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Tuesday, 28 May 2013

इज्जत का फालूदा बना तो क्या कुर्सी तो सलामत रहे!

          देश के तमाम लोग कह रहे हैं कि एन.  श्रीनिवासन साहब  बी. सी. सी. आई. के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दें. पर आखिर क्यों ? जमाई के  द्वारा किया गया पाप श्वसुर के सर क्यों मढ रहे हैं आप लोग ? जमाई तो सदियों से श्वसुर  की लुटिया  डुबोते आए  हैं. सबसे पहले तो  प्राचीनकाल में "स्यामंतक"  हीरे की खोज में निकले हमारे भगवान श्रीकृष्ण ने जाम्बवान को मुष्टियों के प्रहार से अधमरा कर दिया फिर  उनकी सुपुत्री जाम्बवती को अपनी अर्धांगिनी बनाने के  लिए भी  सहमति  प्रदान कर दी.  कालांतर में  पृथ्वीराज चौहान  दिनदहाडे   शेष भारत के राजाओं के सामने  इस बात को नजरअंदाज करते हुए कि जयचंद उनका मौसेरा  भाई था और इस  नाते संयोगिता रिश्ते में उनकी भतीजी ही थी, संयोगिता को  घोडे पर बिठाकर भगा ले गए;  भले ही देश के हक में उनकी इस हरकत का अंजाम बुरा हुआ. आधुनिक इतिहास के आरंभिक दौर में  मीर कासिम ने मीरजाफर को बंगाल की नवाबी से बेदखल करवा कर  गद्दी कब्जियाई  और ज्यादा  पीछे न जाएं तो यही कोई बीस-इक्कीस साल पहले चंद्राबाबू नायडू ने एन.टी  रामाराव का तख्तापलट कर खुद मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल ली. अगर भगवान  श्रीकृष्ण को छोड दें जिन्होने खुल्लमखुल्ला जाम्बवान को चैलेंज किया था (आखिर वो तो भगवान थे न), तो  बाकी सबने श्वसुरों को इस बात का कोई इमकान न होने दिया कि वे  पलीता लगाने वाले हैं  और जब आतिशबाजी शुरू हुई तो पहले तो उन्हें(श्वसुरजन को ) यह  समझ में ही नहीं आया कि कि उसका कर्ता-धर्ता कौन है. तो कुल कहने का आशय यह है साहब, कि ये सोलह आने संभव है कि बेटे समान प्रिय दामाद क्या कर रहा है इसका कुछ भी भान श्रीनिवासनजी  को न रहा हो. आप कहते हैं कि कोडाइकोनाल  में दो दिन पहले तक तो दोनो साथ-साथ थे  और आनंद मना रहे  थे. तो आप कहते रहिए साहब!अब आप क्या उम्मीद करते हैं कि पृथ्वीराज, मीर  कासिम   और चंद्राबाबू की श्रेणी  का दामाद  अपने तुरुप के पत्ते श्वसुरजी को   दिखाकर कहेगा-" पिताजी देखिए ,अगली चाल  में मैं  इसे डालने वाला हूँ."  तो साहब आप  श्रीनिवासन साहब की इस बात  पर पूरा भरोसा रखिए कि वह दामाद जिसे उन्होने विवादों से बचने के  लिए चेन्नई सुपर किंग के मालिक के रूप में प्रचारित करवा रखा था, लाखों-करोडों रूपए आई पी एल की बेटिंग पर लगा रहा था,फिक्सिंग कर रहा था पर उन्हें कुछ भी मालूम  नहीं था. जब बंसल साहब का भांजा करोडों का लेन-देन कर  रहा था  और बंसल साहब को  कुछ भी मालूम नहीं था  तो यह कोई अजूबे की  बात नहीं कि श्रीनिवासन साहब को कुछ भी मालूम नहीं  था. अब इस देश में यही हो  रहा है , माँ-बाप  और सास-श्वसुर की पूरी एक जमात धृतराष्ट्र बन चुकी है. उनके बेटे, दामाद, भतीजे और भांजे उनकी नाक के नीचे क्या कर रहे हैं उन्हे मालूम  नहीं रहता.मांएं कहती हैं -उनका बेटा भोला भाला है,वो कोई गलत काम कर ही नहीं सकता. न यकीन हो तो पिछले छ: महीनों मे चर्चित बलात्कार के मामलों में सारे आरोपियों की मांओं के बयान पढ लीजिए. तो साहब मैं बार-बार कहता हूँ कि श्रीनिवासन साहब को यह बिलकुल मालूम नही था कि उनका दामाद  क्या कर रहा है.

          फिर मेरियप्पन का कहना है कि उसे दारापुत्र विंदू ने बहकाया है.बच्चा है बेचारा, आ गया बहकावे में! श्रीनिवासन साहब का कहना है कि मेरियप्पन क्रिकेट एंथूसिएस्ट है. इतना भी आप लोग नहीं समझते. वह तो अपने एंथूसियाज्म में महज कौतूहलवश चेन्नई सुपर किंग की  टीम के  साथ-साथ घूम  रहा   था. अब अगर लोग उसे चेन्नई सुपर किंग का   मालिक समझने लगे ,राजीव शुक्ला उसे यही मान कर  ई-मेल भेजने  लगे तो इसमें न तो श्रीनिवासन की कोई गलती है और न ही मेरियप्पन की .

          आप कहते हैं कि अगर श्रीनिवासन साहब को दामाद  की  करतूतों के बारे में नहीं भी मालूम था तो भी वह नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दें. आखिर क्यों दें भाई? कौन है इस देश में जो नैतिक आधार पर इस्तीफा दे  रहा है? लालबहादुर शास्त्री की बात करते हो,अरे वो जमाना चला गया भाई! क्यों पुरानी बातों को कलेजे से चिपकाए बैठे हो? भूल जाओ नैतिकता-फैतिकता! अब तो जब तक कुर्सी पर से धकियाया नहीं जाता या हाथ पकड कर ऐंठा  नहीं जाता तब तक कोई कुर्सी नही छोडता. फिर श्रीनिवासन साहब  ही आपको मिले हैं नैतिकता का पाठ पढाने  के लिए. जब इस आई. पी. एल. का आगाज ही नीलामी के साथ होता है  जिसमें खिलाडियों पर बोली लगती है और जिसे पहली बार देख कर एक नीलाम हो रहे विदेशी खिलाडी ने कहा था-"आई वाज फीलिंग लाइक ए काऊ",तो किस  नैतिकता की बात आप करते हैं? आई.पी.एल. की  सफलता के पीछे मार्केटिंग के सारे नुस्खे हैं. मार्केटिंग का मूलमंत्र है- पैसा लगाओ और पैसा कमाओ ,उसके लिए जो भी हथकंडा जरूरी  हो अपनाओ :फनफेयर ,चीयरलीडर और पार्टियाँ ,ये सब वही तो हथकंडे थे. आई. पी. एल. तो एक बिकाऊ माल है,खाली स्पोर्ट्स-स्पोर्ट्स आप क्या लगाए बैठे हो? श्रीनिवासन साहब  का कहना है -"आई कांट बी बुलडोज्ड इन टू   रिजाइनिंग". तो आप लोगों को ये मालूम नहीं है कि श्रीनिवासन साहब खुद बुलडोजर हैं. आपकी क्या औकात कि उन्हें बुलडोज करें. ये उनकी ही हैसियत थी  कि उन्होंने ये कानून ही बदलवा दिया था कि बी. सी. सी. आई. के पदाधिकारी आई. पी. एल. टीमों के मालिक नहीं बन सकते. तो  साहब  वे अपनी मनमर्जी करते हैं और ये उनकी आदत में शुमार है. बी. सी. सी. आई. के किसी सदस्य या पदाधिकारी की हिम्मत उनके आगे चूँ करने की नहीं है. उसे उन्होंने कौरवों की सभा में तब्दील कर दिया है जहाँ बडे-बडे दिग्गज बैठे हैं पर सारी नैतिकता भूल कर चुपचाप  बैठे हैं. वे राजनीतिक सूरमा भी जो बात-बात पर प्रतिद्वंदी दल के लोगों  से इस्तीफे की माँग  करते हैं.

          श्रीनिवासन साहब का कहना है कि कानून अपना काम करेगा और दोषियों को सजा मिलेगी. तो आप  उन पर भरोसा रखिए भले ही उनके दामाद  के बारे में आने  वाली रिपोर्ट  और उनकी आई. पी. एल. टीम (दुनिया जानती है कि चेन्नई सुपर किंग  किसकी टीम है) के  बारे  में उन्हें खुद ही फैसला करना है. आप उनकी नीयत पर खामखाँ शक मत करिए. उन्हें शेरशाह सूरी की श्रेणी का मानिए जिसने अपने बेटे द्वारा किसी की पत्नी के ऊपर थूक दिए जाने पर उसके लिए भी  इसी तरह के  बर्ताव का प्रावधान किया था. भले ही आज के भारत में इस तरह के सारे आश्वासन झूठे साबित हो रहे हों पर आप जगजीत सिंह की गाई गजल के मुताबिक झूठे वादे पर यकीन करके अपनी उम्र बढा लीजिए. आखिर आने वाले साल तक आप ये सारी बातें भूल चुके होंगे और   किसी न किसी आई. पी. एल.  टीम को  सपोर्ट कर उसकी जय-जयकार में लगे  होंगे.इस देश में तमाम सारे  गम हैं और क्रिकेट तथा आई पी एल का कांबीनेशन उन गमों को भुलाने की सबसे अच्छी दवा है.

Saturday, 25 May 2013

दुश्चक्र ( संस्मरण पर आधारित एक बाल श्रमिक की कथा)

        बात सन  1995  की है .मेरी तैनाती उन दिनों अंबरनाथ (जो मुंबई का पुणे लाइन पर स्थित उपनगर है) में थी.शुरू में मुझे सरकारी आवास नहीं मिल पाया और मैं किराए पर एक फ्लैट लेकर उसमें रहने  लगा. कुछ समय के बाद मुझे सरकारी आवास आबंटित हो गया और मैं उसमें रहने के लिए आ गया.मेरा आवास एक काफी  बडा भवन था जो एक छोटी पहाडी या वहाँ की स्थानीय  भाषा के अनुसार टेकरी के ऊपर स्थित था.इसमें चार फ्लैट नीचे तथा चार ऊपर बनाए गए थे.मैं  नीचे सामने  पश्चिम की दिशा में स्थित फ्लैट में रहता था. भवन से निकलने वाली सडक के बगल में उपत्यका थी तथा सामने भी हरी-भरी पहाडियाँ दिखती थीं  जो संपूर्ण दृश्य को मनोरम बनाती थीं.सुबह उनके पीछे से निकलने वाला सूरज मन को आहलादित  कर देता था. एक तरफ की पहाडी पर बस्ती थी और उस पर रात में  रोशनियाँ टिमटिमाती थीं जो अच्छा समा उपस्थित करती थीं. बारिश के दिनों में चारों तरफ का दृश्य स्वर्ग सदृश सुंदर हो जाता था. मेरे पास एक सर्वेंट  क्वार्टर तथा गैरेज भी था.चूँकि मेरे पास गाडी आदि  नही थी अत: गैरेज का इस्तेमाल भी सर्वेंट क्वार्टर की तरह होने लगा तथा उसमें एक परिवार रहने  लगा जो बागवानी का काम कर देता था.कुछ दिनों के बाद एक परिवार सर्वेंट क्वार्टर में रहने की मंशा से आया. मेरे पडोसी बोलन साहब ने बताया कि वे पहले उनके सर्वेंट क्वार्टर  में रह  चुके थे तथा भले  लोग थे.अत: मैंने अपना  सर्वेंट क्वार्टर उन्हे दे दिया.

        मेरे घर में शुरू में  काम करने के लिए उस घर की गृहस्वामिनी अपनी एक छोटी बच्ची के साथ आई.कुछ दिनों के बाद उसने स्वयं आना  बंद कर दिया और केवल उस बच्ची को ही भेजना आरंभ कर  दिया.बच्ची की उम्र दस -ग्यारह वर्ष रही होगी.पर वह बडी तत्परता के साथ घर के सारे काम निपटा देती.उसने पाठशाला का मुँह भी नही देखा था तथा वह अपनी माँ के साथ अन्य कई  घरों में भी काम करने के लिए जाती थी.उसका नाम पिंकी  था.बच्ची बडी ही सुघड,विनम्र तथा स्वच्छताप्रिय थी. ढंग के कपडे पहन  लेने पर  कोई कह नहीं सकता  था कि वह किसी समृद्ध परिवार की नहीं है.  मेरी श्रीमतीजी ने बी.एड. में प्रवेश लिया तो पिंकी रसोई के काम में भी उनकी मदद करने लगी.जरूरत पडने पर वह रोटी भी बना देती.अपने स्वभाव,सेवाभाव तथा कर्तव्यपरायणता से बच्ची ने हम लोगों के दिल में घर कर लिया.मैने अपनी पत्नी से कहा कि तुम पिंकी को कुछ पढना-लिखना सिखाओ.पिंकी को कापी तथा पेंसिल आदि लाकर दे दी गई तथा घर का काम करने के बाद वह मेरी श्रीमतीजी से पढने लगी.जब उन्होने उसे हिंदी पढाना शुरू किया तो पिंकी  कहने लगी कि  मै अंग्रेजी  पढूँगी. अब  वह हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी पढने लगी.कुछ दिनों तक तो पिंकी की पढाई ठीक-ठाक चली  फिर कभी उसकी कापी तो कभी पेंसिल गायब होने लगी. किसी दिन पिंकी न पढने के लिए कोई बहाना बना देती.एक समय के बाद मेरी श्रीमतीजी तंग आ गईं  और मुझसे बोलीं-पिंकी की पढने-लिखने में रुचि नही है,कभी कापी तो कभी  पेंसिल गायब कर देती है.धीरे-धीरे पिंकी की  पढाई बंद हो गई.

        एक दिवस रविवार था और मैं सुबह देर तक सोने के मूड में था .प्रात: दरवाजे की घंटी बजी .श्रीमतीजी संभवत: स्नानागार में थीं.अत: मुझे जाकर दरवाजा खोलना पडा.देखा तो पिंकी खडी थी .पिंकी घर के भीतर आ गई  और मैं पुन: सोने का उपक्रम करने लगा.तभी पिंकी मेरे पास आकर बोली-"अंकल-अंकल!"जब मैंने आँखें खोलीं तो पिंकी ने मेरी तरफ एक  सौ रूपए का नोट बढाया.मैं अचरज में पड गया और बोला-"ये क्या पिंकी?पिंकी हंस कर बोली-"अंकल,कडकी थी न घर में तब आंटी से ये रूपए लिए थे." मैंने रूपए ले लिए पर सोचने लगा -ये छोटी सी पिंकी अभी से कडकी जैसे शब्द से परिचित हो गई है.

        पिंकी हमारे परिवार का एक अनिवार्य हिस्सा सा बन गई थी.मेरे साले साहब अमेरिका से सपरिवार  मिलने आए  थे.वे पति-पत्नी दोनों ही व्यस्त प्रोफेशनल हैं.मेरी सलहज ने अमेरिका में दैनिक कामों में सहायता  के लिए  किसी के मिल पाने में होने वाली दिक्क्तों का जिक्र किया तो मैंने कहा -  आप पिंकी को स्पांसर कर  अपने साथ लेती जाइए. उन्होने मेरी श्रीमतीजी से  कहा-"पिंकी से पूछो  अमेरिका चलेगी?" जब श्रीमतीजी ने पूछा तो पिंकी ने मना कर दिया.दिन गुजरते गए और इस दौरान मुझे पुत्ररत्न की  प्राप्ति हुई .पिंकी बेटे की देख-भाल में भी सहायता करती.मेरा बेटा भी पिंकी  से हिल-मिल गया.जब उसने बोलना शुरू किया तो पिंकी को ताई (मराठी में दीदी को ताई  कहते हैं) कह कर पुकारना  शुरू कर दिया.पिंकी इस दौरान  बडी हो गई थी,इस  बात का अहसास उस दिन हुआ जब उसकी  माँ मेरे पास आकर बोली- "जब पिंकी काम करने आती  है तो इधर लडके आते हैं.हम इज्जत  वाले हैं तुम देखना बेटा!." मैंने पिंकी से पूछा -"पिंकी कौन लडका इधर आता है,तुम्हारी माँ कह रही थीं.अगर  कोई इधर आता है या तुम्हे तंग करता है तो मुझे बताओ." पिंकी कुछ नहीं बोली पर उस दिन  से घर में रहने पर अगर पिंकी घर में है तो  मैं उसकी तरफ ध्यान रखने लगा.घर की रसोई बिल्कुल पीछे की तरफ थी और वहाँ से एक दरवाजा बाहर की तरफ खुलता था  जिसके बाहर खाली जगह पडी थी .कुछ पेड आदि थे तथा काँटेदार तारों से घर की बाउँड्री बनाई गई  थी.पिंकी रसोई  में काम करते समय हवा आदि आने - जाने के लिए वह दरवाजा खोल लिया करती थी. एक दिन मैंने देखा   कि बाड के  दूसरी तरफ कुछ लडके खडे हैं.मैने डाँटा तो वे चले गए.उस दिन से पिंकी को हिम्मत आ गई.वह लडकों को डाँटकर भगाने लगी.एकाध पर लडकों को  खडा पाकर जब मैं उस तरफ गया तो  जिस ढंग से सीधी -साधी दिखने वाली पिंकी उन पर गरजी उससे मैं आश्चर्य में पड  गया.

         अंबरनाथ में ही मेरी बहन का विवाह स्थानीय रूप से तय हो गया .सुविधा को देखते हुए मैने वहीं से विवाह को संपन्न करने का  निश्चय किया.उस समय मेरे बहुत से बंधु-बांधव  तथा रिश्तेदार अंबरनाथ पधारे.पिंकी ने उन दिनों घर में बहुत काम किया.घर में आए हुए सभी लोग उसके सेवाभाव से बहुत अभिभूत हुए तथा उसे कुछ न कुछ देकर गए.

        उसके कुछ महीनों बाद की बात है ,जब मैं शाम को कार्यालय से घर आया तो श्रीमतीजी ने कहा कि सोनाबाई (वह महिला जो मेरे गैरेज में अपने परिवार के  साथ रहती थी तथा बागवानी का काम देखती थी ) आज पिंकी के बारे में कह   रही थी कि उसका सिद्धनाथ( जो मेरे  पडोसी प्रसादजी के सर्वेंट क्वार्टर में रहता था तथा उनके यहाँ काम करता था ) के साले के साथ लफडा (मुंबई में यह शब्द affair का पर्याय है) है ,जब वह उसे देखती है तो उसकी आँखों में चमक आ जाती है और जब भी वह सिद्धनाथ के घर  आता है पिंकी उसके साथ घंटों बातें करती है.श्रीमतीजी आगे बोलीं कि मैंने उसे डाँट दिया है और कहा है कि पिंकी के बारे में इस तरह की उल्टी-सीधी बातें  मत करना.

        खैर, कुछ दिनों के बाद पता चला कि सोनाबाई ने जो कुछ भी कहा था वह असलियत थी.पिंकी को बहुत समझाने-बुझाने की चेष्टा की गई पर वह सिद्धनाथ के साले से विवाह करने पर आमादा थी.सिद्धनाथ का साला माँ-बाप का अकेला लडका है तो क्या हुआ,निकम्मा है , आवारा है- आदि उसे बताया गया पर पिंकी पर कोई असर न  हुआ.सिद्धनाथ का साला अलग पिंकी के माँ-पिता को धमकाने लगा.सिद्धनाथ के सास-ससुर आकर कहने लगे कि उनका इकलौता लडका पिंकी के प्रेम में पागल हो गया है तथा कहीं कुछ कर न बैठे  इसलिए जल्द से जल्द पिंकी का विवाह उनके बेटे से कर दिया जाए.अंततोगत्वा तंग आकर पिंकी के माता-पिता ने उसका विवाह  सिद्धनाथ के साले के साथ कर दिया.

        एक दिन  मेरे ताऊजी आए.उन्होने पिंकी के न दिखाई देने पर उसके बारे में पूछा.मैने उन्हे सारी कहानी बताई.इस पर वे बोले-"पिंकी गरीबी के दुश्चक्र में थी और उससे बाहर निकलने के लिए उसने ऐसा किया."
शायद उनकी बात सही रही हो.पर पिंकी तो एक दुश्चक्र से निकल कर दूसरे दुश्चक्र में चली गई थी क्योंकि कुछ ही दिनों के बाद पिंकी के आवारा और निकम्मे पति द्वारा उसके साथ मार-पीट किए जाने की खबरें आने लगीं.

Thursday, 23 May 2013

अरुणिमा के हौसले को सलाम!

        अरुणिमा की कहानी खुद्दारी की,विपरीत परिस्थितियों में भी हौसला न खोने कीऔर हार न मानने की  ,जीवन में आए एक ऐसे तूफान से बाहर निकलने की जिसमें से शायद बहुतेरे बाहर ही न निकल पाते,दृढ   इच्छाशक्ति की,अदम्य साहस की, जीवटता   की और सबसे बढ कर नारीशक्ति की  मनुष्य की  पाशविकता पर  विजय की प्रेरणादायी गाथा है.


        आज से दो वर्ष पहले मैंने समाचारपत्रों में एक समाचार पढा था जो अरुणिमा सिन्हा  के बारे  में था.उत्तर प्रदेश के एक छोटे से नगर अम्बेडकरनगर की निवासी अरूणिमा जो राष्ट्रीय स्तर की वालीबाल खिलाडी थी,  12 अप्रैल 2011 को पदमावती एक्सप्रेस से लखनऊ से दिल्ली जा रही थी.बरेली से  पहले कुछ बदमाशों ने उसके गले से सोने की चेन खींचने  का प्रयास किया.बदमाशों को मालूम नही था कि उन्होने किसी अबला नारी पर नही  बल्कि एक हिम्मती और जीवट वाली लडकी के साथ यह जुर्रत की है.उसने बदमाशों को सीधे चेन दे देने के बजाय उनका मुकाबला किया और जब बदमाशों को लगा कि वे उससे पार नही पाएंगे तो उन्होने उसे ट्रेन से  बाहर धक्का दे दिया.अरूणिमा ट्रेन  के बाहर जा गिरी और दूसरी तरफ  से आ रही ट्रेन से टकरा गई  तथा बुरी तरह से घायल हो गई.उसे गंभीर स्थिति में अस्पताल  में भर्ती कराया गया.बरेली और  अम्बेडकरनगर से मैं जुडा  रहा हूँ अत: स्वाभाविक तौर पर  मैंने वह समाचार ध्यानपूर्वक पढा.मन बडा ही खिन्न हुआ.सरकार क्यों नहीं रेलों में पर्याप्त  सुरक्षा उपलब्ध  कराती जो ऐसी घटनाएं  घटती हैं.उस समय रेलवे विभाग ने कहा था कि कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है. मैने एक-दो दिन बाद फिर पढा कि अरुणिमा का जीवन बचाने के लिए डाक्टरों ने  उसका बांया पैर काटने का निर्णय लिया है. मन और  भी दु:खी हुआ कि एक बच्ची का कैरियर बर्बाद हो गया.मुझे लगा कि अरुणिमा  अब  तमाम सामान्य लोगों की तरह अपने दु:ख से उबरने की कोशिश करेगी.पता नहीं वह इसमें सफल हो पाएगी या नहीं.जीवन में यदि वह कुछ स्थिरता पा जाए तो उसके लिए अच्छा होगा.पर बदमाशों की तरह मैं भी गलती पर था.अरुणिमा को एक भयावह हादसे के कारण जिसके कारक समाज के ही बदनुमा दाग जैसे अंश थे,  गुमनामी के अंधेरों में खो जाना और अपने सपनों को टूटते देखना मंजूर नही था. मुझे नही मालूम था कि एक बार फिर मैं अरूणिमा के बारे में समाचार पढूँगा और  वह भी इस दुनिया  की सबसे बुलंद जगह उसके द्वारा फतह किए जाने के बारे में.


          कल मैंने समाचारपत्र में पढा कि अरुणिमा ने  मंगलवार ,21 मई को  प्रात: 10.55 पर एवरेस्ट की चोटी पर चढने में सफलता प्राप्त की तथा एवरेस्ट पर विजय पाने  वाली वह भारतवर्ष की  पहली विकलांग है . इसके  अलावा प्रोस्थेटिक कृत्रिम पैर के सहारे एवरेस्ट पर चढने वाली वह विश्व की प्रथम महिला है.

        अरूणिमा का कहना है कि वह नहीं चाहती थी  कि  लोग उसे बेचारगी भरी नजरों से देखें इसलिए उसने  "एवरेस्ट पर विजय" जैसा ऊँचा लक्ष्य का निर्धारित किया.उसने  अपने इरादे अपने  कोच और अपने भाई को बताए.उन्होने उसे प्रोत्साहित  किया.अगर आपके इरादे नेक हों तो मदद करने वाले मिल ही जाते हैं. दुर्घटना के शॉक से बाहर निकल कर उसने भारत की प्रथम एवरेस्ट विजेता महिला बछेंद्री  पाल के दिशानिर्देश में उत्तरकाशी में टाटा स्टील एडवेंच्योर फाउंडेशन में एक वर्ष तक कठोर प्रशिक्षण लिया और वह कारनामा कर दिखाया जिसकी उसकी जैसी परिस्थितियों वाले व्यक्ति से  सामान्यत: कोई उम्मीद नही करता.इसीलिए किसी ने कहा है-

                                           "पंख होने से ही कुछ नहीं  होता,  हौसलों  से उडान होती है.
                                            सपने उन्हीं के सच होते हैं जिनके सपनों में जान होती है.."

        अरुणिमा की  कथा बरबस उस बच्ची की भी याद दिला  जाती  है  जो दिसंबर ,2012 में दिल्ली  की एक बस में कुछ दरिंदों का मुकाबला करते हुए उनकी दरिंदगी का  शिकार हुई.अगर वह बहादुर बच्ची बच गई  होती तो शायद अरुणिमा जैसा ही कुछ कर दिखाती,भले ही किसी दूसरे क्षेत्र में.यदि हम अपनी बच्चियों  को अबला नारी  के बजाए  इन्हीं की तरह बहादुर,दृढप्रतिज्ञ और दिलेर बनाने का संकल्प लें तो देश का नक्शा बदल जाए.


Monday, 20 May 2013

चलो बेवकूफ बनें हम!

        ऐसा लगता है कि हम भारतवासी  बेवकूफ बनने के लिए ही पैदा हुए हैं.शायद इसकी वजह है कि हम भारतवासी जरूरत से ज्यादा होशियार हैँ.है न कैसा विरोधाभास?पर इसमें विरोधाभास कुछ भी  नहीं है.दरअसल हम खुद को होशियार समझ कर दूसरे  को बेवकूफ बनाने में लगे रहते हैं.पर कमोबेश देश में एक जमात ऐसी भी है जिसे हर कोई बेवकूफ बनाने की जुगत में रहता है.वह है इस देश की गरीब जनता.कहते हैं कि गरीब की जोरू सबकी भाभी होती है.नेतागण उसे सब्जबाग दिखाते  हैं नरेगा के,गैस सब्सिडी के,कर्ज माफी के ,शिक्षा और खाद्य सुरक्षा के अधिकार के.कुल लब्बोलुबाब यह है कि गरीब जनता को कुछ न कुछ दिखा कर ललचाते रहो,कुछ टुकडे उसके हाथ में गिराते रहो और उस कार्टून की तरह जिसमें किसी गाडी  का कोचवान गाडी में श्वानों को जोतकर उनके आगे कुछ हड्डी के टुकडे एक लीवर संचालित छड से लटका कर उन्हे उठाता गिराता रहता हैऔर इस प्रकार श्वानों को दौडाता रहता है तथा अपनी गाडी चलाता रहता है वैसे ही अपनी गाडी चलाते रहो.पर उसे इसे इस काबिल बनाने की कोशिश मत  करो कि वह अपने पैरों पर खडी हो जाए .बस उसे ऐसा बनाए रखो कि  वह तुम्हारी तरफ लालसा भरी निगाहों से देखती रहे.  उसे याद कराओ कि वह किस धर्म का है और उसकी जाति क्या है और उस धर्म तथा जाति के पैरोकार आप ही  हैं ताकि  वह आपकी ही जय-जयकार करे,आपको ही अपना हितैषी समझे और बेवकूफ बनकर आपको वोट देता रहे.

        नेताओं के बाद  बेवकूफ बनाने के लिए सुदीप्त सेन जैसे लोग हैं जो पैसा दिन दूना रात चौगुना  होने का ख्वाब दिखा कर जनता को बेवकूफ बना रहे हैं.जिन लोगों की पूरी जिंदगी की कमाई पच्चीस-तीस हजार रूपए है वे जल्द से जल्द पैसा दोगुना होने के लालच में और जिनके पास  और ज्यादा है वे रईस की श्रेणी में आ जाने के लालच में सुदीप्त सेन  जैसे लोगों के पास अपना पैसा रख रहे हैं  और जिस दिन सुदीप्त जैसों का खेल खत्म  हो जाता है उनमें  से अनेक हताशा और  निराशा में आत्महत्या कर लेते हैं.पर खेल  खेलने के लिए फिर कोई नया आ जाता है और कमजोर  याददाश्त वाली जनता फिर  से जाल  में फंसने और बेवकूफ बनने  के लिए तैयार रहती है.राजकपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' के डायलाग -ये दुनिया एक सर्कस है,के अनुरूप सर्कस का खेल जारी रहता है.

        जनता को  बेवकूफ बनाने में जो कमी रह जाती है उसे हमारे भाई लोग पूरा करते हैं.आप कहेंगे कौन से भाई.अरे यही दाऊद भाई और टाइगर मेमन भाई और इनके जैसे और भाई .हमारी भारत सरकार इन भाई लोगों के कारनामों और ठिकानों से वाकिफ होते हुए भी  इनका आज तक  कुछ बिगाड नही  पाई. अब भाई लोगों  ने पढे-लिखे और न पढे-लिखे ,अमीर और गरीब सभी श्रेणी के भारतीयों  को बेवकूफ बनाने के लिए नायाब तरीका निकाला है,क्योंकि उन्हे मालूम है कि क्रिकेट के शौकीन ये सभी हैं.सो साहब बेटिंग के रैकेट चलाओ,स्पाट फिक्सिंग कराओ,क्रिकेटरों को धन  और सुंदरी  का संयोग उपलब्ध कराओ,बाकी  काम धमका कर और ब्लैकमेलिंग कर पूरे हो ही जाएंगे .जनता बेवकूफ बनती रहेगी,सब कामकाज छोड कर क्रिकेट के मैच देखेगी, क्रिकेट पर परिचर्चा करेगी और भाई लोग क्रिकेटरों के साथ-साथ अपनी जेबें गरम कर अपनी पौ-बारह करते रहेंगे.बेटिंग के रैकेट में उलझे क्रिकेटर उनसे ज्यादा होशियार हैं जो इस  चक्कर में नही पडे.उन्हे मालूम है कि इस काम में दोनो  ही हाथों में लड्डू है.अगर पकडे भी गए तो कोई बात नही.जनता  की याददाश्त कमजोर है.दस साल के बाद कोई न कोई पार्टी एम.पी. का टिकट दे देगी  और जनता भी सब कुछ भूल कर वोट दे देगी और साहब आप देश के भाग्यविधाता-भाग्यनिर्माता की श्रेणी में आ जाएंगे.

       यह तो रही जनता को बेवकूफ  बनाने वालों की बात.हमारे दो पडोसी देश हैं जो हमारी सरकार  को ही बेवकूफ बनाने में लगे रहते  हैं.एक ने तो हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा लगाया और हमसे भी लगवाया.हम इसी मुगालते में रहे कि हिंदी-चीनी बिछडे हुए सगे भाई  हैं और बरसों के बाद जब हम आजाद हुए तब जाकर मिल पाए हैं.पर हमारे इस तथाकथित भाई ने हमें उन्नीस सौ बासठ में ऐसी पटकनी दी कि हम आज तक नही भूल पाए हैं.हमारा यह तथाकथित भाई अब भी वक्त-बेवक्त  हमें आँखें तरेर कर देखता  है,रात-बिरात हमारे घर की साँकल खटखटाता है और जबरदस्ती हमारे घर में घुस आता है.हम भी  सीना बाहर निकाल कर उसे तरेरते हैं,पर जब वह टस से मस नहीं होता तो आखिर में उससे कहते हैं-भाई हमारी इज्जत रख और चला जा!क्या कहा चुमार में गश्त बंद कर दें,चल मान लेते हैं.क्या कहा अपने घर के बाहर के बरामदे  से  शेड  हटा लें,चल मान लेते हैं,अब तो भाई चला जा! भाई हमें देख कर मुस्कुराता है और  चला जाता है.हम हैं कि उसकी मोहक मुस्कान पर निहाल हो जाते हैं  और कह बैठते हैं- तेरे घर का बैठकखाना हमें बडा अच्छा लगता  है,अपने से भी ज्यादा,बस चले तो वहीं रहें.

        हमारे दूसरे पडोसी के बारे में क्या कहा  जाए. उसको मालूम है कि आमने-सामने लडेगा तो पटखनी खा जाएगा.इसलिए वह समय-समय पर हमे चिकोटी काटता रहता  है.कभी धीरे से तो  कभी जोरों से.इतना जोर से कि हमारे खून निकल आता है.कभी हमारे सर पर टीप  लगा देता है  और कभी हमारे सर  पर गरम-गरम पानी डाल देता है,इतना गरम कि हम जल जाते  हैं. .पर साहब हम शांति और अहिंसा के अग्रदूत, हम उसे झिडकने- डाँटने के सिवाय कुछ नही करते.हमें उसका स्वभाव बच्चों जैसा लगता है इसलिए हम  उसे बस  यही बताते हैं कि अच्छे बच्चे  ऐसा नही करते.बहुत हुआ तो कह देते हैं- मार देंगे,हाँ.वैसे अमेरिकी खुफिया विभाग का कहना  है कि हमें मालूम है कि उसके पास खतरनाक असलहे हैं.इसीलिए हम उसे बच्चा मान कर उसकी हरकतें नजरंदाज करते हैं.

        तो चलिए बेवकूफ बनने और बनाने का खेल जारी रखते हैं.

Saturday, 18 May 2013

राजनीति या पुत्रनीति और परिवारनीति

          भारतीय  राजनीति बडी तेजी से पुत्रनीति में परिवर्तित होती जा रही है.क्या कांग्रेस क्या बी.जे.पी.,क्या समाजवादी और क्या द्रविडवादी(डी एम के), क्या अकाली और क्या लाली (लालूजी) कोई पीछे नहीं है.कहीं कम तो कहीं ज्यादा ,कोई पहले तो कोई बाद में,हर कोई इसका अनुगमन करता दिखाई देता है.
          सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस में तो  राजनीति में आगे बढने  के लिए यह एक आवश्यक योग्यता बन गई है.श्रीमती इंदिरा गाँधी को नेहरूजी ने  लोकतंत्र की कीमत पर प्रत्यक्ष रूप से प्रमोट नहीं किया था  पर श्रीमती इंदिरा गाँधी ने संजय गाँधी और फिर राजीव  गाँधी  के रूप में प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक उत्तराधिकारी  के रूप में पुत्रों को प्रमोट करने की परंपरा की शुरुआत  की और अब यह कांग्रेस में परिपाटी का रूप धारण कर चुकी  है. प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने की माँग जब-तब कांग्रेसी बंधु उठाते ही रहते हैं .राहुल,ज्योतिरादित्य,सचिन पायलट,जितिन प्रसाद  कुछ उदाहरण हैं  जो अपनी राजनीतिक धरोहर को संभालने के लिए राजनीति में अवतरित हुए हैं.
          बी. जे.  पी. पुत्रनीति की दृष्टि  से थोडा पीछे है.पर वहां भी वसुंधरा  हैं, अनुराग ठाकुर हैं,वरुण हैं,पंकज हैं,राजवीर हैं और अग्रणी नहीं तो पीछे की पंक्ति में अनेक नाम मिल जाएंगे.किसी एम.एल.ए या एम.पी.  के दिवंगत होने पर वहाँ भी परिवार वाले  उस स्थान पर अपना दावा करने पहले पहुँच जाते हैं. आर.एस.एस. के नियंत्रण के कारण वहाँ पुत्रनीति कुछ दबी-छिपी सी है.
          छोटे राजनीतिक दलों का तो कहना ही क्या,वहाँ तो नेता सीधे-सीधे बिना किसी संकोच के किसी मठाधीश की भाँति अपने पुत्र,पुत्र न होने पर भतीजे या पुत्री को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर  देते  हैं. अपनी पार्टी के वरिष्ठ राजनीतिज्ञों को दरकिनार करते हुए फार्रुख अब्दुल्ला ने  उमर अब्दुल्ला को और प्रकाश सिंह बादल ने सुखवीर सिंह बादल को  उत्तराधिकारी बना दिया है.अजीत पवार बहुत दिनों से शरद पवार के अघोषित उत्तराधिकारी हैं.अब बेटी सुप्रिया सुले भी मैदान में हैं.देवगौडाजी ने कुमारस्वामी को  कर्नाटक  का मुख्यमंत्री साम,दाम,दंड,भेद का प्रयोग कर बनवाया.स्वयं को धरतीपुत्र  कहलाना पसंद करने वाले और खुद को लोहिया का अनुयाई बताने वाले मुलायमसिंह यादव ने अपने पुत्र अखिलेश को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री आखिरकार बना ही दिया है. जिसके दो पुत्र हों वहाँ पहले तो धर्मसंकट पैदा होता है और फिर उसका समाधान होते ही    गृहयुद्ध की नौबत  आ जाती है.प्रतीक यादव के छोटा होने के कारण अभी मुलायम सिंहजी के आगे यह समस्या नहीं है.पर दो उत्तराधिकारियों पुत्र उद्धव और भतीजे राज के दावों और प्रतिदावों के कारण शिवसेना विभाजित हो चुकी है. करुणानिधि के पुत्रों स्टालिन और अलागिरि के वैमनस्वपूर्ण संबन्धों का उदाहरण  सामने है.अब लालूजी पीछे क्यों रहें,वे भी तेज कुमार और तेजस्वी को सामने लेकर आ गए हैं.इसके पहले वे पत्नी राबडी देवी को राजनीतिज्ञ बना ही चुके हैं.उनके और उनकी पत्नी के मुख्यमंत्रित्व के दिनों में उनके सालों की ही बिहार में तूती बोलती थी.
          कुल मिलाकर यह प्रतीत होता है कि यदि कुछ अपवादों और काडर आधारित पार्टियों को छोड दें तो भारतीय राजनीतिज्ञ जनता के हित की कितनी भी बात करें ,कितना भी गाँधी,नेहरू , लोहिया और जयप्रकाश को याद करें: उनके लिए अपने पुत्र-पुत्रियों , भाई -भतीजों और परिवार का हित सबसे ऊपर है और राजनीति तत्संबंधी  हितों को ही साधने का साधन है.भारतीय राजनीतिज्ञों की पुत्रनीति हमें उसी भारतीय मानसिकता से परिचित कराती है जिसके तहत वर्ण व्यवस्था जो वरण अर्थात चयन या  सेलेक्शन पर आधारित  थी; शनै:-शनै: जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई.शायद हम एक नई  जाति 'राजनीतिबाज' का उदय देख रहे हैं.व्यक्तिपूजा और सामंती व्यवस्था की लंबी परंपरा से लबरेज भारतीय समाज  के लिए लोकतंत्र अपेक्षाकृत नई परंपरा है और वह लोकतंत्र के इस पुत्रतंत्र में परिवर्तन को जैसे सहज और स्वाभाविक मानकर इसे स्वीकार करने के लिए तैयार है.परिणामस्वरूप राजनीतिज्ञ भी उन महापुरुषों और मसीहाओं और उनके आदर्शों को भूलकर जिनका वे अपने भाषणों में उल्लेख करते हैं,अपने पुत्र और परिवार को प्रमोट करना अपना अधिकार मानने लगे हैं.इसका  दुष्परिणाम नेताओं की ऐसी नई  पीढी के रूप में देखने को मिल रहा है जो अनुभवहीन  है, संघर्ष  में तपे न होने के कारण संघर्ष करने का माद्दा नही रखती  है,सामंती मानसिकता रखने के कारण आम जनता का भला करने के प्रति प्रतिबद्ध नही है और साहसी तथा निर्भीक निर्णय लेने  की क्षमता से विहीन है पर महत्वपूर्ण स्थानों पर बिठाई जा रही है.यदि जनता इसे हतोत्साहित नही करती है तो भविष्य में दोयम दर्जे के नेतृत्व के  कारण होने वाले दुष्परिणामों को भुगतने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए.

Tuesday, 14 May 2013

असफलता का प्रबंधन


        13अप्रैल को मैंने एक समाचार  पढा कि आई. ए.एस.  में चयन होने के लिए आशान्वित एक 24  वर्षीय नवयुवक वी.वाई.मंजुनाथ ने आत्महत्या कर ली क्योंकि चयनित अभ्यर्थियों की सूची में उसका रोल नं. 264वें क्रमांक पर मेरिट में होने के बावजूद नाम उसका न होकर किसी आश्विन बी. का था  और इस बारे में जब उसने यू.पी.एस.सी.से संपर्क किया तो उसे समुचित और संतोषप्रद उत्तर  नही मिला था.मंजुनाथ इंजीनियरिंग डिग्री  प्राप्त था. यू.पी.एस.सी. की परीक्षा के लिए यह उसका प्रथम प्रयास था.उसने कोई कोचिंग नही की थी.उसके पिता सरकारी क्लर्क हैं और बहुत अच्छी आर्थिक स्थिति में नही हैं.उन्होने मंजुनाथ की इंजीनियरिंग की पढाई के लिए कर्ज लिया था.

        इसी समाचार के बारे में मैंने आज  दिनांक 14 अप्रैल को यू.पी.एस.सी का स्पष्टीकरण पढा कि मंजुनाथ  वास्तविकता में प्रारंभिक परीक्षा  (प्रिलिम.)में ही असफल रहा था तथा इस कारण मुख्य परीक्षा में वह बैठा ही नही था.संभवत: उसने अपने घर में झूठ बोला था तथा घर वालों को अपना रोल नं. गलत बताया था जो एक सफल उम्मीदवार का था.

        यह समाचार पढने के  बाद जब मैं कल घर आया तो  मैंने सबसे पहले अपने बेटे से इस बारे में बात की  क्योंकि मुझे लगा कि यह आवश्यक है कि हम अपने बच्चों को असफलता का प्रबंधन करना सिखाएं.गत वर्ष भी मुझे इसी प्रकार के एक समाचार ने बहुत उद्वेलित किया था.कोलकाता के एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट ने  बंगलौर में नौकरी से हटा दिए जाने के बाद आत्महत्या  कर ली थी.

        सफलता,सफलता कैसे पाई जाए,सफलता पाने के उपाय,...आदि,....आदि क्षेत्रों में सफल कैसे हों,  सफलता और  उससे संबंधित इन विषयों पर सैकडों  नहीं हजारों- हजार पुस्तकें हैं .पर कोई भी पुस्तक आपको यह नही बताती कि असफलता   का प्रबंधन कैसे करें जबकि आज के गलाकाट प्रतियोगिता के युग में उसकी जरूरत ज्यादा है.


  असफलता के प्रबंधन के मेरे विचार से दो पहलू हैं-

                       1.आत्मप्रबंधन-स्वयं यह समझना कि एक असफलता से मेरे लिए दुनिया नही खत्म हो गई.जिस भी  क्षेत्र में असफलता मिली है उससे आगे मेरे लिए जहाँ और भी है और मुझे उस जहाँ के लिए,उसे बेहतर बनाने के लिए, उसे पाने के लिए जीना है.मेरे अंदर यदि  कुछ कमी है तो उसे दूर करँगा,मैं खुद को और बेहतर बनाने की कोशिश  करता रहूँगा और खुद  को बेहतर साबित करूँगा.मुझमें अगर बहुत कुछ कर पाने की नही, तो कुछ कर पाने की क्षमता जरूर है जिसे मैं अंजाम तक पहुँचाऊँगा.उसके लिए मैं पुरजोर कोशिश करँगा.अगर जीवन में कुछ नही मिल पाया तो  कोई बात नही, पाने को अभी बहुत कुछ और भी है.अगर आज कुछ मेरे अनुकूल नही था तो इसका यह मतलब नही कि कल भी मेरे अनुकूल नही होगा.मैं हार नही मानूँगा और कोशिश करता रहूँगा.

                       2.असफलता के विभिन्न पहलुओं,उसके परिणामों और उपलब्ध विकल्पों का  विश्लेषण कर अपने लिए सबसे उपयुक्त रास्ता चुनना और उस पर दृढता के साथ चलना.


      मेरे विचार से मंजुनाथ को या अन्य किसी को भी जो उस स्थिति में हो खुद से निम्नलिखित सवाल करने और खुद को उनके जवाब देने चाहिए थे-

क्या इस असफलता के साथ मेरे लिए दुनिया में सब कुछ खत्म हो गया है?
-नही

क्या मेरे लिए सारे रास्ते बंद हो चुके हैं?
-नहीं

क्या मैं एक कोशिश और नही कर सकता?
-हाँ,मै कर सकता हूँ?

क्या मुझे सफलता प्राप्त होनी ही चाहिए थी?
-नही यह जरूरी नहीं. क्योंकि देश में आयोजित होने वाली सर्वोच्च स्तर  की  परीक्षाओं में से यह एक है,जिसमें तमाम सारे बच्चे बैठते हैं.इनमें सर्वोत्कृष्ट मेधा वाले और अथक  परिश्रम करने वाले बच्चे ही लिखित परीक्षा में चयनित हो पाते हैं.साक्षात्कार स्तर पर भी एक-एक  सीट के लिए कम  से छ: बच्चे ऐसे होते हैं जो हर दृष्टि से समान होते हैं.एक-एक अंक के भी  अंतर से मेरिट में बहुत अंतर आ  जाता है.जहाँ भी समान योग्यता के लोगों में प्रतियोगिता होती है वहाँ गौण समझा जाने वाला बिंदु भी महत्वपूर्ण हो जाता है तथा  न चाहते हुए स्वीकार करना पडता है कि भाग्य की अपनी एक भूमिका का निर्माण हो  जाता है.

क्या मुझे और विकल्पों के बारे में भी सोचना चाहिए?
-निश्चय ही जब आप उच्च  स्तरीय प्रतियोगिता में बैठते हैं तो आपको असफलता की संभावना के बारे में सोचकर अपने लिए कुछ अन्य विकल्पों के बारे में सोचना तथा उन्हे खुला रखना चाहिए.

क्या असफल रहने पर मैं एक और कोशिश कर सकता हूँ?
-क्यों नहीं?मैं अपना विश्लेषण करूँगा तथा देखूँगा कि मेरे स्तर पर क्या कहीं कमी  रह गई?क्या मैं किसी  भी  प्रकार, किसी भी तरह अपने प्रयत्न को और बेहतर बना सकता हूँ?यदि हाँ तो मैं वह कोशिश जरूर करूँगा.यदि मैं नही भी कर सकता हूँ  तो भी एक और कोशिश करने में कोई हर्ज  नही है.क्या पता कल भाग्य मेरे साथ हो.

अगर आज का दिन मेरा नही था तो क्या कल का दिन भी मेरा नही होगा?
-नही,बिल्कुल नही. क्योंकि हो सकता है कि कल परिस्थितियाँ बिल्कुल मेरे  अनुकूल हो जाएं.

अगर फिर भी सफलता नही मिलती है तो?
तो कोई बात नहीं,मैं अन्य उन विकल्पों की दिशा में प्रयास करँगा जो मेरे लिए खुले हैं.

        असफलता प्रबंधन का महत्व उन बच्चों के लिए ज्यादा है जो पूरी तरह से सेक्योर वातवरण में पले-बढे हैं,जिन्होने कभी तकलीफ देखी नही और किसी समस्या का सामना नही किया.अगर अब तक उनके हाथ सफलता ही लगती रही है और उन्होने असफलता का मुंह ही नही देखा है तो ऐसे मेधावी बच्चों को  हिला देने के लिए एक ही असफलता काफी है.इसलिए बच्चों को बताएं कि असफलता भी हमारे जीवन का एक हिस्सा है और मजबूत चरित्र के हार न मानने वाले लोग असफलताओं की बुनियाद पर ही सफलताओं  के महल खडे करते हैं.उनके सामने उनका उदाहरण रखें जो सी.पी.एम.टी.में सफल  नही हो पाए पर आज उच्च कोटि के विश्वविद्यालय में फैकल्टी हैं.जो इंजीनियरिंग की परीक्षा में असफल रहे पर सिविल सर्विस की परीक्षा में सफल रहे  या फिर वैज्ञानिक हैं.मैं व्यक्तिगत  तौर पर ऐसे लोगों को जानता हूँ.

        प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संघर्ष कर अपने लिए रास्ता बनाने वाले महापुरूषों के उदाहरण दें.शिवाजी कई किले हार जाने के बाद जब जयसिंह के समझाने पर औरंगजेब से संधि करने गए तो उसने उन्हे नजरबंद कर दिया.पर उन्होने हार नही मानी.वहाँ से भाग निकलने की जुगत निकाली और फिर से लडाई कर  अपने सारे किले वापस ले लिए.हुमायूँ भारत का साम्राज्य शेरशाह के हाथों गवाँ बैठा था.पर जीवन के सांध्यकाल में अपनी कोशिशों से वह अपना खोया हुआ साम्राज्य वापस पाने में सफल रहा.महाराणा प्रताप  को जंगलों की खाक छाननी पडी पर एक  दिन भामाशाहस्वरूप जैसे स्वयं भगवान प्रकट हुए.महाराणा प्रताप ने फिर से अपनी सेना खडी की और चित्तौड छोडकर शेष राज्य अकबर से वापस छीनने में सफल रहे.

हरिवंश  राय बच्चन की निम्नलिखित पंक्तियों और ऐसे ही अन्य उद्धरणों से बच्चों को प्रेरणा प्रदान करें-

असफलता एक चुनौती है ,इसे स्वीकार करो
क्या कमी रह गई ,देखो और सुधार करो.
जब  तक न सफल हो ,नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोडकर मत भागो  तुम.
कुछ किए बिना ही जय-जयकार नही होती,
कोशिश करने वालों की हार नही होती.

इति!


 
   


Saturday, 11 May 2013

पी.एम.और नमक का दरोगा

        यह शीर्षक देख कर आप चौंक गए होंगे कि आखिर पी.एम. और नमक के दरोगा में क्या संबंध है.चलिए बताता हूँ.

       "नमक का दरोगा" मुंशी प्रेमचंद की सुप्रसिद्ध कहानी है जो उस देश-काल की है जब ब्रिटिश सरकार ने नमक पर टैक्स लगा दिया था.आप लोगों में से कई लोगों ने यह कहानी पढी भी होगी.नमक के दरोगा का नायक वंशीधर एक चरित्रवान,कर्तव्यपारायण नवयुवक है जो अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार, मुस्तैद,पक्का और पाबंद है.एक दिन रात में उसे यमुना के पुल पर से गुजरती गाडियों की आवाज और कोलाहल सुनाई देता है. वह वर्दी पहन कर,अपने जमादार को साथ में लेकर पुल पर पहुँच जाता है.नमक का दरोगा कडकती हुई आवाज में गाडियों को रुकने का आदेश देता है और पूछता है कि गाडियाँ किसकी हैं.गाडी का कोचवान पं अलोपीदीन का नाम लेता है जो दातागंज के प्रसिद्ध जमींदार,रईस और व्यापारी हैं. वह गाडियों से अपने घोडे को सटा कर लदे हुए बोरों की टोह लेता है तो उसका शक पुख्ता हो जाता है  कि उनमें नमक है जो  टैक्स की  चोरी करते हुए  कांनपुर ले जाया जा रहा है. नमक का दरोगा पं अलोपीदीन  को बुलाने का हुक्म देता है. पं अलोपीदीन आते हैं और दरोगा वंशीधर को रिश्वत देकर बचने का प्रयास करते हैं.वे एक हजार से आरंभ कर चालीस हजार तक का प्रस्ताव देते हैं. वंशीधर कहता है कि चालीस हजार  तो क्या चालीस लाख भी उसके ईमान को डिगा नहीं सकते और जमादार को उन्हे हिरासत में लेने का हुक्म देता है. पं. अलोपीदीन न्यायालय
द्वारा छोड दिए जाते हैं क्योंकि न्यायतंत्र और प्रशासन सभी बिके हुए थे.दरोगा वंशीधर मुअत्तल होकर घर चले आते हैं.कुछ दिनों के बाद उनके घर पर पं. अलोपीदीन पधारते हैं  और उनके चरित्र की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हे प्रचुर  वेतन और सुविधाओं के साथ अपनी समस्त एस्टेट और जायदाद का मैनेजर नियुक्त करने का प्रस्ताव देते हैं  जिसे थोडे ना-नुकुर के बाद वंशीधर स्वीकार कर लेते हैं.

        बहुत पहले कभी लखनऊ में एक परिचर्चा के दौरान सुप्रसिद्ध लेखिका शिवानी  ने इस कहानी को असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक बताते हुए  प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से  एक बताया था.उस परिचर्चा में उपस्थित मेरे  ताऊजी ने इसकी चर्चा मुझसे करते हुए कहा था कि मैं शिवानी के कथन से सहमत नही हूँ क्योंकि प्रेमचंद की इस  कहानी में अंततोगत्वा एक ईमानदार आदमी एक बे‌ईमान आदमी का नौकर बन जाता है.  इस कहानी में अंतरनिहित एक अन्य संदेश यह है कि बे‌ईमान लोगों को  भी  अपने मामलों का प्रबंधन करने के लिए ईमानदार लोगों की जरूरत अनुभव होती है.

       परसों जब किसी पत्रकार ने सुश्री रेणुका चौधरी से यह प्रश्न किया कि सी.बी.आई. की कोयला घोटाले से संबंधित रिपोर्ट बदले जाने में पी.एम.ओ. के अधिकारियों की भी संलिप्तता पाई गई है और इस प्रकार क्या रिपोर्ट बदले जाने का दोष  प्रधानमंत्री पर भी नहीं आता तो सुश्री रेणुका चौधरी का कहना था कि प्रधानमंत्री अपनी ईमानदारी के लिए विख्यात  हैं और उन पर किसी प्रकार का प्रश्नचिह्न नही लगाया जा सकता.कांग्रेस पार्टी और उसका नेतृत्व, जब भी कोई मामला उछलता है,प्रधानमंत्री की ईमानदारी की दुहाई देना शुरू कर देती है या यूँ कहें कि उसकी शरण लेने का प्रयास शुरू कर देती है.यह बात मुझे सहज पं अलोपीदीन और वंशीधर का स्मरण करा देती है.जब वंशीधर, पं अलोपीदीन के चाकर बन गए होंगे तो उसके बाद पं अलोपीदीन भी यह कहने की स्थिति में रहे होंगे कि मेरे मैनेजर की ईमानदारी तो विख्यात है फिर मेरे यहाँ कोई बे‌ईमानी कैसे हो सकती है.दूसरी बात यह है कि जब पं अलोपीदीन का सारा साम्राज्य शोषण और बे‌ईमानी पर आधारित था तो उनके साथ जुड  कर कितने दिन वंशीधर अपनी आत्मा को बचाए रख सके होंगे.

        उक्त पर मुझे साहित्यिक जनों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी.

Tuesday, 7 May 2013

ये लो कहाँ आ गए हम-भारतीय राजनीति में निर्लज्जता की नई पराकाष्ठा!

      हमारे एक  रेलमंत्री लालबहादुर शास्त्री थे जिन्होने रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी स्वयं पर लेते हुए त्यागपत्र दे दिया था और एक हमारे वर्तमान रेलमंत्री हैं जिनकी छत्रछाया में एक सदस्य रेलवे बोर्ड की नियुक्ति हुई और इसके लिए उनके भांजे-भतीजे ने दो करोड रूपयों का सौदा किया जिसकी पहली नब्बे लाख रूपयों की नकद किस्त की रंगे  हाथों बरामदगी हुई,लेकिन  साहब उनकी कोई जिम्मेदारी नही बनती है !.घरवाले,रिश्तेदार,दोस्त-अहबाब,राजनीतिक एजेण्ट राजनीतिज्ञों के नाम पर जो चाहे करें,जिससे जितने चाहे रूपए लें ,दस-दस करोड तक की माँग करें पर साहब नेताजी की कोई जिम्मेदारी नही है!नेताजी जो नेताजी ठहरे!नैतिकता की सारी  सीमाओं से परे!उनका दर्जा अब भगवान का हो गया है.उनके प्रति सिर्फ श्रद्धा रखनी  चाहिए.उन पर किसी भी प्रकार का प्रश्नचिह्न लगाना पाप है.राम-राम!ऐसा पाप मत करना.इसीलिए तो साहब पूरी  पार्टी पूरी ताकत से एक तथाकथित ईमानदार प्रधानमंत्री के नेतृत्व में उनके पीछे खडी है.बेवकूफ थे  के डी मालवीय, बूटासिंह और बंगारू लक्ष्मण  जिन्होने इस्तीफा  दिया था  और जिन्होने  उन्हे इस्तीफा दिलवाया था वह भी छोटी रकमों के लिए.

        कालिख धोने का हक सबको है तो फिर  सरकार को क्यों नही. सी बी आई हमारी नौकर है,हमने  रिपोर्ट बदलवाई तो क्या?हम कालिख न धोएं क्या?हमारे प्रधानमंत्री ईमानदार हैं,इसलिए ईमानदारी का तमगा हमारे पास है.परदे के पीछे हम जो चाहे वह करें,अगर परदा खुल भी गया तो क्या!नया जमाना आ गया है साहब!अब लोग नई तरह की फिल्में,नए तरह के  नाटक देखना पसंद करते हैं.मल्लिका शेरावत और सनी लियोन को भूल गए क्या? अरे साहब वह तो पी एम ओ के एक अदने अधिकारी ने रिपोर्ट देखी थी और व्याकरण की त्रुटियों को सुधारने के निर्देश दिए थे.कानूनमंत्री,सॉलिसिटर जनरल सब तो यही कर रहे  थे,व्याकरण संबंधी  त्रुटियाँ ठीक करवा रहे थे.यह सरकार व्याकरण का विशेष ख्याल रखती है.इस देश का और कुछ बुलंदियों पर पहुँचे न पहुँचे ,अपनी भाषाई सतर्कता के चलते यह सरकार भाषा को जरूर नई  ऊँचाइयों पर पहुँचा देगी.भाषा को ऐसा बना देगी जो जनता की समझ से परे हो.भूल जाओ अब्राहम लिंकन को.यह जनता का शासन जनता के द्वारा जनता के लिए नही है.अब तो जनता के द्वारा जनता के शोषण के लिए देश को लूटने का अरमान रखने वालों का शासन है. फिर   जनता ने मालिक बनाया है पूरे पाँच साल के लिए,हम इसी प्रकार पुरजोर सेवा करेंगे जनता की.भला  सेवा करने के लिए भी इस्तीफा देना पडता है क्या?सेवा करने से तो मेवा मिलता है,यह इस देश की  पुरानी कहावत है,फिर हम क्यों न  खाएं मेवा !

       हम्माम में नंगे वह भी  हैं, हम  भी हैं.हम नागनाथ हैं तो वह  साँपनाथ हैं, इसलिए जनता को तो हममें से ही एक को चुनना है. हम नही तो वह सही,वह नही तो हम सही.देख लो कर्नाटक  में हम वापस आ रहे हैं .काटजू साहब ने कुछ दिनों पहले बताया ही है कि इस देश की अधिकांश जनता क्या है.इसलिए हमारा खेल बंद होने वाला नही है,यह चलता ही रहेगा.जाति और धर्म के नाम पर  लोगों को बाँटकर हम थोक में वोट पाते रहेंगे,चिल्लाने वालों चिल्लाते रहो तुम सब!