्य 4.- जोखिम वाले पदार्थ  (Hajarduous  material)_ में अलग-अलग किया जाए तथा ऐसा करने के बारे में लोगों को शिक्षित किया जाए तो यह कचरा बीनने वालों के साथ-साथ गाय एवं एवं अन्य पशुओं के लिए भी अच्छा होगा जो खाद्य सामग्री के साथ तमाम सारा पॉलिथिन खा जाते हैं. इन कार्यों हेतु एन. जी. ओ. संस्थाओं की मदद ली जा सकती है.साथ ही म्युनिसिपैल्टियों को भी इस दिशा में सक्रिय प्रयास करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए.

Thursday, 2 October 2014

गाँधीजी,सांप्रदायिकता और स्वच्छता (विमर्श )

रघुवंशमणि (मेरे मित्र)-
          गाँधीजी के विचारों में सबसे महत्वपूर्ण विचार धर्मसमभाव का था। जब तक धर्म के नाम पर घृणा और पूर्वाग्रह बने रहेंगे गाँधीजी के विचार प्रासंगिक बने रहेंगे। जब तक मन साफ नहीं होगा बाहरी सफाई बेकार है। पहले मन साफ होना चाहिए। मन के कलुष पर झाडू मारिए।

अनिल अविश्रांत (रघुवंशमणिजी के मित्र)-
          रघुवंश सर जब धर्म में ही समभाव नहीं है तो उनसे संबन्धित विचारों में कहाँ से होगा. धर्म जिन भौतिक कारकों से प्रेरणा ग्रहण करता है अनिवार्य रूप से उसके पक्ष में झुका रहता है और एक बड़े तबके के शोषण का कारण बनता है.

मेरी प्रतिक्रिया-
          शहरों में दंगों का भयंकरतम रूप मलिन बस्तियों में और उनके आस-पास देखने को मिलता है जबकि सफेदपोश इलाके अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते हैं. यह इस तथ्य का संकेतक है कि बाहरी सफाई शायद कहीं मन को भी प्रभावित करती है. जब हम अपने घर में या बाहर कहीं निष्कलंक अथवा नैसर्गिक वातावरण में बैठते हैं तभी मन में अच्छे विचार भी आते हैं. कूडे-कचरे के बीच संभवत: हम सभी अच्छे चिंतन को जन्म नहीं दे सकते. धर्म के नाम पर घृणा और पूर्वाग्रह भी व्यक्ति विशेष के चतुर्दिक प्रदूषित (विचारों का प्रदूषण) वातावरण में पनपते हैं. समग्र स्वच्छता का भाव मन और बाहर दोनों ही जगह की मलिनता के निराकरण में सहायक होगा. सारे सांप्रदायिक लडाई-झगडों के मूल में धर्म का स्थूल स्वरूप और अधिकांश लोगों की समझ का वहीं तक सीमित होना है . इस बारे में अनिल अविश्रांतजी के विचार काफी हद तक सच्चाई के निकट हैं. समग्र स्वच्छता इसके निराकरण में सहायक होगी.

रघुवंशमणि-
       तमाम वातानुकूलित कमरों में बैठे कलुषित मन वाले नेता और राजनीतिक लोग दंगे कराते हैं ।यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि दंगे होते हैं । दंगे कलुषित मन वाले राजनीतिक संभ्रांत कुटिल लोगों द्वारा कराए जाते है। इसलिए जब तक विचार और मन साफ नहीं होगा, तब तक ये समस्याएँ बनीं रहेंगी । गरीबों के सिर पर ठीकरा फोड़ना उचित नही^ । उन्हें सफेदपोश लोग ही बरगलाते हैं । साफ- सफ्फाक लोग कितनी कालिमा फैलाते हैं इसका प्रमाण वे तमाम दंगे हैं जिनके सूत्र दिल्ली की राजनीति से जुड़े रहे हैं । यह विडम्बना ही है कि साम्प्रदायिक लोगों के हाथ में ही सफाई की बागडोर है। करते गंगा को खराब देते गंगा की दुहाई! सामान्य जनता को मूर्ख बनाया जाता है और इस्तेमाल किया जाता है। उच्च स्थानो पर बैठे कुटिल लोग जब तक ठीक तरीके से सोच नहीं बदलेगे कुछ नहीं ठीक होने वाला । मीडिया के सामने झाड़ू नाचना दूसरी बात है।

मेरी प्रतिक्रिया-
          दंगे जहाँ कई बार प्रायोजित होते हैं वहीं स्वत:स्फूर्त भी होते है। स्वत:स्फूर्त दंगों के पीछे प्राय: गोवध, धार्मिक जुलूस और उन पर पत्थर फेंका जाना, उसका मंदिर या मस्जिद के बगल से निकलना, मस्जिद के सामने हिन्दू धार्मिक संगीत का बजना अथवा हिन्दू धार्मिक कार्यक्रम के समय अजान का होना, दो अलग-अलग संप्रदायों के जुलूसों का आमने-सामने आ जाना,उन्हें एक खास रास्ते से ले जाने की जिद करना जैसे कारण होते हैं । इन दिनों इनमें एक नया कारण समुदाय विशेष की लड़की को छेड़ा जाना और जुड़ गया है। दंगा प्रायोजित हो अथवा स्वत:स्फूर्त दोनों में ही लोगों की नासमझी एक बहुत बड़े कारक और उत्प्रेरक ( catalyst)  दोनों का काम करती है। इसी का फायदा सांप्रदायिक जहर फैलाने वाले उठाते हैं । मैंने अपनी पहले की टिप्पणी में कहा है कि धर्म के नाम पर घृणा और पूर्वाग्रह भी व्यक्ति विशेष के चतुर्दिक प्रदूषित (विचारों का प्रदूषण) वातावरण में पनपते हैं भले ही ऐसा व्यक्ति वातानुकूलित वातावरण में रह रहा हो तो भी क्या? जिन्हें आप सांप्रदायिक कहते हैं उनका सत्ता में आना भी उनकी असफलता का द्योतक है जो स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं । उन्हें स्वयं का विश्लेषण करना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ। वे क्यों भारतवासियों की नजर में असफल थे जिसके कारण उन्होंने तथाकथित साम्प्रदायिक लोगों के हाथों में सत्ता सौंप दी । उन्हें स्वयं से यह प्रश्न भी करना चाहिए कि उन्होंने गाँधीजी को क्यों अनाथ छोड दिया था जिससे एक दक्षिणपंथी को गाँधीजी को अपना बनाने का मौका मिल गया । अब यह तथाकथित कम्यूनल लोग लोग पावर में आ गए हैं और पूर्ण बहुमत के साथ अगले पाँच साल तक रहेंगे। तो आने वाले पाँच सालों तक क्या उनके द्वारा उठाए जाने वाले अच्छे कदमों का विरोध भी मात्र इस आधार पर किया जाए कि वे कम्यूनल हैं । क्या सड़क पर,स्टेशन पर और चौराहों पर पड़ा कचरा आपको विचलित नहीं करता? क्या यह कचरा और गंगा में डाला जाने वाला कचरा मात्र कम्यूनल लोगों का योगदान है? क्या इसके लिए सभी भारतीय जिम्मेदार नहीं हैं और क्या सभी भारतीयों को अपने चारों तरफ के वातावरण को साफ रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए? वैसे मुझे व्यक्तिगत तौर पर मोदी के स्वच्छता अभियान की सफलता में संदेह है क्योंकि हम भारतवासी अपनी आदतों विशेषकर गंदी आदतों को बदलेंगे यही संदेहास्पद है, पर एक अच्छा प्रयास सराहनायोग्य है। अगर कोई आसमाँ की तरफ पत्थर उछाल कर सूराख करने की कोशिश भर कर रहा है तो भी उसके हौसले की दाद देनी चाहिए. मेरे पिताजी कहते थे कि यदि अपने मातहतों से काम कराना चाहते हो तो पहले खुद काम करके उनके सामने उदाहरण प्रस्तुत करो । मैंने अपने काम के दौरान इसे सफलतापूर्वक आजमाया है। वही काम मोदी कर रहे हैं, इसमें महज फोटो खिंचवाने जैसी बात नहीं है। सांप्रदायिकता और स्वच्छता दो अलग-अलग मुद्दे हैं जिनका एक दूसरे में घालमेल करने से एक अच्छी बात दब जाएगी । सांप्रदायिकता का विरोध एक अलग मुद्दे के रूप में किया जाना चाहिए। मन के कलुष को साफ करने के लिए अलग दूसरे प्रयासों की जरूरत है। वैसे मन की सफाई करना बाहरी भौतिक सफाई से बहुत अधिक कठिन और श्रमसाध्य है।