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Friday, 31 January 2014

भारतवर्ष में असमानता की समस्या

          श्री सुनील खिलनानी ने दिनाँक 31जनवरी,2014 के  "टाइम्स आफ इंडिया" में अपने एक आलेख के माध्यम से भारतवर्ष में असमानता के सवाल को अहम बताते हुए इस बात पर खेद जताया है कि  राहुल गाँधी, नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल में  से किसी ने भी इस मुद्दे  पर बात या चर्चा नहीं की है.  उनका कहना है कि पूरी  दुनिया में  असमानता के मुद्दे को  महत्व देते हुए उस पर बहस की जा रही है परंतु भारत में इसकी अहमियत को नहीं समझा जा रहा है.   मैं स्वयं भी श्री खिलनानी के विचारों से इत्तफाक रखता हूँ और इस विषय पर सोचता रहा हूँ तथा इस संदर्भ में यहाँ अपने विचार रख रहा हूँ.

          श्री खिलनानी के आलेख को पढकर लगता है कि उनका आशय मुख्यतया आर्थिक असमानता से है. पर जब हम भारत के संदर्भ में बात करते हैं तो आर्थिक के साथ-साथ सामाजिक असमानता का प्रश्न भी सामने आ जाता है.  कमोबेश सामाजिक असमानता के बारे में समय-समय पर  भारत में बात होती रही है पर हमारे राजनैतिक दलों और नेताओं ने सामाजिक असमानता का निदान प्राय: आरक्षण व्यवस्था को ही समझा है.  आरक्षण सामाजिक असमानता का एकमात्र निदान  नहीं है क्योंकि आरक्षण व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए भी व्यक्ति को कम से कम एक न्यूनतम योग्यता हासिल होनी चाहिए. यदि कोई आर्थिक रूप से कमजोर है तो उसके लिए इस न्यूनतम योग्यता को हासिल करना ही समस्या है.  एक अन्य बात यह है कि आरक्षण का लाभ उठा रहे समुदायों में अब एक वर्ग ऐसा तैयार हो गया है जिसके साथ आर्थिक और शैक्षणिक पिछडेपन  की समस्या नहीं है  और आरक्षण व्यवस्था का अधिकांश लाभ इसी तबके को मिल रहा है . इस कारण आरक्षण  व्यवस्था  की सुविधाप्राप्त समुदायों का एक बडा तबका आर्थिक पिछडेपन के कारण  आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाता है जिन्हें आरक्षण की सुविधा देते समय प्राथमिकता  दी जानी चाहिए तभी आरक्षण का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकता है. पर कुल मिलाकर आरक्षण एक अस्थाई समाधान ही है क्योंकि मुख्य समस्या सभी  को समान अवसर प्रदान करने और एक ही धरातल पर खडा करने की है और इसके लिए सामाजिक भेदभाव की समाप्ति के  साथ-साथ सभी के लिए समान रूप से  शैक्षणिक और स्वयं के विकास अवसर उपलब्ध होना आवश्यक है.

           शिक्षा वह मुख्य तत्व है जो आर्थिक और सामाजिक दोनों प्रकार की असमानता की समाप्ति में सहायक हो सकता है. यहाँ शिक्षा का तात्पर्य हमें समग्र  शिक्षा से  लेना चाहिए जिसके अंतर्गत स्कूली शिक्षा के अलावा तकनीकी,व्यावसायिक और कौशल संबंधी शिक्षा भी शामिल हैं. शिक्षा ही किसी को भी इस योग्य बनाती है कि वह अपनी क्षमतानुसार देश की  सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों  में भागीदारी करे.  पर यहाँ समस्या यह है कि सभी भारतीयों को शिक्षा के अवसर समान रूप  से उपलब्ध नहीं हैं. श्री खिलनानी ने इस  असमान उपलब्धता को द्विस्तरीय शिक्षा प्रणाली की संज्ञा  दी है.  एक ओर स्तरीय निजी शिक्षा प्रणाली है पर मंहगी होने के कारण सभी भारतीय इसका लाभ नहीं उठा सकते हैं. दूसरी ओर सरकारी शिक्षा प्रणाली  सभी के लिए उपलब्ध है पर यह सदैव स्तरीय नहीं पाई जाती है. इस प्रकार समाज का गरीब तबका गुणवत्तापूर्ण शिक्षा  से वंचित रह जाता है. यद्यपि संसद ने शिक्षा के अधिकार को मान्यता दे दी है  पर वास्तविकता में इसके  परिणाम देखने को नहीं मिल रहे हैं. इसके बेहतर परिणाम मिलने के लिए सरकारी शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति में सुधार आना  आवश्यक है जो इन संस्थानों को उत्तरदायी तथा परिणामोन्मुखी  बनाकर किया जा सकता है. सरकारी संस्थानों के प्रमुख,शिक्षक तथा कार्मिक निजी संस्थानों के कर्मचारियों की  तुलना में बेहतर वेतन पाते हैं इसलिए इस बात का  कोई  कारण नहीं है कि ये बेहतर परिणाम न दें. मुख्य समस्या जिम्मेदारी की भावना का अभाव है. नौकरी की सुरक्षा को कार्यनिष्पादन तथा परिणाम के साथ जोडकर सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में जिम्मेदारी की भावना पैदा की जा सकती है.


         जहाँ तक आर्थिक  असमानता का सवाल है ओ ई सी डी की रिपोर्ट के  अनुसार पिछले दो  दशकों में भारत में आय संबंधी असमानता में दोगुने का इजाफा हुआ है. श्री खिलनानी के अनुसार एक दशक पहले किए  गए एक सर्वे के अनुसार  भारत  में असमानता का स्तर ब्राजील  से भी अधिक है. आर्थिक असमानता के संबंध में  भारत की केंद्रीय और राज्य सरकारों के  प्रयास  खैरात बाँटने जैसे ही रहे हैं जो समस्या  को स्थाई  रूप से हल नहीं कर सकते. केंद्रीय सरकार इस दिशा में मनरेगा और खाद्य सुरक्षा अधिकार  को अपनी उपलब्धियों के रूप  में  गिनाती है. पर यह योजनाएं अस्थाई उपाय जैसी हैं जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर नहीं बनाती हैं. जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है वह देश की आर्थिक गतिविधियों  में सक्रिय भागीदारी नहीं कर सकता. राज्य सरकारों में भी कमोबेश केंद्र जैसी यही प्रवृत्ति है. भा.ज.पा. शासित छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह 'चावल वाले बाबा' कहलाते हैं क्योंकि उन्होने सस्ती दर पर गरीबों के लिए चावल उपलब्ध  करवाया है जबकि इसी दल द्वारा शासित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान  बालिकाओं के लिए अपनी आर्थिक सहायता योजनाओं के कारण  'मामाजी' कहलाते हैं. 

        आर्थिक असमानता को दूर  करने के लिए यह आवश्यक है कि देश के  सभी नागरिकों को ,उन्हें भी जो आज की तारीख में गरीब को परिभाषित करते हैं , आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी करने का अवसर मिले. इसके लिए आर्थिक विकासोन्मुखी (ग्रोथ ओरिएंटेड) नीतियाँ आवश्यक हैं जिसकी तरफदारी श्री नरेंद्र मोदी कर रहे  हैं. राहुल गाँधी ने भी अपने प्रथम औपचारिक साक्षात्कार में उत्पादन(मैन्युफैक्चरिंग ) पर जोर देने की बात कही है. पर पिछले पाँच वर्षों के दौरान केंद्रीय सरकार ने इस  दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है . आर्थिक गतिविधियों में बढोत्तरी औरर आम  नागरिकों की उसमें भागीदारी के लिए देश के अपने बाजार के  विकास और उसमें अधिक से अधिक भारतीयों की किसी न किसी रूप में भागीदारी के अलावा निर्यात की नई संभावनाओं को तलाशा जाना महत्वपूर्ण है. निर्यात की संभावनाएं  भी नए-नए बाजारों की खोज, उनकी  जरूरत के  सामान की पहचान और कमतर लागत रखते हुए अच्छी गुणवत्ता के साथ उनके निर्माण और उत्पादन द्वारा ही बेहतर की  जा सकती हैं . चीन ने सफलतापूर्वक इसे कार्यान्वित किया है. दूसरे इस दिशा में हमें सघन प्रयास करने होंगे  क्योंकि आज के दौर में  निर्यात अब उतना आसान नहीं रह गया है. आर्थिक समस्याएं हर देश के सामने किसी न किसी रूप में हैं और विभिन्न देशों की सरकारें 'प्रोटेक्शनिस्ट" हो चली हैं.  विशाल आबादी के कारण स्वयं हमारे देश में ही एक बडा बाजार है.जरूरत इस बात की  है कि अधिक से अधिक जनता के पास क्रयशक्ति हो और उसमें निरंतर बढोत्तरी हो जो औद्योगिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिए जाने पर तथा उसमें अधिक से अधिक लोगों के सक्रिय भाग लेने पर निर्भर है. 

          देश में गरीबी की स्थिति को देखते हुए सहायता योजनाओं तथा कार्यक्रमों को पूरी तरह  बंद नहीं किया जा सकता पर सामान्य जनता पर आर्थिक भार तथा आर्थिक घाटे को कम से कम रखने  के लिए उसे   गरीब तबके  तक सीमित किया जाना चाहिए.  सबको आत्मनिर्भर बनाने तथा असमानता में  कमी लाने के लिए तीव्र आर्थिक विकास का रास्ता ही एकमात्र उपाय है. कुल मिला कर  हमें प्रो. अमर्त्य सेन  और प्रो. जगदीश भगवती  द्वारा प्रतिपादित आर्थिक नीतियों तथा माडलों के बीच एक समन्वय बनाना  होगा ताकि जहाँ गरीबों को फौरी राहत मिले  और उनके लिए जीवन कुछ आसान बन सके वहीं उन्हें वह रास्ता भी मिले जिससे वे गरीबी के दुष्चक्र से सदैव के लिए बाहर आ सकें और भारत में अंततोगत्वा असमानता कम  हो . अन्यथा सामान्य  गरीब जनता तो पिसती रहेगी ही,साथ  ही समाज  में तमाम सारी कानून और  व्यवस्था की समस्याएं इस असमानता के रहते पैदा होंगी जिससे समाज का हर तबका प्रभावित होगा.


Saturday, 25 January 2014

चाय वाला लडका और चाय वालों का सीना (व्यंग्य- Satire)

        नीचे कुछ कल्पित स्थितियाँ और वार्तालाप दिए जा रहे हैं जो पूरी तरह काल्पनिक हैं और इनका उद्देश्य मात्र सहज हास्य है, सच्चाई से इनका कोई लेना-देना नहीं है. अगर इनमें से किसी काल्पनिक कथ्य  या चरित्र की किसी तथ्य या  व्यक्ति के साथ कोई साम्यता पाई जाती है तो वह महज इत्तफाक है .

      स्वतंत्रता के पहले गाँधीजी की बकरी के दूध की काफी चर्चा रहती थी. सत्तर के दशक में रामाराव आदिक द्वारा विमानयात्रा के दौरान रंगीन पेय पदार्थ की बारंबार माँग और उसके बाद विमान की परिचारिकाओं  के साथ उनके उलझने के  साथ भारतीय राजनीति  में नए तत्व की लोकप्रियता का संकेत मिला. इसकी बढी हुई लोकप्रियता को देखते हुए ही  शायद अदम 'गोंडवी' को यह पंक्तियाँ लिखने की प्रेरणा प्राप्त  हुई - 'आया है रामराज विधायक-निवास में,काजू भुने प्लेट में ह्विस्की गिलास में'

      पर इन दिनों भारतवर्ष की  राजनीति में चाय और चाय वाला लडका बहुचर्चित हो गए हैं. चाय के बहाने चौंसठ वर्षीय राजनीतिज्ञ को खुद को लडका कहने का अवसर प्राप्त हो रहा है. इस तरह उसके तथा सत्ताधारी दल के नन्हे बाबा के बीच उम्र का फर्क समाप्त हो गया है और दोनों वय की दृष्टि से बराबरी पर आ गए हैं. दूसरे, हमारे वे भाई जो गौ माता की रक्षा के लिए सदैव समर्पित रहने की बात करते हैं, अब यह भूलकर  कि हमारे पूर्वज आर्य  अन्न आदि न मिलने पर  गौ और  दुग्धपान पर निर्भर रहा करते थे और शायद इसीलिए गौमाता के प्रति इतने कृतज्ञ रहा करते थे; इन दिनों चाय के अनुरागी बन गए हैं. जैसे गाँधीजी ने नमक के सहारे  ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया था, वैसे ही इन्होने  चाय के सहारे कांग्रेसी राज की चूलें हिलाने के मंसूबे बाँध लिए हैं. और तो और, हमारे योग- गुरू  बाबा  भी यह  भूल गए हैं कि कैफीन और टैनिन  से युक्त चाय सदृश द्रव पीना और पिलाना ठीक नहीं है तथा चाय वाले लडके के समर्थन में घूम  रहे हैं.

     सत्ताधारी दल के नन्हे बाबा अपने सिपहसालारों से परेशान हैं जो रह-रह कर  चाय वाले लडके  को उकसाते रहते हैं. एक साहब ने चाय वाले लडके को अपनी पार्टी के अधिवेशनों में चाय बेचने का आफर तक दे डाला. पर  नन्हे बाबा  यह सोचकर परेशान हैं कि चाय  वाले लडके ने यदि सचमुच यह आफर वैसे ही मान लिया जैसे अटलबिहारी बाजपेयी अखबारों में शरीफ के न्यौते की खबर पढकर लाहौर चले गए  थे;  और उनके अधिवेशनों में अपने साथी - बराती साथ  लेकर (जो 'मोदी फार पी एम' की भगवा टोपी लगाए रहेंगे) , चाय बेचने पहुँच गया तो क्या होगा. सारे टी वी और अखबार वाले तो उसी की कवरेज करने और इंटरव्यू लेने में लग जाएंगे और अधिवेशन धरा रह  जाएगा.

     चाय वाले  लडके का इन  दिनों सीने के माप पर बहुत जोर है. उसने गोरखपुर में यू. पी. के नेताजी को जो खुद कभी पहलवान थे, चुनौती देने की हिमाकत कर डाली कि पहले छप्पन इंच की छाती लाओ फिर उत्तर प्रदेश के विकास की बातें करो. नेताजी की पार्टी ने अभी थोडे ही दिनों पहले सैफई महोत्सव कर विकास का नमूना पेश किया है जिसे चाय वाले लडके ने नजरअंदाज कर दिया. सैफई के पास में ही चंबलघाटी है जहाँ के डाकुओं की हिम्मत के नमूने कभी बालीवुड की फिल्में पेश किया करती थीं. इसलिए यह बडा ही स्वाभाविक है कि चाय वाले लडके के छाती सबंधी बयान पर नेताजी की पार्टी को चंबल के डाकू याद आ गए.
  
     चाय  वाला लडका यह भी  कह  रहा है  कि  इन दिनों हर चाय वाला  सीना तान  कर घूम रहा है. मेरे ख्याल से चाय  वाला लडका अगर यह कहता कि हर चाय पीने वाला  सीना तान कर घूम रहा है तो ज्यादा अच्छा होता. क्योंकि यह इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल जैसा हो जाता जिसकी जद में हिंद महासागर समेत पूरा भारतवर्ष होता (बाबा रामदेव जैसों को  छोडकर जो चाय नहीं पीते) जबकि सिर्फ चायवालों की बात करना शार्टरेंज मिसाइल जैसा है जिसकी पहुँच पाकिस्तान के क्रॉस बॉर्डर एरिया तक ही है.

     अपने घर के पास चाय बेचने वाले जुम्मन चाचा को कल सुबह जब मैं टहलने जा रहा था, गौर से  देखा कि क्या उनका सीना तना हुआ  है. पर मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा. आखिर मैंने हिम्मत कर जुम्मन चाचा से पूछ ही डाला-
"चाचा  सुना है , पूरे भारत में चाय वाले सीना ताने घूम रहे हैं,पर  आपके साथ तो मुझे ऐसा  कुछ दिखाई नहीं दे  रहा."

चाचा कहने लगे-" सीना क्या खाक तना रहेगाइस मँहगाई के जमाने में चाय  बेचकर परिवार और पेट पाल रहा हूँ. घर में बीमार बूढी माँ है, दो जवान बेटियाँ शादी करने को हैं, दो लडके बेरोजगार हैं. बडा लडका गाहे- बगाहे दूकान पर आकर  मदद करने लगा है, पर दूसरा मुहल्ले के निठल्लों के साथ घूमने लगा है. सबसे छोटा बेटा पढने में अच्छा था, सो इंजीनियरिंग कालेज चला गया है. पर कर्जा लेकर उसका एडमीशन करवाया, अब पढाई  का खर्चा उठाते-उठाते परेशान हूँ. ऊपर से मुजफ्फरनगर में दंगों के शिकार कुछ रिश्तेदार  घर पर आ बैठे हैं जो वापस जाने को तैयार  नहीं. अब तुम्ही बताओ मेरा सीना तना कैसे रह सकता है.”

मैंने कहा-“चाचा आपने इतना परिवार क्यूँ बढाया? इस मँहगाई  के जमाने में पाँच बच्चों का परिवार ? कभी फैमिली प्लानिंग के बारे में नहीं सोचा?”

“नए जमाने के लडके हो सो यही सब बातें करोगे. हम यहाँ चाय की दूकान पर झख मारते कि फैमिली प्लानिंग वालों के पीछे घूमते?”
 
     मैंने अपने मन में सोचा कि मुख्य विपक्षी पार्टी सारे चाय के खोखों को साइबर सेंटर में तब्दील करने को सोच रही है,वह हर चाय के खोखे पर एक फैमिली प्लानिंग एडवाइजरी सेंटर खोलने को क्यूँ नहीं सोचती. मैंने बातचीत आगे बढाई-
“ चाचा आप अपने निठल्ले वाले लडके को पॉलिटिक्स में क्यूँ नहीं उतार देते? सुना है पॉलिटिक्स में ऐसे लोगों की काफी पूछ है.”

“अरे बेटा मेरा लडका निठल्ला है गुंडा नहीं है. पॉलिटिक्स के लिए गुंडई आनी जरूरी है. दूसरे लडका अगर कहीं किसी इलेक्शन में खडा हो गया तो मेरा घर-बार तो बिक जाएगा.”

“चाचा आजकल एक नई पार्टी आ गई है जो सदाचार की पक्षधर है . ये नए-नए लडकों को भी टिकट दे रही है. दूसरे इसके उम्मीदवारों को इलेक्शन लडने के लिए ज्यादा पैसे की जरूरत नहीं होती और ये चंदे से भी चुनाव लड लेते हैं.”

“अरे उसी नई पार्टी की बात कर रहे हो जिसके मुख्यमंत्री एक-दो रोज पहले रजाई ओढकर अनशन पर बैठे थे. खुदा न खास्ता मेरा लडका कहीं उसके फेर में पड गया और अनशन पर बैठ गया तो घर पर बैठी मेरी बुढिया खाना-पानी छोड देगी और रो-रोकर जान दे देगी. सुबह-शाम घर पर जो दो रोटी बनी-बनाई मिल जाती है उससे भी हाथ धोऊँगा. मेरा सर बहुत खा चुके हो, लो ये चाय पिओ , पैसा देने की जरूरत नहीं है पर अब मेरी जान मत खाओ और धंधा-पानी करने दो.”

“ पर चाचा मैं चाहता हूँ कि आपका सीना चौडा और तना दिखाई दे.”

“ बेटा हुक्मरानों से जा कर कहो कि मँहगाई के हालात काबू कर जीने लायक  माहौल बनाएं, दंगे-फसाद चोरी- डकैती और बलात्कार न होने दें, बिजली-पानी और रोजगार नसीब कराएं; फिर मेरा तो क्या, हर हिंदुस्तानी  का सीना चौडा और तना दिखाई देगा.”

मैंने चाचा की इस बात पर उनके आगे सर झुका दिया‌-“हर हिंदुस्तानी यही ख्वाहिश रखता है चाचा!”




Friday, 24 January 2014

काली-पीली सिस्टर!

       कुमार  विश्वासजी  द्वारा  संचालित  कुछ कवि  सम्मेलनों  में  मैंने बतौर  श्रोता  शिरकत  की  है  और  उनके संचालन  को  मैंने  काबिल-ए-तारीफ  पाया है. पर  इधर  उनके  पहले  के  कुछ  कार्यक्रमों  को  लेकर  आपत्तियाँ  उठाई  गई  हैं.  मुआमले  पर  गौर  करने  पर  ये आपत्तियाँ  जायज  लगती  हैं. वस्तुत: लोगों  का  मनोरंजन  करने के  प्रयास  में कार्यक्रमों  की  प्रस्तुति करने  वाले  कई  बार  यह  भूल  जाते    हैं  कि  सार्वजनिक  रूप  से क्या  कहना  उचित   है  और   क्या  कहना  अनुचित  है. यह  कई  बार  कार्यक्रमों के  दौरान  मैंने  अनुभव  किया है. पर कुमार  विश्वास प्रबुद्ध  हैं , इसलिए यदि  वे  यह  कह  कर  अपने  को  बचाने का  प्रयास  करें कि  उन्होंने लिखी  हुई  स्क्रिप्ट  पढी  है तो गलत  है.  वे  अपनी  तुलना  अभिनेताओं से  नहीं कर  सकते  क्योंकि  वे  अभिनय  नहीं  कर  रहे  थे,  बल्कि  बतौर एक  कवि  अपनी  प्रस्तुति  दे  रहे  थे.  कुमार  विश्वासजी द्वारा केरल की  नर्सों को  काली - पीली  सिस्टर  कहने  का मैं  तीव्र  विरोध  करता  हूँ. ऐसा  लगता  है  कि  उन्हें  इनकी सेवाओं   का  कोई  अनुभव  नहीं  है  अन्यथा शायद  उनके  हृदय  से  स्वत:  सिस्टर  शब्द  निकलता . हमारा  किसी  से  कोई  भी प्राकृतिक  रिश्ता कभी  भी उसके  रंग-रूप पर  निर्भर  नहीं  करता. हम  अपनी  माँ को  और  बहन  को  सदैव  उसी  रूप  में  देखते  हैं  भले  ही  उनका रंग-रूप कुछ  भी  हो. फिर  मैं  यह  नहीं  समझ  पाता कि  कुमार  विश्वास  ने  यह  कैसे  कहा कि  काली-पीली  नर्सों  को  देखकर स्वत:  ही ये  विचार  आता  है  कि  ये  सिस्टर ही  हैं. यहीं  वे  आगे  कहते  हैं  कि  अब  उत्तर  भारत   से  नर्सें  आने  लगी  हैं - एकदम  शानदार. किसी  को  शानदार  कहना  गर्व  की   बात  हो  सकती  है  पर  यहाँ  उन्होंने  जिस  संदर्भ में इस  शब्द  का  प्रयोग किया  है वह उस  पेशे  की अवमानना है जो  मानवता  से  और  सेवा  से  जुडा  हुआ  है. दूसरे केरल की हमारी  जो  बहने  नर्सिंग  से  जुडी हुई हैं  यदि  उनके  कार्य को, उनकी  भावना  को और  उसके  प्रति  उनके समर्पण को  कोई देखे तो  निश्चय  ही  वह  यह   स्वीकार  करने के  लिए  बाध्य  होगा  कि  वे  शानदार  हैं; कुमार  विश्वास  द्वारा इस  शब्द  के   प्रयोग  के  संदर्भ  में  नहीं बल्कि  इसके   संपूर्ण  संदर्भों में. यहाँ  मैं कुछ   अनुभव  बाँट  रहा  हूँ जो  शायद  आपके मन  में  भी  इस  धारणा को  पुख्ता  करेंगे.

       आज  से  ढाई  वर्ष पूर्व  मेरी  धर्मपत्नी को कुछ   तकलीफ  के  कारण डॉक्टर  के  पास  ले   जाना  पडा.  . डॉक्टर ने  सर्जरी  करने  का सुझाव  दिया और   वह  अस्पताल  में  भर्ती हो  गईं. उसके  तुरंत बाद उनके  कुछ  चेक-अप  होने   थे. बेड  के  लिए  एलॉटेड नर्स की  ड्यूटी  शायद  खत्म होने  वाली  थी. वह  कम  उम्र की  थी. उसे  देखकर  लगता था कि उसे  अभी  कालेज  में  होना चाहिए  था. उसने  बडी    तत्परता के  साथ  दौड-दौड कर  सारी औपचारिकताएं  पूरी  कीं. उसके  बाद  मेरी श्रीमतीजी से  कहा  कि  मेरी ड्यूटी  अब  खत्म  हो  रही  है  अब  आपकी देख-रेख  के  लिए कोई  और  आएगा.  उसके  उपरांत वह मुस्कराती  हुई  तथा  बाय  करते  हुए  चली  गई. मैं और  मेरी श्रीमतीजी बातचीत  के  दौरान अभी  भी  उसे  याद  करते  हैं. अपने  काम  को   हँसते  और  मुस्कराते  हुए दौड कर करना, वह  भी  तब  जब  ड्यूटी खत्म  होने वाली  हो और  एक  नया  काम सर पर  आ  जाए, कितने  लोग  करते  हैं ? यह  केरल की  एक  मलयाली  सिस्टर  थी. जब  मैं  अपनी श्रीमतीजी को  सर्जरी  के  लिए  ले  गया तथा  बाद  में  वहाँ  से  लाया तो  भी  मेरे  साथ  एक  मलयाली  सिस्टर थी जिसने इस  पूरी  अवधि  के  दौरान यह   सुनिश्चित  किया कि  सभी  कुछ  व्यवस्थित और  अच्छी  तरह  से  हो. मेरी  श्रीमतीजी  के अस्पताल  में  रहने की  अवधि के  दौरान  उन  नर्सों  ने  अच्छी  तरह  उनकी देखभाल  की और  औषधि, भोजन, आराम तथा  परिचर्या  सुनिश्चित  की  जिसके  कारण मैं  अपनी  श्रीमतीजी  के  अस्पताल  में  होते  हुए  घर  में  अपने  अन्य दायित्वों को  अच्छी  तरह  देख  सका. बीमारी  और  शल्यक्रिया  के  दौरान तथा  बाद में कई  बार  ऐसा होता है  जब  मरीज  या  उसके  घर  वाले  भावुक  हो  जाते  हैं.  मेरी  धर्मपत्नी   के  साथ  जब  भी  ऐसे  क्षण   आए  तो  उनका ढाढस बँधाने  के  लिए  ये  मलयाली  सिस्टर  सदैव  उनके पास  होती थीं . दो-चार  दिनों के  बाद  अस्पताल  जाने  पर  मैं  देखने  लगा  कि  मेरी  श्रीमतीजी  ठहाका मारकर हँसने और  हँसी  मजाक  करने  में  लगी  हुई  हैं .  मुझे  आखिर  कहना पडा  कि  तुम्हें  देखकर  तो  यह  लगता नहीं  कि  अस्पताल  में  हो  बल्कि  ऐसा  लग  रहा  हो  जैसे  पिकनिक  करने  के  लिए  आई  हो.  पर  आप यह सोचिए  कि  किसी  मरीज  के  लिए  इससे  अच्छी  बात  और  क्या हो  सकती है कि  अस्पताल  पिकनिक स्थल  बन  जाए. एक सप्ताह  के  बाद  मैं अपनी धर्मपत्नी को  अस्पताल से  घर लाने  लगा. उस  समय  इन  सिस्टर  ने  सारी   औपचारिकताएं  पूरी   कीं . मुझे  सारे  निर्देश  बताए. पूरी केसहिस्ट्री मेरे हवाले  की.  जब  मैं  अपनी श्रीमतीजी को  जो व्हीलचेयर पर थीं लेकर लिफ्ट द्वारा नीचे  के  फ्लोर पर  आया और  बाहर निकला; उसी समय कुछ  नर्सें जो  मेरी  श्रीमतीजी के  वार्ड में ड्यूटी पर रहती  थीं, दूसरी  तरफ  से  आ  रही  थीं. यह  सब मेरी श्रीमतीजी को  विदा  कहने के  लिए  आईं  और  उनसे   गले  मिलीं. कुछ  सिस्टर  उनके  गाल  से  गाल  सटा कर  चुम्बन  लेने लगीं. मैंने  अपनी धर्मपत्नी  से  कहा  कि  ये  सब  तो  तुम्हें मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता   की प्रतियोगियों  की  तरह  विदा  कर  रही  हैं. इस घटना के कुछ महीनों के बाद उक्त अस्पताल में आग लग गई और इन्हीं मलयाली नर्सों ने कई मरीजों की जान बचाई  और इस प्रयास में तीन-चार नर्सों की जान चली गई.


       मैं  कुमार विश्वास साहब  से यह  कहना  चाहूँगा  कि  अगर  उन्होंने किसी और की  लिखी   स्क्रिप्ट पढी  थी  जैसा   कि  उनका कहना है ; तो  वह  निहायत  ही   घटिया  आदमी  था जिसने  वह  स्क्रिप्ट लिखी   थी और उन्हें  उस  स्क्रिप्ट को  पढने से  पहले  अपने स्वविवेक का  इस्तेमाल  करना चाहिए  था. वैसे  प्राय: हम  सब  भारतीय  कहीं  न कहीं  कुछ  नस्लवादी  हैं.  हम  प्राय: अपने ही  देशवासी को इंसान के  रूप   में  परिभाषित करने के  बजाय उसके जाति, धर्म और  प्रांतीयता  के  आधार  पर  परिभाषित  करते हैं और सांस्कृतिक वैभिन्य, खान-पान या  रंग-रूप  के आधार पर अलग-अलग समुदायों  को  उपहास  का  पात्र बनाते हैं. . कुछ  अवगुणों को  समुदाय विशेष से   जुडा  मानते  हैं  और  कुछ  गुणों  को  सिर्फ अपने  समुदाय विशेष  की  बपौती मानते   हैं.  यह  समस्या उन  लोगों  के   साथ   कुछ  ज्यादा  है  जो  कभी  अपने  दायरे  से  बाहर  नहीं निकले और  कुएं  के  मेढक बने  रह गए. कुछ  ऐसे  हैं  जो  कुएं से  बाहर निकलने  पर  भी  कुएं के  मेढक की  मनोवृत्ति को  नहीं  छोड  पाए. यह लोग गली  के उस श्वान की  तरह  हैं जो  दूसरी गली  के  श्वान को  देखते  ही  भौंकना  शुरू  कर  देता  है. ऐसे  लोगों   से  मैं  कहना चाहूँगा  कि  दूसरे  की संस्कृति, मान्यताओं, परंपराओं, खान-पान, वेश-भूषा  और  रंग-रूप  का  आदर  करना सीखें. विभिन्नता  में  एकता  ही  हम  भारतीयों   का वैशिष्ट्य है. कृपया इस पर प्रहार   न  करें  तो   देश  की  बडी  सेवा  होगी.

Monday, 20 January 2014

अगर वो गंजों को कंघा बेच रहे हैं तो तुम चम्पी का तेल ही बेचो ! (व्यंग्य- Satire)

           नीचे कुछ कल्पित स्थितियाँ और वार्तालाप दिए जा रहे हैं जो पूरी तरह काल्पनिक हैं और इनका उद्देश्य मात्र सहज हास्य है, सच्चाई से इनका कोई लेना-देना नहीं है. अगर इनमें से किसी काल्पनिक कथ्य  या चरित्र की किसी तथ्य या  व्यक्ति के साथ कोई साम्यता पाई जाती है तो वह महज इत्तफाक है जिसके लिए लेखक जिम्मेदार नहीं  है.

       सत्ताधारी  पार्टी  की  राष्ट्रीय  कार्यकारिणी  के  हाल  ही  में राजधानी में  संपन्न  दिल्ली  अधिवेशन में नन्हे  बाबा ने कहा  कि  मुख्य  विपक्षी  पार्टी के  लोग मार्केटिंग  के  काम   में  माहिर  है. इतने  माहिर  कि  वे  गंजों  को  भी  कंघा बेच  सकते  हैं. दिल्ली  में  सत्ता  में  आई पार्टी  की  ओर  इशारा  करते  हुए  उन्होंने  कहा कि  नए  लोगों  ने   तो  गंजों   का  बाल  काटने  के  लिए  सैलून  ही  खोल  दिया  है.  एक  समाचार  के  अनुसार नन्हे बाबा  के  आस-पास  जो  भी   गंजे थे  वे   उनका बयान  सुनकर अपनी- अपनी बगलें  झाँकने  लगे  क्योंकि  उन्हें   लगा कि नन्हे बाबा को  कहीं  ये  न लगे   कि  वे  कंघा   खरीदने  के लिए  तैयार  हैं या  फिर  कंघा खरीद  चुके   हैं. कुछ  ने  तो  यूँ  ही  अपनी  चाँद  पर  हाथ  फिरा  लिया  ताकि नन्हे बाबा  ये  समझ  जाएं  कि  वे  यूँ  ही हाथों  से  सर सहला  लेते  हैं  और  कंघे  की  जरूरत नहीं  समझते.  कुछ  के  पास  टोपियाँ थीं  जो  उन्होने  झटपट  जेब  से  निकाल कर  सर  पर  लगा   लीं.  कुछ  गंजे   जो   पहले  से  ही  टोपी लगा  कर  आए  थे प्रसन्न  होकर  मुस्करा  रहे  थे  कि   देखो  हम  ही  यहाँ  सबसे  होशियार हैं,  हम  भी  गंजे  हैं नन्हे  बाबा को  पता  ही  नहीं  चलेगा.

       मैंने  मुख्य विपक्षी दल के एक गंजे हो चले बंधु  से  पूछा- आपने नन्हे  बाबा  की  बात  सुनी,  आखिर  आप  लोग  गंजों  को  कंघा क्यूँ  बेच  रहे  हैं?”  वे   गुस्से में  आ  गए  और  कहने लगे-  “आप इनसे  ये  तो  पूछिए  कि  पिछले दस  सालों से  देश  की  जनता  को  गंजा  कौन  कर  रहा  है  और  फिर   जब  इन्होंने  गंजा  किया है  तो  हम  भी  लोगों  से  कह  रहे  हैं  कि  अखबारों में  हेयर फैरी  और   हेयर  किंग  तेलों  के  विज्ञापन  पढो  और  अपनाओ,  जल्दी  ही  तुम  बाल  वाले  हो  जाओगे  फिर  उसके  बाद  तो  तुम्हे  कंघे  की   जरूरत  पडेगी  ही  और  लोगों  को   हमारी  बात  पर  अगर  यकीन  हो  रहा  है  तो  इसमें  हमारी  क्या गलती  है ? जो  पैसे  वाले  हैं  उनको  हम  डॉ.  खतरा और  डॉ.  ढाल  के  पास  भेज  रहे  हैं  जिन्होने अपना  बैंक  बैलेंस  बढाने  के  लिए पूरे  भारत के पैसे वाले गंजों  को  बाल  वाला बनाने  का  प्रण  किया है.  इससे वे  भी हमारे  कंघे खरीद  रहे  हैं.  अब  बोलिए,  गंजा उन्होंने बनाया  और फिर  भी  हम  कंघे  बेचे  ले  रहे  हैं तो इसमें क्या गलती  हमारी  है ? आखिर  जिसने  गंजा  बनाया  उसी  से  गंजा  हुआ   इंसान  कंघा  क्यूँ  लेगा ?"  इसके  बाद  उन्होने अपनी  जेब  से  कुछ  रंगबिरंगे  कंघे  निकाले और उनमें से एक अपने सर पर बचे दो-चार बालों  में  फिरा  कर  दिखाने  लगे. फिर हमारी  तरफ कंघे  बढाकर  बोले -  ले  लीजिए  आप  भी  इनमें  से  कोई  एक  जो  पसंद  हो,  कीमत  बस  यही  एक  वोट.”  मैंने  कहा -  “देखिए  प्रभुवर!  मेरा  तो  सर  अभी  पूरी  तरह  खाली  हुआ  नहीं  है ,अभी  आधे - तीहे  बाल  बचे  हुए  हैं . जरा  नए  वाले सैलून  में  बाल  कटवा कर  आता  हूँ  फिर  विचार  करता  हूँ.”  यह  कह  कर  मैं  नए  वाले  हेयर  कटिंग  सैलून  की  तरफ  चला  गया.

       वहाँ मैंने  देखा  बिल्कुल  नया  साइन बोर्ड  लगा हुआ  था-  “कजरारे – कजरारे हेयर कटिंग सैलून.” साइनबोर्ड  देखकर   मैं  जरा  ठिठका  पर  फिर  अंदर   चला  गया.  वहाँ  अजीब  नजारा  था.  दो   कुर्सियाँ शीशे  के आगे  लगी  हुई  थीं   और  दोनों  पर  दो  गंजे  बैठे  हुए  थे.  कुर्सियों  के  पीछे  एक  व्यक्ति गले  में  मफलर  डाले  और  सर   पर  टोपी लगाए शायद  बाल  काटने की  तैयारी  में एक हाथ  में   कैंची लिए  हुए  था .  उससे  मैंने   पूछा-  “भाई  साहब  क्या  यहाँ बाल  वालों  के  भी  बाल  कटते   हैं  या  सिर्फ गंजों की  ही  सेवा  होती है ?” उस   व्यक्ति  ने  अपने होठों  पर  एक  उँगली रखकर मेरी  तरफ  देखा और  चुप  रहने का  इशारा   किया. इसके  बाद वह  बडी   तेजी  से  कैंची  लेकर  गंजे  आदमी  के   सर  की   तरफ  लपका.  मैं  डर  गया.  पर  उस  व्यक्ति  ने  अपनी  उस  कैंची से  जैसे  झपट्टा  सा  मारते हुए  कैंची के  बीच एक  मक्खी को  पकड  लिया.  मैंने  विरोध  प्रकट किया- “ये  क्या  तरीका  है ?  कहीं इन गंजे भाई  साहब  के  सर   में  चोट  लग  जाती  तो ?” 

“तुम  नहीं  समझोगे” वह  बोला,”  मैं   भ्रष्टचार   मिटा रहा  हूँ, भ्रष्टाचार.”

“ऐसे  कैसे  भ्रष्टाचार  मिटेगा ”- मैंने  कहा.

“जो  मुझे  दिखता  है  वह  तुम्हें नहीं दिखता. यह  मक्खी  इन  सज्जन  के  सर  पर  बैठकर किसी  दूसरी  मक्खी  को  फोन  पर  कह रही  थी  कि   तुम्हारे लिए एक  बढिया  खाली  प्लाट  देखा   है. मेरा   कमीशन  दो  तो  पता  बता  देती  हूँ, आकर  कब्जा  कर  लो” .

“पर  फोन?  वो  भी  मक्खी  के  पास ! ”- मैंने  कहा.

“कहा  न,  जो  मुझे  दिखता  है  वो  तुम्हें नहीं दिखता.  अति  सूक्ष्म यंत्र  धारण  कर  रखा है  उसने” –वे  बोले. फिर  उन्होने  मुझे  एक   इयरपीस  जैसा  कुछ   दिया  और  बोले-  “इसे  अपने  कानों में    लगा  लो, जो  भी  षडयंत्रकारी तुम्हारे  पास  आकर  फुसफुसाएंगे,  वे  मच्छर  हों  या  मक्खी ,उनकी  बात  सुन  और  समझ  सकोगे.” 

मैंने इयरपीस  अपने  कानों  में  लगा  लिया. तभी  मैंने  देखा कि  मेरे  सर  पर   छोटी और  बडी दो मक्खियाँ  आकर  बैठ  गईं. थोडी  ही  देर  में  मुझे  अपने कानों  में  आवाज आने  लगी – “ माँ, ये  किनारे  वाली  सडक  तो   चौडी  है.”

“हाँ बेटी, पर  पहले यहाँ पगडंडी  थी जो  अब  सडक  बन  गई  है.  फिर  भी  पूरा  प्लाट  खाली  होने  में  अभी  कुछ  साल  लग जाएंगे

“ तो  भी  देखकर  रखते  हैं   माँ,  जगह  अच्छी  है.”

       अब  तक  मैंने  देखा  कि  टोपी  मफलर  वाले   सज्जन कैंची  लेकर  मेरे  सर  की  तरफ  संभवत: भ्रष्टाचार  मिटाने  की  नीयत  से  लपक  रहे  हैं.  मैंने  सैलून से  नौ   दो   ग्यारह  होने  की  नीयत  से  दौड  लगा   दी. पर  सैलून  के  बाहर टोपी  लगाए  हुए और  हाथ   में  झाडू   लिए हुए एक  सज्जन  ने  मुझे  पकड  लिया और  बोले - “ऐसे  कैसे  भाग  रहे  हो, अरे  टोपी तो  लगवाते  जाओ.”

मैंने अनुनय  की - “  भाईजान मैं  अभी  टोपी नहीं लगवाऊँगा. फिर किसी  दिन के  लिए  छोड  दीजिए.जरा  जल्दी  में  हूँ ”.

“तो फिर  मेरी  एक कविता ही  सुनते  जाओ”

“क्या बकवास  है” मैंने  कहा.

“बकवास नहीं है, विश्वास  करो ”

“पर बताया  न, मैं   जरा  जल्दी  में  हूँ ”

“तो टोपी ही पहनो.”

मैंने उनके  आगे  शीश  नत कर दिया  और  उन्होने  झटपट  मुझे  टोपी  पहना  दी. “अब  तो  बख्श दो  प्रभुवर” – मैंने  कहा.  

“ठीक  है, जाओ पर  आज  शाम  को मेरी  ताजा  रचना राजकुमार  और  अमेठी सुनने  आ  जाना ” वे  बोले.

       मैं   वहाँ   से  सरपट  भाग  निकला  कि  कहीं अंदर से  कोई  कैंची  लेकर मेरी  तरफ भ्रष्टाचार मिटाने  की  फिराक  में न आ जाए. सुना  है  इस सैलून के  मुरीद  आजकल  आधी रात  गाहे- बगाहे  किसी  के  भी  घर  में; कौन देशी है कौन विदेशी , कौन महिला  है  कौन  पुरुष इसका  विचार  किए  बिना भ्रष्टाचार  मिटाने के  लिए  घुस जाते  हैं.

       जैसे  ही  सडक  पर  आया  तो  देखा नन्हे  बाबा गाडी में बैठकर  आ  रहे  थे. उनके पीछे पूरा  अमला  चला  आ   रहा था. मुझे देखकर  उन्होने  गाडी  रोक  दी , और बोले- “ कजरारे  सैलून  से  आ रहे  हो?” शायद  उन्होने मुझे  सैलून  की   तरफ   से आता   देख  लिया    था.

“हाँ, पर  आप  पूछ  क्यूँ रहे  हैं ?”

“जनता को  कितना  समझाता  हूँ,समझती  नहीं.”

“नन्हे बाबा ! जब दूसरे  गंजों  को  कंघा  बेच  रहे  हैं  और  उनके  लिए   सैलून  खोल  रहे हैं तो  आप   भी  उनके  लिए  कुछ  क्यूँ  नहीं करते?”  मैंने  कहा.

“ क्या  करूँ?” वे  त्यौरियाँ  चढा  कर  बोले.

“आप  कुछ  नहीं  तो  कम  से  कम उन्हें चम्पी करने  वाला  तेल  ही  बेचो.  उन्हे  बताइये  कि  ठंड के दिनों  में  ये  तेल  दिमाग  में  गर्मी   पहुँचाएगा  और  गर्मी में  दिमाग  को ठंडा  रखेगा. नूतनरत्न   तेल  की  मॉडलिंग   करने वाले हीरो तो  आपकी  पार्टी से  जुडे  रहे  हैं. उनका  अनुभव  भी  आपके काम  आएगा.”

“ गुड आइडिया, पय्यरजी इसे नोट कीजिए.” नन्हे  बाबा  ने  पय्यरजी  को   इशारा  किया.

“सर  मुझे  ये  बेचने-बाचने  के    चक्कर  में  मत  लगाइए. मैं  दक्कन का   खानदानी  ब्राह्मण हूँ. ऐसे  ही देखिए, मैंने किसी  को  चाय  बेचने का  आफर  क्या  दिया, बवेला मचा  हुआ  है.” पय्यरजी बोले.

“अरे भूल  जाओ  ये  झूठे  खानदानी  किस्से. जमाना मार्केटिंग का  है. तुम  बूढों के  साथ यही  समस्या है. आज  भी गुजरे  हुए जमाने  में  जीते  हो.  नहीं  सुधरोगे  तो  ये  आम    आदमी हमें  उठाकर  डस्टबिन  में  फेक  देगा. इसलिए  इसकी  बात   सुनो  और  तुम  चम्पी  के  तेल  की  गंजों  को  मार्केटिंग  करने  में  लग  जाओ.”

 “सर-सर,यस सर-यस सर.जरूर-जरूर सर.  मैं  अभी  तुरंत   ही  ये  काम   शुरू  कर  दूँगा.”

“गुड!” नन्हे  बाबा पय्यरजी  की  पीठ  ठोंककर  बोले. पय्यरजी गदगदायमान  हो  गए.


       इसके  बाद नन्हे  बाबा  ने अपने  अमले  को  आगे  रवाना  होने  का  इशारा किया और  मुझे  बाय  करते हुए  आगे बढ  गए. 

Friday, 17 January 2014

सुचित्रा और सुनंदा - कम्पेयर एवं कंट्रास्ट !

                             आज दिनाँक 17 जनवरी,2014 का दिन विषादमय सा प्रतीत हो रहा है क्योंकि आज प्रात: सुचित्रा सेन की मृत्यु का समाचार मिला जिन्होंने अपनी अभिनय प्रतिभा से बंगला एवं हिंदी दोनों ही भाषाओं के फिल्म जगत को नई ऊँचाई प्रदान की थी. मात्र सोलह वर्ष की उम्र में शिक्षक करुनामय दासगुप्ता की इस बेटी रोमा दासगुप्ता का विवाह देबनाथ सेन के साथ हो गया था. रोमा ने संगीत,नृत्य और कला की शिक्षा शांतिनिकेतन से ग्रहण की थी. मूलतया वे गायन में रुचि रखती थीं तथा प्लेबैक सिंगर बनने की इच्छा के साथ उन्होने कोलकाता के पार्कस्ट्रीट में स्थित एक स्टूडियो में इसके लिए आडीशन दिया. उनका चयन हो गया था पर बाद  में उसी स्टूडियो में उन्हे अभिनेत्री बनने का प्रस्ताव मिला जिसे उन्होने तथा उनके पति ने थोडी हिचकिचाहट के साथ स्वीकार कर लिया.   इसके बाद आगे जो कुछ घटा वह अब बंगला फिल्मों का स्वर्णिम इतिहास माना जाता है.  उनकी पहली रिलीज फिल्म 'सात नम्बर कायेदी' के सह निदेशक नितीश रॉय ने उन्हें नया नाम सुचित्रा दिया. बंगाली फिल्मों के महानायक उत्तम कुमार के साथ आगे चलकर उन्होंने हिट जोडी बनाई  तथा वे बंगाल में आदर्श सम्भ्रांत बंगाली महिला का पर्याय समझी जाने लगीं. सात पाके बाँधादीप जोले जाईउत्तर फाल्गुनी, देवदास, बंबई का बाबू, ममता तथा आँधी उनकी सुप्रसिद्ध फिल्में थीं. वे मास्को फिल्म फेस्टिवल में 'सात पाके बाँधा' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीत कर बंगला फिल्मों के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली प्रथम अभिनेत्री बनी  थीं. हिंदी फिल्म आँधी में अपने जोरदार अभिनय के लिए वे सराही गई थीं पर नामित होने के बाद भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार पाते-पाते रह गई थीं. वे पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हुईं. पर जीवन के सांध्यकाल में  उन्होंने चमक-दमक की दुनिया से अपने को अलग कर लिया था. वे घर के भीतर  ही रहती थीं तथा बाहर कहीं आवश्यक होने की स्थिति में जाने पर भी स्वयं को छिपा कर रखती थीं. इस कारण उन्हें कुछ लोग भारत की ग्रेटा गार्बो  कहने लगे. यहाँ तक कहा जाता है कि दादा  साहब फाल्के पुरस्कार का प्रस्ताव पाने पर उन्होंने उसके लिए मना कर दिया था क्योंकि उसे लेने के लिए उन्हे घर से बाहर जाना पडता. विगत वर्ष प. बंगाल की सरकार ने उन्हें बंग विभूषण पुरस्कार प्रदान किया पर वे उसे ग्रहण करने नहीं गईं तथा इस हेतु उन्होने अपनी बेटी मुनमुन सेन को भेज दिया था. वस्तुत:  उनका नश्वर संसार से मोहभंग हो गया था तथा वे आध्यात्म की तरफ उन्मुख हो गई थीं. किसी ने उन्हे बेलूर मठ में, जहाँ वे देर रात गए या फिर  भोर में आया करती थीं,  कहते हुए सुना था- 'आमी पुनरजन्मो चाई न.ठाकुर आमी जेनो तोमार चरने थाई पाई ( मुझे पुनर्जन्म नहीं चाहिए.भगवान मुझे अपने चरणों में जगह दो).'  गुलजार साहब के अनुसार वे पांडिचेरी स्थित महर्षि अरविंद आश्रम में भी  जाया करती थीं. उन्होने बेलूर मठ के स्वर्गीय भरत महाराज के निर्देशानुसार स्वामी बीरेश्वरानंदजी से दीक्षा ले ली थी. पर जब तक वे अभिनय जगत में रहीं उन्होने अपनी शर्तों पर काम किया तथा बांगला  जगत में महानायिका कहलाईं. वे जीवंत अभिनय के साथ अपनी बंगला तथा हिंदी फिल्मों में सदैव अस्तित्वमान रहेंगी भले ही उन्हें पुनर्जन्म की इच्छा न रही  हो .

         पर  सुचित्रा सेन की मृत्यु  से भी अधिक दु:खद  सुनंदा पुष्कर के दिवंगत होने का समाचार है क्योंकि सुचित्रा ने तो अपने जीवन को पूर्णता के साथ जिया था पर सुनंदा ने अभी कुछ ही समय पहले जिस उम्र में सुचित्रा सेन संसार से विमुख होने लगी थीं लगभग  उसी  उम्र में शशि थरूर से विवाह कर ( दोनों के जीवन का विरोधाभास देखिए) अपना जीवन नए सिरे से प्रारंभ किया  था. उनकी मृत्यु  रहस्यमय परिस्थितियों में दिल्ली के होटल लीला में हुई पाई गई है जिसके कारणों का खुलासा शायद दो-एक दिनों में पुलिस कर सके. पर जिस तरह पाकिस्तानी पत्रकार मेहर तरार के द्वारा अपने  पति शशि थरूर को किए जा रहे ट्वीट को लेकर उन्होंने अपना रोष व्यक्त किया था;  उसके बाद पति-पत्नी द्वारा सब कुछ ठीक-ठाक होने का स्टेटमेंट जारी किया जाना, रात में उनका होटल में आकर चेक-इन करना और अगले दिन मृत पाया जाना यह सब रहस्यमय और दु:खद है. सुनंदा पुष्कर का  अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व था और उनके सुप्रसिद्ध पति की उपस्थिति में भी वह दबा नहीं बल्कि अपने विचारों को अभिव्यक्ति देने में  उन्होंने कोई संकोच नहीं किया. यहाँ तक कि कुछ दिनों पहले उन्होंने जम्मू काश्मीर में स्त्रियों के अधिकारों को लेकर नरेंद्र मोदी द्वारा व्यक्त  विचारों का समर्थन किया था. देश के लिए सशक्त व्यक्तित्व वाली महिलाएं निधि की तरह हैं जिनका असमय काल के गाल में चले जाना क्षतिपूर्ण है. उनकी हत्या की गई, अथवा व्यथित होकर उन्होंने स्वयं अपना जीवन ले लिया इस बात की जाँच तो पुलिस करेगी पर जो कुछ हुआ वह दु:खद है. सुनंदा की मृत्यु एक  यह प्रश्न भी उपस्थित करती है कि क्या किसी भी उद्दाम प्रेम का अंत टूटन के साथ ही होता है.

         हम  सब  उक्त दोनों सशक्त नारी व्यक्तित्वों को मात्र श्रद्धाँजलि दे सकते हैं और उनकी आत्माओं  को शांति मिले तथा उनके परिवार  के  लोगों को ईश्वर  दु:ख सहने की शक्ति एवं धैर्य प्रदान करें  यही प्रार्थना मात्र कर सकते  हैं.
















Wednesday, 15 January 2014

Dear Mr. Wayne May & Alicia May!

Dear Mr.  Wayne May & Alicia May,

           I feel very sad for you after coming to know that you both were troubled a lot after being posted at U.S. Embassy in New Delhi. "The Holy & Sacred cow" which was referred as "Stupid cow" by Alicia proved to be  most troublesome  for you both. In India you were deprived of devouring them. Just after one week in the country you were missing the steak. Hearts of you both burnt whenever you saw them in the middle of the road. You had to give way to those creatures. Probably it was your indignation which made Alicia  to say that she was insulting the cow neither for the first time nor for the last time. But when Alicia said about the Indian cows that most of them were bodyline starved , it should have been an eye opener for the Indians because Alicia was more worried about missing  the steak like her husband and she was not going to do as much to save them as to save Ms. Sangita Richard's husband and sons. Activist agenda of you both was limited to helping Sangita Richard's family to immigrate to U.S. and Indians should have known it. After all there are many who help people immigrate illegally, may be for a hefty sum but you both were doing it as a charity even if two greatest democracies of the world came on the verge of a cold war and even if your country declares India as its strategic partner. After all for many personal agenda is greater than the national agenda. It is also sad that you were deprived of real American Hamburgers at New Delhi and ultimately had to depend on their smuggling inside the embassy in suitcases to pacify your taste buds. But ultimately you should have sometimes had sparkles in your eyes when your friends from other embassies brought items like pearls for sale inside the embassy. You say your dog Paco looked to be in better health than your gardener as he got more proteins. But Dear Mr. & Mrs. May - doesn't it mean that you were treating him worse than your dog. As the gardener was taking care of  your house, you both were responsible for his good being. I fail to understand why you have one set of norms for Indian Diplomats serving in the U.S. and another set of norms for American Diplomats serving in India. Goodness! I think of the ordeal you had to go while drinking the tasteless tea served to you at a mosque. May be the Indians who served the same to you were feeling grateful that you had their tea & didn’t reject it.

          While referring to a Huffington Post article that non vegetarians are more likely to be involved in violence & sex crimes (Here I want to make it clear that I don't subscribe to this idea) Alicia said that a follow up article should be done on how many vegetarians raped women in India. You said that in India, vegetarians are raping women and not the non vegetarians. You told further that it was applicable to Indians only and not to the westerners. First of all I want to ask you Alicia, if you had   gone through profiles of all the rapists during your stay in India that you came to know that all the rapists were vegetarians. I'm sure you were talking in the air only and had nothing to substantiate your statement. For your kind information-  many of the Indians are not vegetarians. Whether vegetarians are not, all the Indians are also not rapists. Rapists represent a negligible percentage of the Indian population in case you can see vastness of the Indian population and that is true for your country also ( as per a report regarding U.S., one out of ten women has been raped there). And for sure, you owe an apology to all the Indians  for such rubbish, otherwise you are established as a racist beyond any doubt.

          I'm sad not only for you both, rather I'm sad for the Diplomatic corps of U.S. which has persons like you as members & presence of you people is bound to produce instances of "embarrassing failure of U.S. international protocol ( in the words of Daniel Arshack, the lawyer of Devyani Khobragade who became a pawn for you to help out the nanny Sangita Richards & her family to immigrate to U.S.). " 





Monday, 6 January 2014

कांग्रेस का हाथ किसके साथ?

          एक आकलन के अनुसार कांग्रेस  का एक तबका अब यह मान रहा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में सत्ता का उनके  पास बने रह पाना मुश्किल है. इस तबके को दिल्ली के राज्य चुनावों में आशा की किरण दिखाई दी है और यह तबका आर्किमिडीज की तरह आह्लादित होकर "यूरेका-यूरेका" जैसा कुछ चिल्लाना  चाहता है. यह तबका मैच को जीतने के लिए नहीं बल्कि ड्रा कराने के लिए खेलना चाहता है  और उसे लग रहा है कि इस चैम्पियनशिप की बाजी मुख्य विपक्षी टीम से छीन  लेने में   केजरीवाल और उनकी आम आदमी टीम महत्वपूर्ण भूमिका  निभा  सकती है. कुछ को  तो यह भी उम्मीद है कि "आप" ने यदि बैटिंग और बालिंग दोनों ही क्षेत्रों में कुछ जौहर दिखाए तो मुख्य विपक्षी टीम धराशाई भी हो सकती है और जो उन्हें असंभव लग रहा है(सत्ता में दोबारा आना) वह भी संभव हो सकता है. इसके लिए इस तबके के लोग एक दूसरे के कानों में फुसफुसा कर कह रहे हैं( पर फिर भी और लोग उसे सुन पा रहे हैं )- "कांग्रेस पार्टी का हाथ आम आदमी नहीं आम आदमी पार्टी के साथ". इस तबके का मानना है कि केजरीवाल ही वह आलराउंडर है जिसके पास मुख्य विपक्षी टीम के सारे दाँव-पेंचों की काट है और वह उनके बल्लेबाजों को कम रन के चलते,चलता कर सकता है. इसलिए यह तबका चाहता है कि केजरीवाल ताल ठोंककर  पूरे दमखम से लडे.,पूरे देश में लडे. बहुत पहले किसी को एक कहावत कहते सुना था-' हमारी एक आँख जाए तो जाए, दुश्मन की दोनों आँख फूटे'. पर शायद इन्हें इस बात का इमकान नहीं है कि हो सकता है  केजरीवाल ऐसा खिलाडी निकले  जो इनकी भी दोनों आँख ले जाए.

          अरे भाई इस बात को तो समझो कि अपनी लडाई दूसरों के कंधे के सहारे नहीं, खुद लडी जाती है. आज का मुख्य विपक्षी दल भी इसी तरह के मुगालते में धोखा खा चुका है. मई-जून 1995 में कल्याण  सिंह ने बार-बार आगाह किया था कि मुलायम सिंह की सरकार गिराने के लिए मायावती को गले मत लगाओ, कुछ दिन इंतजार  करो.पर भाजपा ने मायावती की  ताजपोशी बतौर मुख्यमंत्री करा दी और मायावती इतनी चतुर खिलाडी निकली कि उसने सबके पर कतर दिए. आज भी उत्तर प्रदेश में लोग अखिलेश के  विकल्प के तौर पर मायावती का नाम लेते हैं,भाजपा के किसी नेता का नहीं. हो सकता है कि आगे दिल्ली में भी दो मुख्य दल "आप" और"भाजपा" ही रह जाएं (भले ही दूर की कौडी लगे पर अगर केजरीवाल जनता की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं तो  यह संभव  है)  और भले ही आज यह कोरी कल्पना लगे पर आगे चलकर केंद्र में भी दुहराई जा सकती है  क्योंकि भारतीय राजनीति इस बात की गवाह है कि केंद्र से थोडा  वामपंथ   और थोडा दक्षिणपंथ की तरफ झुकाव रखने वाली केवल दो ही पार्टियाँ केंद्र की राजनीति में प्रमुखता पाती हैं. इसलिए कांग्रेस को अपना स्थान दूसरे को गँवा देने के प्रति सावधान रहना चाहिए. ब्रिटेन की लिबरल पार्टी जो एक लंबे अरसे से वहाँ की तीसरे नम्बर की   शक्ति है कभी वहाँ की सत्ताधारी पार्टी  हुआ करती थी. 

           खानवा के युद्ध के समय राणा साँगा की फौज को देखकर जब बाबर के सैनिक घबरा गए और कुछ उसे बिना लडे ही वापस काबुल चले चलने की सलाह देने लगे  तो उसने उन्हें समझाया और हौसला बँधाया. फिर भी उसे अपने सैनिकों की घबराहट देखकर यह लगा कि इनमें से कुछ  पलायन  न  करने लगें  तो उसने उन्हें कुरान हाथों पर रखकर लडने की कसम खिलाई और कहा कि अगर जीतोगे तो हिंदुस्तान का साम्राज्य मिलेगा और अगर शहीद हुए तो बहिश्त में जगह पाओगे. नतीजतन तदबीर के साथ तकदीर ने भी उसका साथ दिया.राहुल "आप" से सीख लेने की बात  कह ही चुके हैं,बाबर जैसा ही कुछ उन्हें अपने अनुयाइयों  के साथ  पेश आना चाहिए-" अरे  जीते तो जीते,  नहीं तो पाँच साल बाद दोबारा मौका मिलेगा." लडाई वही दमदार और कारगर होती है जो  अपने बूते लडी जाती है.दूसरे के कंधे के सहारे लडाइयाँ नहीं लडी जा सकतीं.  हार और जीत जिंदगी की तराजू के दो पलडे हैं जिनमें से कभी एक भारी हो जाता है तो कभी दूसरा, पर बिल्कुल अंत में देखने पर आप यही पाएंगे कि  कुल मिलाकर दोनों का संतुलन बराबर रहा है.

Sunday, 5 January 2014

दिल्ली कांड की एक वर्ष बाद कोलकाता में पुनरावृत्ति

          विगत 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में बलात्कारियों के एक गैंग की यातना की शिकार एक  वयस्क बच्ची की 29 दिसंबर को मौत हो जाने के साथ उसका फिजियोथिरैपिस्ट बनने का सपना टूट  गया था. उक्त घटना के ठीक एक वर्ष के बाद  उपर्युक्त घटना की जैसे पुनरावृत्ति के  तौर पर  दिसंबर 2013 का अंत होते-होते  कोलकाता में भी एक बच्ची जो अभी बालिग भी नहीं हुई थी और शिक्षिका बनना चाहती थी; का सपना  भी महज सोलह वर्ष की उम्र में 25 अक्टूबर को बलात्कारियों के एक गैंग की यातना का और फिर 26 अक्टूबर को पुन: थाने में शिकायत दर्ज कराने के बाद लौटते समय उन्हीं बलात्कारियों के  गैंग का शिकार होने के बाद और 23 दिसम्बर को रहस्यमय तरीके से जल जाने के कारण 31 दिसंबर को मौत हो  जाने  के साथ टूट गया.

दोनों ही मामलों में कई समानताएं हैं-


  • दोनों ही घटनाएं महानगरों में घटित हुई हैं. 
  • दोनों ही बालिकाएं समाज के गरीब तबके का प्रतिनिधित्व करती हैं. 
  • दोनों ही के परिवार स्लम एरिया में निवास कर रहे थे.
  • दोनों ही बालिकाएं प्रवासी परिवारों से संबंध रखती हैं जो देश के दो पिछडे राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार से क्रमश: दिल्ली और कोलकाता महानगरों के प्रवासी बने थे. 
  • दोनों ही परिवार अपनी बच्चियों को इन महानगरों में अच्छी  शिक्षा दिलाकर उनका भविष्य बनाने के विचार  से लाए थे.
  • दोनों ही बच्चियाँ अच्छी शिक्षा प्राप्त कर अपने परिवारों को गरीबी के दायरे से बाहर निकालना चाहती थीं. कोलकाता की बच्ची अपनी माँ के साथ महज पाँच महीने पहले समस्तीपुर से स्थाई  रूप से इसी उद्देश्य को लेकर कोलकाता आई थी.उसके पिता उसे कुछ स्थानों  पर ट्यूशन पढने के लिए भेज रहे थे ताकि उसे किसी अच्छे स्कूल में दाखिला दिला सकें.
  • दोनों ही अस्पताल के बिस्तर पर  भी अपने भविष्य तथा शिक्षा को लेकर चिंतित थीं तथा इस विषय में अपने परिवारों से बात कर रही थीं.
  • दोनों ही अस्पताल के बिस्तर पर भी दोषियों  को सजा दिलाने के लिए कटिबद्ध थीं .
          यहाँ आकर  दोनों मामलों मे समानताएं समाप्त हो जाती हैं.  क्योंकि  दिल्ली के मामले में जहाँ पुलिस ने तत्परता से काम किया,  वहीं कोलकाता में  ऐसा नहीं हुआ. उल्टे पुलिस पर यह भी आरोप लग रहा है कि उसने लीपापोती की कोशिश की. जब बच्ची पुलिस के पास  25 अक्टूबर की घटना के बाद शिकायत दर्ज कराकर अपने पिता के साथ लौट रही  थी  तो उस दुस्साहसी गैंग का साहस इतना बढा हुआ था कि  उसने उसके पिता के सामने ही बच्ची का अपहरण कर उसके साथ दोबारा सामूहिक बलात्कार किया.इसके पश्चात अपराधी गिरफ्तार हुए पर उनके गिरोह के सदस्य  बच्ची, उसके पिता तथा परिवार को धमकाते रहे. जब बच्ची और उसके परिवार ने घर बदल लिया तथा दूसरे घर पर चले गए तो गिरोह के सदस्यों ने वहाँ भी पहुँच बना ली तथा अपनी धमकाने की कार्रवाई जारी रखी. बच्ची तथा उसके परिवार को किसी प्रकार की सुरक्षा मुहैया नहीं हुई न ही किसी से कोई सहायता मिली. यह भी कहा जा रहा है कि बच्ची को आग अपराधियों के गिरोह के सदस्यों ने ही लगाई थी. कहा जा रहा है कि बच्ची ने इस बारे में पुलिस को स्टेटमेंट भी दिया पर  उसे दबा दिया गया तथा इसे आत्महत्या के मामले के रूप में प्रचारित किया गया. अब बच्ची की मौत हो जाने के बाद ही मामले ने तूल  पकडा है तथा आग लगाने के जुर्म में दो अपराधी गिरफ्तार किए गए हैं. यह भी कहा जा रहा है कि पुलिस ने बच्ची के शव को अगवा करने तथा  परिवार से जबर्दस्ती मृत्यु-प्रमाणपत्र  हासिल कर बच्ची का शवदाह करने का प्रयास किया जो बच्ची के  परिवार वालों की सजगता  के कारण सफल नहीं हो पाया.

          यह सब हो जाने के बाद  कोलकाता के बुद्धिजीवियों, विचारकों और संभ्रांत नागरिकों तथा वामपंथियों को लगा कि कोलकाता  की मर्यादा का हनन हो रहा है और वे सडकों पर उतरे पर यह स्वत: उद्भूत नहीं दिखा और इसमें  नौजवानों तथा विद्यार्थियों की भागीदारी नगण्य थी जबकि दिल्ली में वे ही आंदोलन चला  रहे थे. शायद इसका कारण नया वर्ष रहा हो और यह कि 'सिटी आफ ज्वाय' सेलिब्रेशन में कभी पीछे नहीं रहता.एक अन्य बात यह है कि बंगाल में बलात्कार अब खबर नहीं बनते. एक खबर के मुताबिक बंगाल  इस मामले में देश में  दूसरे स्थान पर  है.

          शायद ममता के राजनीतिक विरोधियों को छोडकर कोई  राजनीतिक पार्टी  इस मामले पर उस तरह  नहीं बोलेगी जिस तरह वे दिल्ली के मामले पर बोली थीं क्योंकि सभी जानते हैं कि कुछ महीनों के बाद केंद्र में गठबंधन सरकार   बनने की स्थिति में ममता का समर्थन पाना महत्वपूर्ण होगा  और ममता दी इस मुगालते को पाले रहना चाहती हैं कि राज्य में सब कुछ ठीक चल रहा है. कानून  और व्यवस्था के मामले और  इनके बारे में किसी का भी बोलना उन्हें वामपंथियों का षडयंत्र दिखाई देता है .


           लेकिन दिल्ली में निर्भया कांड  के एक वर्ष बाद उसी प्रकार के हादसे की एक अन्य महानगर  में पुनरावृत्ति हमारे सामने कुछ अहम सवाल खडे करती है-
  • क्या बेटे और बेटियों के समान होने का नारा निरा नारा ही है और वास्तविकता में हम उसे निरर्थक  मानते हैं ?
  • क्या गरीबों की बेटियों को शिक्षा पाने,  सपने देखने और उन्हें साकार करने का हक नहीं है?
  • क्या नगरों में गुंडा एवं गैंगस्टर गिरोहों के विकास पर रोक लगाने और उनका  दमन करने का काम सक्रियता से और प्रथम प्राथमिकता के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए.
  •  क्या हम चाहते हैं कि हमारा देश विश्व में बलात्कारियों के देश के रूप में जाना जाए  और अन्य देशों के लोग  यहाँ आने के नाम से ही खौफ खाएं.
          अगर इन सवालों का जवाब नहीं है तो कृपया आप जहाँ भी हैं स्वयं सजग हों,अपने पडोसियों को सजग करें तथा अपने समीप के राजनीतिज्ञों पर इस बात के लिए दबाव बनाएं कि वे प्रशासनतंत्र को इस प्रकार के मामलों  में त्वरित एवं कठोर कार्रवाई के लिए बाध्य करें अन्यथा फिर उक्त सवालों का जवाब 'हाँ' ही हो सकता है.