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Tuesday, 31 December 2013

कुकडूँ-कूँ-कुकडूँ-कूँ! हैप्पी न्यू इयर! (व्यंग्य-Satire)

          एक कसाई  की दूकान ' ताजा मटन शॉप'  और उसके बगल में एक मुर्गे तथा चिकन वाले की दूकान 'दि बेस्ट चिकन मीट शॉप ' है . कुछ दूरी पर एक देशी शराब का  ठेका 'रस अमृत' है  तथा उसके सामने ही' विक्टोरिया इंग्लिश वाइन शॉप' है. पास में ही 'दि डिवाइन ईटरी' नाम का रेस्टोरेंट है. हर जगह भारी भीड  उमडती नजर आ रही  है. कसाई की दूकान के भीतर दो बकरे मार कर टांगे गए हैं.  चार बकरे  दूकान के बाहर बँधे हुए हैं. मुर्गे तथा चिकन  वाले की दूकान  के बाहर दो बडे-बडे  दडबे रखे हुए हैं जिसमें से एक में मुर्गे बंधे हुए टुकुर- टुकुर ताक रहे हैं. दूसरे दडबे में चूजे जैसे दीन-दुनिया से बेखबर एक दूसरे के साथ  खेल रहे हैं तथा महीन-महीन सा कोलाहल कर रहे हैं.  तभी बाहर बँधा चितकबरा बकरा कुछ बुदबुदाता है. उससे कुछ दूरी पर स्थित मुर्गे के दडबे में से एक लाल मुर्गा उसे गौर से देखता है.

लाल मुर्गा अपने बगल के काले  मुर्गे से पूछता है -"ये चितकबरे चाचा  क्या कह रहे हैं?"

काला मुर्गा- "लाली अभी तो तुम्हारी उमर इतनी हुई नहीं. क्या कान कुछ कमजोर हो गए हैं? मैं उनकी  आवाज  तो सुन पा रहा हूँ.पर मैं बकरों की भाषा समझता नहीं . तुम ऐसा करो सफेदू चाचा(सफेद बकरा जो चितकबरे के बगल में खडा  है) से पूछो , वे तो हमारे साथ ही रह  रह रहे थे. वे मुर्गों की भाषा समझते हैं."

लाल मुर्गा आवाज लगाता है- "सफेदू चाचा! सफेदू चाचा!"

सफेदू लाली की तरफ  देखता है और कहता है-" यहाँ जान पर बनी हुई है. तू क्यों  चिल्ला रहा है?"

लाली-" वो तो जो यहाँ आ गया उस पर बनी ही रहती है. मैं तो ये पूछ रहा था कि ये चितकबरे  चाचा क्या कह               रहे हैं?

सफेदू-" ये कह रहे हैं- भीड देख रहे हो, आज हममें से कोई लौट कर घर नहीं जाएगा."

लाली-" हाँ चाचा भीड तो बहुत है और ये भीड लगता  है कि हम पर शामत ढाने  वाली  है. पर चाचा आज न तो              हिंदुओं का कोई त्योहार है,न ही मुसलमानों का और न ही ईसाइयों  का. पर इस भीड में तो देखो  जय                भी हैं,जगजीत भी हैं,रहमत भी हैं,डेविड  भी हैं . आखिर ये कौन  सा त्योहार है चाचा."

सफेदू- " अरे ये इंसान  कंबख्त जो इंसान कहलाने लायक  नहीं हैं, नया साल मनाने की तैयारी में हैं"

चितकबरा-" और नए साल को मनाने का सबसे बेहतर तरीका ये यही समझते हैं कि हमको जिबह कर दें और                   पका कर खा जाएं. साथ-साथ "रस अमृत" और " विक्टोरिया" में मिलने वाले द्र्व्य का कम  से कम                   इतना पान कर लें कि उल्टी आने लगे या फिर जमीन पर लोट जाएं."

कालू (काला मुर्गा)- " अरे चाचा !वो देखो मेरे बगल  वाले घर में रहने वाला रमुआ रिक्शेवाला रस-अमृत पर                                     लाइन में लगा हुआ है. जब ये घर पहुँचता है इसकी बीबी रोज झगडा करती है क्योंकि                                      कभी घर पर खाने के लिए कुछ नहीं रहता है   और कभी फीस न दे पाने की वजह से    
                             बच्चों  का स्कूल से नाम कट गया रहता  है  और  ये हमेशा नशे की  हालत में ही घर  
                             पहुँचता है."

चितकबरा-"जानता  हूँ ,सब जानता हूँ."

सफेदू-" और  वो 'विक्टोरिया' पर देखो, हमारे सामने वाली ऊँची बिल्डिंग में जो बडे साहब रहते हैं;बोतलें बैग में             डाल रहे हैं.आज ये क्लब में बैठकर इतनी  पीने वाले हैं  कि बाद में चलने-फिरने लायक नहीं रह      
           जाएंगे और इनका ड्राइवर इन्हें उठाकर गाडी  में डालेगा और घर पहुँचाएगा.जब ये घर पर कालबेल    
           दबाएंगे तो मेमसाहब नींद  से उठकर इन्हें गालियाँ देते हुए घर का दरवाजा खोलेंगी."

लाली-" और चाचा !जरा 'डिवाइन ईटरी' की तरफ भीड  देखो. अंदर टेबल  नहीं मिल पाने की वजह से लोग      
           बाहर इंतजार कर रहे हैं."

चितकबरा-" और उनको भी देखो जो अपनी तोंद पर हाथ फिराते हुए बाहर  निकल  रहे हैं.  हमारे  भाई- बहनों                    को निगल  कर ये तृप्ति अनुभव कर रहे  हैं. "

सफेदू-"भगवान हमारे भाई-बहनों की आत्मा को शांति प्रदान करें."

तभी अंदर से  कसाई निकल कर आता है और चितकबरे का कान पकड कर उसे अंदर ले जाने लगता है.
चितकबरा-" भाई-बहनों, खुदा हाफिज."

सफेदू-"खुदा हाफिज! हैप्पी न्यू इयर चितकबरे!"
चितकबरा- "हैप्पी न्यू इयर, सफेदू ! अब तो खुदा का प्यारा बनकर  ही अपना हैप्पी न्यू इयर होगा."

तभी "दि बेस्ट चिकन मीट शॉप "  का वधिक बाहर आकर लाली  को पकड कर ले जाने लगता है.लाली कुकडूँ-कूँ-कुकडूँ-कूँ चिल्लाने लगता है.

कालू-" चिंता मत कर.मैं तेरे लिए सुप्रीम कोर्ट में पी आई एल  दाखिल करवाऊँगा. पर वहाँ तो केवल इंसानों की            बात सुनी जाती है.मैं नए मुख्यमंत्री केजरीवाल के पास जाऊँगा. वो शाकाहारी है,शायद हमारे लिए कुछ            करे."

लाली-"पर तू भी बचेगा तब तो.अच्छा चल, इंसानों की तरह हैप्पी न्यू इयर करते हैं-हैप्पी न्यू इयर कालू!"

कालू- "भगवान तेरी आत्मा को शांति प्रदान करे."

लाली (रोते हुए)- "और तेरी भी आत्मा को इंसानों की जुबान और पेट के लिए कुर्बान होने के बाद शांति मिले.  
                          हैप्पी न्यू इयर!."

कालू (स्वगत)- शायद दो चार दिन और जिंदा रहते पर इस हैप्पी न्यू इयर  ने जिंदगी और मौत का फासला  
                        हमारे लिए मिटा दिया.मैं नहीं करूँगा हैप्पी न्यू इयर! मैं नहीं करूँगा हैप्पी न्यू इयर!

वधिक लौटकर आता है और कालू को भी पकड कर ले जाता है.कालू जोरों से चिल्लाता है-"कुकडूँ-कूँ-कुकडूँ-कूँ." !

Monday, 30 December 2013

आतंकी परमाणु हमले का खतरा वास्तविक है !

           आतंकी परमाणु हमला कोई दूर की कौडी या कल्पनालोक की अवधारणा नहीं बल्कि एक वास्तविकता  है. समाचारपत्रों में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक इंडियन मुजाहिदीन के मुखिया यासीन भटकल ने पूछ्ताछ के दौरान एन आई ए तथा पुलिस को बताया है कि उसके इरादे सूरत पर आतंकी परमाणु हमला करने के थे तथा ऐसा कर सकने की संभावना को टटोलने के लिए उसने पाकिस्तान  स्थित अपने भाई तथा मार्गदर्शक रियाज भटकल से इस विषय में बात  की थी कि क्या इसकी व्यवस्था की जा सकती है. इस पर रियाज ने उसे उत्तर दिया कि पाकिस्तान में सब कुछ संभव है. रियाज ने कहा कि  परमाणु हमला किया जा सकता है पर  उसे यह झिझक थी कि उसमें मुसलमान भी मारे जाएंगे. यासीन ने इसका निदान यह बताया कि मस्जिदों में प्रचार कर मुस्लिमों को शहर खाली कर देने के लिए कह दिया जाएगा. यासीन के द्वारा सुझाया गया यह समाधान किसी नौसिखिए की सी बात लगती है क्योंकि मस्जिदों के माध्यम से सभी मुसलमानों  को शहर  खाली करने के लिए  कहने पर इंटेलीजेंस एजेंसियों  को इसकी खबर नहीं हो जाती इसकी संभावना न के बराबर थी.  पर जब किसी के ऊपर शैतान सवार हो जाता है तो वह ऐसे तथ्यों को नजरंदाज करने पर भी उतारू  हो जाता है.  यासीन के अनुसार वह थोडे दिनों के बाद ही गिरफ्तार हो गया और इस कारण  अपनी कार्ययोजना को अंजाम नहीं दे सका.

             नि:संदेह पाकिस्तान एक-दो दिन में इसका खंडन कर देगा तथा कहेगा  कि उसके परमाणु ठिकाने पूरी  तरह सुरक्षित हैं  और उसके परमाणु ठिकानों एवं परमाणु सामग्री की सुरक्षा के लिए की  गई व्यवस्था  फूलप्रूफ  है. पर इसमे दो पेंच  हैं.पहला तो यह कि पाकिस्तान में प्रत्येक स्थान पर आतंकियों  से सहानुभूति रखने वाले तत्व हैं जो उनकी मदद के लिए तैयार रहते हैं.पाकिस्तानी सेना में ऐसे तत्व निश्चित रूप से हैं और साथ ही यह तत्व पाकिस्तान की परमाणु व्यवस्थाओं में  भी हो सकते हैं. दूसरे अभी कुछ महीने पहले आतंकियों ने पाकिस्तान के परमाणु ठिकाने पर हमला किया था जिसमें वे असफल रहे थे. पर  उन्होंने इस तरह की जुर्रत की तथा वे प्रथम रक्षा पंक्ति पर असफल  ही सही, हमला कर सके यह स्वयं में बडी बात है.

          एक अन्य तथ्य  है  जिससे  न्यूक्लियर फिजिक्स पढने  वाले वाकिफ हैं, और वह यह है कि परमाणु विस्फोट की मैकेनिज्म कोई बहुत उलझी हुई नहीं बल्कि  साधारण है, मुख्य समस्या वीपन ग्रेड यूरेनियम या थोरियम की उपलब्धता है और इसके उपलब्ध हो जाने पर इस्लामी आतंकी संगठनों के पास इतना टेक्निकल एक्सपर्टाइज  निश्चित रूप से है कि वे परमाणु विस्फोट को अंजाम दे  सकते हैं  क्योंकि उनके  साथ तकनीकी ज्ञान रखने वाले तथा इंजीनियर भी हैं. इसी के बलबूते वे 9/11 की घटना को अंजाम दे सके थे.

          अत: विश्व के  सभी जिम्मेदार देशों को  आतंकी परमाणु हमले की वास्तविकता को समझते हुए इस समस्या पर  मिल- बैठ कर  विचार करने और  इसके निमित्त निवारक तथा प्रतिकारात्मक उपाय तत्परता से करने की जरूरत है  अन्यथा ऐसा न हो कि जब कुछ भयावह घटित हो जाए तभी दुनिया जगे पर तब तक बहुत बडा नुकसान हो चुका होगा. 

Sunday, 29 December 2013

उम्मीद की एक नई किरण!


          28 दिसंबर 2013 का दिन स्वतंत्र भारत के राजनैतिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण  पडाव के रूप में सदैव याद किया जाएगा. जब हम राजनीति को भ्रष्टाचार, बे‌ईमानी, जातिवाद,परिवारवाद तथा साम्प्रदायिकता के पर्याय और विभिन्न प्रकार के  माफिया गिरोहों और उनके सरगनाओं की शरणस्थली के रूप में देखने के आदी हो गए थे;उस समय अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों के राजनीतिक दृश्यपटल पर आगमन के बाद दिल्ली विधानसभा के चुनावों में उनकी अप्रत्याशित सफलता तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर अरविंद का  शपथग्रहण  उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया है. ईमानदार आदमियों के साथ ईमानदारी के पैसे से चुनाव लडना असंभव माना जाने लगा था, पर केजरीवाल की 'आम आदमी पार्टी' ने इसे संभव कर दिखाया है.

           कुछ समय पहले तक यह कहा जा रहा  था कि मोदी आज की भारतीय राजनीति  में एजेंडा सेट कर रहे हैं तथा  कांग्रेस उनके पीछे-पीछे  नाच रही है. पर, आज निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि इस एजेंडे का एक हिस्सा अरविंद केजरीवाल सेट करने लगे हैं जिसकी नोटिस लेने के  लिए कांग्रेस और बी.जे. पी.दोनों विवश हैं. चूँकि अरविंद जो एजेंडा सेट कर  रहे हैं वह राजनीतिक- सामाजिक क्षेत्र में स्वच्छता और शुचिता को स्थान देने के साथ जुडा हुआ है, इसलिए नि:संदेह  इसमें समस्त भारतीय समाज का हित निहित है. इस बात को शायद बहुत से लोग मानेंगे कि बी.जे.पी. के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में हर्षवर्धनजी का मार्ग प्रशस्त करने में "आप" की नैतिकतापरक राजनीति की भूमिका अहम रही है अन्यथा विजय गोयल इतनी आसानी से मानने  वाले  नहीं थे. अरविंद  इस मायने में भाग्यशाली हैं कि उन्हें विपक्षी दल के  नेता के तौर पर हर्षवर्धन जैसे स्वच्छ,सौम्य और शिष्ट  व्यक्ति का सामना करना होगा. कांग्रेस की बैसाखी ही अरविंद के पैरों की बेडी है अन्यथा अरविंद और हर्षवर्धन  के आमने-सामने रहते हुए दिल्ली के  लोग दिल्ली के विकास के साथ-साथ   दिल्ली के बाह्य पर्यावरण तथा नैतिक पर्यावरण दोनों में ही अप्रत्याशित सुधार की आशा कर सकते थे.  

         नवंबर, 2013 के महीने में  मैं  उत्तरप्रदेश गया था. मेरा वहाँ अपने ननिहाल में जाना हुआ जहाँ चुनावी माहौल था, क्योंकि जिला पंचायत के सदस्य पद संबंधी कुछ रिक्तियों को  भरने के लिए चुनाव आयोजित किए गए थे. ग्रामीण क्षेत्र में भी उम्मीदवारों के बडे-बडे कटआउट तथा पोस्टर लगे हुए थे. जिस दिन नामांकन होना  था उस दिन उम्मीदवारगण बडे भारी-भरकम  जुलूसों के साथ जिनमें कई-कई  वाहन शामिल थे, अपना नामांकनपत्र दाखिल   करने जिला कचहरी पहुँचे. हर उम्मीदवार ने अपने-अपने साथ क्षेत्र के अधिक से अधिक बाहुबलियों को  लाने की चेष्टा की थी. मैंने यह सब देखकर अपने एक भतीजे से जो राजनीतिक  रूप से सक्रिय है,इस  सब पर होने वाले खर्च के बारे में पूछा. वह विलेज डिफेंस कमेटी के सदस्य का  चुनाव लड चुका है. उसने मुझे बताया कि उस इलेक्शन में उसके दो-ढाई लाख रूपए खर्च हो गए  थे ,फिर इस चुनाव में तो लोगों को कहीं ज्यादा पैसा खर्च करना पडेगा. लोग पैसा  खर्च ही इस आशा में करते हैं कि वे बाद में इससे कुछ अधिक गुना कमा  सकेंगे. उसने मुझे बताया कि समाजवादी पार्टी का जो उम्मीदवार है उसने सरे आम फरसे से किसी का सर काट दिया था तथा  बी जे पी के उम्मीदवार ने हथौडी से सर कूँच कर किसी को मार दिया था.  अगले दिन बी.जे.पी.के उम्मीदवार  का पर्चा उसके खिलाफ आपराधिक मामला होने के कारण खारिज हो  गया.पर उसकी पत्नी ने रिजर्व उम्मीदवार के रूप में पर्चा दाखिल कर रखा था तथा अपने पति के  बदले में वह उम्मीदवार हो गई.  मेरे दिमाग में  स्वत: यह प्रश्न उठा कि मोदी द्वारा भ्रष्टाचार  और परिवारवाद को खत्म करने के सारे वादों एवं आवाह्न के बावजूद वह ऐसी स्थिति  में कहाँ तक कामयाब हो पाएंगे .पर यदि "आप" को दिल्ली जैसा ही प्रतिसाद देश के अन्य भागों में मिलता है तो निश्चय ही हम इस प्रकार की स्थिति में सुधार की आशा कर सकते हैं क्योंकि सबको "आप"  के एजेंडे के अनुसार सुधरना पडेगा. आखिरकार देखिए राहुल ने भी अपराधी राजनैतिक उम्मीदवारों  के पक्ष में लाए जा रहे विधेयक तथा आदर्श सोसाइटी के मामले में नैतिकता के अलमबरदार की  भूमिका निभाई है.


          आगे केजरीवाल और "आप" की सफलता दिल्ली का प्रशासन चलाने में उनकी निपुणता,  लोगों  की उम्मीदों पर खरा उतरने और चुनावी वायदों को पूरा करने पर निर्भर करेगी. पर यहाँ यह भी याद रखना आवश्यक है कि दिल्ली एक सिटी स्टेट की तरह है तथा पूरे देश में सफलता पाने के लिए केजरीवाल एवं "आप" को विविध समुदायों के हितों में सामंजस्य साधने के साथ-साथ उद्योग,कृषि तथा व्यापार संबंधी नीतियों, व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण  और राष्ट्रीय तथा सामाजिक महत्व के बिंदुओं के बारे में, जिसमें रक्षा और विदेश नीति भी शामिल हैं,  अपनी कार्ययोजना तथा दृष्टिकोण को जनता के सामने स्पष्ट करना आवश्यक है. "आप" को जनता नैतिकता के लिए आंदोलन का पर्याय समझती  है तथा दिल्ली के आज के मूमेंटम का लाभ उठाने के लिए  केजरीवाल  एवं उनकी टीम  को अपनी पार्टी के साथ-साथ  इस आंदोलन को पूरे देश में विस्तार देना आवश्यक है.

Wednesday, 18 December 2013

जमीन देखने और दिखाने की कोशिश!

          आखिरकार देवयानी खोब्रागडे के मामले ने भारत सरकार को अमेरिका को इस बात का   अहसास कराने के लिए मजबूर कर दिया  कि भारतीय रीढविहीन समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते.  सवाल यह है कि किसने आपसे कहा था कि गौरांग बंधुओं को देख  कर जमीन पर बिछ-बिछ  जाइए जो अब आप उनके दूतावासों के कर्मचारियों तथा राजनायिकों  को दी गई विशेष रियायतों को वापस लिए जाने की घोषणा  करते फिर रहे हैं,ऐसी रियायतें जो वे हमारे राजनायिकों को नहीं  देते.  अब तक इनका दिया जाना  हमारी "माई-बाप" मानसिकता और साथ ही हमारी हीनभावना को दर्शाता है.

           अमेरिका में भारतीयों तथा भारतीय राजनायिकों  के साथ दुर्व्यवहार का यह पहला वाकया नहीं है. इसके पहले भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की एक बार न्यूयॉर्क के जे.एफ. के. हवाईअड्डे पर तथा एक बार कॉन्टिनेंटल एयरलाइंस के स्टाफ द्वारा    नई दिल्ली एयरपोर्ट पर फ्रिस्किंग के साथ तलाशी  ली जा चुकी है.  रक्षामंत्री रहते हुए श्री जार्ज फर्नांडीज की दो बार स्ट्रिप सर्चिंग की गई. अमेरिका  में तत्कालीन भारतीय राजदूत मीरा शंकर को रोककर कर उनकी शारीरिक तलाशी ली जा चुकी है.  संयुक्त राष्ट्र संघ  में भारत के स्थाई प्रतिनिधि हरदीप पुरी को पगडी खोलने से मना करने पर बॉडी-पैट के लिए रोका गया. अभिनेता  शाहरुख खान  ने  भले ही व्यंग्य में कहा हो, पर यह कहते हुए असलियत बयान की है कि जब भी उनके ऊपर स्टारडम ज्यादा हावी होने लगता है तो  उससे मुक्ति पाने के  लिए वे अमेरिका चले जाते हैं तथा अमेरिका वाले  उन्हें जमीन पर ले आते हैं. अमेरिकियों द्वारा इस प्रकार के व्यवहार से उनकी नजरों में हमारे देश की स्थिति और साथ ही गौरांग समुदाय में श्यामवर्णी लोगों को लेकर स्वयं की श्रेष्ठता की भावना (सुपीरियारिटी काम्प्लेक्स)  झलकती है.  शायद आज भी वे 'व्हाइट  मैंस बर्डेन' की ग्रंथि से पीडित हैं अन्यथा भारतीय राजनायिकों को जाहिल समझ कर उन पर अपना कानून थोपने और उन्हें मनुष्य बनाने के प्रयास में लगे रहने की जुर्रत नहीं करते .ऐसा  वे  यूरोपीय अथवा चीनी राजनायिकों के साथ तो नहीं करते.दूसरे नस्लवाद( रेशियलिटी) के किसी भी प्रकार के आरोप से बचने के लिए उन्होंने प्रीत भरारा तथा निशा देसाई बिस्वाल को खडा कर दिया है. कहते हैं कि नया मुल्ला पाँच बार नमाज जरूर पढता है. प्रीत भरारा तथा निशा देसाई बिस्वाल ऐसे ही मुल्ले हैं जो  भारतीय राजनायिक के साथ दुर्व्यवहार के पीछे अमेरिकी कानून की दुहाई देते  हैं. अमेरिका का कानून क्या यही कहता है कि भारतीय राजनायिक को नौकर  को कम तनख्वाह देने तथा गलत ढंग से वीसा पर उसे अमेरिका ले आने  जैसे संगीन जुर्म (अमेरिकी कानून के  अनुसार)  उस समय हथकडी लगाकर गिरफ्तार किया जाए जब वह बच्चों को स्कूल  छोडने आई हो. फिर  उसकी स्ट्रिप सर्चिंग की जाए,डी.एन.ए. स्वैब लिया जाए तथा कैविटी सर्चिंग की जाए  और इस सबके दौरान उसे भयानक अपराधों के दोषी लोगों के  साथ रखा जाए तथा यह सब करने के बाद ;जुर्म इतना भयंकर होने(अमेरिकी कानून के  अनुसार) के बावजूद उसे दो घंटे  के बाद जमानत पर रिहा भी कर दिया  जाए. स्पष्ट रूप  से  यह जमीन पर ले आने या फिर जमीन दिखाने का मामला है.  देर से ही सही कम से कम हमारी सरकार ने भी अमेरिकियों को जमीन दिखाने की कोशिश  की. चलिए देखते हैं कि वे कितनी जमीन देखने को तैयार होते हैं.

         एक अन्य बात यह है कि हम आज भी सामंतवादी मानसिकता से पीडित हैं. अन्यथा क्या कारण है कि हमारी सरकार आई.एफ.एस. अफसरों को विदेश पोस्टिंग पर साथ में नौकर ले जाने की सुविधा प्रदान करती  है. क्या इसलिए कि उन्हें "माई-बाप" होने का अहसास विदेश में भी बना रहे. अमेरिका में  राजनायिकों के  नौकरों को लेकर उन पर आरोप लगने का यह तीसरा प्रमुख मामला है. इसके पहले वहाँ  पर नीना मलहोत्रा तथा प्रभुदयाल भी ऐसे मामलों में फंस चुके हैं. कम  से कम एक दलित आई.एफ.एस. अफसर ने ऐसे मामलों में सरकार को आइना देखने के लिए मजबूर किया,यह एक  अच्छी बात है.


Wednesday, 11 December 2013

"आप" की खातिर !

          राजनीतिक परिदृश्य पर दिल्ली विधानसभा में 28 सीटों के साथ 'आप' (आम आदमी पार्टी) की धमाकेदार एंट्री  ने अपनी सफलता के आगे तीन राज्यों में बी. जे. पी. की भारी जीत को भी जैसे फीका कर दिया है. राहुल ने जहाँ 'आप' से सीख लेने की जरूरत पर जोर दिया है,  वहीं दिल्ली में बी.जे.पी.के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हर्षवर्धनजी ने 'आप' को अप्रत्याशित सफलता के लिए बधाई दी है.  'आप'  ने इससे उत्साहित होकर लोकसभा चुनावों में भी जोर आजमाने की मंशा जताई है. चुनावों के टिकटार्थी भी 'आप' की तरफ मुखातिब हो रहे हैं.

          पर यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि 'आप' एक आंदोलन का परिणाम है.यह आंदोलन  भ्रष्टाचार और अनैतिकता के खिलाफ था जिसका नेतृत्व अन्ना ने  किया था. भले ही चुनावी राजनीति में आस्था न रखने के कारण अन्ना ने 'आप' के रूप में किए जा  रहे प्रयोग से स्वयं को अलग कर लिया है  तो भी 'आप' के उसी आंदोलन का प्रतिफल होने से इंकार नहीं किया जा सकता  और आप की सफलता वस्तुत: भ्रष्टाचार और अनैतिकता के खिलाफ जनसंघर्ष की सफलता है ;यह वही जनसंघर्ष था जिसके साथ जनता स्वत:उद्भूत प्रेरणा के साथ जुडी थी और जिसका एक रूप उस समय भी देखने में आया था जब दिल्ली बलात्कार कांड के विरोध  में जनता सडकों पर  उतर आई थी और राजनीतिक नेताओं  के हमदर्दी दिखाने के लिए आने पर   जनता ने उन्हें जनसंघर्ष के मंच का प्रयोग राजनीतिक उद्देश्यों के लिए करने  से रोक दिया था.

         पर कोई भी आंदोलन जब चुनावी  राजनीति का भाग बन जाता है  तो उसके अपने उद्देश्य से भटक जाने की संभावना सदैव बनी रहती है जिसे शायद अन्ना बहुत अच्छी  तरह समझते हैं. बहुजन समाज पार्टी भी एक आंदोलन का परिणाम थी जिसे कांशीराम ने डी. एस.- 4 के रूप में शुरू किया था. बहुजन समाज पार्टी के आरंभिक दिनों में ऐसे  बहुत से लोग जिन्हें मुश्किल  से दो जून की रोटी नसीब होती थी, पार्टी की बैठक के लिए अपना समय देते थे और अपनी आय का अंश पार्टी के लिए कष्ट उठाकर भी देते थे. पर चुनावी राजनीति के दल-दल में फंसकर आज बहुजन समाज पार्टी उस रास्ते से अलग  चली गई है जिस पर कांशीराम  ने उसे आगे बढाया था.  ऐसे तमाम लोग जो जनहित के लिए नहीं बल्कि स्वयं के हित के लिए राजनीति के साथ जुडे हुए हैं; आज बहुजन समाज पार्टी का हिस्सा हैं. राजनीतिक सफलता प्राप्त होने के बाद ऐसे तत्वों  के 'आप' के साथ जुडने की संभावना  सदैव बलवती रहेगी;  पर ऐसे  लोग जब भी पार्टी के साथ जुडेंगे पार्टी के अपने मूल उद्देश्यों से हटकर अलग रास्ते पर जाने लगेगी. अत: 'आप' के कर्णधारों को इस दृष्टि से सजग  रहना होगा.

          अरविंद केजरीवाल को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने  उच्च एवं निम्न मध्यम वर्ग के साथ-साथ गरीब तबके की जनाकांक्षाओं को भी पहचाना  है तथा विशेषकर बिजली और पानी के साथ जुडी आंदोलनात्मक सक्रियता के बल पर 'आप' को उनके साथ जोडा है. इन अलग-अलग वर्गों को एक बिंदु पर ले आना और एक साथ जोडना ही उनकी सबसे बडी सफलता है.  जब लोगों को लगा कि कोई उनके दिल और  दिमाग से जुडे मुद्दों की बात कर रहा है तो वे अपनी जातीय,धार्मिक और वर्गीय  पहचान स्वत: भूल गए.

          पर  राष्ट्रीय राजनीति की बात करते समय 'आप' को यह समझना होगा कि विभिन्न स्तरों पर विभिन्न तबकों के लोगों को उनके स्वयं के हित , जिसमें वे अपने जातीय और धार्मिक हितों को भी शामिल समझते हैं,से ऊपर उठकर राष्ट्रीय और सामाजिक हितों की बात सोचने के लिए और उस कारण स्वयं से जुडने के लिए प्रेरित  करने हेतु अपना स्वरूप राष्ट्रीय आंदोलन का बनाए रखना होगा तथा स्थानीय के साथ-साथ राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों को भी सक्रियतापूर्वक उठाते रहना होगा. एक अन्य बात यह है कि पार्टी को लोगों को जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि उनके पास इस देश के लिए एक "विजन" है,एक "आर्थिक दृष्टिकोण" है  तथा उसे कार्यरूप देने के लिए निर्धारित योजना और सक्षम व्यक्तियों का समूह  है.
      
        कम से कम ऐसे लोगों के लिए जो साफ-सुथरी राजनीति देखना चाहते हैं और अपने राजनीतिज्ञों को भी साफ-सुथरा ही देखना चाहते हैं  'आप' के रूप  में एक विकल्प दिखाई पडा है और ऐसा लगता है कि स्वच्छ राजनीति का सपना पूरा भी हो सकता है. पर  सपनों के टूटने में और मोहभंग होने में समय नहीं लगता और इस कसौटी पर खरा उतरना ही 'आप' के लिए सबसे बडी चुनौती है.

Saturday, 7 December 2013

टेढी उँगली चाहिए!

          कोलकाता की एक लोकल ट्रेन में सफर करते हुए  देखा गया एक वाकया- लोकल में काफी भीड है. जो लोग बैठ सके हैं वे बैठे हैं.शेष खडे  हैं . जब  भी कोई स्टेशन  आता है जितने उतरते नहीं उससे ज्यादा चढ जाते हैं. बैठे हुए लोगों की दो पंक्तियों के  बीच में तीन नवयुवक  खडे हैं तथा  उनके साथ एक बूढा व्यक्ति खडा है. अपना गंतव्य नजदीक आने के कारण कोई व्यक्ति खडा हो जाता है तथा खाली हुई जगह पर बूढे को बिठा देता है. खडे हुए नौजवान विरोध शुरु कर देते हैं- हम पहले से खडे हैं,हमें जगह देनी चाहिए थी. कोई बांगला में बोलता है- "उनी तोर दादू जोन्य,देखते पाच्चिस ना रे की?"( वो तेरे पितामह की तरह हैं ,देख नहीं पा रहे हो क्या?). उनमें से एक नौजवान बांगला बोलने वाले  व्यक्ति की तरफ मुखातिब होकर कहता है -"आमि तोमार सने कोथा बोलछी न"(हम तुमसे बात नहीं कर रहे हैं) . उस नौजवान के मुँह से शायद शराब का भभका आता है.  इसलिए पहले  बांगला बोलने वाला व्यक्ति बुरा सा मुँह बनाते हुए अपनी नाक और मुँह ढकते  हुए दूसरी तरफ मुँह घुमा कर कहता है-" सकाले नेशा कोरे ट्रेने उठछीस "(सुबह-सुबह नशा करके ट्रेन  में चढते हो). नशा करने वाला नौजवान कहता है-"तोमार बापेर गाडी की?"(तुम्हारे बाप की  गाडी है क्या). 

           नौजवान हिंदीभाषी हैं इसलिए आगे झगडे ने बिहारी बनाम बंगाली का रूप ले लिया.एक व्यक्ति बोला-" आप बिहार के हैं न". अब नौजवान बोला-"तो तुम्हें क्या परेशानी है?". वह व्यक्ति बोला-"आप अपना देश जाइए,बंगाल को गंदा मत कीजिए."  नशे में होने के बावजूद नौजवान ने अच्छा उत्तर दिया -" बिहार केनो कोरे जाबो? आमी एइखाने थाकी,एई  आमार देश"(बिहार क्यों जाऊँ, मैं यहीं रहता हूँ; यही हमारा देश है). अब एक आदमी अंग्रेजी में बोला- बोला- "यू पीपुल आर लाइक दिस. नो वन कैन मेक यू अमेंड योर वेज‌"(तुम लोग ऐसे ही हो.कोई भी तुम्हें सुधार नहीं सकता).  अब नौजवान अंग्रेजी बोला-"  आई स्टे हेयर,आई ऐम बंगाली नाट बिहारी"( मैं यहीं रहता हूँ,मैं बंगाली हूँ बिहारी नहीं). 

         इसके पश्चात झगडे ने प्रांतीय से राष्ट्रीय रूप  ले लिया. एक व्यक्ति जो बोला वह सुनने लायक है- "एई  जोन्य मोदी चाई. ओई सबाईके ठीक कोरे देबे" (इसीलिए  मोदी चाहिए.वह सबको ठीक कर  देगा). एक दूसरा व्यक्ति बोला-"आपनी ठीकेई बोलछेन. मनमोहन-राहुल किछू कोरते पारबेन न. एई देश के मोदी चाई" ( आप ठीक कह रहे हैं . मनमोहन-राहुल कुछ नहीं कर पाएंगे.इस देश को मोदी चाहिए). एक व्यक्ति बोला-"  आमार ममता दीदी तो आछे"(हमारी ममता दीदी तो हैं).अब अन्य व्यक्ति नौजवान की तरफ हाथ उठाकर बोला -"ममता  दीदी तो आछे किंतु देखछेन  की होच्चे?"(ममता दीदी तो हैं किंतु देख रहे   हैं  क्या  हो रहा है?). एक  नया  व्यक्ति बोला-"सोत्ति कोथा बोलछेन दादा"(सही  बात कह रहे हैं भाई).

          कुल बात का लब्ब-ओ-लुबाब यह कि लोगों को लग रहा है कि सीधी उँगलियों से  घी नहीं निकल  रहा है और इसके लिए टेढी उँगली चाहिए.




Wednesday, 4 December 2013

रानी और श्वेता :हर बच्चे के विशिष्ट होने के प्रमाण

          रानी और श्वेता दिल्ली म्युनिसिपल  कार्पोरेशन के चौखंडी स्थित प्राइमरी स्कूल की नौ वर्षीय छात्राएं हैं.इन बच्चों को दिल्ली म्युनिसिपल कार्पोरेशन और इंटैक के  तत्वावधान  में उनके स्कूल की विरासत पर एक फिल्म बनाने का काम सौंपा  गया था.इन बच्चों को इंटैक द्वारा अपने वर्कशाप में फिल्म बनाने के मूलभूत तथ्यों से परिचित कराया गया. बच्चों ने पहले  अपने स्कूल के सबसे पुराने वृक्ष पर फिल्म बनाने की सोची. बाद में उन्हें लगा कि क्यों न उनके स्कूल की सफाई कर्मचारी फूलवती जो तैंतीस वर्षों से स्कूल में  काम कर रही थीं तथा सेवानिवृत्त होने वाली  थीं, पर फिल्म बनाई जाए. बच्चों की  प्रधानाध्यापिका तथा अध्यापकों ने बच्चों को इसके लिए प्रोत्साहित किया तथा उनका मार्गदर्शन भी किया. इन बच्चों ने फिल्म बनाई जिसमें शुरुआत में फूलवती को स्कूल में झाडू लगाते हुए दिखाया जाता है ,बाद में रानी फूलवती   का साक्षात्कार लेती है तथा फिल्म, फूलवती की सेवानिवृत्ति के अवसर पर विदाई समारोह के साथ समाप्त होती है.  इस फिल्म को हैदराबाद में आयोजित अट्ठारहवें अंतर्राष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव में भेजा गया जहाँ आई हुई लगभग छ: सौ प्रविष्टियों में  से इस  फिल्म को सर्वश्रेष्ठ बालनिर्देशक श्रेणी में दूसरा पुरस्कार मिला.

          यह दोनों ही बच्चे गरीब पारिवारिक पृष्ठभूमि से हैं.एक के पिता सफाई कर्मचारी हैं तथा मां घरों में काम करती हैं.दूसरी के पिता सिक्यूरिटी गार्ड  हैं. बच्चों की सोच ,सहजता तथा सृजनात्मकता काबिल-ए-तारीफ है तथा इस  तथ्य की पुष्टि करती है कि प्रतिभा किसी वर्गविशेष की बपौती नहीं है. बच्चों ने अपनी जिस सोच के अंतर्गत एक जीते जागते इंसान को जो उनके विद्यालय की स्वच्छता को सुनिश्चित करता था तथा उन्हें बहुत प्यार करता था  विरासत का प्रतीक माना,वह उनकी मौलिक सूझ-बूझ की परिचायक है. इन बच्चों ने बडे सहज भाव से बताया कि कैसे उन्हें हैदराबाद के  जिस होटल में वे रुके थे, सोफे तथा गद्दों पर कूदने में मजा आया, स्नान के लिए गर्म और ठंडे दोनों प्रकार के पानी की व्यवस्था तथा नाश्ते और खाने के लिए भाँति-भाँति के व्यंजन उनके लिए आश्चर्यप्रद थे तथा शुरू में वे बडे-बडे स्कूलों से आए हुए बच्चों को देखकर नर्वस थे. बच्चों के शिक्षकों  ने उन्हें सहज भाव से रहने तथा बातचीत  का मंत्र दिया था जो उनके बहुत काम आया  विशेषकर तब, जब उनकी फिल्म पुरस्कृत होने पर लोग उनका साक्षात्कार करने के लिए आने लगे. बच्चों ने लोगों द्वारा अंग्रेजी में प्रश्न करने  पर कह  दिया कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती और फिर लोगों ने उनसे हिंदी में प्रश्न पूछे तथा उन्होंने हिंदी में ही जवाब दिए.  बच्चों का कहना है कि उनके हौसले बुलंद हुए हैं तथा उन्होंने स्वयं को किसी भी प्रकार के भय से दूर रखना सीख लिया  है.

          काश कि हम रानी और श्वेता  की  तरह गरीब पृष्ठभूमि के हर बच्चे के मन में यह धारणा घर करवा पाते कि वह विशिष्ट है तथा गरीबी,असमानता और अभाव उसके सपनों के साकार होने में बाधक नहीं  हैं.  रानी और श्वेता के बताए अनुसार वे इस बात को समझ गए हैं ,पर यह भी  ध्यान  देने योग्य है कि उनकी अवस्था अभी बहुत कम है और उनके लिए यह महज शुरुआत भर है.  ऋणात्मक स्थिति में रहते हुए संघर्ष करने पर  हौसला बनाए रखने केलिए सदैव सजग रहना पडता है तथा मन के जरा भी कमजोर पडते ही नकारात्मकता सर उठाने लगती है जिसका सर कुचलने के लिए सदैव   तत्पर रहना पडता है.

Friday, 29 November 2013

आइए अपने गिरेबान में झाँककर देखें !

          समाज में जिन आदर्शों  और मूल्यों की हम बात करते हैं और जिन्होंने उसके लिए संघर्ष करने का स्वत: जिम्मा लिया है; जब वे आदर्श और मूल्य उन्हीं के द्वारा ध्वस्त किए जाते पाए जाते हैं और इसके उदाहरण एक-दो नहीं कई-कई सामने आते  हैं तो ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक है कि समाज के स्वस्थ  होने में हमारी आस्था ही डिगने लगे और मन में यह प्रश्न उठने लगे कि क्या हम एक मिथ्याचारी ढोंगी समाज में जी रहे हैं . लोगों को आध्यात्म का रास्ता दिखाने का दावा करने वाला अनाचार में लिप्त पाया जाता है, भ्रष्टाचार  का  पर्दाफाश  करने वाला कदाचार का आरोपी पाया जाता है,महिला अधिकारों के लिए लडने की बात करने वाली संपादिका  अपने वरिष्ठ के कुकृत्यों  पर पर्दा डालने का प्रयास करती है,एक मंत्री और उसके  साहब पर  एक लडकी की निगरानी ए.टी.एस. से करवाने पर गुहार है, केंद्र  सरकार समेत देश की प्राय: सभी सरकारों पर भ्रष्टाचार के आरोप समय-समय पर लगते रहते हैं.

          यदि  यह प्रश्न खडा किया जाए कि क्या एक अरब से ऊपर की आबादी वाले   इस देश में यह कृत्य एवं इनके कर्ता-धर्ता अपवाद हैं अथवा सामान्य  बात बन चुके  हैं तो नि:संदेह बडी संख्या में लोग सामान्य होने की ही पुष्टि करेंगे.कदाचार एवं भ्रष्टाचार की व्यापकता  तथा प्रतिष्ठित व्यक्तियों की इनमें संलिप्तता बीमारी का लक्षण मात्र है तथा समाज में इस रोग के व्याप्त होने की तरफ  संकेत करती है.  शरीर जब अस्वस्थ हो जाता है तो पूरा रक्त ही दूषित हो जाता है, भले ही अलग-अलग अंग स्वस्थ दिखाई देते हों.

          पिछले कुछ अर्से में जब अन्ना के समर्थन में बडी संख्या में जनता उठ खडी हुई,जब पिछले दिसंबर में दिल्ली में घटित बलात्कार कांड के विरोध में जनता सडकों पर उतर आई और जब लोगों  ने टू जी तथा कोलगेट जैसे  घोटालों और अपराधियों को राजनीति में बनाए रखने के प्रयासों के विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की तो एक उम्मीद बंधी कि  लोग भ्रष्ट व्यवस्था से ऊब चुके हैं तथा उसे बदलने के लिए आतुर हैं.

         पर,  साधारणतया हम सभी आदर्शवाद की बात करते तो हैं पर स्वयं  को उसके प्रति प्रतिबद्धता से अलग रखना चाहते हैं.यही कारण है कि  जिन्होने आदर्शों को स्थापित करने का बीडा उठाया था वे  ही उन्हें धराशाई करते हुए नजर  आ रहे हैं-" जिनसे है वफा की उम्मीद  वो नहीं जानते कि वफा क्या है."  आदर्शों  का बीडा तो  सबने  ही उठाया था.अन्ना का समर्थन सत्ता पक्ष को छोडकर सबने ही किया था.दिल्ली बलात्कार कांड के विरुद्ध आवाज  सबने ही उठाई थी,घोटालों का विरोध  सबने किया था, राजनीति में अपराधियों के प्रति  वितृष्णा भी  सबने व्यक्त की थी. फिर  भी हम आदर्शवाद के प्रतिमानों को  आज टूटते हुए क्यूँ देख रहे हैं? आदर्शों को स्थापित  करने के लिए और उन्हें ध्वस्त होने से बचाने के लिए यह जरूरी है कि हम सभी अपने-अपने हृदय में झाँकें और वहाँ छिपे हुए राक्षसों को खत्म कर दें. यदि हम अपने गिरेबान में झाँक कर दिमाग में पल रही तथा हलचल मचा रही अवांछित  लालसाओं को, उनके  सर उठाने के पहले तथा इसके पहले कि वे हमारे आदर्शों पर  प्रहार करें, समाप्त नहीं करेंगे तो कोई  लोकपाल,कोई नेता अथवा कोई  व्यक्ति देश में अपेक्षित सुधार नहीं ला पाएगा और न ही जीवन में मूल्यों और आदर्शों की स्थापना हो  पाएगी.

Thursday, 28 November 2013

मौन किसी प्रश्नचिह्न का उत्तर नहीं.

          गुजरात में सरकारी तौर पर  एक महिला आर्किटेक्ट की निगरानी किए जाने का मामला पिछले  दिनों बहुचर्चित रहा है. श्री अमित शाह जिनका इस मामले  में प्रत्यक्ष तौर पर सामने नाम आया है तथा श्री नरेंद्र मोदी जिन्हें श्री अमित शाह द्वारा किसी 'साहब' का जिक्र किए जाने के  कारण अप्रत्यक्ष तौर पर इससे संबंधित समझा जा रहा है;  दोनों ही इस मामले पर मौन हैं

          गुजरात सरकार ने इसकी जाँच के लिए एक दो सदस्यीय आयोग नियुक्त कर दिया है.परंतु यह बात  इस आयोग के जाँच के दायरे में नहीं है कि  ऐसा क्यों किया गया. इस मामले में भारतीय जनता पार्टी  की तरफ से सफाई के तौर पर महिला के पिता की तरफ से एक पत्र प्रस्तुत किया गया जिसमें उनके द्वारा कहा गया है कि उन्होने स्वयं इस बाबत श्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया था जो उनके  पारिवारिक मित्र हैं.श्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे उनके खिलाफ षडयंत्र बढेंगे और अरूण जेटली के अनुसार राहुल के मुकाबले नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को देखते हुए ऐसा  किया  जा रहा है.

          इस मामले में गुजरात के निलम्बित आई. ए.एस. अधिकारी श्री प्रदीप शर्मा ने श्री नरेंद्र मोदी पर सीधे आरोप लगाए हैं जो एक  तरह उनके चरित्र पर आक्षेप करते हैं. प्रदीप शर्मा का यहाँ तक कहना है कि श्री नरेंद्र मोदी से महिला आर्किटेक्ट का परिचय उन्होने ही करवाया था.अरूण जेटली का कहना  है कि प्रदीप  शर्मा द्वारा लगाए  गए आरोप बेबुनियाद हैं और निलम्बन के कारण लगाए  गए हैं.ऐसा  हो भी सकता है जिसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है.

          परंतु मौन किसी प्रश्न का उत्तर नहीं है वह भी तब, जब आप प्रधानमंत्री पद के उम्मीद्वार हों. सीताजी को भी अग्निपरीक्षा देनी पडी थी तथा एक धोबी द्वारा उनके बारे में शंका व्यक्त किए जाने पर  राम ने उनका परित्याग कर दिया था. श्री नरेंद्र मोदी अथवा अमित शाह में से किसी भी एक के द्वारा  यह स्पष्ट कर  देने पर कि इस प्रकार की निगरानी के पीछे क्या कारण थे,  संदेहों का निराकरण हो सकेगा अन्यथा दाल में कुछ् काला होने की संभावना को बल मिलेगा. राजनीति जिस निम्न स्तर पर उतर चुकी है वहाँ एक दूसरे पर हमले  करते हुए सारे  शिष्टाचार एवं मर्यादा को ताक पर रख दिया जा रहा है. ऐसे में यदि मोदी विरोधियों को एक मुद्दा मिला है तो वह उसे छोडने वाले नहीं हैं.

         लोकतंत्र की मर्यादा को देखते  हुए यह श्री नरेंद्र मोदी एवं अमित शाह का कर्तव्य है कि वे सच्चाई  को जनता के सामने लाएं.

Wednesday, 27 November 2013

" To be or not to be" dilemma before the "Indian Girls"

          Since early  childhood  Indian  Girls start facing some kind of harassment. Sometimes they tell  their guardians about this and many times they don't tell. As they grow up and reach the gate of puberty, harassment becomes very common as they go out of house and come back. They learn to ignore it.Often they face some kind of unwanted encounter on regular basis,yet they ignore it; in hope that one day it will  die down.Things come out into open only if water surpasses their head  and they are compelled to open their mouth or when a chance encounter makes their family members come to know of it.Their tormentors take advantage of their habit of ignoring and  continue with what they call " lighthearted banter" which sometimes takes shape of serious harassment and goes to the extent of what we call molestation or sexual harassment.

          It is not that once a girl achieves womanhood and becomes a gracious lady, the problem is over. Everywhere there are some wolves who are on prowl. They are very well  aware of habit of the Indian  Girls of ignoring. First they start with so called "Lighthearted banter" and  when the girl ignores, they take gradually it to other levels and continue till the girl ignores. If at some stage the girl murmurs, now they ignore it and continue with their activities in hope of "Consensual liaison". If they are in position of power they start pressurising or blackmailing the girl.  They are shaken off only if the girl violently protests, otherwise they proceed for the kill.

         As an investigating journalist and father of a grown up daughter the Tahalka Boss  should be well aware of the above analysis & facts . Now, Mr. Tahalka Boss! You should be knowing why the lady journalist, although tormented,  was still behaving normal on 9th of November after the incidences of 7th & 8th November. Every Indian girl, may be she is tormented by someone; when comes back to her house  behaves normal as she doesn't want to trouble her family members and wellwishers with her problems. She achieves perfection in this art of looking normal as a young lady, because she has been practising it since very childhood.

          So it will be be  foolish on your behalf to base your defence on the premises of the girl looking and behaving normal even after the said encounters with you. When a girl faces a predicament due to situations as created by ungentlemanly & lecherous behaviour of someone; she is allways in two minds and faces Shakespearian dilemma of  "to be or not to be", that is to spill  the beans or not, to take corrective steps or not. Sometimes someone's,whom  she confides  in, prodding   is needed to end her predicament and it takes its own course. Till then she behaves normally.So please don't try to befool  the judiciary. I think I've done enough to demolish your defence.

Monday, 25 November 2013

कार्यस्थलों पर महिलाओं एवं लडकियों की सुरक्षा!

          पिछले कुछ दिनों  अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों के दामन  पर चारित्रिक पतन के छींटों  दाग लगे  हैं. वे एक अहम सवाल सामने खडा करते हैं कि क्या लडकियों को कहीं भी सुरक्षित समझा जा सकता है.  बुजुर्गवार बाप सरीखे वे बास जिन्हें पहले से नैतिकता के रखवाले के रूप में ख्याति मिली हुई है यदि अवसर पाते  ही शैतान का रूप धारण कर लेते हैं तो  हम अपनी लडकियों की सुरक्षा कैसे करें . नि;संदेह आप सबको एक तराजू पर  नहीं तौल सकते, पर घटित घटनाएं यही बताती हैं कि कहीं भी आप इस प्रकार की संभावना से इन्कार नहीं कर सकते.

          कन्सेन्सुअल सेक्स,एक्स्ट्रा मैरिटल रिलेशनशिप और लिव-इन-रिलेशनशिप जैसे शब्द कुछ अर्से से  ज्यादा सुनाई देने लगे हैं और इनका प्रचलन बढा है. इनसे संबंधित चर्चा के दौरान अब ऐसे लोग आपको अच्छी तादाद में मिल जाते हैं जो कहते  हैं कि यदि दो वयस्क पक्ष इनके लिए सहमत हैं तो आपको क्या परेशानी है.इन शब्दों ने समाज के नैतिक आवरण या मोरल फैब्रिक को भेद्य बना दिया है और इस आवरण के भेद्य बन जाने पर संबंधित या इन अवधारणाओं से प्रभावित व्यक्ति संभावनाओं के द्वार  खोजने  लगता है. इन  विषयों पर  आधारित फिल्मों और सीरियलों ने भी इनके प्रचार-प्रसार और स्वीकार्यता  में योगदान  दिया है.संभावनाओं का द्वार खोजने वाला  व्यक्ति यदि उच्चतर स्थ्ति में है या उसके पास किन्ही अंशों में  सत्ता का कोई अंश है तो वह शिकारी की भूमिका में आ जाता है और बतौर शिकारी लाभप्रद स्थिति में होता है.  शिकार हमेशा ताकतवर द्वारा कमजोर का किया जाता  है. यह  शिकारी पंचतंत्र की  कहानियों के उस शेर की तरह होता है जो बूढा हो जाने पर सन्यासी  का वेश धारण कर लेता है और अपने संपर्क में आने वाले पशुओं को  आश्वस्त करता है कि वह साधु हो गया है तथा वे उसके साथ पूरी तरह सुरक्षित हैं.जब वह शेर पर  भरोसा कर  लेता है तब शेर उसका शिकार कर डालता है.

          इन दिनों समाचारपत्रों में आए मामलों के  अलावा  भी अपने कार्य के दौरान  मैंने इस तरह के कृत्य सुने-देखे हैं.मामला खुल जाने पर उन्हें दबाने  की कोशिश होती है क्योंकि संगठन की बदनामी का सवाल होता है और जहाँ यह नहीं संभव हो पाता है वहाँ ज्यादातर मामले जाँच समिति बिठाकर तथा छोटी-मोटी सजा देकर निपटा दिए जाते  हैं.यदि मामला बडे बास का होता  है तो दूसरे बडे अफसरों की सहानुभूति उनके साथ होती है.

          पर इन सारी समस्याओं के मूल में समस्या यह है कि हमने अपनी लडकियों को आज्ञाधीनता और विनीत भाव वाला बनाकर वश्य एवं  कमजोर बना दिया है. आज  कानून पहले से सख्त हुआ है और उनके माध्यम से लडकियाँ कार्यस्थलों पर बेहतर सुरक्षा प्राप्त कर सकती हैं,पर वे इसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं. यदि लडकियाँ कार्यस्थलों  पर  किसी वरिष्ठ के  गलत  इरादे और अनाधिकार चेष्टा     दिखने पर उसका तुरंत तीव्र विरोध करें और बास के द्वारा इसके परिणामस्वरूप उत्पीडन की तथा  यहाँ तक कि काम छूट जाने की भी परवाह न करें तो वे साधुवेशधारी बासों के गलत इरादों को विफल कर सकेंगी. पर एक दु:खद तथ्य यह भी है कि कभी-कभी कुछ लडकियाँ  यह पाने  पर कि बास उनमें रुचि ले रहा है, उसे रोकने के स्थान पर  गौरवान्वित अनुभव  करती हैं अथवा उसका फायदा उठाने में लग जाती हैं  जिससे  वरिष्ठ को इस प्रकार की गतिविधियों के  लिए और प्रोत्साहन मिलता है.

          लडकियाँ ऊपर बताई गई परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम हों इसके लिए आवश्यक है कि उनका  पालन-पोषण करते समय लडके-लडकी जैसा कोई भेदभाव न किया जाए. लडकियों को निर्भीक , साहसी और दबंग  बनाया जाए.मैंने व्यवहार में  देखा है कि ऐसी लडकियों के साथ कोई भी बास दु:साहस नहीं  कर पाता अथवा फिर एक बार ठीक से डाँट खाने पर  सुधर जाता है. दृढतापूर्वक विरोध ऐसी स्थितियों से निपटने का सबसे कामयाब अस्त्र है.

Tuesday, 19 November 2013

प्रतिभाएं पुरस्कारों की मोहताज नहीं होतीं!

        इन दिनों भारतरत्न पुरस्कार को लेकर  विवाद का बाजार गर्म है. किसी का कहना है कि सचिन को भारत रत्न मिलने से पहले ध्यानचंद के नाम पर विचार  किया  जाना चाहिए था तो   किसी ने प्रश्न उठा दिया है कि अटल बिहारी  बाजपेयी के नाम पर भारतरत्न दिए जाने के लिए विचार क्यों नहीं किया गया. सवाल वाजिब भी है.जब खान अब्दुल गफ्फार खाँ और राजीव गाँधी को भारतरत्न दिया जा सकता है तो फिर अटल बिहारी बाजपेयी की दावेदारी इन  लोगों से किसी भी दृष्टि से कम नहीं कही जा सकती.पर मनीष तिवारी ने इसका स्पष्टीकरण भी दे दिया है कि चूँकि अटलजी ने नरेंद्र मोदी को राजधर्म की नसीहत देने  के बावजूद हटाया नहीं  था इसलिए उनकी दावेदारी नही बनती. गोया कि मनीष तिवारी ने  इतनी काबलियत हासिल कर ली है कि वे अटलजी के बारे  में निर्णयकर्ता की भूमिका  में आ गए हैं.

       पर इन सबसे ऊपर लाख टके की बात डॉ. फार्रूक अब्दुल्ला ने कही है कि अटलजी का व्यक्तित्व भारतरत्न पुरस्कार से बडा है  और मुझे यहाँ यह कहने   में कोई  संकोच नहीं है कि  सचिन का व्यक्तित्व भी भारतरत्न पुरस्कार  से बडा है. सचिन, सचिन ही रहता भले ही उसे भारतरत्न पुरस्कार दिया जाता या नहीं.क्रिकेट और खेल के इतिहास में  सचिन का आकलन भारतरत्न न दिए जाने पर भी महानतम बल्लेबाजों में से एक के तौर पर होता और भारतरत्न दिए जाने के बाद भी उसी तरह होगा.  ध्यानचंद हाकी के जादूगर कहलाते रहेंगे,उन्हें भारतरत्न नहीं मिला तो क्या. ऐसे ही अटलजी की सेहत पर भी भारतरत्न पुरस्कार न मिलने से कोई फर्क नहीं पडता. उनका आकलन इतिहास में भारतरत्न न मिलने पर भी वैसे ही अपना कार्यकाल पूरा करने वाले प्रथम और संभवत:  महानतम गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री ( कम से कम आज की  तिथि तक) के तौर होगा जैसे यह पुरस्कार मिल जाने की   स्थिति में होता.

        जो व्यक्ति वास्तव में महानता प्राप्त कर लेते हैं वे पुरस्कार पाकर सम्मानित होते हैं ऐसा मानना मेरे विचार से गलत है बल्कि इसके उल्टे उन्हें पुरस्कार दिए जाने पर उस पुरस्कार की गरिमा बढती है. नवोदित हो रहे व्यक्तियों के लिए अवश्य पुरस्कार  मान्यता दिलाने में मददगार होते हैं यथा अरुंधति रॉय और अरविंद अडिगा को बुकर पुरस्कार ने अंग्रेजी साहित्य की दुनिया में साहित्यकार  के रूप में स्थापित किया. पर चेतन भगत ने  अंग्रेजी साहित्य के ही क्षेत्र में अपनी पहचान अपनी  पाठकसंख्या के आधार पर बनाई है,किसी पुरस्कार के दम  पर नहीं.

          दुनिया में दिए जाने  वाले बहुत से पुरस्कार पूरी तरह निष्पक्ष और मेरिट पर आधारित नहीं होते.उदाहरण के लिए श्री बैरक ओबामा को सत्ता संभालने के छ: महीनों के भीतर मात्र इस आधार पर शांति के लिए नोबल पुरस्कार दे  दिया गया कि उन्होने अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने के बारे में अपने इरादों की घोषणा कर दी  थी पर इस दिशा में कुछ ठोस किया जाना शुरू भी नहीं किया गया था. बिल गेट्स ने अपने एक वक्तव्य में कहा  था - Life  is  unfair,  get  used  to  it. मुझे कई बार  पुरस्कार मिले हैं . कई बार मैंने बडी मेहनत से पुरस्कृत कामों से भी श्रेष्ठ कार्यों  को अंजाम  दिया है पर तब कोई  पुरस्कार नहीं  मिला. कारण यह है कि तब कोई प्रस्तावक नहीं था. इन दिनों कई बार पुरस्कार लाबीइंग के कारण मिलते हैं या फिर प्रायोजित होते हैं अथवा इनके पीछे कई बार अन्य कारण जैसे मेरिट छोडकर अन्य कारणों से  किसी के लिए निर्णयकर्ताओं में किसी का पक्षधर होना होता  है  . अत: पुरस्कार मिलने पर फूल कर कुप्पा होना अथवा पुरस्कार न मिलने पर मन मसोसना मेरे विचार से गलत है. हाँ यह जरूर है कि यदि वाकई में आपने काम किया है तो प्रसन्नता और संतोष जरूर होता है कि किसी ने आपके कार्य को मान्यता दी.पर यदि आपके मन में अपने काम को लेकर संतोष है और पुरस्कार न मिलने पर भी लोग आपके काम की महत्ता को समझते हैं तथा उसे मान्यता देते हैं तो  इसे ही सबसे बडा पुरस्कार समझा जाना चाहिए.

Saturday, 16 November 2013

NOTA सिर्फ अंग्रेजी का ज्ञान रखने वालों के लिए नहीं!

          विगत 27 सितम्बर,2013 को पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज द्वारा सन 2004  में दाखिल किए गए एक मामले  पर अपना निर्णय देते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि मतदाताओं को चुनाव मतपत्र /ई वी एम पर  NOTA  ( नन आफ दि एबव )  अर्थात इनमें  से कोई नहीं का विकल्प दिया जाए ताकि ऐसे मतदाता जो चुनाव में खडे किसी भी उम्मीदवार को चुनने के  पक्ष में नहीं हैं अपने मताधिकार का प्रयोग  करते हुए सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार कर सकें. माननीय  सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को चुनाव सुधारों  की  दिशा में एक बडा कदम  मानते  हुए इसका काफी  स्वागत किया गया.

          तदनुसार चुनाव आयोग ने  आगामी चुनावों  के संबंध  में व्यवस्था की है कि काली पृष्ठभूमि में  सफेद अक्षरों में NOTA लिखा रहेगा तथा जो मतदाता सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार  करना चाहें वे इसके आगे बटन दबा कर  ऐसा कर सकेंगे.

          उक्त व्यवस्था करते समय चुनाव  आयोग ने शायद इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया है कि  हमारे देश में एक बडी संख्या निरक्षर मतदाताओं की है  और जो मतदाता साक्षर हैं उनमें भी आवश्यक  नहीं है कि सबको अंग्रेजी का ज्ञान  हो. मूलत: इसी बात को ध्यान में रखते हुए चुनावों में विभिन्न दलों एवं प्रत्याशियों के लिए चुनाव-चिह्न की  व्यवस्था  की  गई है ताकि अनपढ मतदाता भी अपना मत अपनी इच्छानुसार सही जगह पर डाल सकें. इसे ध्यान में रखते हुए NOTA  के  लिए किसी चिह्न का प्रयोग करना अधिक उपयुक्त होता. इसके लिए ठेंगा ( सामने की चार उँगलियाँ मुडी  हुई तथा अँगूठा ऊपर की  तरफ सीधा खुला हुआ ) जिसे हमारी संस्कृति में 'कुछ भी  नहीं' का प्रतीक माना जाता है अथवा फिर 0 (शून्य  का चिह्न) जैसा कोई चिह्न प्रयोग में  लाया जा सकता था.  पुनश्च केवल अंग्रेजी में लिखे NOTA  का विकल्प देकर संविधान की धारा 343 की स्पिरिट का भी उल्लंघन किया गया है जिसके तहत हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के विकास की बात  की  गई है. आखिरकार NOTA  का विकल्प सभी भारतीयों के लिए है, न कि केवल अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों के लिए . इस बात को मद्देनजर रखते हुए चुनाव आयोग  के लिए यह अधिक उपयुक्त होगा कि वह  NOTA  के कार्यान्वयन के लिए अंग्रेजी में लिखे हुए NOTA के स्थान पर किसी चिह्न की व्यवस्था करे जिसे साक्षर और निरक्षर तथा किसी भी  भाषा का ज्ञान रखने वाले भारतीय समझ सकें .

Friday, 15 November 2013

सर्वव्याप्त हो रही विद्रूपता

         जुलाई के महीने में मेरे द्वारा  लिखे एक आलेख पर सुश्री कविता रावतजी ने  रहीमदासजी को उद्धृत करते हुए कहा था-" जिह्वा ऐसी बावरी कह गई सरग पताल।खुद तो कह भीतर भई जूती खाय कपाल्॥"

          11 नवंबर के दिन सी.बी.आई. द्वारा आयोजित संगोष्ठी के दौरान  "खेल-कूद में नैतिकता और  ईमानदारी"  पर हो रही परिचर्चा के दौरान सी.बी. आई. निदेशक ने बेटिंग को कानूनी जामा  पहनाने की  वकालत करते हुए  कहा कि  जब राज्यों द्वारा लाटरी का आयोजन किया जा रहा है, पर्यटनस्थलों में कैसीनो चलाए जा  रहे हैं और सरकार काले धन की स्वत: घोषणा हेतु माफी योजनाएं घोषित करती है तो बेटिंग को कानूनी स्वरूप देने में क्या हर्ज है. सी.बी.आई. निदेशक के यह अपने विचार हो सकते हैं और नि:संदेह उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत अपनी  राय व्यक्त करने का पूरा अधिकार है. पर अपनी बात की  विवेचना करते हुए उन्होंने आगे जो कुछ कहा वह ठेठ पुलिसिया अंदाज में था और शायद लोगों को मनोरंजक ढंग से अपनी बात बताने के चक्कर में वह यह भूल गए थे कि वे पुलिस वालों के बीच में नहीं बल्कि जनता के  विभिन्न वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों के बीच बैठे हैं. निश्चय ही एक सार्वजनिक मंच पर  उनका यह कहना हतप्रभ कर देने वाला था- क्या  हमारे पास एंफोर्समेंट एजेंसियाँ हैं? अगर हम एंफोर्स नहीं कर सकते हैं तो यह उसी तरह है जैसे यदि आप बलात्कार को रोक नहीं  सकते हैं तो उसका आनंद लीजिए.

          तमाम महिला संगठनों ने सी.बी. आई. निदेशक की  निंदा की है.कुछ ने उनके इस्तीफे की माँग की है  तो  कुछ ने आंदोलन चलाने और कुछ ने न्यायालय  का रुख करने का इरादा जताया है. निदेशक महोदय ने बार-बार  अपने कथन पर स्पष्टीकरण दिया है,खेद जताया है पर कोई सुनने को तैयार नहीं है. स्पष्टत: उनकी  गलती अक्षम्य है. महिलाओं   के खिलाफ अपराधों में पिछले कुछ अर्से में  दर्ज की गई बढोत्तरी और और इसके खिलाफ आई जागृति तथा पिछले वर्ष दिल्ली में चले आंदोलन तथा अन्य कई स्थानों पर भी ऐसे अपराधों के खिलाफ जनता के सडक पर उतर आने को देखते हुए देश के सर्वोच्च पुलिस अधिकारियों में गिने जाने वाले सी.बी.आई. निदेशक को महिलाओं  के खिलाफ होने वाले अपराधों की गंभीरता का अहसास होना चाहिए था जो उनके द्वारा दिए गए उदाहरण के परिप्रेक्ष्य में लगता है कि उन्हें नहीं है.

          देश में विभिन्न सभाओं और रैलियों में सत्ता और विपक्ष दोनों ही तरफ के  अग्रणी पंक्ति के कुछ  नेताओं द्वारा दिए जा रहे भाषणों से लगता है कि जैसे लोक-जीवन में सामान्य शिष्टाचार के लिए भी कोई स्थान नहीं रह गया है. नेतागण शायद जनता को मनोरंजक तरीके से अपनी बात बताना चाहते हैं  पर उससे संबंधित उनकी समझ इतनी खोटी है कि उनकी कही हुई बातों को सुनकर उबकाई सी आने लगती है. आखिर आप किसी के प्रति गालियाँ भी कितनी सुन सकते हैं. उसकी भी एक सीमा होती है.  इसके बाद यदि अग्रणी पंक्ति के हमारे अफसरगण भी भाषाई संयम खोने लगते हैं  तो  किसी से भी क्या उम्मीद की जा सकती है. वैसे सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग यदि स्वयं सतर्क न रहें तो उनके लिए यह स्वाभाविक होता है क्योंकि उनके चारों तरफ बैठे हुए लोग प्राय:  चमचे की  श्रेणी के होते हैं, और जो  इस श्रेणी में नहीं होते हैं वे सच का अहसास कराने की हिम्मत नहीं करते या फिर ऐसा करना व्यर्थ समझते  हैं. मनोरंजन और  हास्य का स्वरूप विद्रूप होता जा रहा है जिसकी झलक टी.वी. पर आ रहे कई हास्य कार्यक्रमों में दिखाई दे  रही है.शायद इसी कारण यह विद्रूपता सर्वव्याप्त होती सी दिख रही है.

Saturday, 2 November 2013

प्याज और टमाटर के लिए डकैती !

         प्याज की बढती कीमतों के कारण इन पर आधारित अनेक कार्टून पिछले कुछ दिनों से देखने में आ रहे थे. पर ऐसा लगता है कि इन  कार्टूनों में दिखाया गया हास्य हकीकत में बदल रहा है. एक समाचार के अनुसार उत्तरप्रदेश के जौनपुर में पिछले महीने डकैतों के एक गिरोह ने प्याज से भरे एक ट्रक के ड्राइवर और क्लीनर को मारकर ट्रक अपने कब्जे में कर लिया.  पुलिस ने  आठ डकैतों में से पाँच को गिरफ्तार कर लिया  है जबकि तीन  अभी भी फरार हैं. गिरोह ने पुलिस को बताया है कि  वह इसके पहले टमाटर से भरा ट्रक भी लूट चुका है पर टमाटर के खराब हो जाने के कारण गिरोह उसे बेच नहीं सका.

          कल मैं बाजार सब्जियाँ लेने गया था.  मैं  कोलकाता के जिस क्षेत्र में  निवास करता हूँ वहाँ सब्जियों की  आमद अच्छी है और शेष कोलकाता की तुलना  में सब्जियाँ सस्ती हैं.फिर भी  सब्जियों का औसत भाव सत्तर रूपए किलो था. बैगन जैसी सब्जी अस्सी रूपए किलो थी.  यदि यही हाल रहा तो  शायद  कुछ  दिनों के बाद प्याज और  टमाटर के अलावा बैगन,लौकी, कद्दू  और भिंडी जसी सब्जियों के लिए भी डकैती और चोरी के किस्से अखबारों में पढने को मिलेंगे. हमारे वित्तमंत्री सदृश जो लोग देश की अर्थव्यवस्था में बेहतरी आने का दावा कर रहे हैं वे कृपया इस तरफ भी ध्यान दें  और बताएं कि यह कैसे  देश की अर्थव्यवस्था में किस प्रकार के सुधार का द्योतक है. जो लोग गरीब के खैरख्वाह होने का दावा कर रहे हैं वे कृपया बताएं कि ऐसी परिस्थितियों में शहर में रह  रहा गरीब जो पचास रूपए प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन की दर से भी कमाई करने की स्थिति में गरीब की सरकारी परिभाषा से बाहर है अपना जीवनयापन कैसे करेगा.

         सरकार सोने की खोज  में लगी हुई है जबकि लोगों को जरूरत  आलू-प्याज ,धान और गेंहू  की है. दूसरी तरफ सत्ताधारी दल के विद्वान समझे जाने वाले मंत्रीगण भी ऐसे बयान देने में लगे  हैं जो लोगों को हँसने पर मजबूर कर देते हैं. कानून मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा दिए गए एक बयान के अनुसार  प्याज की कमी और  उसके दामों में बढोत्तरी के लिए नरेंद्र मोदी जिम्मेदार  हैं क्योंकि उन्होने कच्छ  में अडानी समूह को जो जमीन उनके व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए दे दी है, वहाँ प्याज की खेती होती थी और वह प्याज अब बाजार में आनी बंद हो गई है.

Tuesday, 29 October 2013

सामाजिक सद्भाव को चिनगारियों से बचाना जरूरी!

         पटना में  दिनांक 27अक्टूबर,2013को हुए आठ विस्फोट  दु;खद होने के साथ-साथ बिहार में गुप्तचर और पुलिस व्यवस्था की असफलता और इन बलों में प्रोफेशनलिज्म की कमी को दर्शाते हैं.भले ही बिहार में पहले कोई  बडी आतंकवादी घटना न हुई हो पर बिहार के कुछ  क्षेत्र कई वर्षों से नक्सलवाद का  शिकार रहे हैं.  इसके अलावा आई. एम. के दरभंगा मॉड्यूल ने पिछले कुछ   दिनों में कुख्याति अर्जित कर ली है. फिर  रैली को  संबोधित करने श्री नरेंद्र मोदी आ रहे थे जो कई आतंकवादी संगठनों के निशाने पर हैं. ऐसे में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम बरतने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए  थी. भारतवर्ष में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो कोई भी घटना हो जाने पर  पूरे के  पूरे समुदाय को उसके लिए दोषी मानने और उन्हें दंडित करने के लिए दंगे शुरू कर देने में कोई संकोच नहीं करते. 1984, बाबरी मस्जिद के विध्वंस और गोधरा कांड के बाद हुए दंगे इस तथ्य की पुष्टि करते हैं. इस बात के मद्दे नजर कि सामाजिक सद्भाव के ताने-बाने के छिन्न -भिन्न होने के लिए सिर्फ एक चिनगारी  का बहाना काफी होता है सदैव विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए विशेषकर तब जब संवेदनशील मुद्दे,राजनीतिज्ञ और राजनीति का जुडाव हो . इस प्रकार की घटनाओं के लिए कोई निर्धारित जगह नहीं है,यह कहीं भी घट सकती हैं.पिछले कुछ अर्से में साम्प्रदायिक और आतंकवादी गतिविधियाँ नए-नए स्थानों पर घटी हैं  उम्मीद की जानी चाहिए कि इस घटना से हमारा सुरक्षा तंत्र आगे के  लिए सबक लेगा.

         इस पूरी घटना के दौरान  जो अच्छी बात हुई वह यह कि श्री नरेंद्र मोदी ने  बम धमाकों का जिक्र न कर संयम का परिचय दिया और  यह  कहते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता की और शांति की अपील की  कि हिंदू और मुस्लिम को आपस में लडने के बजाए गरीबी  से लडना चाहिए.  यह सुना जाना सुखद और संतोषप्रद है.

        जहाँ राजनैतिक  बैरभाव भुलाकर प्राय: सभी दलों और उनके नेताओं ने घटना  पर क्षोभ और दु:ख व्यक्त किया वहीं  कुछ राजनीतिज्ञ इस  पर भी राजनीति खेलने से बाज नहीं आए और घटना के समय पर प्रश्नचिह्न लगाकर तथा  इससे होने वाले संभावित राजनीतिक फायदे का संकेत कर अपनी सैडिस्टिक मनोवृत्ति का परिचय दिया है.इस प्रकार के राजनीतिज्ञों से भारतीय राजनीति को निजात पानी चाहिए.

Sunday, 27 October 2013

Mr.Modi pl. address the reservations against you!

          Mr.  Modi you are a declared Prime Ministerial candidate of the main opposition party. There have been misgivings upon your candidature in your party as well as outside of  your party. In your party these have been put to rest. Outside of your party clamour is still going on but you have been gaining momentum. Your rallies are proving to be successful. People are coming in large numbers.They are responding to you. People want a person with conviction who has guts to execute what he believes in ,is good  for the nation.They want a performer and due to your track record they are looking towards you. But still you are portrayed by many as authoritative and communal. You have been quoted by your detractors as responsible for Gujarat Riots of 2002.

          Gulam Ahmad Vastanvi was the first prominent Muslim who said that Muslims should move on alongwith the time and adopt an approach of forget and forgive towards you. But he had to pay for it and it is said that supporters of Maulana Saiyad Mahmood Madani were responsible for his removal. However lately Maulana Mahmood Madani has said that parties calling themselves secular should ask for Muslim votes on the basis of their performance and not by making them apprehensive of Modi. He has even given a statement that more number of riots have taken place in U.P & Rajasthan than in Gujarat during last ten years. Maulana Saiyad Mahmood Madani & Maulana Khalid Rashid Firangimahali both have criticized  Rahul  for his statement regarding Muslim youth being contacted by ISI after Mujaffarnagar riots. Maulana Madani even accepts your track record on development in Gujarat. Maulana Kalbe Sadiq has gone one step ahead and said that he would even vote for you if you own your mistake and assure that you have changed. Maulana Firangimahali has said that the question is have you really changed. Except of a sense of insecurity Muslims are largely  facing same problems which other Indians face. They require security, control on inflation, electricity,roads,water ,education & employment. Their interests are no different from interests of other Indians. They also wish like other Indians that whosoever occupies the Raisina Hill in the next election should address the problems before them and all other Indians.

         So you should take the bull from the horns and address the misgivings of Muslims about you directly. Yesterday you even batted for Muslim youths in Jhansi when you said that Rahul should apologize for  aspersions cast on the patriotism of Muslim youth when he told that they have been contacted by ISI. If you explain your position regarding the Gujarat riots in clear terms;may be there were a few wrong decisions,may be there was lack of experience,may be initially riots couldn't be controlled;  it would go a long way in mitigating apprehension of Muslims and assuring them. For sure they are not going to vote for you in large numbers but after all you aspire to be Prime Minister of all the Indians including Muslims.

Saturday, 26 October 2013

काल्बे सादिक का इंसानियत पर भरोसा

           सम्राट अशोक ने मौर्य साम्राज्य को कथित  रूप से अपने भाइयों की हत्या करने  के बाद जब हस्तगत किया तो पाया कि सारा भारत तो मौर्य सत्ता के अधीन है पर कलिंग प्रदेश नहीं. सम्राट अशोक संपूर्ण भारत को मौर्य सत्ता के अधीन लाने के लिए कृतसंकल्प थे और जब कलिंग ने मौर्य साम्राज्य की अधीनता स्वीकार करने से  इंकार कर दिया  तो उसे मौर्य साम्राज्य के आधिपत्य के अंतर्गत लाने के सम्राट अशोक ने भयंकर  युद्ध छेड दिया. सम्राट को उनकी दृढता,वीरता और तीव्र आक्रमण एवं  भयंकर युद्ध करने के कारण चंडाशोक कहा जाने लगा  था. कलिंगवासी स्वाधीनताप्रिय थे.उन्होने मौर्य साम्राज्य शक्ति का डटकर मुकाबला किया.पर मौर्य साम्राज्य की प्रचंड शक्ति के आगे वे कब तक टिक पाते. अपार जन और धन की हानि के पश्चात अंततोगत्वा कलिंग की पराजय हुई और वह मौर्य साम्राज्य का अधीनस्थ प्रदेश बन गया. पर सम्राट  अशोक ने अपनी विजय के पश्चात जब कलिंग को देखा तो उनका कठोर हृदय द्रवीभूत  होकर  करूणामय हो गया. आबाल-वृद्ध नर- नारी सहित कलिंग ने प्रबल प्रतिरोध किया था और बहुत बडी संख्या में लोग हताहत हुए थे तथा कलिंग की जनसंख्या का एक बडा भाग काल के गाल में समा गया था. सम्राट अशोक जीतकर भी हार गए थे.उन्हें मानवता की कीमत पर अपनी विजय व्यर्थ लगी थी और उन्होने भविष्य में कोई युद्ध न कर स्वयं को मानवता की  सेवा में समर्पित करने का संकल्प किया था . सम्राट बौद्ध धर्म की शरण में आ गए और इसके बाद धम्माशोक कहलाने लगे. इसके बाद के  सम्राट अशोक को सिर्फ भारत ही नहीं  अपितु दुनिया जानती है. सम्राट अशोक ने उस जमाने में ईजिप्ट और ग्रीस तक अपने कल्याणकारी कार्य यथा औषधालय खुलवाना और दुर्लभ औषधियों की व्यवस्था करवाना आदि संपन्न किए थे. सम्राट अशोक का चंडाशोक  से धम्माशोक तक का यह  सफर बतलाता है कि प्रत्येक मानव के साथ अपार संभावनाएं छिपी होती हैं.

          मौलाना काल्बे सादिक ने यह कह कर कि  यदि मोदी  2002 में अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं और यह ऐतबार दिलाने में समर्थ होते हैं कि उनमें बदलाव आ चुका है तो वे उनके लिए वोट दे सकते हैं इसी संभावना को तलाश करने की एक  कोशिश की है जो काबिले तारीफ है.  हर एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने अनुभवों से सीखते हुए परिपक्वता की दिशा में आगे बढता है और इस सनातन तथ्य पर भरोसा जताने वाला वाकई में इंसानियत पर अपना भरोसा जताता है.

Thursday, 24 October 2013

Rahul needs a better team of advisers.

          If we go through actions & campaign  trail of Rahul Gandhi following strategies emerge which he has adopted to counter Modi & BJP -

1.Present self as a different breed than the regular Congressmen eager to get rid  of corruption & power brokers.
2.Present self as a champion of downtrodden ,dalits & muslims.
3.Present himself as a torch bearer of Nehru-Gandhi family which has been wronged at the hands of terrorism despite of all the sacrifices.
3.Take credit for the schemes like MGNREGA, Food Security Bill which are considered as game changer by the Congress thinktank.
4.Portray BJP  as communal,pro-rich & pro-corporate,anti poor,anti muslim.
5.Portray Modi as an authoritarian,communal,pro-rich & pro-corporate,  a boasting person quoting exaggerated progress in Gujarat, wrongly  presenting himself as a person who can solve all the problems of the country .
6.Presenting  mother Soniya as a person dying to do something concrete for the downtrodden despite of her health problems and so much concerned regarding the same that she is  driven to tears due to this. Here it has to be remembered that this trend was started by Salman Khurshid when he portrayed Soniya as full of tears for Muslim youth who had to go through Batla encounter.
7.Present Nehru -Gandhi family including self as the one which may again become victim of terrorism.

          Simaltaneously it also becomes clear that Rahul consideres poors as the main congress constituency which could be won over by  doles like  food security bill & passing on subsidies into their account.

         Rahul should do some simple arithmetic to understand crux of the electoral politics. In any election committed voters don't make or mar a Government.In any case they are committed voters who vote for a particular party and would be voting for the same come what may.It is the floating voters who  play a greater role in formation of a Govt. as they shift their votes from one party to the other. Anti incumbency factor,dissatisfaction with the performance of a Govt.,promises by the other party and even caste and religion play here their role, and due to any of, or a combination of these reasons a floating voter decides in  favour of voting for a  new party ditching the old one he voted for.

          Image of the present P.M. has been sullied by the corruption charges against the Govt. and he is considered as a non-performer & dull. Modi has been taking advantage of this image of the Govt. and hammering his points well with the public.It would have been of great help to the Congress if it had chosen someone  who is performance oriented and looks to be full of energy for the prime job .In the present scenario it would be tough for the Congress to get votes of floating voters. Despite of all the propaganda against Modi,he is being considered as a performer and a person with promises and people are becoming ready to ignore authoritarian & communal image of Modi  giving him benefit of doubt as  they expect him to perform. Due to this Modi has has been  able to touch a chord with the middle classes and young voters. Modi has evolved himself- he has neither talked about Ram Mandir nor about article 370, rather he talks about development.

         Modi has  talked negatively about the P M ,Nehru Gandhi family , Congress and Congress rule but at the same time he lays down a road map of development before his audience.Modi is specially cautious when addressing young generation, economic,commerce,industrial & business forums. In front of them he talks only of economics & development. His negative & satirical  barbs are reserved for general public only.

         Under these circumstances Modi can't be countered by the present negative & emotive strategy  adopted by Rahul. Rather he has to explain to the public if voted to power what Congress plans to do in the next five years, what will be the roadmap of the future Congress Govt. , how Congress plans to improve upon its mistakes or the arena where the performance has been lacklusture and most important of all whether the Govt. will be led by a dynamic personality determined to mitigate woes  of public & nation and usher in a performance oriented regime with an environment of hope.Instead of reminding the public about tears Rahul should talk tough for the nation .Politics is not a tearjerker Indian movie ,it is a grand job of nation building.Certainly Rahul  is in need of a better team of advisers.


Monday, 21 October 2013

सोने का सपना (व्यंग्य/Satire)

          बाबा शोभन सरकार को सपने में सोने के भंडार दिखाई दे रहे हैं.  जो चमत्कार न दिखाए वह बाबा कैसा. चमत्कार की आशा ने बाबा शोभन सरकार को अखिल भारतीय व्यक्तित्व वाला तो बना ही दिया है. सोना मिलना न मिलना तो दूर की बात है. सोना न भी मिले तो भी अब दूर-दूर से से लोग  बाबा के पास आएंगे. बहुतों को बाबा के दर्शनों से ही पुण्यलाभ की आशा होगी  तो बहुतों को बाबा के  चमत्कार से अपनी समस्याएं उडनछू  हो जाने की उम्मीद बँधेगी . डौंडियाखेडा में तो आर्केयोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया खुदाई में लगा ही  हुआ है, कुछ लोगों ने बाबा के सपने के आधार पर ढाई हजार टन सोने की आशा में आदमपुर में गंगाघाट  पर स्वत:  ही खुदाई शुरू कर दी है.  बाबा के अनुयाइयों का कहना है कि बाबा तो खजाने की चर्चा नौ वर्षों से करते रहे हैं पर देश के ऊपर आर्थिक संकट देखकर उन्होंने उसे उपलब्ध कराने की दिशा में  अब कदम उठाया है. प्रश्न उठता है कि बाबा ने यह जानकारी देने के लिए इस संकट तक प्रतीक्षा क्यों की जब कि वे पहले ही हमारे देश को दुनिया की सुपरपावर बनाने की दिशा में सहायता कर सकते थे.

           मैं अपने बेटे को हमेशा यही बताता हूँ कि बेटा अपनी मेहनत पर भरोसा करना और कभी भी जिंदगी में चमत्कार की या जुगाड या शॉर्टकट की आशा मत करना. कुछ लोगों को जरूर जीवन में शॉर्टकट मिल जाते हैं पर अधिकांश लोगों के साथ ऐसा नहीं होता है. मैंने चमत्कारों के विषय में सुना भर है पर मुझे जीवन में प्रत्यक्ष कभी जीवन में चमत्कार के दर्शन नहीं हुए. जीवन में जो कुछ भी   हासिल हुआ वह सिर्फ मेहनत के बल पर ही मिल सका है. पर एक ऐसे प्रदेश में जहाँ लोगों के पास अवसरों की कमी है भले ही उसका कारण अदूरदर्शी राजनीतिज्ञ और जाति पर आधारित राजनीति तथा सर्वव्यापी भ्रष्टाचार हो ,जनता में चमत्कार के सहारे समस्याओं  का समाधान हो जाने की आशा जगना स्वाभाविक है  क्योंकि जुगाड,शार्टकट और चमत्कार छोडकर अब और किसी वस्तु का आसरा  उसके पास नहीं है.

          सोना मिलने संबंधी सपने के सच हो जाने  के चमत्कार की आशा ने तमाम लोगों के जीवन में जरूर बहार ला दी है. आर्केयोलॉजिकल सर्वे आफ  इंडिया जो सदैव धन और स्टाफ की कमी का रोना रोता रहता है और देश की तमाम धरोहरों पर एक दो बोर्ड लगा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है भले ही वह धराशाई होने की दिशा में आगे बढ  रही हो या फिर चोर और तस्कर वहाँ से अमूल्य स्थापत्य और मूर्तिकला की वस्तुएं चुराकर बेच रहे हों ;इस खुदाई के चलते लाइमलाइट में है और फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि उसके पास धन  या स्टाफ की कोई कमी  है.  मीडिया खुश है कि उसकी टी आर पी बढ रही है. केंद्र और प्रदेश दोनों ही स्थानों पर सत्तापक्ष खुश है कि लोग देश और जनता की सारी समस्याएं भूल कर खजाने की चर्चा में लगे हुए हैं.  प्रदेश की  सरकार के लिए यह बडे राहत की बात है क्योंकि  मुजफ्फरनगर के दंगों की याद को भुलाने के लिए यह खुदाई मुफीद दवा साबित हो रही है. देश की सरकार के एक मंत्री ने तो यहाँ तक आशा व्यक्त कर  दी  है कि सोना मिलने पर देश की सारी  समस्याओं का समाधान हो जाएगा, मुख्य विपक्षी दल के सारे अभियान की हवा  निकल जाएगी और  यही सरकार फिर से चुनाव जीत कर दोबारा सत्ता में वापस  आ जाएगी.  स्थानीय जनता खुश  है क्योंकि उसे लग रहा है कि इस सोने का कुछ न कुछ असर उसके  ऊपर जरूर पडेगा तथा और कुछ नहीं तो उसके क्षेत्र का ही कुछ विकास  हो जाएगा. राजा रामबख्श सिंह के वंशज खुश हैं कि उन्हें भी सोने  में उनका जायज हक मिलेगा.  ऐसे में बरबस ही गालिब का यह शेर याद आ जाता है-"दिल बहलाने को गालिब खयाल अच्छा है."

          बहुत साल पहले बहू बेगम के खजाने की खोज में पुरातत्व विभाग ने फैजाबाद में आई.टी.आई. के पीछे जंगे शहीद की मजार के आस-पास के क्षेत्र की खुदाई करवाई थी जो तीन-चार महीनों तक चलती रही .उन दिनों वहाँ दर्शनार्थियों का ताँता लगा रहता था. रोज अखबारों में लेख निकलते रहते थे.फिर एक दिन अचानक पुरातत्व विभाग  के लोग वहां से नदारद हो गए.  सुनाई दिया कि सरकार ने आगे खुदाई जारी करने के लिए ग्रांट नहीं  दी. स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि पुरातत्व विभाग के लोग फिर लौट कर वापस आएंगे और बहू बेगम का खजाना खोज निकालेंगे पर  वे वापस लौट  कर नहीं  आए.  जनता के लिए कुछ महीनों तक खजाने की चर्चा करना अच्छा शगल रहा. आम  जनता के एक  वर्ग का तो यहाँ तक मानना था कि पुरातत्व विभाग के लोगों को खजाना मिल गया जिसे लेकर वे चुपचाप चले गए.पर धीरे-धीरे खजाने की चर्चा समाप्त हो गई और आज कोई बहू बेगम के खजाने का नाम भी नहीं लेता.

          मैं तो इसी संशय में हूँ कि  सोने के भंडार के खोज संबंधी इस संपूर्ण कार्यकलाप की जो सरकारी  तत्वाधान में हो रहा है,अपने बेटे के समक्ष कैसे विवेचना  करूँ  और खुदा न खास्ता यदि  कहीं सोना मिल गया तो किस मुँह से अपने बेटे से कहूँगा कि बेटा जीवन में अपनी मेहनत पर भरोसा करना, भाग्य पर नहीं और न ही जीवन में किसी जुगाड या शार्टकट की आशा करना.
 
चलते-चलते

       बाबा शोभन सरकार ने एक पत्रकार को सपनों का महत्व बताते हुए कहा-
                  तुम एक सपना हो, मैं एक सपना हूँ
                  हर क्षण एक सपना है,यह जीवन एक सपना है

        इसके साथ मैं यह जोडना चाहूँगा-

                  जीवन में घटित हो कुछ अच्छा  सोचना जरूर ।
                  अच्छे,शुभ और कल्याण के सपने देखना जरूर ॥
                  पर  सपने हों  साकार  इसलिए मेहनत करना जरूर।
                  बुद्धि और हाथ  भगवान का दिया यही अपना है॥
                  इनके उपयोग से सपनों को सत्य करना धर्म अपना है।
                 हर क्षण एक सपना है,यह जीवन एक सपना है॥

Tuesday, 8 October 2013

देश में बदलाव लाने में मध्यम वर्ग सक्षम है!

          एक प्रसिद्ध लोककथा है कि एक बार एक सिंहशावक अपनी माँ से बिछड गया. भटकता हुआ वह सिंहशावक सियारों के एक झुंड के पास पहुँच  गया. सियारों को उस पर तरस आया और उन्होंने उसे अपने झुंड में शरण दे दी. सिंहशावक सियारों के बीच में रहते-रहते यह भी भूल गया कि वह सिंहशावक  है. उसने सियारों की आदतें अपना लीं. उसका उन्हीं के जैसा स्वभाव विकसित होने लगा. वह उन्हीं की भाषा और स्वर में बोलने लगा. एक दिन एक सिंह घूमता-घामता सियारों के उस झुंड के पास आ गया. सिंह को सियारों  के झुंड के बीच सिंह शावक को देख कर बडा आश्चर्य हुआ. सिंह ने सिंहशावक को आकर्षित करने के लिए दहाड की आवाज  निकाली.  पर सिंह की दहाड सुन कर सियारों का पूरा झुंड दूर भाग गया. उनके साथ सिंहशावक भी हुआँ-हुआँ करता दूर भाग गया.  सिंह एक बार फिर झुंड के पास गया और दहाडा. सियारों का झुंड एक बार फिर सिंह शावक समेत हुआँ-हुआँ करता दूर भाग गया.  सिंह सोच में पड गया. उसने रात होने का इंतजार किया. जब देर रात गए सियार झुंड के सभी सदस्य सिंहशावक समेत खा-पीकर और हल्ला-गुल्ला मचा कर,थक- हार कर   सो गए तब  सिंह दबे पाँव सियारों के झुंड के बीच गया और उसने सिंहशावक को पकड लिया. सिंहशावक हुआँ-हुआँ चिल्लाने लगा. उसकी आवाज सुन कर  सभी सियार जाग गए पर अपने बीच सिंह को देख कर चिल्ला कर  भागने लगे. पर सिंहशावक, सिंह की मजबूत गिरफ्त में होने के कारण नहीं भाग पाया. सिंह ने उससे कहा- "क्यों रे तू इन सियारों के  बीच क्या कर रहा है."  सिंह शावक कोई जवाब देने के बजाय हुआँ-हुआँ कर रोने लगा. शेर ने उसे चुप कराते हुए कहा- "देख तू मेरे ही  समान सिंह कुल का है और भटक कर इन सियारों के बीच रहने लगा है तथा इनके जैसा हो गया है.  तू सिंह है, आज से तू मेरे साथ  रह और सिंह है तो सिंह जैसा बन. चल सबसे पहले दहाडना सीख. मैं जैसे आवाज निकालता हूँ तू भी निकाल." यह कह कर सिंह दहाडा और सिंह शावक को दहाडने के लिए प्रेरित किया. सिंह शावक, सिंह की बातों से आश्वस्त हुआ और दहाडने की कोशिश करने लगा. पहली-दूसरी बार मरी-मरी सी आवाज निकली पर तीसरी  बार वह दहाडने में कामयाब हो  गया. चौथी बार वह जोर से दहाडने में कामयाब हो गया और  पाँचवीं बार तो उसने अपने नए- नए गुरू बने सिंह जैसी ही गर्जना भरी दहाड निकाली जिसे सुनकर सियारों का झुंड जो सिंह शावक से सिंह को बातें करता देख नजदीक आने का साहस जुटा रहा था  और दूर भाग गया. सिंह ने फिर सिंह शावक से कहा -" तूने अपनी ताकत  पहचानी?   पिछलग्गू नहीं राजा बन कर रह "

          भारतीय मध्यमवर्ग की हालत भी अभी कुछ दिनों पहले  तक सिंहशावक की सी थी जिसे अपनी ताकत का अहसास नहीं था तथा भ्रष्ट भारत, भ्रष्ट व्यवस्था, भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट अफसर को उसने अपनी नियति मान लिया था. पर अन्ना हजारे ने उसे दहाडना  सिखाया. दिल्ली में हुए निर्भया या दामिनी कांड ने उसे दहाड की ताकत का अहसास कराया. हाल ही में दागी नेताओं के पक्ष में लाए जा रहे अध्यादेश के विरोध में आवाज बुलंद कर उसने सत्तारूढ तबके को  अध्यादेश की वापसी के पक्ष  में अपना मत बदलने के लिए मजबूर कर दिया , वैसे ही जैसे सिंहशावक जब पूरी ताकत से दहाडा तो सियारों का झुंड भाग खडा हुआ. पर अपनी असली ताकत का अंदाजा शायद उसे अभी भी नहीं है.  उसे अभी भी यह विश्वास  नहीं है कि देश की सत्ता का सूत्र उसके हाथों में भी हो सकता  है. मध्यमवर्ग, जिसकी आबादी लगभग बीस करोड है, यदि पिछले चुनाव के आँकडों पर नजर डाले  तो उसे अपनी शक्ति पता चल जाएगी. वर्ष 2009 के चुनावों में कांग्रेस को 11.9 करोड वोट मिले थे जिनके बूते पर यह दल देश को प्रधानमंत्री देने में कामयाब रहा था. वर्ष 2014 के चुनावों में बारह करोड युवा वोटरों के देश की वोटर जमात में शामिल होने की उम्मीद है. इनमें लगभग तीन करोड वोटर मध्यमवर्गीय परिवारों  के प्रतिनिधि होंगे. मध्यमवर्गीय व्यक्ति किसी भी जाति या धर्म का हो उसकी आकांक्षाएं समान हैं- भ्रष्टाचारमुक्त भारत जहाँ हर व्यक्ति कानून के हाथों में खुद को महफूज समझे, जहाँ बहू-बेटियाँ बेहिचक घर से बाहर आ-जा सकें, जहाँ हर हाथ के लिए काम उपलब्ध हो, बिजली-पानी और सडक की मूलभूत जरूरतें पूरी होती हों और सबसे बडी बात जहाँ शिक्षा के लिए और अपने सपनों  को साकार करने के  लिए हर किसी को अवसर उपलब्ध हों क्योंकि मध्यमवर्ग की जरूरत और सपने सिर्फ रोटी के जुगाड तक सीमित नहीं हैं. पर इसे साकार करने के लिए मध्यमवर्ग को राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति विरक्ति का भाव छोड कर मतदान के लिए आगे आना होगा तथा उसे व्यवस्था परिवर्तन का जरिया बनाना होगा. इसके  अलावा  सियारों के झुंड में रहने वाले सिंह शावक की तरह उसने जो आदतें उसमें विकसित हो गई हैं-जातीय , सामुदायिक और धार्मिक आधारों पर विचार करने की ; उन्हें उसे देशहित में त्यागना होगा. नि:संदेह कार्ल मार्क्स की भविष्यवाणी के विपरीत मध्यमवर्ग का दायरा बढता गया है तथा समाज में उसकी स्थिति मजबूत हुई है पर यदि देश की राजनीति तथा प्रशासन  में परिवर्तन लाने के लिए वह इसका उपयोग नहीं करता है तो हम आगे भी भ्रष्ट व्यवस्था और भ्रष्ट प्रशासन के शिकार बने रहेंगे तथा एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को सहने के लिए मजबूर बने रहेंगे जिसे जन- आकांक्षाओं से कोई  लेना-देना नहीं है तथा स्व-परिपोषण ही जिसका एकमात्र उद्देश्य है.

Friday, 4 October 2013

देवालय से पहले क्या ?

          एक  बात जो देवालयों विशेषकर भव्य मंदिरों के संदर्भ  में मैंने देखी है वह यह कि गरीब व्यक्ति प्राय: इनमें घुसने की हिम्मत नहीं कर पाता. इन मंदिरों के बाहर भीख मांगने वालों की कतार तो आपको दिख जाएगी पर भीतर ईश्वर से याचना करने वाला कोई गरीब नहीं दिखेगा. इसे देखकर कई बार मेरे मस्तिष्क में यह प्रश्न उठा कि विपन्न व्यक्ति मंदिर में आने  से डरता क्यूँ है. क्या उसे ईश्वर की जरूरत नहीं है या उसका ईश्वर अलग है अथवा फिर भव्यता से डरकर वह मंदिर में नहीं आता. एकाध बार यदि गलती से ऐसा कोई चला आया तो उसे निकाले जाते हुए भी देखा है.


           सन उन्नीस सौ  अट्ठासी-नवासी में मैं कालेज की पढाई समाप्त करने के उपरांत शोधार्थी के रूप में नामांकित था और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. मेरे  एक शिक्षक जिन्होने छोटी  कक्षाओं में मुझे पढाया  था एक दिन मेरे घर आए और बताया कि हम लोगों के घर के  पास ही एक मंदिर निर्माणाधीन है  और  वे उसका  प्रबंधन  देख रहे हैं. उन्होंने यह भी बताया कि मंदिर में प्रतिदिन चौबीसों घंटे  रामधुन गाई जाएगी और इसके लिए कुछ व्यक्ति  मंदिर में रखे जाएंगे जिन्हें इस कार्य के लिए कुछ वेतन दिया जाएगा. इस वेतन की व्यवस्था करने के लिए उन्होंने नगर के कुछ धनाढ्य व्यक्तियों से बात कर रखी थी जिन्होंने प्रतिमाह इस उद्देश्य से धन देने का वायदा कर रखा था.  मैंने उनसे यह कहा कि इस धन का उपयोग कर क्यों नहीं आप मंदिर में एक डिस्पेंसरी खोलते जहाँ  गरीबों को चिकित्सा आदि की सुविधा उपलब्ध हो. इस पर उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति रामधुन के आयोजन के लिए धन देने के लिए तैयार हैं यदि मैं उनसे गरीबों  के लिए कुछ करने के नाम पर पैसा मांगूँगा तो वे देने को तैयार नहीं होंगे. उनकी समस्या वास्तविक थी. हिंदू समाज  के अनेक धनाढ्य व्यक्ति जहाँ धर्म के नाम पर पैसा खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं वहीं  परोपकार के नाम पर पैसा खर्च करने  से वे अपने हाथ पीछे खींच लेते हैं. अयोध्या ,मथुरा और काशी जैसे धार्मिक स्थानों में धार्मिक  संस्थानों और स्थापनाओं के पीछे काफी धन खर्च होता है और यह सब दान से ही आता है. पर इस्लाम में जकात जैसी व्यवस्था और ईसाई सेवा संस्थानों जैसी सेवा परम्परा हिंदू धर्म में नहीं है. इस दिशा में  कुछ शुरुआत सोच बदलने के परिणामस्वरूप हुई है और कई संस्थान  समाजसेवा और शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे हैं  पर हिंदू धर्मावलंबियों की क्षमता को देखते हुए यह प्रयास पर्याप्त नहीं हैं.


          ऐसे में दिल्ली में आयोजित युवा सम्मेलन में मोदी ने पहले शौचालय फिर देवालय की और धार्मिक मुद्दों के ऊपर विकास को प्राथमिकता देने की बात कह कर हिम्मत दिखाई है. मोदी के इस बयान  की आलोचना करने वालों को शायद यह याद नहीं है कि अहमदाबाद में सडकें चौडी किये जाने  के दौरान मोदी ने 200 से अधिक मंदिरों को स्थानांतरित करने  में कोई संकोच नहीं किया और उन्होंने विश्व हिंदू परिषद के विरोध की  भी कोई परवाह नहीं की. इसी कारण पिछले गुजरात चुनाव के दौरान विश्व हिंदू परिषद के अनेक लोग मोदी नहीं केशूभाई पटेल के साथ  थे.


         मोदी के बयान की जयराम रमेश ने अवसरवादिता कहकर आलोचना की है और  स्वयं के पहले के इससे मिलते-जुलते बयान की उस समय बी जे पी द्वारा आलोचना किए जाने की याद दिलाते हुए पार्टी चरित्र के दोहरेपन पर सवाल खडे किए हैं. जयराम रमेश की बात अपनी जगह जायज है. विकास एक ऐसा मुद्दा है  जहाँ सभी पार्टियों को एकमत होना चाहिए. विकास होने पर ही गरीब उस  स्थिति में पहुँच पाएगा जहाँ मंदिर की भव्यता उसे डराएगी नहीं और वह भी स्वयं को इस लायक समझेगा कि मंदिर में प्रवेश कर  ईश्वर से याचना कर  सके.  विकास ही सभी के लिए समान रूप से देवालय का द्वार खोल सकेगा.

Wednesday, 2 October 2013

संबंधों को न होने दें संवेदनाओं का शिकार

            आज राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का जन्मदिन है और आज के दिन उनके ऊपर बहुत  कुछ कहा तथा लिखा जा रहा है. बापू के चरित्र का जो सबसे महत्वपूर्ण गुण मुझे लगा वह यह कि उन्होने निरंतर स्वयं का विष्लेषण कर  स्वयं में सुधार किया और अपनी उन्नति को विशेषकर आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में सुनिश्चित किया. एक छोटी सी घटना इसका उदाहरण है. जब वे दक्षिण अफ्रीका में थे उन्होने अपने आश्रम में सभी के लिए शौचालय साफ करने का काम अनिवार्य कर दिया पर बा (उनकी पत्नी) इसके लिए नहीं तैयार थीं. एक दिन जब बापू के कहने पर भी उन्होंने यह कार्य नहीं किया तो बापू क्रोध में आ गए तथा उन्हें घर से निकल जाने के लिए कह दिया. इस पर बा ने उन्हें विवाह के समय लिए गए सात फेरों तथा वचनों का स्मरण कराया. गाँधीजी ने अपनी गलती का अहसास किया और बा से क्षमा माँगी. हम सबके जीवन में ऐसे अवसर आते हैं पर कई बार क्षमा माँगने में हमारा अहम आडे आ जाता है. कई बार हम अपने अहम के कारण अपना आत्मनिरीक्षण कर आत्मसुधार के लिए तैयार नहीं होते हैं. कई बार जब गलती दूसरे की होती है तो हम अपनी संवेदनशीलता के कारण क्षमा करने के लिए तैयार नहीं होते हैं. मैंने बापू के जीवन से इस विषय में सीख ग्रहण करने का प्रयास किया है तथा अपने  संदर्भ में इस संबंध में एक घटना का उल्लेख नीचे कर रहा हूँ.

            विगत उन्नीस अगस्त को प्रात: मैं  कार्यालय के लिए तैयार हो रहा था तभी मुझे  माँ की तबियत ज्यादा खराब लगने लगी और मुझे लगा कि उन्हें तुरंत अस्पताल में दाखिल करवाना श्रेयस्कर होगा. उनकी तबियत कुछ दिनों से खराब चल रही थी. पत्नी अपने विद्यालय जा चुकी थीं . मैंने कार्यालय में सूचना दे दी और माँ को लेकर अस्पताल चला गया. अस्पताल  में  डॉक्टर ने उनका परीक्षण किया और कहा कि उन्हें कुछ दिन अस्पताल में ही रहना होगा. मेरे घर से निकटस्थ अस्पतालों में यह अस्पताल साफ - सुथरा है. दूसरी बात, मरीज की सारी तीमारदारी अस्पताल के लोग स्वयं करते हैं और जैसी आवश्यक हो तद्नुसार डॉक्टर, न्यूट्रीशनिस्ट और डायटीशियन की सलाह के अनुसार मरीज को औषधि एवं आहार भी स्वयं अपने स्तर पर प्रदान करते हैं. घर के लोगों और आगंतुकों को नियत समय में ही मरीज से मिलने की इजाजत होती है. इस कारण थोडा मँहगा होने पर भी इस अस्पताल में मरीज को भर्ती करने के बाद घर वाले थोडा निश्चिंत रह पाते हैं. इन दिनों मेरे ऊपर कार्यालय के भी बहुत से कामों का भार था. 

      अगले दिन बीस अगस्त को सायं मैं कोलकाता के कालेज स्ट्रीट क्षेत्र के एक प्रेस में बैठ कर अपनी विभागीय पत्रिका को अंतिम रूप देने का कार्य कर रहा था जिसका मैं संपादक हूँ. पिछले कुछ दिनों से कोलकाता में काफी बारिश हो रही थी और उस दिन भी जब मैं दोपहर में प्रेस पहुँचा उसके थोडी देर के बाद ही बारिश शुरू हो गई. शाम को प्रेस के एक कर्मचारी ने बताया कि प्रेस के आस-पास पानी भरने लगा है. लगभग आठ बजे प्रेस के एक कर्मचारी ने फिर आकर बताया कि आस-पास दूर तक पानी भर गया है. मुझे स्यालदह से तीस किलोमीटर दूर लोकल ट्रेन पकड कर वापस जाना था, कार्यालय से गाडी लेकर भी नहीं आया था. इस कारण मैं चिंतित हो गया और बाकी काम किसी और दिन आकर समाप्त करने का निश्चय किया तथा प्रेस के मालिक को अपना इरादा बताकर नीचे उतर कर प्रेस के दरवाजे पर आ गया .

      प्रेस के दरवाजे के बाहर देखा तो घुटनों तक पानी भरा हुआ था जिसमें लोग अपने कपडे बटोरते-समेटते, सँभलते-गिरते चले जा रहे थे. बरसात का मौसम मेरा सर्वप्रिय मौसम है और बारिश जितने जोर की हो मुझे उतना ही मजा आता है. यदि कुछ अर्सा छोड दूँ तो मैं सदैव प्राकृतिक रूप से रमणीक स्थानों पर रहा हूँ जहाँ ड्रेनेज की अच्छी व्यवस्था विद्यमान है और जो नीचे नहीं हैं, इस कारण वहाँ जलभराव जैसी समस्या का कभी सामना नहीं करना पडा. इन दिनों भी गंगा के किनारे रहता हूँ और घर के बरामदे में बैठकर बरसात देखना मेरा प्रिय शगल है. पर कोलकाता के कालेज स्ट्रीट की इस तंग गली में बरसात का भरता पानी देखकर मेरी चिंता बढती जा रही थी,आनंद तो बहुत दूर की बात है. प्रेस के कर्मचारियों ने कहा कि गली में सवारी का कोई साधन नहीं मिलेगा क्योंकि बारिश का नजारा देखकर लोग अपने घरों को भाग गए हैं. प्रेस के एक कर्मचारी से मैंने आग्रह  किया कि वह मुख्य सडक पर मुझे किसी ऐसे स्थान तक पहुँचा दे जहाँ से स्यालदह के लिए कोई सवारी का साधन मिल जाए. उसने मुझे सेंट्रल एवेन्यू के एक आटो स्टैंड तक पहुँचा दिया जहाँ मुझे स्यालदह के लिए आटो मिल गया.

      स्यालदह पहुँचने पर मुझे ख्याल आया कि कल रक्षाबंधन है. मैंने बहन को फोन किया जो कोलकाता में ही रहती है. मुझे विश्वास था कि  माँ की तबियत को देखते हुए बहन ने कल मेरे यहाँ आने का कार्यक्रम बनाया होगा. इससे बहन माँ से भी मिल लेगी और हम सब रक्षाबंधन भी मना लेंगे. पर जब बहन को फोन किया तो उसने कहा कि जिस तरह की बरसात हो रही है उसे देखते हुए मैं नहीं आ पाऊँगी, इन्हें(मेरे बहनोई) कार्यालय के कामों के कारण फुर्सत नहीं है अन्यथा इनके साथ आ जाती. मैंने कहा- “देखो,मुझे माँ के पास अस्पताल भी जाना है, डॉक्टर से भी परामर्श के लिए मिलना है, बेहतर है कि तुम गाडी लेकर चली आओ”. बहन ने फिर कहा कि बरसात में कहाँ फंसना पडे भरोसा नहीं इसलिए मैं नहीं आऊँगी.अब मुझे बहन पर थोडा-थोडा गुस्सा आने लगा. मैंने उसे फिर से मनाने की कोशिश की- “देखो, मुख्य सडक पर जलभराव जैसी कोई समस्या नहीं इसलिए तुम आ जाओ”.पर बहन राजी नहीं हुई. मैं स्यालदह से लोकल पकड कर घर आ गया.

      घर पर पत्नी ने अगले दिन रक्षाबंधन मनाने के बारे में पूछा. मैंने उसे बहन से हुई बात के बारे में बता दिया. पत्नी ने पूछा – “तो फिर क्या आप उसके यहाँ जाएंगे”. ”देखो मुझे अस्पताल भी जाना है, बहुत से और भी जरूरी काम पडे हुए हैं; फिर मैं कहाँ जा पाऊँगा ” – मैंने कहा. दरससल मुझे बहन पर गुस्सा भी आ रहा था. मुझे लग रहा था कि माँ की तबियत खराब है,बहन को कम से कम उन्हें देखने तो आना चाहिए था.


      पर अगले दिन जब मैं सुबह उठा तो मैंने उक्त प्रसंग पर नए सिरे से विचार किया . मैंने सोचा छोटी-छोटी बातों और संवेदनशीलताओं के कारण भाई-बहन , पति-पत्नी, मित्र और सहकर्मियों के बीच रिश्ते इनका शिकार हो जाते हैं. संवेदनाएं इकट्ठा होते-होते जब स्थाई संवेदनशीलता में तब्दील हो जाती हैं तो हमारे रिश्तों में स्थाई दरार या खटास पैदा कर देती हैं. बहन के लिए उसकी अपनी दृष्टि से समस्याएं हो सकती हैं जो उसके लिए वास्तविक हो सकती हैं. किसी व्यक्ति के लिए उसका परसेप्शन ही उसके लिए रियलिटी या वास्तविकता होता है. मैं नहा –धो कर तैयार हो गया और पत्नी को बता दिया कि मैं लोकल पकड कर बहन के घर जा रहा हूँ और जल्दी ही राखी बँधवाकर माँ के पास अस्पताल जाने के समय से पहले लौट आऊँगा. जबसे कोलकाता तैनाती पर  आया हूँ, राखी बँधवाने का क्रम नहीं टूटा है तो इस बार क्यूँ टूटे.