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Wednesday, 26 June 2013

आपदा के समय स्लैंगिंग के मैच न खेलो प्लीज! (व्यंग्य/Satire)

          हमारे दोनों मुख्य राष्ट्रीय दलों का यदि बस चले तो शायद वे स्लैंगिंग को हमारा राष्ट्रीय खेल बना  दें. वैसे तो सभी राजनीतिक दलों को इस  खेल में आनंद आता है.  उत्तराखंड में आई आपदा इनके लिए इस खेल के नए राउंड खेलने का अवसर लेकर आई है.सबसे पहले तो  किसी ने सवाल उठाया कि देश की सारी समस्याओं का हल जिनके पास है अर्थात नरेंद्र मोदी, वे कहाँ हैं. फिर किसी ने कहा कि गुजरात ने अमीर श्रेणी का राज्य होते हुए भी सिर्फ दो करोड रुपए ही क्यों दिए. स्पष्ट है कि सवाल सत्ताधारी पार्टी की तरफ से उठे थे.फिर जब नरेंद्र  मोदी उत्तराखंड में दिख गए तो प्रश्न उठ गया कि राहुल कहाँ हैं.यह प्रश्न मुख्य विपक्षी दल की तरफ से आया था.इसी बीच केदारनाथजी का "स्टेट आफ दि  आर्ट पुनर्निर्माण" करवा  दिए जाने का भी प्रस्ताव आ गया.किसी ने पंद्रह हजार गुजरातियों के बचाए जाने का भी दावा कर दिया. सत्ताधारी दल की काटो तो खून नहीं जैसी हालत हो गई.किसी ने सवाल किया कि मोदी को क्यों जाने दिया गया.अब ऐलान किया गया कि वी.आई.पी. ज्यादा से ज्यादा हवाई  चक्कर लगा कर चले जाएं, उतरने की इजाजत न होगी.किसी को भी अलग से राहत कार्य चलाने की इजाजत न होगी , जो सहायता देना हो उत्तराखंड सरकार को दें .उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने कहा कि मंदिर बनाने के  लिए उन्हे बाहरी सहायता की जरूरत नहीं है.मुख्य विपक्षी दल का कहना है कि जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने मंदिर बनवाने के लिए कहा तो आपत्ति नहीं,अब हम कह रहे हैं तो इतनी आफत.इस बीच राहुल बाबा आ गए.मुख्य विपक्षी दल ने तुरंत आपत्ति जताई-जब वी आई पी को जाने की इजाजत नहीं है तो राहुल बाबा वहाँ कैसे पहुँच गए.सत्ताधारी दल का जवाब है कि तुम तो फोटो खिंचाने गए थे,वे सेवा करने गए हैं;तुम वी आई पी बन कर गए थे ,वे आम आदमी बनकर मदद करने  गए हैं.मुख्य विपक्षी दल चिल्ला रहा है-फाउल-फाउल!पर गनीमत है कि इस खेल में  कोई रेफरी या अंपायर नहीं है.वरना दोनों तरफ से उसकी टांगें खींची जातीं  और शायद बेचारा खडा भी नहीं रह पाता.

          इस आपदा के समय तो शर्म करो भाई! जिनके स्वजन लापता हो गए हैं या काल के गाल में समा गए हैं   उनकी सोचो.ऐसे लोगों की संख्या सैकडों में नहीं,हजारों में है.अपने इस  खेल को कुछ दिनों  के लिए मुल्तवी  कर अगर वास्तव में देशप्रेम  है तो आपदा  से पीडित जनता की शांतिपूर्वक मदद करो.अगर वह भी नहीं कर सकते हो तो कम से कम चुपचाप रहो  और जले पर नमक छिडकने जैसा काम न करो. कुछ दिनों के बाद फिर चौके-छक्के मार लेना.अभी तो धोनी चैंपियंस ट्राफी ले आए हैं और वही काफी है. जनता को कुछ दिनों के लिए बख्श दो प्लीज!

गंगा- पौराणिक आख्यान आज के संदर्भ में

          कहते हैं कि ब्रह्माजी के आदेश पर  गंगा सगर के पुत्रों को मुक्ति देने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं. पर यह आज्ञा उन्हें अपमानजनक लगी ,इसलिए उनका   अवतरण क्रोधपूर्ण था जो पृथ्वी  पर प्रलय की सृष्टि कर देने के लिए  वेग और प्रवाह से परिपूर्ण था .  महादेवजी ने, जो केदारनाथ ही हैं, भगीरथ की प्रार्थना पर गंगा के क्रुद्ध प्रवाह को  अपनी हिमालयी जटाओं में झेल लिया और पृथ्वी की रक्षा हो सकी.महादेव की जटाओं से गंगा की जो धारा निकली वह शीतल होकर मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी बन गई थी जो  भगीरथ सदृश मानव का अनुसरण करते हुए उनके पुरखों को तारने के लिए पाताललोक की ओर चल पडी तथा भागीरथी कहलाईं .उनकी धारा  साधारण मानवों को मोक्ष प्रदान करने के लिए पृथ्वी पर रह गई .पश्चिमी जगत में प्रचलित पुरा कथाओं में जिक्र मिलता है कि ईडेन के बगीचे से एक शक्तिशाली नदी पृथ्वी पर  गिरती है जो गंगा संबंधी भारतीय पौराणिक  आख्यान के अनुकूल ही है. अलकनंदा, मंदाकिनी और यमुना इसी गंगा की धाराएं और नाम हैं. उत्तराखंड के चारधामों में हाल में घटित भीषण वृष्टि और जल आप्लवन,भूस्खलन तथा जन-धन की अपार हानि को देखते  हुए लगता है कि हमने गंगा-आख्यान के प्रतीकात्मक अर्थों को समझने की कभी चेष्टा नहीं की.

          पौराणिक आख्यानों में सर्वत्र गंगा को मानवीकृत करते समय उन्हें  स्वच्छंद पर दूसरों की फिक्र करने वाली देवी-नारी के  रूप में चित्रित किया गया है.ब्रह्माजी के दरबार में जब  वे आती हैं तो उनकी भाव-भंगिमाएं किसी अल्हड नवयुवती सी हैं जिसे अपने कपडों-लत्तों की भी ठीक से सुध नहीं है जिसके  कारण  वहाँ उपस्थित इक्ष्वाकुवंशीय राजा महाभिष उनकी तरफ आकृष्ट हो जाते हैं.परिणामस्वरूप शापित होकर महाभिष को पृथ्वी पर राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु के रूप में जन्म लेना पडता है.पर दूसरी तरफ जब वशिष्ठ द्वारा पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्म लेने के लिए शापित  विकृतरूप  वसुओं ने गंगा से पृथ्वी पर नारी रूप में उनकी माँ बन कर उनका उद्धार करने के लिए और स्वयं के जन्म लेने के शीघ्र बाद अपने प्रवाह में बहाकर मृत्युलोक से मुक्त कर  देने की प्रार्थना की  तो वे सहमत हो जाती हैं.

           पृथ्वी पर जब गंगा नारी रूप में आती हैं तो राजा प्रतीप की ही ओर आकृष्ट हो जाती हैं.प्रतीप अपनी दाहिनी  जांघ पर बैठ जाने के कारण उन्हें पुत्री सम मानकर  पुत्रवधू  बनाने के लिए ही तैयार होते हैं.पर गंगा उसी समय प्रतीप को अपनी शर्त बता देती हैं कि वे उनके पुत्र के साथ तब तक  ही रहेंगी जब तक कि वह उनकी इच्छा के अनुरूप आचरण करेगा.कालांतर में राजा  प्रतीप के पुत्र शांतनु जब गंगा के समक्ष प्रणय प्रस्ताव रखते हैं तो गंगा उन्हे बता देती हैं कि उन्हें उनकी स्वतंत्रता को बाधित करने का कोई अधिकार न रहेगा और न ही वे उन्हे अप्रिय संबोधन के साथ बुला सकेंगे और यदि कभी भी उन्हें लगा कि राजा ने  इसके विपरीत आचरण किया है तो वे अपने चुने हुए मार्ग पर जाने के लिए स्वतंत्र होंगी.राजा द्वारा शर्तें स्वीकार कर लेने पर गंगा शांतनु की हो  जाती हैं.सभी वसु एक-एक कर पुत्र रूप में गंगा और शांतनु के घर जन्म लेते हैं और गंगा उनसे किए गए वायदे के अनुरूप एक-एक कर उन्हें अपने प्रवाह में बहाती  जाती  हैं.राजा शांतनु अपने पुत्रों  को एक-एक  कर बिछडते देखते हैं पर गंगा द्वारा दाम्पत्य जीवन के  लिए लगाई गई शर्तों को याद कर चुप रहते हैं. गंगा जब आठवें पुत्र  के जन्म  के बाद उसे गोद में उठाती हैं तो इस बार शांतनु चुप नहीं रह पाते और गंगा की गतिविधि पर रोष प्रकट करते हैं.इस पर गंगा राजा को पुत्र सौंप देती हैं और उनके प्रणय निवेदन के समय स्वयं द्वारा रखी गई शर्त का स्मरण कराती हैं तथा कहती हैं कि उनके साथ का अंत हुआ और वे अब जा रही हैं.

          पर गंगा निष्ठुर नहीं  हैं.पत्नी के वियोग में राजा शांतनु जब राज-पाट त्याग कर गंगा के ही किनारे तप करने चले  जाते हैं तो  वे आकर पुत्र देवदत्त को साथ ले जाती हैं  तथा पहले उन्हें ब्रह्मर्षि वशिष्ठ  को शास्त्रों का ज्ञान अर्जित करने के लिए सौंपती हैं एवं उनमें पारंगत हो जाने के बाद उन्हें परशुराम को शस्त्र विद्या में निष्णात बनाने के  लिए  सौंप  देती हैं. बालक देवदत्त के नीति,धर्म,शस्त्र और शास्त्रों का मर्मज्ञ नवयुवक बन जाने  के बाद शांतनु के निवेदन पर उन्होने पुत्र को उनके समक्ष प्रस्तुत किया तथा साथ ही राजा से अनुरोध किया कि वे तप करना छोड   पुत्र को साथ लेकर अपने राज्य वापस  चले जाएं .राजा ने ऐसा ही  किया.यह राजकुमार देवदत्त ही महाभारत के गंगापुत्र भीष्म  हैं.

          इस पौराणिक आख्यान में गंगा  स्वतंत्रताप्रिय, दूसरों के उपकार की भावना रखने वाली, नि:संकोच अपनी भावना-प्रेम-प्रणय को व्यक्त कर देने वाली,कुछ हद तक क्रोधी और रुष्ट हो जाने वाली परंतु जिम्मेदारी का भाव रखने वाली देवी-नारी के रूप में मानवीकृत होकर हमारे सामने आती हैं.  वे किसी भी आधुनिक नारी के लिए आदर्श हो सकती  हैं.पर हमने उनके इस चरित्र   को समझ कर उसके अनुरूप व्यवहार करने का प्रयास नहीं किया जिसके परिणाम हमारे सामने आने आरंभ हो गए हैं.

         क्या कारण है कि गंगा और उनकी धाराएं   उत्तराखंड में रूद्र के झंझावात के बाद मूल प्रलयंकारी रौद्र रूप में वापस आ गईं और फिर केदारनाथजी भी उन्हे अपनी जटाओं में संभाल नहीं पाए? पिछले  दिनों इस पर काफी कुछ लिखा गया है . हिमालय ही तो शिवजी की जटाओं का प्रतिरूप है जिसने गंगा को संभाल रखा है. वृक्षों और वनस्पतियों का दोहन कर शिवजी को हम जटाहीन करने में लगे हुए हैं.निर्माणकार्य के लिए हम नि:संकोच डायनामाइट का प्रयोग कर रहे हैं और जटा  की कौन कहे,हम तो शिवजी के सर को  ही अस्थिर करने में लगे हुए हैं. फिर गंगा को संभालेगा कौन यह हमने कभी सोचा नहीं. हमारी ऊर्जा की भूख और हमारा लालच इतना बढ गया कि गंगा के अलौकिक रूप की हमने  परवाह न कर स्वतंत्रताप्रिय गंगा को जिन्हे हम माँ कहते हैं, जगह-जगह बंधनों में आबद्ध करना आरंभ कर दिया . यहाँ तक कि   मैदानों में गंगा में पानी ही  नहीं रह गया,जो पानी दिखाई देता है वह कचरे के साथ आया हुआ जल है.कुंभ मेले के लिए इसी कारण बाँधों से जल छोडे जाने की विशेष व्यवस्था करनी पडी.  व्यवसाई बनकर हमने सारे रिश्ते भुला दिए हैं और पैसे के लोभ में केदारनाथजी तथा बद्रीनाथजी सबको पर्यटनस्थल में तब्दील  कर इतने बोझ से लाद दिया है और इतना मलिन कर दिया है कि वे गंगा के रोष से अपने भक्तों को  नहीं बचा सके या फिर बचाना उन्होने मुनासिब नहीं समझा.वे तो बस शांतनु की तरह हृदय में वेदना समेटे सारा दृश्य देखते रहे. कुछ वर्षों पूर्व मैंने अपने एक मित्र को दिल्ली फोन कर जब केदारनाथ जाने की इच्छा व्यक्त की तो उसने कहा कि कपाट खुलने के बाद एक सप्ताह के भीतर आ जाओ,बाद में बहुत अधिक गंदगी हो जाएगी जो बरसात हो जाने के बाद ही साफ हो सकेगी.  गंगा अनुशासनप्रिय माँ हैं जो  बच्चों की देख-रेख जिम्मेदारी से करती हैं पर यदि गलती हो गई तो दंडित भी करती हैं.

          पुराण यह भी वर्णित करते हैं  कि गंगा के सूख जाने के साथ ही कलियुग समाप्त हो जाएगा.ऐसे में सहज  मन में यह प्रश्न उभर आना स्वाभाविक है कि क्या हम  उसी राह पर चल पडे हैं.पुराण भले ही विशुद्ध वास्तविकता का लेखा -जोखा न हों पर उनमें प्रतीकात्मक निहितार्थ जरूर छिपे हुए हैं जिन्हें यदि हम समझ सकें तो हमारे लिए बेहतर  होगा.

Monday, 17 June 2013

असली समाजवाद! (व्यंग्य/Satire)

           जुम्मन शेख मेरे पुराने  साथी हैं.उनका एक उसूल है कि अगर कोई तुम्हारा ख्याल करे तो  तुम उसका ख्याल जरूर करो,अगर कोई तुम्हारे ऊपर अहसान करे तो तुम उसके इस अहसान का बदला चुकाने का मौका मत छोडो.  वो बताते हैं कि उन्हें यह बात उनके अब्बूजान ने बताई थी जो खुद भी इस  उसूल पर चलते थे. उनके कुनबे के लोग  आजादी के पहले से कंकडबाग, पटना में रहते आए थे. आजादी मिलने के बाद जुम्मन  के चाचा-ताऊ सब पाकिस्तान  चले गए पर जुम्मन  के अब्बूजान ने हिंदुस्तान नहीं छोडा क्योंकि उन्हें पंडित जवाहरलाल नेहरू के इस वायदे पर भरोसा था कि  आजाद हिंदुस्तान में  हिंदू और मुसलमान दोनों का दरजा बराबरी का होगा.आजादी के बाद सालोंसाल जुम्मन  के अब्बूजान उस वायदे का ख्याल करके कांग्रेस को वोट देते रहे .सन सरसठ में भी उन्होने कांग्रेस का दामन नहीं छोडा  जब पहली बार उनकी बिरादरी के कुछ लोगों ने बढती मंहगाई से तंग आकर  कांग्रेस के खिलाफ वोट डाला. जयप्रकाश  नारायण का जब आंदोलन चला तो जुम्मन के अब्बू ने कहा- कुछ भी होता रहे हमारा वोट तो इंदिरा को ही मिलेगा,आखिर वो जवाहरलाल की बेटी है.पर जुम्मन के अब्बू अपनी इस बात पर कायम नहीं रह पाए क्योंकि इमरजेंसी लगने के बाद जुम्मन के मामू जो कालेज में पढाते थे और दो बेटों तथा दो बेटियों, कुल चार संतानों के भरे-पूरे परिवार के मालिक थे पकड कर जेल  में बंद कर दिए गए.वजह ये थी कि उन्होने जबर्दस्ती बंध्याकरण आपरेशन किए जाने के विरोध में बयान दिया  था और उन्हे जेल से तब छोडा गया जब उन्होने खुद का बंध्याकरण  आपरेशन करा लिया.तब से ही जुम्मन के अब्बू को  लगने लगा कि कहीं ढलती उम्र के बावजूद बंध्याकरण आपरेशन के लिए उनका  भी नंबर न  लगा दिया जाए जबकि  वो डरपोक इतने  थे कि एक बार फोडा हो जाने पर जब डाक्टर ने उसका आपरेशन  करने के लिए कहा तो उन्होने चीर-फाड के डर के मारे साफ इंकार कर दिया था,भले ही बाद में पस पड जाने के कारण वे उसकी तकलीफ को महीने भर झेलते रहे और ऐंटीबॉयटिक इंजेक्शन लगवाते  रहे.इसलिए इमरजेंसी के बाद जब वोट पडे  तो उन्होने उन्ही जयप्रकाश नारायण के अनुयाइयों को  वोट दिया जिन्हे वे पहले बच्चों की पढाई-लिखाई बरबाद करने के लिए कोसते थे.पर जनता सरकार के समय में जो दंगे-फसाद और अराजकता के दर्शन हुए कि उन्होने फिर इन्हे वोट देने से तोबा  कर ली और सन अस्सी में फिर इंदिरा गाँधी को वोट दिया.इंदिरा के बाद उन्होने राजीव के लिए वोट दिया .पर उनका एक बार  फिर राजीव  की तरफ से दिल टूटा जब रामजन्मभूमि का शिलान्यास हुआ.पर इसके पहले कि 1989 में वोटिंग हो, वो बीमार  पडे और  उनका इंतकाल हो गया.इंतकाल के पहले उन्होने जुम्मन को पास बुलाया और बोले बेटा मेरे बाद मेरे उसूल ही मेरी धरोहर हैं ,तुम उन्हे निभाते रहना.अब तक जुम्मन इक्कीस के हो चुके थे और उनका नाम  भी वोटर लिस्ट में आ गया था.जुम्मन को अब्बाजान के दर्द का और उनकी कही बातों का ध्यान था.इसलिए उन्होने अपना वोट जनता पार्टी को दिया.लालूजी बिहार के  मुख्यमंत्री बने.लालूजी ने सदैव मुस्लिम भावनाओं का ध्यान रखा.इसलिए जुम्मन   उनको ही वोट देते रहे.पर जब अराजकता बहुत बढ गई और अपने आस-पास घटित हो रही घटनाओं  को देखकर जुम्मन को अपने जान-माल की सुरक्षा  का भय सताने लगा तो उन्होने  2004 में वो कर डाला जो उनके खानदान में किसी ने नहीं किया था.उन्होने उन्ही आडवाणी  की पार्टी के लिए वोट डाला जिन्हे लालूजी ने 1989 में तब गिरफ्तार कर लिया था जब वो अयोध्या में राममंदिर  बनवाने के लिए एक रथ पर सवार होकर उनके राज्य में घुसे थे  और ये खबर पाकर बीमारी के कारण खटिया पकड चुके उनके अब्बजान खुश हुए थे.दरअसल  वजह यह थी कि  जनता दल(यू) और बी जे  पी के गठजोड ने नितीश की पेशकश मुख्यमंत्री के तौर पर की थी , इसलिए जुम्मन को भरोसा था कि गुजरात जैसा कुछ बिहार में नहीं होगा और फिर अगर ऐसा कुछ होता भी है तो  अगले इलेक्शन में लालू के लिए  वोट देने से उन्हे कौन रोक सकता था.पर अगले इलेक्शन में उन्हे लालू को वोट देने की जरूरत नही पडी क्योंकि ऐसा कुछ हुआ नहीं और जुम्मन का जो भरोसा अपनी जान-माल की हिफाजत पर से उठ गया था वो वापस लौट आया था.

          पर आज थोडी देर पहले जुम्मन का फोन मेरे पास आया था.जुम्मन कह रहे थे -" समझ में नही आ रहा है क्या करूँ.कांग्रेस  का कहना  है कि मोदी रूपी राहु-केतु के प्रकोप से  वही मुसलमानों को बचा सकती है,लालू का कहना है कि असली जवाँ-मर्द मैं ही हूँ,आखिर आडवानी की  गिरफ्तारी का दम मेरे अलावा और किसमें था  और अब नितीश का कहना है कि  मुसलमानों के लिए सबसे बडी कुर्बानी तो मैंने दी है,बहुमत वाली सरकार से अल्पमत वाली सरकार का मुख्यमंत्री बन गया  हूँ."

          मैंने कहा-"जुम्मन भाई जो आग पटना में लगी है वही लखनऊ में भी लगी हुई है.कांग्रेस कह रही है कि ब्राह्मणों की असली पुरानी पार्टी वही है.बी जे पी का कहना है  कि धर्म की रक्षा का जिम्मा उसका है और ब्राह्मणों को धर्म की रक्षा के लिए उसके ही साथ रहना चाहिए.माया बहन कह रही हैं कि जब सब ब्राह्मणों की मान- मर्यादा का हनन कराने में लगे थे तो उन्होने ही ब्राह्मणों को उनकी प्रतिष्ठा वापस दिलवाई और मुलायम भैया ब्राह्मणों का यशोगान करते हुए कह रहे हैं कि  ब्राह्मणों ने सदैव देश का  उद्धार किया  है और फिर देश को बचाने के लिए उनके साथ आएं.यही असली समाजवाद है जुम्मन भाई,जब हर पार्टी के लिए हर धर्म और  जाति बराबर महत्वपूर्ण हो जाए!भगत सिंह,पं.जवाहरलाल  और लोहिया सभी ने इसी समाजवाद की  कल्पना की रही होगी!उसूलों की ज्यादा फिक्र न करो और अगर उसूलों की ज्यादा फिक्र है  तो ऐसा करो  कि इलेक्शन में तुम मेरे खिलाफ खडे हो जाओ और मैं तुम्हारे खिलाफ खडा हो जाता हूँ .तुम मेरे लिए वोट डाल देना  और मैं तुम्हारे लिए वोट डाल दूँगा.तुमने मेरे ऊपर जो अहसान किया होगा वह चुकता हो जाएगा और मैंने तुम्हारे ऊपर जो अहसान  किया होगा वह सब चुकता हो जाएगा और उसूलों का पालन करने के कारण हमारे पितरों की आत्माएं भी प्रसन्न हो जाएंगी."

Sunday, 9 June 2013

संघ खेमे की राजनीति एक नए मुकाम पर!

        भारतीय राजनीति में संप्रदाय की अपेक्षा जाति की भूमिका कहीं अधिक प्रभावी रही है.जाति के आधार पर राजनीतिज्ञ रणनीति बनाते रहे और वोट माँगते रहे हैं. आज जब पिछडी जाति से संबंध रखने वाले नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी (बी .जे.पी.) में नं 1 के रूप में प्रतिष्ठित करने की कवायद चल रही है तो बहुत पहले की एक घटना याद आ रही है.चौधरी चरण सिंह ने जब 1967 में कांग्रेस को अलविदा कहने का निश्चय किया तो श्री बलराज मधोक ने उन्हे बी जे पी  के पूर्व संस्करण भारतीय जनसंघ को ज्वाइन करने के लिए मनाने की बहुत कोशिश की पर चौधरी साहब  का कहना था कि संघ और जनसंघ दोनों में ही शीर्षस्थल पर पहुँचने के लिए ब्राह्मण होना जरूरी है और इस आधार पर वे भारतीय जनसंघ में शामिल होने के लिए सहमत नहीं हुए .बलराज मधोक ने चौधरी साहब को लाख आश्वस्त करने का प्रयास किया कि जनसंघ में उन्हे पूरा मान-सम्मान दिया जाएगा पर चौधरी साहब अपनी बात पर अडिग रहे.

       आज जब भारतीय जनता पार्टी के कुछ बुजुर्ग नेताओं ,उनके अनुयाइयों और मध्य वय के कुछ नेताओं/नेत्रियों (जिन्हे मोदी अपना स्थान छीनते हुए दिख रहे हैं ) के समूह को छोड कर पूरी भारतीय जनता पार्टी मोदी को वोट-कमाऊ राजनीतिज्ञ मानते हुए उनके सहारे चुनाव की वैतरणी को पार करने की आशा में है तो चौधरी साहब के विचारों के परिप्रेक्ष्य में भारतीय राजनीति और साथ ही संघ खेमे की राजनीति एक नए मुकाम तक पहुँच गई दिख रही है. अटल बिहारी बाजपेयी और आडवाणीजी के बाद  अगली पीढी के नेताओं में भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखे जा रहे प्रमोद महाजन के असामयिक निधन के बाद अरूण जेटली और सुषमा स्वराज को प्रमोट करने की कोशिशें की गईं. पर यह दोनों ही जनहृदयों के नायक/नेत्री के रूप में बाजपेयी या आडवाणी के कद के कहीं नजदीक भी नही पहुँच सके हैं.आडवाणीजी  अभी भी भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं पर पिछले चुनाव में "मजबूत नेता मजबूत पार्टी" के नारे को जनता ने तवज्जो नहीं दी और उनका आभामंडल तिरोहित हो गया है. कुशल प्रशासक के रूप में शिवराज सिंह चौहान का नाम भी आगे करने की कोशिश की गई पर वे मोदी जैसे शातिर राजनीतिज्ञ नही हैं और कार्पोरेट जगत तथा मीडिया पहले से मोदी को विकल्प के तौर पर प्रचारित कर रहा है.यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि मोदी के विकल्प के रूप में बी. जे. पी. में शिवराज का नाम आगे लाया गया और वे भी पिछडे वर्ग से ही हैं.ले देकर भारतीय जनता पार्टी को मोदी के अलावा और कोई नहीं दिख रहा जिसके नाम पर वोट मिल सकें.

        मोदी ने मुख्यमंत्री के रूप में अपने शासन के दौरान एक ऐसी छवि बनाई कि गुजरात में बी.जे.पी.के सभी दिग्गजों की छुट्टी हो गई.मोदी ने जो चाहा उसे कार्यान्वित किया और जो भी रास्ते में आया उसे किनारे लगा दिया ,वह चाहे भारतीय किसान संघ रहा हो या फिर प्रवीणभाई तोगडिया रहे हों.हिंदुत्व के पोस्टर-ब्वाय के रूप में प्रचारित किए जा रहे मोदी ने रास्तों पर बनाए गए दो सौ मंदिरों को भी स्थानांतरित करने में किसी की परवाह नहीं की.मोदी की इंदिरा गाँधी जैसी व्यक्तिवादी राजनीति की शैली जिसमें लोग उनकी सभाओं में उनका मुखौटा लगाए दिखाई देते हैं उनके राजनीतिक विरोधियों की तो बात ही छोड दीजिए; बी,जे.पी. के कुछ वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ संघ को भी रास नहीं आती.फिर भी अन्य किसी करिश्माई व्यक्तित्व के अभाव में संघ और बी जे पी दोनों की ही मजबूरी मोदी हैं.भ्रष्टाचार में डूबे राजनीतिज्ञों और नौकरशाही वाले इस देश की जनता का एक वर्ग  सलीम-जावेद लिखित फिल्मों के अमिताभ बच्चन जैसे ऐंग्री यंगमैन की तलाश में है जो व्यवस्था को दुरुस्त कर दे ,भले ही उसमें अधिनायकवाद के तत्व हों.पहले भी तो वह इंदिरा गाँधी को सर-आँखों पर बिठा चुका है.

        मोदी का यह उभार राजनीति के पूर्व जजमानी सिस्टम जिसमें अगडों या ब्राह्मणों के हाथ में सत्ता रहती थी और शेष जातियाँ जजमान के तौर पर उनके संरक्षण में रहती थीं,के राष्ट्रीय राजनीति से भी विदाई का संकेत दे रही है.प्रदेशों की राजनीति से तो यह पद्धति काफी पहले विदा हो चुकी है. अगर आज चौधरी चरण सिंह होते तो उनकी इस डेवलपमेंट पर क्या प्रतिक्रिया होती,सोचने लायक है.