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Monday, 15 September 2014

प्रकृति का दुर्लभ लौकिक संगीत!-2 (विमर्श )

     


          मैंने और मेरे मित्र संजय त्रिपाठी ने अपने जिन अनुभवों की चर्चा की है( देखिए: प्रकृति का दुर्लभ लौकिक संगीत!-1), उन्हें कोई धार्मिक व्यक्ति ब्रम्हज्ञान या दैवीय से जोड़ सकता है। यह उसके धार्मिक दृष्टिकोण की बात होगी । दूसरे शब्दों में यह निर्वचन interpretation का मामला है । मुझे इस प्रकार के अनुभव अपने मनोजगत से जुड़े लगे । मैं इन्हें किसी भी तरह से धर्म या आस्था से नहीं जोड़ पाता । मेरे अन्य मित्रों ने भी मुझे कुछ ऐसे अनुभव बताये हैं । वास्तव में ये अनुभव मूलतः धार्मिक नहीं होते । उन्हें हमारे दृष्टिकोण या आग्रह ही ऐसे रंग प्रदान करते । इन्हें धार्मिक मान लेने पर इन्हें ब्रम्ह से जोड़ कर अनिर्वचनीय सिद्ध कर दिया जाता है और इस प्रकार इनके विश्लेषण अथवा निर्वचन का सवाल स्थगित हो जाता है। - रघुवंशमणि (मेरे मित्र)
  
                           प्रकृति को जानने का कोई भी प्रयास ब्रह्मज्ञान की ही दिशा में किया गया प्रयास है
          रघुवंशजी !निश्चय ही यह पूरी तरह अपने-अपने interpretation की ही बात है. ऐसे भी लोग हैं जो मेरे घर आने पर कहते हैं कि मैं जंगल में रहता हूँ और दूसरी तरफ आस्था से भरे ऐसे भी लोग हैं जो स्थान विशेष पर पंडों की कहा-सुनी और सौदेबाजी तथा धक्का-मुक्की के बाद देवी प्रतिमा का दर्शन कर लेने के बाद स्वयं को धन्य मानते हैं. उनका मानना है कि स्थान विशेष पर देवी के दर्शनों की महिमा अलग होती है.वस्तुत: उनका interpretation आस्था में सना रहता है तथा इस कारण धार्मिक स्थलों की अव्यवस्था तथा व्यावसायिकता उन्हें धार्मिक व्यवस्था का ही एक भाग लगती है. उन्हें यह उपेक्षणीय लगती है अथवा इसमें उन्हें कोई बुराई नजर नहीं आती. 
          मेरा मानना है कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी है वह प्रकृति में मौजूद है चाहे उसे खुदा कहो नेचर कहो या फितरत कहो. जो वैज्ञानिक खोजें भी होती हैं वे भी प्रकृति में पहले से ही मौजूद हैं ,वैज्ञानिक उन्हें interpret करने में सक्षम होकर उनकी खोज का श्रेय पा जाता है. इस प्रकार की खोजों का समायोजन कर जब वह एक सिस्टम को बना लेने में सक्षम हो जाता है तो वही नया आविष्कार कहलाता है . न्यूटन का कहना था कि उसने सारे जीवन में जो ज्ञान अर्जित किया वह समुद्र की एक बूँद के बराबर था. गुलाम अली का कहना है कि संगीत उस महासागर की तरह है जहाँ कहीं भी थाह लेने का प्रयास करने पर सुर का गहरा जल ही जल हाथ आता है,इतना कुछ सीखने के लिए है कि एक जीवन अपर्याप्त है. स्टीव जॉब्स नीम करौली बाबा से भेंट की आस लेकर भारत आए थे. एक दिन उन्हें अहसास हुआ कि मानवता का भला करने वाला एक आविष्कार 1000 नीम करौली बाबाओं से भेंट करने से बेहतर है तथा वे अमेरिका वापस लौट गए. इसके बाद उन्होंने एक गैराज किराए पर लेकर एपल के साम्राज्य की नींव डाली तथा उनके आविष्कारों ने दुनिया को बदल डाला.पर उन्होंने जो कुछ भी किया वह प्रकृति के नियमों और संरचनाओं की खोज ,उनका समायोजन और उन्हें नया स्वरूप प्रदान करना भर था. क्या न्यूटन ,गुलाम अली या स्टीव जॉब्स के प्रयास ब्रह्म को जानने की ही दिशा में किए गए प्रयास नहीं थे? मुझे तो लगता है कि वे सभी जो इस प्रकृति को जानने- समझने की कोशिश में लगे हैं ब्रह्मज्ञान की ही दिशा में ही प्रयास कर रहे हैं और निश्चय ही एक व्यक्ति का जीवन प्रकृति के संपूर्ण रहस्यों को जानने के लिए अपर्याप्त है. हजारों-हजार मानवों के द्वारा खोजें करने के बाद भी हम हिग्स-बोसान की संभावना की पुष्टि तक ही पहुँच पाए हैं और इस ब्र्ह्मांड के अनंत विस्तार में अभी तक पृथ्वी जैसा दूसरा गृह नहीं ढूढ पाए हैं .हम लोग तो उस शिशु की तरह हैं जो प्रकृति को देखकर अभिभूत हो जाता है, उन्हें शब्दाकार देने का प्रयास करता है और कभी-कभी इस प्रयास में कविता सी कर जाता है. 

Sunday, 14 September 2014

प्रकृति का दुर्लभ लौकिक संगीत!-1 (विमर्श )


      

        " कई साल पहले की बात है मैं अपने एक मित्र से मिलने गया था जिनका घर नदी के किनारे था। उस घर के पास पेडों के सिलसिले थे।वह दृश्य कुछ जंगल जैसा था हालाँकि उसे जंगल कहना ठीक नहीं । मैं अपने मित्र से मिलने के बाद पेड़ों के बीच घूमने निकल गया । मुझे उस वातावरण में अपूर्व शान्ति का अनुभव हुआ । यह अहसास काफी गहरा था और कुछ समय के लिए वहीं बैठ गया । फिर कुछ देर बाद जब मैं उस अनुभूति से बाहर निकला तो मुझे वर्ड्सवर्थ की वह पंक्ति याद आयी जिसमें उन्होंने प्रकृति में मनुष्यता का दर्द भरा संगीत सुना था।
           यह अनुभूति कहीं से भी धार्मिक नहीं थी। मगर वह अहसास आज भी बना हुआ है। मैं इस प्रकार की अनुभूतियों को आध्यात्मिक ही कहूँ गा।"- रघुवंशमणि (मेरे मित्र)

                                               प्रकृति का दुर्लभ संगीत बनाम धर्म का व्यवसाई रूप
          रघुवंशजी! आपने जिस वातावरण की चर्चा की है संयोग से मैं पिछले सात वर्षों से कुछ वैसे ही स्थान पर रहता हूँ. जब मैं शुरू में इस स्थान पर आया तो जैसा आपने कहा वैसा ही कुछ मुझे अनुभव हुआ. मैं इस वातावरण में भ्रमण कर आनंदातिरेक से भर जाता था.गंगा के किनारे बैठना ,जाती हुई लहरों को देखना, वृक्ष आच्छादित सुरम्य वातावरण मन को निस्सीम शांति से भर देते थे. यह मेरा नित्य का क्रम बन गया. यह स्थिति तीन-चार वर्षों तक रही. इस बीच पत्नी ने यहाँ अध्यापनकार्य शुरू कर दिया . आगे चलकर माँ की तबियत भी गडबड रहने लगी जिससे मेरे लिए यह अनिवार्य हो गया कि मैं प्रात: घर में पत्नी की सहायता करूँ ताकि वह समय पर विद्यालय के लिए निकल सकें. इस प्रकार नित्य प्राकृतिक सानिध्य का जो क्रम मैंने बनाया था वह टूट गया. पर कई बार जब प्रात: मैं अपनी खिडकी से बारिश की फुहारें पडता देखता हूँ तो ऐसी स्थिति में मेरा मन पिंजरें में कैद पंछी की तरह फडफडाता है और मैं बाहर निकलने को आतुर हो उठता हूँ. पहाडों पर भी मैंने प्रकृति की सामीप्यता के सुख का अनुभव किया है पर वह सरिता या समुद्रतट के जैसी अनिर्वचनीय नहीं प्रतीत हुई. मैंने इसके विश्लेषण का प्रयास किया और मुझे लगा कि संभवत: इसका कारण पहाड का जड होना है जबकि नदी या सागर सदैव गतिमान दिखाई देते हैं. आवश्यक नहीं है कि दूसरे की अनुभूति भी मेरी तरह हो क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का अनुभूति का स्तर भी अलग-अलग होता है.मैं इसे प्रकृति में मनुष्यता का दर्द भरा संगीत नहीं बल्कि प्रकृति के दुर्लभ लौकिक संगीत की संज्ञा दूँगा. 

          इसके विपरीत कई धार्मिक स्थलों पर जहाँ पंडे-पुजारी, धार्मिक ग्राहक को लुभाने या उससे पैसा वसूलने की होड सी करते दिखाई देते हैं मेरा मन वितृष्णा से भर जाता है और धर्म का व्यवसाई रूप देख कर मन क्षुब्ध हो जाया करता है. मैं बीस वर्ष पूर्व कोलकाता के कालीघाट मंदिर गया था उसके बाद दोबारा नहीं गया. इस वर्ष एक मित्र के आगमन पर बीस वर्ष बाद पुन:गया और फिर से वही विक्षुब्ध कर देने वाला अनुभव रहा. इसी प्रकार वर्ष 2008 में मैं जगन्नाथपुरी गया था. मेरी एक सहकर्मी ने मुझसे कहा था -"दादा आप एक दिन पुरी का मुख्य मंदिर देखने के बाद अगले दिन एक आटो कर लीजिएगा और वह आपको नगर के सारे मंदिर घुमा देगा!" पर पुरी के मंदिर में पंडों और धर्म का व्यवसाई स्वरूप देखने के बाद अगले दिन किसी मंदिर में जाने के बजाय मैंने अपना दिन समुद्र के किनारे बिताना बेहतर समझा. मैं नहीं समझ पाता कि जहाँ किसी बाजार का सा कोलाहल है वहाँ कैसे कोई कुछ पल के लिए भी ध्यान लगा सकता है या कोई इहलौकिक अनुभव कर सकता है.