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Tuesday, 23 April 2013

अपराधों को जन्म देने वाली कॉकटेल

                 दिल्ली में दिसंबर में घटित घटना और अब अप्रैल में घटित घटना में अनेक समान बिंदु हैं. दोनों में ही अपराधियों ने शराब का सेवन किया था.वे सेलिब्रेशन के मूड में थे.दोनों ही समूह वैश्याओं की तलाश में थे  पर अंतत:उन्होने अपना शिकार मासूम बच्चियोँको बनाया-पहले समूह ने एक वयस्क बच्ची को और दूसरे ने एक शिशु बच्ची को.दोनों ही समूह शिक्षा के संस्कार से वंचित स्कूल ड्राप-आउट  के थे और दिहाडी या ऑड जॉब करने वालों के थे,हाँ पहले समूह में एक फिजिकल ट्रेनर भी था,पर निश्चय ही वह कुसंगति में पड  गया था.दोनों ही समूह पहले भी इस प्रकार के अपराध में लिप्त हो चुके थे.एक अन्य समानता जो महज संयोगवश हो सकती है ,वह यह है कि दोनों में ही शिकार बच्चियाँ गरीब तबके की थीं.पहले समूह के डिस्पोजल पर एक बस भी थी पर दूसरे समूह के पास ऐसा कोई साधन नही था इसलिए उन्होने सबसे आसान शिकार पडोसी की अबोध बच्ची को चुना.दूसरे समूह ने शराब का सेवन करने के साथ-साथ ब्ल्यू फिल्म भी मोबाइल पर देखी(समाज में टेक्नॉलॉजी  के प्रसार और गरीब तबके तक  उसकी पहुँच का यह भी एक रूप है) और यह सब यह दर्शाता है कि यौन अपराधों को जन्म  देने वाली कॉकटेल किस तरह तैयार होती और असर करती है.

              इसके साथ मैं आरुषी कांड का भी उल्लेख करना चाहूँगा क्योंकि इस कॉकटेल के अंश वहाँ भी मिलते हैं.डॉक्टर दम्पति के घर में काम करने वाला नौकर जो स्वयं  अपनी तथा आरुषी की हत्या के कारकों में से एक था,भी शिक्षा के संस्कार से वंचित स्कूल ड्राप-आउट था तथा छोटे-मोटे काम की तलाश में मेट्रो शहर में  रह रहा था.नौकर हेमराज के कमरे में पुलिस को "थ्री मिस्टेक्स  आफ माइ लाइफ" की एक प्रति मिली.हेमराज इस पुस्तक को पढ नही सकता था, अत:  सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि यह पुस्तक कौन पढ रहा था.निश्चय ही आरुषी  को इस पुस्तक को पढने योग्य परिपक्व नही माना जा सकता.अब कोलकाता  में कल घटी  घटना का उल्लेख करते हैं.छ: वर्ष की एक छोटी बच्ची एक शिक्षिका के यहाँ ट्यूशन पढने जाती थी.कल वहाँ जब  वह गई तो शिक्षिका नही थी.शिक्षिका के चौदह वर्ष के बेटे ने उस बच्ची के साथ जबरदस्ती कर डाली.फिलहाल पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है. मध्यमवर्गीय तबके के एक अल्पवय किशोर या किशोरी को जो एक्स्पोजर इन दिनों अपने चारों तरफ मिल रहा है( जिसकी  चर्चा मैंने अपनी पिछली पोस्ट-क्षरित हो रही नैतिकता, में की थी) उसमें ऐसे अपराध में उसका संलग्न हो जाना आश्चर्य का विषय नही है.

             मेरा  कुल कहने का आशय यह है कि जहाँ हम अपराधियों को मृत्युदंड देने की या फिर उन्हे अरब देशों की भाँति दंडित करने की माँग कर रहे हैं वहीं अपराधों को जन्म देने वाली काकटेल को भी तैयार होने से रोकने की दिशा में विचार करें ताकि अपराध को जड से खत्म करने की दिशा में काम किया जा  सके.

Saturday, 20 April 2013

क्षरित हो रहे नैतिक मूल्य

           दिल्ली में एक छोटी बच्ची के साथ घटी हृदयविदारक घटना ने करोडों मनों को व्यथित कर दिया है.कोई समाज को अपशब्द कह रहा है तो कोई देश को,कोई देश के लोगों को घटिया बता रहा है तो कोई समाज को सडा-गला हुआ बता रहा है.देश की राजधानी में घटी अमानवीय या यूँ कहा जाए कि दानवीय घटना पर लोगों की इस प्रकार की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है.  देश की प्रशासनिक,विधिक और पुलिस व्यवस्था में निश्चय ही सुधार की जरूरत है पर साथ-साथ इस तरफ भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि समाज में नैतिक मूल्यों का क्षरण बडी तेजी के साथ हुआ है.पहले हम अपने मां-बाप और शिक्षकों से नीति और दुनियादारी का पाठ सीखते थे.खाली समय में गीता प्रेस,गोरखपुर की पुस्तकें पढते थे या फिर शिक्षापूर्ण बाल पत्रिकाएं पढते थे.मेरे मामा ने मुझे बचपन में चरित्रनिर्माण करने वाली अनेक प्रेरक धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाएं सुनाई थीं.  आज बच्चा जीवन के अधिकाधिक पाठ टी वी और सिनेमा से सीख रहा  है.अभिभावकों और शिक्षकों को उस  पुरानी भूमिका की तरफ वापस लौटने की जरूरत है. "सैयाँ फेविकोल से"  जैसे गाने चतुर्दिक बजते हैं और जब बच्चा इन पर ठुमकता  है तो माता-पिता अत्यधिक प्रमुदित होते हैं.कामोद्दीपक विज्ञापनों,गानों, कार्यक्रमों की बाढ सी आई हुई  है.विद्यालयों के वार्षिक उत्सवों में भी इसी प्रकार के कार्यक्रम दिखाई देते  हैं.और तो और, सामाजिक -धार्मिक उत्सवों में भी यही या इन पर आधारित कार्यक्रम किए जा रहे हैं. इनके प्रभाव से समाज को बचाने की जरूरत है.कमजोर होकर चरमरा रहे नैतिक ढाँचे को सशक्त बनाने और  भारतीय समाज के परम्परागत  मूल्यों(यहाँ मेरा आशय जातिसदृश रूढिगत प्रतिमानों से कदापि नही है) को फिर से स्थापित करने की आवश्यकता है.
         यहाँ मै एक घटना का उल्लेख  करना चाहूँगा.मेरी छोटी बहन मुझसे उम्र में नौ  वर्ष छोटी है.जब वह प्राइमरी शिक्षा ग्रहण कर रही थी तब मै कालेज में था और अभिभावक के तौर पर कई बार उसके विद्यालय जाया करता था.एक बार मै उसकी प्रधानाचार्या के पास किसी सिलसिले में बात करने गया था.उस समय दो अन्य अभिभावक भी वहाँ मौजूद थे.उनमें से एक के बच्चे को विद्यालय  से निकालने की नोटिस दी गई थी.वह बच्चा गालियाँ दिया करता था.प्रधानाचार्या का कहना था कि वह उस बच्चे को विद्यालय में रखेगी तो और बच्चे खराब हो जाएंगे.यह सुनकर अन्य दूसरे अभिभावक ने जो एक मुस्लिम बंधु थे,कहा- "राम-राम  बच्चे ने गालियाँ सीख  ली हैं.मैडम हम तो अपने बच्चे को सुबह सबसे पहले कलमा पढाते हैं. बच्चे इस तरह दिन की शुरुआत कर अपने बाकी काम करते हैं".तो हम सबको बच्चों को कलमा पढाने  की, या यूँ कहें कि उन्हें मजबूत नैतिक  आधार देने की ,उसकी आधारशिला पर उन्हें स्थापित करने की जरूरत है.सन उन्नीस सौ बीस के आस-पास भारत घूमने आए एक विदेशी यात्री ने भारतीयों के मजबूत नैतिक  बल का उल्लेख करते हुए लिखा था कि यहाँ  अकेले सडक पर जाती हुई महिला की तरफ कोई आँख उठा कर देखता भी नही.हमें वो दिन वापस  लौटाने की जरूरत है. यह कार्य यदि समाज के अभिजात्य एवं मध्यमवर्ग तक सीमित रहेगा तो भी आधी सफलता ही मिलेगी.इसलिए समाज के गरीब और पिछडे तबके तथा शहरों की झोपडपट्टियों के लोगों को भी नैतिकता जागरण के अभियान में शामिल करना होगा.