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Monday, 31 March 2014

अरविंद मोदी नहीं, राहुल के लिए चुनौती हैं.

         इस समय भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर तीन सितारे दिखाई दे रहे हैं- नरेंद्र, राहुल  और अरविंद. वैसे तो ममता,जयललिता और मुलायम भी इस परिदृश्य पर अपनी मौजूदगी का दावा कर रहे हैं पर पूर्व तीनों के आगे इनकी चमक क्षीण होने के कारण दिखाई नहीं  दे रही है.  इस समय अब तक के सारे आकलन  और सर्वेक्षण बता रहे हैं इनमें सबसे अधिक चमक फिलहाल नरेंद्र की बिखर रही है. इसके बाद राहुल और अरविंद  का नंबर आता है. राहुल के खेमे में फिलहाल कुछ मायूसी दिख रही है क्योंकि बडे-बडे कांग्रेसी दिग्गज चुनाव के नाम से कतरा रहे हैं. वहीं अरविंद का खेमा चुनौती पेश करने की  कोशिश कर रहा है. अरविंद का यह दावा शायद वास्तविकता से कोसों दूर है कि 'आप' 100 सीटें जीतेगी और सरकार बनाने  में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी पर उनका यह दावा ये जरूर दर्शाता है कि अरविंद एक  राजनीतिज्ञ के रूप में ढल रहे हैं. दूसरे अरविंद के  खेमे में एक उत्साह  है भले ही वह चुनौती देने मात्र का हो. 

          अरविंद तथा उनके साथियों ने  स्वयं अपनी ही  तरफ दिसंबर में दिल्ली में सत्ता ग्रहण करने के बाद कुछ गोल किए हैं. पर इस सबके बावजूद अरविंद ने संघर्ष  करने का और चुनौतियाँ देने माद्दा दिखाया है.  यह इस समय मोदी के लिए उतनी बडी खतरे की घंटी नहीं है जितना कि राहुल के लिए. इस तथ्य को शायद अरविंद भी जानते हैं कि वे मोदी को कोई वास्तविक चुनौती  नहीं दे पाएंगे तथापि उनका सारा प्रयास स्वयं को एक विकल्प के रूप में जनता के सामने पेश करने का है. इस प्रकार जहाँ भविष्य में एक द्विध्रुवीय व्यवस्था के अंतर्गत राहुल, मोदी का स्वाभाविक विकल्प होते वहीं उनके इस स्थान को हडपने का प्रयास कर अरविंद कम से कम राहुल के लिए "अमानत में खयानत" जैसी स्थिति पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं. कांग्रेस के आत्मविश्वास में  कमी आ गई है. यही कारण है कि  जहाँ राहुल ने कुछ दिनों पहले यह कहा कि कांग्रेस "आप" के साथ मिलकर काम कर सकती है वहीं एंटोनी थर्ड फ्रंट के साथ मिलकर कांग्रेस की सरकार बनाने की बात  कर रहे हैं. पर यदि कांग्रेस अपना आत्मविश्वास और संघर्ष का माद्दा वापस नहीं लौटा  पाती है तो उसके स्थान को कब्जियाने की घात लगाए अरविंद और उनकी"आप" बैठी है.सन उन्नीस सौ सतहत्तर में जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो उसके पास इंदिरा गाँधी जैसा जुझारु व्यक्तित्व था. फिर सन उन्नीस सौ नवासी में कांग्रेस जब सत्ता  से बाहर हुई तो कुछ समय के बाद राजीव गाँधी ने देश के विभिन्न भागों का दौरा  शुरू किया तथा उन्हें अच्छा प्रतिसाद भी  मिलने लगा. ठीक चुनाव के पहले उनकी हत्या हो गई जिसने कांग्रेस के पक्ष में सन उन्नीस  सौ इक्यानबे में सहानुभूति की लहर पैदा की जिसके कारण कांग्रेस को पुन: सत्ता में आने में सहायता मिली. सन उन्नीस सौ छियान्नबे,अट्ठानबे तथा निन्यानबे  में लगातार तीन हारों के बाद कांग्रेस पस्त  थी तब सोनिया गाँधी को  इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने कांग्रेस  को संघर्षशील बनाया तथा उसे पुन: एक  बार सत्ता में ले  आईं.

          पर अब  जबकि सोनिया कांग्रेस की  कमान राहुल को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया मे हैं यह प्रश्न उठता है क्या राहुल अपनी माँ और दादी जैसी संघर्षशीलता का भविष्य में  प्रदर्शन कर पाएंगे विशेषकर तब जबकि अप्रत्यक्ष रूप से अरविंद, राहुल को चुनौती देने और उनके स्थान पर कब्जा जमाने के लिए तत्पर दिखते हैं.अरविंद के मार्ग के कंटक सिर्फ उनकी पार्टी की सेल्फगोल करने की प्रवृत्ति तथा भाजपा और कांग्रेस के मुकाबले उनकी  पार्टी का सांगठनिक रूप से कमजोर होना है. पर उनमें सीखने की प्रवृत्ति तेज  है. ऐसी स्थिति में राहुल के ऊपर  इस बात का सारा दारोमदार आ पडेगा कि वे अपने संगठन और साथियों में विश्वास को वापस लौटा लाने का प्रयास करें तथा अपने पूरे संगठन को एक  संघर्षशील संगठन के रूप में तब्दील करें. इसके लिए उन्हें अपनी साफ्ट समझी जाने वाली छवि को परिवर्तित कर स्वयं को एक जुझारु  व्यक्तित्व के रूप में पेश करना  होगा अन्यथा इस बात का पूरा-पूरा अंदेशा है कि इसमें चूकने पर उन्हें अंततोगत्वा अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए  'आप' के साथ रह कर काम करना पडे जैसा कि चौधरी चरण सिंह जैसी शख्सियत के  पुत्र अजीत सिंह को  कभी इस दल और कभी उस दल के साथ रह कर करना पड रहा है.

Friday, 28 March 2014

द्वितीय विश्वयुद्ध की भारतीय मूल की गुप्तचर वीरांगना नूर

          भारतीय मूल की नूर-उन-निसा इनायत खान ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अप्रतिम वीरता दिखाते हुए नाजी जर्मनी के आधिपत्य के फ्रांस में गुप्तचरी करते हुई इंग्लैंड को महत्वपूर्ण सूचनाएं उपलब्ध कराई थीं जिसके लिए उस समय उन्हें ब्रिटेन द्वारा जॉर्ज क्रॉस सम्मान प्रदान किया गया था. विक्टोरिया क्रॉस जहाँ युद्ध में सक्रिय भाग लेते हुए वीरता दिखाने के  लिए ब्रिटेन द्वारा दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है वहीं जॉर्ज क्रॉस सक्रिय युद्ध के अलावा अन्य परिस्थितियों में भयावह  खतरों के  बीच अदम्य और अप्रतिम साहस दर्शाने के लिए दिया जाता है.   विगत 25  मार्च  को द्वितीय विश्वयुद्ध में योगदान  देने वाले भारतीयों को सम्मानित करने की प्रक्रिया  के अंतर्गत  ब्रिटेन की रॉयल मेल सेवा द्वारा उनकी स्मृति में एक विशेष डाक टिकट जारी किया गया. उक्त डाक टिकट में नूर अपनी चित्ताकर्षक मद्धिम मुस्कान के साथ दिखाई दे रही हैं. पर, उन्होंने ब्रिटेन को अपनी  जो सेवाएं दी थीं उसके बदले जर्मनों के हाथों यातना सहनी पडी तथा अपने प्राणों  का भी उत्सर्ग करना पडा.

          नूर-उन-निसा का जन्म सन उन्नीस सौ चौदह में मास्को में हुआ था. उनके पिता  भारतीय सूफी उपदेशक हजरत इनायत खान  थे जो टीपू सुल्तान के वंशज थे तथा माँ अमीना बेगम मूलतया अमेरिकन महिला थीं जिनका पूर्व नाम  ओरा मीना रे बेकर था. नूर की शिक्षा - दीक्षा पेरिस में हुई थी पर जब वहाँ नाजियों का कब्जा हो गया तो उनका परिवार इंग्लैंड भाग आया था. इंग्लैंड में नूर ने वूमेंस आक्जिलरी एयरफोर्स की नौकरी कर ली .यहाँ उन्हें 'मैडेलीन' का कोड नाम दिया गया तथा ब्रिटिश स्पेशल ऑपरेशन एक्जीक्यूटिव ( एस ई ओ )  के वायरलेस अधिकारी के तौर पर सन 1943 में पेरिस में तैनात कर दिया गया  जबकि यह  शहर नाजियों के कब्जे में था. उन्हें शत्रु से संबंधित सूचनाएं स्वयं को दुश्मन की नजरों से बचाए रखते हुए इंग्लैंड भेजनी थीं. यह खतरनाक काम था जिसमें कभी भी शत्रु के हाथों पड जाने का खतरा था. नूर ने इस काम को बखूबी सफलता के साथ अंजाम दिया  तथा महत्वपूर्ण सूचनाएं इंग्लैंड भेजती रहीं.  इंग्लैंड के ही पक्ष के किसी व्यक्ति ने धोखा दिया तथा नूर के बारे  में नाजियों को सूचित कर दिया.  नाजियों ने उन्हें गिरफ्तार कर सघन पूछ्ताछ की पर उन्होंने शत्रुओं को  कोई भी भेद बताने से इंकार कर दिया. नाजियों ने उन्हें दस महीनों  तक हथकडी - बेडी लगाकर रखा और  यातनाएं दीं  तथा उन पर जुल्म किए. एक डच कैदी ने जो प्रत्यक्षदर्शी था,  सन उन्नीस सौ अट्ठावन में बताया कि 13  सितम्बर, उन्नीस सौ चौवालीस के दिन एक उच्च स्तरीय नाजी एस एस अधिकारी विल्हेम रूपर्ट ने नूर की क्रूरतापूर्वक पिटाई की तथा इसके बाद उनके सिर में पीछे की तरफ गोली मार दी गई जिससे वे शहीद हो गईं. इसके  बाद तुरंत नाजियों  ने उनके शरीर को  जला दिया.

          नूर-उन-निसा इनायत खान द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जॉर्ज क्रॉस पाने वाली मात्र तीन महिलाओं में से एक हैं. उन्हें फ्रांस ने भी अपने वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया है. ब्रिटिश लेखक जीन ओवर्टोन ने नूर की जीवनी 'मैडेलीन' नाम से लिखी है.  इस जीवनीकार के अनुसार नूर राष्ट्रीयता के  विचारों से ओतप्रोत थीं तथा उन्होंने कहा था कि यदि कभी उन्हें भारत और इंग्लैंड में से एक को चुनना हो तो वे भारत को चुनेंगी. उनका इरादा युद्ध की समाप्ति के बाद भारत जाकर  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम  में भाग लेने का था. पर उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. हर भारतवासी को नूर जैसी बहादुर महिला पर नाज होना चाहिए जिन्होंने एक दूसरे देश की आजादी बनाए रखने के प्रयास में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए.

Friday, 21 March 2014

अधूरा होली-मिलन (व्यंग्य-Satire)

          नीचे दी गई परिस्थितियाँ और पात्र पूरी तरह काल्पनिक हैं जिनका उद्देश्य सहज हास्य है. वास्तविकता से इनका कोई लेना- देना नहीं है. किसी पात्र  या परिस्थिति के साथ इनकी किसी तरह से साम्यता महज संयोग है जिसके लिए लेखक जिम्मेदार नहीं है
        
           राजधानी में आयोजित राजनैतिक होली मिलन समारोह  में प्राय: सभी प्रमुख राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि आमंत्रित हैं.सर्वप्रथम एक द्वार  से तुरगेंद्रजी तुरग (घोडे) पर सवार होकर आते दिखाई देते हैं. उनके पीछे फाँसवानजी, श्रीमती फुरंदेश्वरी, तमिल हीरो 'कैप्टन', श्री मुदितराज, श्री मुदिमुरप्पा, खल्यान सिंह, दगदम्बिकापाल आदि वे सभी नेता हैं जो पिछले कुछ अरसे  के दौरान बह जल पार्टी  में शामिल हुए या फिर लौटकर वापस आए हैं.

         तुरगेंद्रजी हाथ से अपने पीछे की तरफ इशारा करते हैंं और पत्रकारों से कहते हैं-" देख लो! सारे पत्ते उड-उड कर किस तरफ आ रहे हैं, हवा किस तरफ बह रही  है."
एक पत्रकार- " सो तो है, पर क्या हम कुछ सवाल उन लोगों से पूछ लें जो आपके पीछे-पीछे आ रहे  हैं "
तुरगेंद्रजी-" हाँ-हाँ! पूछो जिससे जो भी पूछना हो."

  एक पत्रकार फाँसवानजी से-" आपके अनुसार तो तुरगेंद्रजी साम्प्रदायिक थे ,फिर आप उनके  साथ कैसे आ गए?"
फाँसवानजी- "सच बताऊँ?"
पत्रकार-"अवश्य"
फाँसवान-"आप जहाँ जाइएगा, हमें वहाँ  पाइएगा."
पत्रकार-" पर आप तो हमेशा तुरगेंद्रजी के साथ नहीं रहे हैं.  आपने  तो उनके और गुजरात के सवाल पर ही गठबंधन छोडा था."
फाँसवानजी-‌" यहाँ आप से मेरा मतलब सत्ता से है. जहा सत्ता रहती है वहाँ  हम रहते  हैं. तुरगेंद्रजी के पास सत्ता आती दिख रही है इसलिए हम  उनके साथ आ गए हैं."
पत्रकार-"लेकिन साम्प्रदायिकता के मुद्दे का और ओसामा बिन लादेन के उस डुप्लीकेट का क्या  हुआ जिसे आप साथ लेकर घूमा करते थे?"
फाँसवानजी-" जैसे बालीवुड में फिल्म बनाने वाले अपनी फिल्म को हिट करने के लिए नए-नए फार्मूले आजमाते रहते हैं,वैसे ही हम भी करते हैं. पिछले इलेक्शन में इन फार्मूलों ने नहीं काम किया तो नया फार्मूला आजमा रहे हैं"
पत्रकार - "लेकिन तुरगेंद्रजी क्या  अब आप के लिए साम्प्रदायिक नहीं रह गए?""
फाँसवानजी-" देखिए कहावत है कि दुनिया अपनी औलाद से हारती है. सो जब मेरा कुलदीपक कह रहा है कि न्यायालय ने तुरगेंद्रजी को दंगों के आरोप से मुक्त कर दिया है तो मेरे सामने इसके सिवाय चारा क्या है कि मैं भी इसी बात को दुहराऊँ. "
पत्रकार - "यानी कि अब आप तुरगेंद्रजी को साम्प्रदायिक न तो कहते हैं और न ही मानते हैं"
फाँसवानजी - "बिल्कुल ठीक." 
पत्रकार - "यानी कि अब आपने अपनी जबान पलट रहे हैं!"
फाँसवान- "जबान पलटने का सवाल ही कहाँ  है? मेरी तो जबान दोनों तरफ एक  जैसी है. लीजिए देखिए "
फाँसवानजी अपनी जीभ बाहर निकालकर दिखाते हैं.फिर जीभ को पलट कर दिखाते हैं. दोनों तरफ  जीभ बिल्कुल एक जैसी है. फोटो पत्रकार क्लिक-क्लिक करते  हुए उनके जीभ की फोटो खींचने में  लग जाते  हैं


एक अन्य पत्रकार तमिल हीरो 'कैप्टन' की तरफ मुखातिब होता और प्रश्न करता है-" सर तमिल फिल्म इंडस्ट्री के डायलागों में आपको 'सत्यवादी ' का पडोसी बताया जाता है. पर सत्य का ठेका इन दिनों राजा  हरिश्चंद्र  के पास नहीं है.इसे 'आप यहाँ आए किसलिए पार्टी'  ने ले रखा है. फिर आप "आप यहाँ..." के साथ न जाकर बह जल पार्टी के साथ क्यों आ गए?"
कैप्टन- "लगता है  तुमने चाणक्य का मंडल सिद्धांत नहीं पढा. "
पत्रकार-"सर मैंने पढा भी नहीं है और  आप  क्या कहना चाहते हैं वह भी मैं नहीं समझ पा रहा हूँ."
कैप्टन-" मंडल सिद्धांत के अनुसार पडोसी पडोसी का शत्रु होता है और पडोसी का पडोसी जो आपका पडोसी नहीं है वो आपका मित्र होता है. फिर अगर सत्यवादी होने की वजह से"आप यहाँ..." मेरी पडोसी है तो मैं उनके साथ कैसे जा  सकता हूँ  और दिल्ली में 'बह जल पार्टी' , 'आप यहाँ.. " की पडोसी है पर मेरी पडोसी नहीं है; इसलिए मेरी मित्र हुई."
पत्रकार-"सर आप तो महान डिप्लोमैट हैं, लगता है विदेश मंत्री आप ही बनेंगे."
कैप्टन' -"मैं  कैप्टन हूँ.मुझे  थलैवर कहो वरना इल्लै-इल्लै पो (तमिल में-कुछ नहीं,जाओ)."
     
एक अन्य पत्रकार खल्यान सिंह की तरफ मुखातिब होता  और प्रश्न करता है-" सर आपने तो भूतकाल  में बह  जल पार्टी को मटियामेट कर देने की घोषणा की थी. फिर अब आप अपनी उस अखंड प्रतिज्ञा को भूल कैसे गए."
खल्यान सिंह-" छोडो कल की बातें,कल की बात पुरानी। नए दौर में लिखेंगे फिर  से नई कहानी."
पत्रकार-"सर पर आप तो फिर-फिर से नई कहानियाँ लिखने  में लग जाते हैं. इस बात का क्या भरोसा कि  आप कल फिर से एक नई  कहानी लिखना नहीं शुरू कर देंगे."
खल्यानजी-" बस अब यही आखिरी कहानी है. जनता  का मुझ  पर से भरोसा इतना उठ चुका  है कि अब मैं कोई नई कहानी लिखने  की स्थिति में नहीं  हूँ."
पत्रकार-" दगदम्बिकाजी के शातिर दिमाग का तो आपको अनुभव है. आपका तख्तापलट कर  वे एक दिन के लिए ही सही राजा बन  बैठे थे. इस बात का  क्या भरोसा  कि वे कल फिर इसे दुहराने से बाज आएंगे."
खल्यानजी-"उनका मामला भी मेरी तरह ही है. होशियार है! अपनी सांसदी बचा ले जाएगा. फिलहाल तो हम  दोनों मिल कर कुछ दिनों के लिए ही सही कल्याणजी-आनंदजी की जोडी  बनाएंगे और राजनैतिक संगीत का सृजन करेंगे."
पत्रकार-" यानी कि यह सुनिश्चित है कि यह कानफोडू  संगीत जनता की श्रवणशक्ति को क्षीण करेगा."
खल्यानजी-"एवमस्तु"

 एक पत्रकार तुरगेंद्रजी से-" सर हवा के साथ  उडकर आए इन पत्तों की मदद से आप कैसे देश  की व्यवस्था को सुधारेंगे?"
तुरगेंद्रजी-"मुगल फौज में बेगार भी भर्ती किए जाते थे. इनमें से  कितनों को मैं बाद में पैदल सैनिक का भी ओहदा दूँगा या नहीं,वो तो मेरे ऊपर  है. वैसे एक राज की बात बताऊँ? "
पत्रकार- "हाँ-जरूर , वही जानने के लिए तो हम आए हैं."
तुरगेंद्रजी-" बाहर से आए यही बेगार कल  पैदल सैनिक  बन कर मेरी ढाल बनेंगे. ये जितने संख्या में अधिक रहेंगे उतने ही  तगडे बफर जोन  का काम मेरे लिए करेंगे. वरना, मेरी पार्टी के  बूढे कब मेरे खिलाफ कौन सा नया बखेडा खडा कर दें  इसका कोई भरोसा नहीं."

         तभी   एक अन्य द्वार से बिगुलजी अपनी माँ मैनियाजी और तनदोहनजी के साथ दल-बलसहित प्रवेश करते हैं. उनके पीछे पय्यरजी, दुरविजय सिंह और रेडनेसजी अन्य अनुयाइयों के साथ तुरही बजा रहे हैं. तुरगेंद्रजी बिगुलजी को देखकर उन्हें एक उंगली दिखाते हैं. बिगुलजी उन्हें दो अंगुलियाँ दिखाते हैं. 
 पय्यरजी - "सर , आप विक्टरी साइन दिखा रहे हैं?"
बिगुलजी - " पय्यरजी जब आप समझ नहीं पाते हैं तो बोला मत किया करिए. "
दुरविजय सिंह - "अरे पय्यरजी! सर कह रहे हैं कि तुम मेरी एक आँख फोडोगे तो मैं तुम्हारी दोनों आँखें फोड दूँगा. है न सर! "
बिगुलजी मुस्कुराते हैं और न में सिर हिलाते हैं.
एक पत्रकार पूछता है - " सर क्या आप दोनों आध्यात्मिक वार्तालाप में निमग्न हैं. तुरगेंद्रजी कह रहे हैं कि एक परमात्मा  है और आप कह रहे हैं कि आत्मा और  परमात्मा दो हैं ?"
बिगुल - " अरे मूर्खों! वे अंकलजी यह कह रहे हैं कि हमारी ग्रेस पार्टी  100 सीटों के अंदर सिमट जाएगी और मैं  कह रहा हूँ कि हमारी दो सौ के  ऊपर सीटें आएंगी . "
पय्यरजी - "सर , आप महान हैं ! "
बिगुलजी अपना हाथ ऊपर उठाकर अँगूठा और शेष चारों उँगलियाँ जोडकर हथेली दिखाते हैं और इसे देखकर तुरगेंद्रजी मुट्ठी बाँधकर दिखाते हैं .
पय्यरजी - " क्या सर ! आपने थप्पड़ दिखाया तो उसने घूँसा दिखा दिया! "
बिगुल - "अगर बात नहीं समझ पाते हो तो चुप रहो !  "
दुरविजय सिंह - " अरे, सर अपनी पार्टी का निशान दिखा रहे हैं और वो हाथ से  फूल बनाने की कोशिश कर रहा था पर फूल बना नहीं पाया , घूँसे की  शक्ल में मुट्ठी बँध गई. ओल्ड  हैबिट्स डाई हार्ड "
पत्रकार - " क्या वास्तव वास्तव में ऐसा है , सर ?"
बिगुलजी फिर मुस्कराते  हैं और न में सिर हिलाते हैं .
पत्रकार - " तो फिर सर! मुझे तो ये विद्योत्तमा और कालिदास वाला मामला लगता है. आपने कहा कि तत्व पाँच है और वे कह रहे हैं कि इनके मिलने से ही सृष्टि बनी  है."
राहुल - "अरे मैं हाथ दिखाकर कह रहा हूँ -'अपना हाथ  जगन्नाथ' और अंकलजी कह रहे हैं दुनिया मेरी मुट्ठी में  "
पय्यरजी - "सर , आप महान हैं ! "

         मैनियाजी और तनदोहनजी पीछे से आगे आ जाते हैं.
तनदोहनजी - " सामने गुजराती आदमी है तो इसका ये मतलब नहीं  है पुत्तर, कि पहले वाले शेयर बाजार की भाषा में  बात करो. अब तो शेयर बाजार भी ऑनलाइन चलता है "
मैनियाजी - "अरे , हम साइन लैंगुएज सीखने नहीं होली मिलन के लिए आए हैं. चलो होली मिलन शुरू करते हैं. "

         इसी समय एक दरवाजे से टोपी लगाए हुए और मफलर बाँधे हुए बकरीवालजी प्रवेश करते हैं. वे चिल्ला कर कहते हैं - " दिल्ली में आयोजित होली  मिलन में पहला अधिकार दिल्लीवासियों का होना चाहिए. फिर किस अधिकार से कौन गुजराती आदमी को यह अधिकार दे रहा है. मैं अभी-अभी गुजरात घूमकर आया हूँ. पूरा गुजरात ही फ्राड है. असली गुजरात तो भगवान कृष्ण के बाद ही द्वारिका के साथ समुद्र में समा चुका है. होली मिलन पर पहला हक मेरा है. अगर किसी ने मेरा यह अधिकार छीना तो मैं तुरंत धरने पर बैठ जाऊँगा. "
बिगुल हाथ जोडकर - " अरे हमने तो पहले भी आपके साथ मिलन किया है और आगे भी मिलन करने को तैयार हैं, इतने उत्तेजित क्यों  हो जाते हो?"
बकरीवाल- " क्योंकि यहाँ बंबानी की साजिश चल रही है. "
राहुल - " वो कैसे बकरीवालजी ? "
बकरीवाल - " अरे ये तो 
बंबानी का नारा था-'कर लो दुनिया मुट्ठी में' .ये तुरगेंद्र मुट्ठी दिखा कर उसी नारे को दुहरा रहा है   "
राहुल - "अरे नहीं भाई.वो अंकलजी कह रहे हैं - दुनिया मेरी मुट्ठी में "
बकरीवाल - " मुझे पता है तुम भी बंबानी के आदमी हो. बंबानी ही इस देश को चला रहा है , मैं  सब समझता हूँ. "
एक पत्रकार बकरीवालजी से- "सर , पिछले कुछ दिनों से आप तुरगेंद्रजी और उनकी पार्टी पर हमलावर हो गए हैं. ग्रेस पार्टी को आपने छुट्टा छोड दिया है.ऐसा क्यों?"
बकरीवालजी - "
ईमानदारी से बताऊँ "
पत्रकार - " अरे सर आप तो स्वयं साक्षात ईमानदारी का अवतार हैंं,फिर ईमानदारी से तो बताएंगे ही."
बकरीवाल - " जब मैं इंजीनियरिंग पढता था तो मेरे एक साथी ने एक दिन कालेज के डाइरेक्टर के चपरासी को थप्पड मार दिया. मैंने अपने उस साथी से पूछा कि तुमने उस बेचारे गरीब चपरासी पर हाथ क्यूँ उठाया. इस पर उसने मुझे एक रहस्य की बात बताई. "
पत्रकार - " वो क्या  सर? "

बकरीवाल - " पहले तुम मेरे साथ उस  दावत में शामिल होने का  वायदा करो जहाँ मेरे साथ खाना खाने के लिए दस हजार का भुगतान करना  पडता है, फिर मैं रहस्य बता दूँगा"
पत्रकार - "सर ये तो मीडिया के साथ नाइंसाफी है "
बकरीवाल - "  मुझे सब मालूम है. पूरा मीडिया बिका हुआ है. मुझे पावर में  आने दो.फिर तुम सब मीडिया वालों से जेल में चक्की पिसवाऊँगा. "
पत्रकार - " सर मैं दस हजार देकर भोजन करने और आम आदमी बनने के लिए तैयार हूँ. ठीक है  सर! अब मुझे रहस्य की बात  बताइए. "
बकरीवाल - " तो ठीक है,सुनो! मेरे इंजीनियरिंग के दिनों के उस साथी ने मुझसे कहा कि देखना कल से ही लोग उस शख्स की बातें शुरू करेंगे और उसे ढूढेंगे जिसने डाइरेक्टर के सेवक पर हाथ उठाने की जुर्रत की और मैं कालेज की मशहूर हस्ती बन जाऊँगा. वाकई बाद में ऐसा ही हुआ. तबसे ही मैंने यह बात गाँठ  बाँध ली और कई मौकों पर ये फार्मूला आजमा चुका हूँ. बडा ही  अचूक और कारगर नुस्खा है ये शोहरत पाने का."    

         इसी समय नैपथ्य से घोषणा होती है - " हमारे सभी राजनीतिक मेहमान आ चुके हैं और हम  होली मिलन कार्यक्रम शुरू कर रहे हैं . "


         तभी लट्ठधारी महिलाओं का एक समूह पंडाल में प्रवेश करता है और नैपथ्य में जाकर घोषणाकर्ता से माइक छीन लेता है. उनमें से एक महिला घोषणा करती है - "हम बरसाने से आई हैं. पैले म्हारे संग लट्ठ्मार होली खेलियो  फिर होली मिलन करियो . " . महिलाओं का दस्ता अपनी-अपनी लाठियाँ लिए हुए राजनीतिक नेताओं की तरफ बढता है. तुरगेंद्रजी अपने तुरग ( घोड़े ) को ऐंड लगाते हैं वह तेजी से हवा में कुलांचें भरने लगता है . उनके पीछे - पीछे उनकी वाहिनी भी दौडने लगती है .

बिगुलजी चिल्लाते हैं - "महिला सशक्तिकरण - महिला सशक्तिकरण! हमें  इलेक्शन लडने के लिए और संसद में ऐसी ही मजबूत महिलाओं की जरूरत है . "
रेडनेसजी - " चोप बचवा! अरे सरेआमकिरपाल  लाठी लैके आओ भाई! धुत !अरे ई सरेआमकिरपला हमरे  दिमाग से निकल नहीं पाय रहा है. अरे घरैतिन तुमहीं लाठी लै के  आओ. हमैं ई मौके पे लाठी की बडी  जरूरत है. "
बकरीवालजी - " हमारे हाथ में पावर आने दो. हम लट्ठ लेकर कूदने वाली इन सब छोकरियों को जेल भिजवा देंगे. इनके खिलाफ फरमान के लिए खाप पंचायत से भी संपर्क करेंगे.फिलहाल तो कोई झाडू लेकर ही  आ जाओ. उसी  से काम चलाना पडेगा.अरे जोगेंद्र,रक्षाबंधनी कोई सुन रहा है. ".


               इसी समय बिजली बंद हो जाती है और अंधेरा छा जाता है . कोई चिल्लाता है-"इस बिजली -कटौती के  लिए बकरीवाल जिम्मेदार है." इस पर बकरीवाल  की आवाज आती  है-"अरे कंबख्तों देश की हर खुराफात  की जड में एक उद्योगपति है."


          " पावर - पावर" का कोलाहल कोरस में गूँजता है और फिर चटाक-चटाक लाठियों की  आवाज सुनाई देती है. चीख-पुकार तेज हो जाती है और थोडी  देर में शांत हो जाती है.


          इसके पश्चात बिजली आ जाती है. पर केवल  लट्ठधारी महिलाएं ही दिखाई दे रही हैं. एक महिला अपनी लाठी फेंककर कहती है-"भाज गयो सब. हो गयो होली मिलन."


         

Friday, 14 March 2014

हमें आज भी वो गुजरा जमाना याद आता है (गजल)

          13 मार्च,2014 को मेरे विवाह की बीसवीं वर्षगाँठ थी. एक दिन पहले गुलाम अली के द्वारा गायी 'इसरार' की गजल "हमें अब भी वो गुजरा जमाना याद आता है" सुन रहा था तभी कुछ मुखडे दिमाग में आए और मैंने 13 मार्च को यह गजल लिख डाली जिसमें इसी मिसरे  का इस्तेमाल करते हुए नई गजल लिखी है. यह मेरी शरीक-ए-हयात को समर्पित  है.

गजल
हमें आज भी वो गुजरा जमाना याद आता है
बीत चुका है जो वो फसाना याद आता है॥

नजरों से कुछ चुरा नहीं रहे थे हम फिर भी
तेरा वो चेहरे पर नकाब गिराना याद आता है॥

रात जब गहरा कर हो चली थी खामोश तब
तेरी पाजेब का सहसा बज जाना याद आता है॥

घटाओं को हटाकर निकल आया हो चाँद
यूँ तेरा रुख से हिजाब हटाना याद आता है॥

खुद का अहसास भी खो चुके थे हम ऐसे में
मन पे तेरा तेजाब सा छा जाना याद आता है॥

पतझड के मौसम ने रुखसती ली थी जब
फागुन में शबाब का छा जाना याद आता है॥

उम्र का इक दौर बीत भी चला है “संजय”
पर आशना बेहिसाब हो जाना याद  आता है॥
-संजय त्रिपाठी,पलता पार्क ईशापुर,14 मार्च 2014


Wednesday, 12 March 2014

"क्लब 160".

          आपने बहुत से क्लबों के बारे में सुना होगा. क्लब का आशय साधारणतया ऐसी जगह से समझा जाता है जहाँ लोगों को सामाजिक मेल-जोल का, कुछ मनोरंजन का और कहीं-कहीं कुछ खास उद्देश्य जैसे कि रोटरी क्लबों या लायंस क्लबों में सामाजिक कार्यों का  अवसर प्राप्त होता है. प. बंगाल में राजनीतिक उद्देश्यों से पहले वाम मोर्चे ने मुहल्ला स्तर पर क्लब बनाए और बाद में तृणमूल  कांग्रेस ने भी यही ढर्रा अपनाया. पर मैं समाचारपत्र में एक नए क्लब के बारे में पढकर हतप्रभ हूँ.

         इस क्लब के बारे में पता लगाया है नारी अधिकारों के लिए लडाई करने वाली सुश्री मधु किश्वरजी  ने. मधुजी के अनुसार यह क्लब भा.ज.पा. के उन नेताओं का है जो  हाशिए पर ठेल दिए गए हैं अथवा जिन्हें भविष्य मे  हाशिए पर ठेले जाने का भय सता रहा है अथवा फिर जिन्हें लग रहा है कि जो स्थान उनका था  उसे मोदी ने छीन लिया है. इन नेताओं की यह धारणा है कि कुछ राजनीतिक दलों द्वारा राजनीतिक अछूत माने जाने वाले  मोदी तभी प्रधानमंत्री बन पाएंगे जब भा.ज.पा. को दो सौ के आस-पास या अधिक सीटें मिलें.   यदि आगामी लोकसभा चुनाव में भा.ज.पा. की सीटें एक सौ साठ के आस-पास सिमट जाएं तो सहयोगी न मिलने के कारण मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे और उस स्थिति में उनमें से किसी एक को यह मौका सहयोगी दल साथ ले आ पाने के कारण  मिल जाएगा अन्यथा फिर वे कम से कम  हाशिए पर जाने से बच जाएंगे..मधुजी के अनुसार मोदी की राह में अडंगे लगाने के लिए इस क्लब के सदस्य ऐसे मुद्दे उछाल रहे हैं जिनके कारण भा.ज.पा. बहुत अधिक बढत  बनाने की तरफ  अग्रसर न हो  पाए.  शायद शंकर सिंह बघेला,चिम्मनभाई शुक्ला,सुरेशभाई मेहता और सबसे बढकर केशू भाई पटेल की छवि इन नेताओं की आँखों के सामने घूम   रही है. है.'क्लब 160' के अस्तित्व के प्रमाण के तौर पर यह भी कहा जा रहा है कि संघ सरचालक  द्वारा कही गई यह बात कि नमो-नमो करना संघ का काम नहीं है जो यह बताने के लिए थी कि संघ अराजनैतिक संगठन है ,इस क्लब से सहानुभुति रखने वाले किसी संघी बंधु  द्वारा ही मीडिया को लीक की गई है.

          "क्लब 160 " का सचमुच  अस्तित्व है या नहीं यह चर्चा का विषय हो सकता है पर यह तो सत्य है ही कि राजनीति जो न कराए वो  कम है. मोदी स्वयं महत्वाकांक्षी हैं इस कारण वे दूसरों की महत्वकांक्षा पर तो प्रश्नचिह्न नहीं लगा सकते. पर उन्हें कम से कम अपने साथियों  की आशंकाएं जरूर दूर करने का प्रयास करना चाहिए जिनमें से अनेक उनके वरिष्ठ हैं अन्यथा इस "क्लब160" के सदस्य ही उनके मार्ग में उनके विरोधियों  से कहीं अधिक बडे कंटक साबित होंगे. 

Tuesday, 11 March 2014

अरविंद और "हार की जीत"

          इंटरनेट पर वाइरल हुए एक वीडियो को कल देखकर मुझे बचपन में पढी हुई "सुदर्शन" की सुप्रसिद्ध कहानी "हार की जीत " फिर एक बार याद आ गई.  पढने के बाद कहानी मन पर छा गई थी . बाबा भारती,उनका घोडा सुल्तान और डाकू खड्ग सिंह जैसे आकर्षक चरित्र और फिर बाबा से सुल्तान को छीनने के लिए डाकू खड्ग सिंह का दीन  दुखियारे अपाहिज का रूप धारण करना जैसा रोमांचकारी कारनामा और अंत में बाबा का मानवता के हित में खडग सिंह से निवेदन  मस्तिष्क में चलचित्र की तरह घूमते रहे थे और वहाँ अमिट रूप से अंकित हो गए.  यह कहानी मुझे क्यों याद आई इस संदर्भ की चर्चा बाद में करेंगे, पहले एक   बार पूरी कहानी संक्षेप में उन लोगों के लिए दुहरा लेते हैं जिन्होने इसे पढा नहीं है अथवा भूल चुके हैं-

          माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत को देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था. भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता. वह घोड़ा बड़ा सुंदर और ताकतवर था. उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में नहीं था. बाबा भारती उसे ‘सुल्तान’ कह कर पुकारते, अपने हाथ से उसे खिलाते-पिलाते. बाबा ने भौतिक मोह - माया का परित्याग कर दिया था और गाँव के बाहर एक छोटे-से मन्दिर में रहते तथा भगवान का भजन करते थे.पर वे सुल्तान का मोह नहीं त्याग सके थे.  सुल्तान की चाल के बारे में वे कहते कि ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो. वे रोज संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर लगा लेते थे .
          खडगसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था. लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे. सुल्तान की ख्याति उस तक  पहुँची.  उसे देखने के लिए अधीर हो खडग सिंह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने खडगसिंह से  हाल-चाल और आने का कारण पूछा. खडग सिंह ने बताया कि वह सुल्तान की तारीफ सुनकर उसे देखने की अभिलाषा से आया है. इस पर बाबा भारती गदगदायमान हो गए तथा उन्होने सुल्तान की चाल और  उसके सौंदर्य का बखान खडग सिंह से कर डाला. फिर वे उसे साथ लेकर अस्तबल गए. बाबा  ने गर्वपूर्वक घोडे को दिखाया. खडग सिंह अचरज में पड गया  क्योंकि उसने ऐसा  बाँका घोडा पहले कभी नहीं देखा था. उसने सोचा कि ऐसा घोडा उसके पास होना चाहिए था,साधु को घोडे का क्या काम. उसने बाबा से घोडे की चाल दिखाने के लिए निवेदन किया. घोडे की हवा में उडने  सदृश चाल देखकर खडग सिंह ईर्ष्या से भर उठा.  डाकू होने के कारण जो भी वस्तु पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था. वापस जाते समय वह बाबा से यह कह कर गया कि वह घोडे को बाबा के पास न रहने देगा.
          बाबा भारती डर गए और रात को नींद के अभाव में जाग-जाग कर अस्तबल की रखवाली करने लगे। पर कई माह बीत गए और खडग सिंह नहीं आया . धीरे-धीरे बाबा भारती का भय मिट  सा गया और वे पुन: पूर्ववत हो गए. एक दिन संध्या के समय बाबा भारती सुल्तान की पीठ पर सवार होकर, आँखों में चमक और मुख पर प्रसन्नता लिए घूमने जा रहे थे. वे घोड़े के शरीर और रंग-रूप  को देखकर मन में फूले नहीं समा रहे थे. अचानक एक तरफ से आवाज़ आई- बाबा, इस कंगले की सुनते जाना. करूणाभरी आवाज़ सुनकर बाबा ने घोड़े को रोक लिया और एक अपाहिज को वृक्ष की छाया में पडे कराहते पाया. बाबा ने अपाहिज के  कष्ट का कारण पूछा. अपाहिज ने हाथ जोड़कर अपने को दुखी बताते हुए दया की प्रार्थना की और तीन मील दूर रामवाला गाँव तक पहुँचा देने की प्रार्थना की जहाँ उसके सौतेले भाई दुगार्दत्त वैद्य रहते थे. 
          बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे. सहसा उन्हें झटका लगा और लगाम हाथ से छूट गई. उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है.  भय, विस्मय और निराशा से वे चीख उठे. वह अपाहिज वास्तव में डाकू खडग सिंह था।
           कुछ देर तक चुप रहने के बाद बाबा भारती ने पूरे बल से चिल्लाकर खडग सिंह से रुकने के लिए कहा.खडग सिंह ने  कहा कि बाबाजी  घोड़ा अब न दूँगा. बाबा भारती ने उससे सिर्फ एक बात सुनने के लिए निवेदन किया. इस पर खडग सिंह ठहर गया.बाबा भारती ने खडग सिंह से कहा कि यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है, मैं  इसे वापस करने के लिए नहीं कहूँगा। परंतु  एक प्रार्थना है इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा. खडग सिंह ने बाबा से  कहा कि वे उसे दास  समझ कर आज्ञा दें पर घोडे को वापस करने की बात छोडकर. बाबाजी ने कहा घोडे का नाम न लो। मैं  इस बारे में कुछ नहीं कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना. खडग सिंह बाबा की बात सुनकर कर चक्कर में पड  गया और उसने पूछा कि बाबाजी इसमें आपको क्या डर है.सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया कि लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास नहीं करेंगे. यह कह कर वे इस  तरह  मुँह मोड़ कर चले गए जैसे उनका सुल्तान से  कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो.
         बाबा भारती चले गए. परंतु उनके शब्द खडग सिंह के कानों में गूँज रहे थे. बाबा को केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग दीन-दुखियों पर विश्वास करना न छोड़ दें. डाकू को लगा कि ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है.   अंततोगत्वा दूसरे दिन रात्रि के अंधकार में खडग सिंह बाबा भारती के मंदिर पर सुल्तान को लेकर पहुँचा .  अस्तबल का फाटक खुला पड़ा था.  खडग सिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया. उस समय उसकी आँखों में  आँसू थे. 
         रात के चौथे पहर बाबा भारती उठने के बाद  अपनी कुटिया से बाहर निकले और स्नानादि से निवृत्त होकर जैसे  स्वप्न में  हों,  अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल का अहसास हुआ और  घोर निराशा ने पाँवों को जैसे रोक सा दिया। पर घोड़े ने अपने स्वामी की पदचाप को पहचान लिया था और वह भीतर ज़ोर से हिनहिनाया. अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़कर  अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो. फिर वे संतोष से बोले-अब कोई दीन-दुखियों से मुँह नहीं  मोड़ेगा.
         अरविंद केजरीवाल के पुण्यप्रसून बाजपेयी द्वारा साक्षात्कार के दौरान उनकी आफ रेकार्ड बातचीत का  वीडियो बहुत से लोगों ने देखा, मैंने भी कल देखा और उसे देखने के बाद ही मुझे सुदर्शन की यह  कहानी याद आ गई. साक्षात्कार के दौरान अरविंद केजरीवाल पुण्यप्रसून से यह अनुरोध करते हुए दिखाई देते हैं कि वे प्राइवेट सेक्टर के बारे में उनके विचारों को न प्रसारित करेंं ताकि मिडिल क्लास उनके खिलाफ न जाए. साथ ही वे "हाशियों पे अस्सी प्रतिशत  समाज" सबंधी अंश को असली वोट बैंक से संबंधित होने के कारण प्रसारित करने तथा भगत सिंह को 14 फरवरी के दिन फाँसी दिए  जाने एवं स्वयं द्वारा 14 फरवरी को इस्तीफा दिए जाने को पुण्यप्रसून द्वारा क्रांतिकारी बताए  जाने पर उसे बार-बार चला कर दिखाए जाने के लिए कहते   हैं . एक आदमी को लोगों ने सच्चा समझा ,तमाम लोगों ने उम्मीद बाँधी कि वह राजनीति को बदल देगा.इंटरनेट पर ही दो महीने पहले देखा कि किसी ने उसकी  तुलना गाँधी से कर डाली. पर आखिर में यदि लोगों को यह पता चलता है कि उसने भी एक मुखौटा लगा रखा है तो लोग क्या इसके बाद फिर दोबारा किसी ऐसे व्यक्ति पर यकीन करेंगे जो यह कहेगा कि वह सच्चाई की राह पर चलने वाला है और तमाम बुराइयों को मिटा देने के लिए राजनीति में अवतरित हुआ है. इस प्रश्न का जवाब निश्चय ही  अरविंद  केजरीवाल के  पास हो सकता है. पर मुझे कभी अपने द्वारा लिखी गई कुछ पंक्तियाँ याद आ गई हैं-
गर बबूल के बीज बोए हैं
                               काँटे ही होंगे आम की उम्मीद नहीं रखना ।
गर किसी का भरोसा तोडा है
                                जफा ही मिलेगी वफा की उम्मीद नहीं रखना ॥

Sunday, 9 March 2014

Thoughts over topics for Kolkata Blogger Meet on 9th of March,2014.

  • ·         How  to retain the inclusiveness and secular fabric of India
  • ·         How to harness potential of of youth for innovation
  • ·         How to empower women to have a greater say in the household decision  
  • ·         How to increase transparency in the governance at all levels


Let me make it clear here that so far as first three topics are concerned, in  my  view  Education & Economic Independence hold key to all the three areas.Let me first take the education.

Education is the most important tool for making of a nation with equal playing field and empowerment of all the sections of society, including the underprivileged,deprived and minority sections ,women as well as  youth of the society. Education in our country is suffering from following diseases-
·         For many marginalized sections of the society ,specially in the remote corners of nation, there are no educational opportunities at all.
·         For many, educational opportunities have been made available but it is not quality education. As a result many a times  we find such students at the H S Level who don’t have basic language skills and mathematical ability.
·         Education has to fulfill the objective of producing responsible citizens . If we  find that the secular fabric of the country is under strain, it  means  education is not helping our national objectives.
·         There are such educational institutions in the country which have fundamentalism as one of their  objectives.
·         Education is not employment oriented  therefore it is producing unemployable graduates. It is  also failing in the objective of making people economically independent.

Solutions- (1) Education has to be universal in the country available to everyone within 5 Km radius of his house and within 2-3 Km radius of a house at the primary level.
(2)Education means quality education with the help of committed and qualified teachers.In the educational field Govt. offers better salary structure and therefore boasts of better qualified teachers yet their performance is lackadaisical and those who can afford, prefer private educational institutions. To make teachers of Govt. Schools performance oriented, carrot and stick policy should be adopted whereby good  performance has to be rewarded  with incentives whereas penalties have to be imposed  for non-performance. Govt. Schools should become model institutions with high standards . These should be utilized as Nodal Agencies for achieving educational objectives.
(3) Curriculum should be such that it inculcate moral and national values including democratic values, secularism, tolerance,equality of gender ,religion and caste as well as  mutual respect for different  sections and communities,shunning  stereotypes  & prejudices.
(4)All the educational institutions whether Govt., private & dependent  on Govt. aid  or totally private have to abide by core values of the nation and make efforts to  inculcate these in the students. Schools which don’t follow it and encourage fundamentalism of any kind have to be penalized and ultimately to be shut down if  don’t fall in line.
(5) After  imparting basic and middle level education only those should be encouraged to go for higher education who are really interested. Others have to be diverted towards Skill development so that they can have some gainful employment or become able for self employment.  I.T.I.s  (Industrial Training Institutes) have to be made nodal agency for skill development.  A lot of changes have taken place in the society in last twenty years and many new professions have come into being so new trades like mobile repairing have to be included in the curriculum of I.T.I.s.
(6) I.T.I.s impart skill training to only those who have a minimum level of education. But there are many who don’t have even minimum level of education ,yet they acquire some skill in the unorganized sector by their private efforts like as automobile repairing,tailoring,embroidery etc. This has contributed a lot in gainful as well as self- employment. Such efforts have to be encouraged and some sort of institutional support should be given for the purpose  . NGOs can be included in a scheme to encourage  and  streamline such efforts.

Emphasis on growth of manufacturing sector-
As a corollary of skill development we have to put  emphasize upon  growth of manufacturing sector. For a robust growth of manufacturing sector we have to create suitable business atmosphere with the help  regarding planning,  know how,  capital arrangement,tax rebate and other appropriate policies . Further  we  have to look for export opportunities in addition to our own internal market . We should look for exploiting even small opportunities for export. China has successfully been doing this.

                The above mentioned  educational  reforms along with the growth of manufacturing sector  will help in retaining inclusiveness and secular fabric of the nation as well as harness potential of the youth for innovation  and help in increasing women have a greater say in the household decision as economic self dependence  is the key for  all the above.

                Inclusiveness and secular fabric  of India can also be strengthened by ensuring that everyone has same opportunity in the nation and no one is favoured or discriminated against. For this purpose procedures and system has to  be clear & transparent in every sphere of life and a fair mechanism for grievance redressal  should be available to every one.Local citizenship participation in Law & Order machinery has to be ensured so that lumpen,troublesome and communal elements are continuously under watch and  their activities are curbed at the initial level itself. Special Police Task Force should be constituted to tackle the hardened among  such elements  who are not amenable.This will check   communal activities along with other law & order problems.

For harnessing the potential of youth for innovation apart from making  economic opportunities available to them we have to increase their participation at the decision making level. For this purpose in every elected body specially those at the local level, a percentage of seats be reserved for them or as an alternative every political party ensure a particular percentage of their candidature.

                Measures which have been discussed earlier, will ensure a better say for the women also as they will be equipped with education , skill and economic self dependence .Women specially in the villages have to face many a times health problems but there are no proper facilities to take their care.So the number of Primary Health Centers has to be increased along with better facilities , preferably there should be at least one P H C within a 5 Km radius . A category of diploma holder medical practitioners  should be prepared and given  permission to practice in the rural areas only to solve the problem of paucity of medical practitioners in these areas. Patriarchal mindset will change as  education with sound values is spread and women gain economic independence. This is already happening, albeit on a small scale.Domestic violence and violence against women should be curbed with strict laws and their more  strict implementation. As intoxication is a major source of violence against women-domestic as well as outside , it is better if prohibition is imposed or some other kind of measure like increasing number of dry days is taken.

How to increase transparency in the the governance at all levels
(1)R T I regime should be strengthened with strict punishment for non compliance.
(2) One day per week( may be initially per month) be fixed in every office when people should be allowed to see the files and documents themselves if they desire so.
(3) Maximum of the office working be online and accessible to people ,for example: exam & result procedure of U P S C or Income Tax Assessment by an ITO be available online
(4)Judicial process has to  speed up and judicial remedy should be time bound.
(5)Every member of the Govt.machinery  whether a peon or a higher up or even the highest one has to be accountable for his each & every official action.

The above is all that I could think about and offer as a solution.

Thanks!